नान-घोटाले में बड़े अफसरों पर कार्रवाई इतनी देर से कि..

संपादकीय
20 जुलाई 2015

छत्तीसगढ़ के सैकड़ों करोड़ के नान घोटाले की खबरें जल्द खत्म नहीं होना है। आज से कांग्रेस के हमले की धार कुछ कम हो सकती है, क्योंकि दो बड़े अफसरों के खिलाफ राज्य सरकार द्वारा केन्द्र सरकार से मांगी गई मुकदमे की इजाजत आ गई है, लेकिन फिर भी यह घोटाला इतना बड़ा, इतना संगठित, और इतने गरीब लोगों के हक को छीनने वाला है कि यह कांग्रेस के हाथ एक हथियार बने रहेगा। और फिर यह तो आने वाले दिन ही बताएंगे कि सत्तारूढ़ पार्टी को अब तक के चुनावों में जिस राशन-रियायत नीति का नफा मिलते रहा है, उसे इसी राशन-घोटाले के इस मामले से कितना नुकसान मिलेगा। लेकिन आज की तारीख में केन्द्र सरकार से नान घोटाले के दो सबसे बड़े अफसरों पर मुकदमे की राह साफ हो चुकी है, और एसीबी ने अदालत में राज्य सेवा के बाकी जिन अफसरों-कर्मचारियों के खिलाफ चार्जशीट दाखिल की थी, उसमें इन दो आईएएस अफसरों के जुर्म के बारे में बड़े खुलासे से लिखा था। इसलिए अब यह जाहिर है कि इन पर मुकदमा टल नहीं सकता। 
लेकिन आज सवाल यह है कि नान-घोटाला सामने आने के बाद, इन दो अफसरों के भ्रष्टाचार की लंबी-चौड़ी टेलीफोन रिकॉर्डिंग सरकार के पास होने के बाद, क्या इन पर मुकदमे की इजाजत में इतना समय लगना था? सरकार के कुछ लोगों का यह मानना है कि मुकदमे की इजाजत के पहले सरकार को मामले को तौलना पड़ता है, और उसके बाद ही इजाजत दी जा सकती है। लेकिन इसी सरकार के कुछ दूसरे उतने ही ताकतवर अफसरों का यह भी कहना है कि सरकार ने समय पर कार्रवाई करने की अपनी नीयत साबित करने में देर कर दी। हमारा यह मानना है कि ऐसी औपचारिकता को पूरा करने में सरकार को महीनों लगाने के बजाय कुछ दिनों के भीतर ही रात-दिन मेहनत करके अपनी नीयत और अपनी जिम्मेदारी की साख बचानी चाहिए थी। आज जब केन्द्र सरकार से यह इजाजत आई है, तो प्रदेश में राज्य सरकार की किसी कोशिश को कोई वाहवाही इससे नहीं मिल सकती। यह बहुत देर से हुई कार्रवाई है, जो कि अब इतनी छोटी है कि वह अपना महत्व खो बैठी है। लोकतंत्र में सरकार या सत्तारूढ़ पार्टी को जनधारणा का सम्मान भी करना चाहिए। 
जब जनधारणा और सरकार की खुद की जांच एजेंसी यह मान चुकी थी कि इन दो अफसरों की अगुवाई में भ्रष्टाचार का पूरा गिरोह काम कर रहा था, राज्य को लूट रहा था, गरीब जनता के खून को चूस रहा था, तब सरकार इजाजत देने में महीनों लगा रही थी। यह मामला इस तरह का नहीं था कि जिसकी फाईलों पर सरकार के दो-तीन विभाग महीनों गंवा देते। जिस तरह किसी को दिल का दौरा पडऩे पर शुरुआती एक घंटे में इलाज मिल जाने को गोल्डन अवर (सुनहरा घंटा) कहा जाता है, वैसा ही हाल सरकार की साख का होता है। छत्तीसगढ़ सरकार ने जितना समय इस इजाजत पर गंवाया है, उससे उसे नान-घोटाले के नुकसान का दुगुना नुकसान झेलना पड़ रहा है। जनधारणा में, जनता की नजरों में इस तरह गिरने से इस सरकार को यह सबक लेना चाहिए कि भ्रष्टाचार के बाकी मामलों की फाईलों पर सरकार जिस तरह से बैठी हुई है, उसे वहां से हिलना चाहिए, और भ्रष्ट लोगों को आज सरकार हांकने से परे करना चाहिए। आज भी इस प्रदेश में वन विभाग के कुख्यात आरा मिल घोटाले जैसे भ्रष्टाचार के बहुत से मामले हैं, जिनमें कुसूरवार पाए गए लोग आज भी सरकार के ताकतवर ओहदों पर बने हुए हैं, और इससे जनता के बीच यह साफ संदेश जाता है कि सरकार भ्रष्ट लोगों को बचा रही है। 
छत्तीसगढ़ सरकार के पास आज भी अगले चुनाव के पहले का करीब तीन बरस का समय ऐसा है जिसमें वह भ्रष्टाचार से छुटकारा पाने की कोशिशों की साख बना सकती है, लेकिन इसके लिए उसे ठोस मेहनत करनी पड़ेगी। आज ऐसी नीयत दिखाई नहीं पड़ती है, और सरकार के ताकतवर और हमदर्द अफसर इस बात पर निजी चर्चा में भारी अफसोस जाहिर करते हैं कि किस तरह सरकार ने नान-घोटाले में समय रहते कार्रवाई नहीं की, इन अफसरों को छुट्टी पर भेजने जैसा एक आसान रास्ता भी इस्तेमाल नहीं किया, और अब जब विधानसभा शुरू हो रही है, तो यह कार्रवाई करती हुई सरकार गंवाई हुई साख वापिस नहीं पा सकती। अब भी सरकार को बाकी बची हुई फाईलों पर से धूल हटाकर, या खुद उन पर से हटकर, इंसाफ होने देना चाहिए।

कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें