छत्तीसगढ़ में संगठित भ्रष्टाचार के खिलाफ कड़े इरादे जरूरी

संपादकीय
26 जून 2015

छत्तीसगढ़ में इन दिनों नागरिक आपूर्ति निगम का भ्रष्टाचार महीनों से खबरों में तैर रहा है। जब से वहां एसीबी का छापा पड़ा, और छोटे कर्मचारी गिरफ्तार हुए, कुछ बड़े अफसरों के नाम सामने आए, और अदालत में चार्जशीट पेश हुई, तो लोगों को पता लगा कि भ्रष्टाचार का पैमाना क्या था। जिस संगठित भ्रष्टाचार की वजह से प्रदेश के सबसे गरीब लोगों को चावल की जगह कनकी और धूल दिया जा रहा था, उस संगठित भ्रष्टाचार में मंत्री के नाम पर दस लाख रूपए दर्ज मिले, तो अफसरों के नाम पर करोड़ों रूपए की रिश्वत पहुंचाना दर्ज मिला। अब सवाल यह है कि जिन अफसरों को प्रदेश के सबसे गरीब लोगों के हक के रियायती चावल में भ्रष्टाचार से परहेज नहीं हुआ, उन अफसरों को क्यों बख्शा जाए? ऐसे अफसरों के नाम खबरों में हैं, एसीबी के रिकॉर्ड में हैं, एसीबी के पास टेलीफोन टेपिंग में उनकी आवाज में लेन-देन भी दर्ज है, लेकिन वे सरकारी कुर्सियों पर बैठे काम कर रहे हैं। मजे की बात यह है कि नान घोटाले के केन्द्र में एक मंझले दर्जे का जो अफसर पकड़ाया है, जिसके सरकारी दफ्तर के कमरे से पौने दो करोड़ रूपए नगद बरामद हुए हैं, वह अफसर छत्तीसगढ़ भाजपा के सबसे सीनियर सांसद का कर्मचारी भी रहा है, और पहले भ्रष्टाचार में पकड़ाने के बाद भी वह मामला झेलते हुए वह फिर मोटी कमाई की इस कुर्सी पर बैठकर प्रदेश के गरीब लोगों के पेट से दाने निकालकर अफसरों को करोड़ों रूपए पहुंचा रहा था। 
राज्य सरकार के पास ऐसे बहुत से और अफसर हैं जो कि भ्रष्टाचार के बड़े स्थापित मामलों में पकड़ाए हुए हैं, कुछ रंगे हाथों रिश्वत लेते पकड़ाए हैं, बहुत से लोग अनुपातहीन संपत्ति के मामलों में पकड़ाए हैं, और कई अफसर भयानक घोटालों में जांच रिपोर्ट में कुसूरवार साबित हो चुके हैं। लेकिन ऐसे तमाम लोग काली कमाई की ताकत से राज्य में बड़ी ताकत और बड़े असर के साथ सरकार के कमाऊ दफ्तरों को हांक रहे हैं। छत्तीसगढ़ सरकार को भ्रष्टाचार के मामलों में नई राजनीतिक शब्दावली के एक शब्द, जीरो टॉलरेंस, का इस्तेमाल करना चाहिए, और जिन अफसरों के खिलाफ बर्खास्तगी नहीं भी की जा सकती, उनको जबरिया छुट्टी पर भेजने से लेकर बिना काम बिठाने तक बहुत से मौजूद प्रशासनिक विकल्पों से प्रताडि़त करना चाहिए। अगर ईमानदार और बेईमान के बीच सरकार में कोई फर्क ही नहीं होगा, जब करोड़ों के घोटाले वाले लोग सरकार में उसी तरह ताकतवर और कमाऊ कुर्सियों पर काबिज रहेंगे, तो बाकी लोगों का हौसला भ्रष्टाचार के लिए बढ़ते चलेगा। 
अधिक हैरानी इस बात को लेकर होती है कि सरकार की बहुत सी महत्वपूर्ण कुर्सियों पर ऐसे लोग बैठे हुए हैं जिनको लेकर जनधारणा ईमानदारी की बनी हुई है। ऐसे में संगठित भ्रष्टाचार करने वाले मुजरिम-अफसरों को रियायत क्यों और कैसे मिलती है यह समझ से परे है। सरकार के पास भ्रष्ट अफसरों पर कार्रवाई करने के लिए मामले बरसों से पड़े रहते हैं। यह सिलसिला खत्म होना चाहिए। जांच एजेंसियों को किसी तरह की इजाजत की जरूरत नहीं होनी चाहिए, क्योंकि भारत की न्यायपालिका का हाल यह है कि चाहे सौ कुसूरवार छूट जाएं, एक भी बेकसूर को सजा नहीं मिलनी चाहिए, और इसलिए जांच एजेंसियां सिर्फ बहुत पुख्ता मामलों में ही अदालत तक जाती हैं। भ्रष्टाचार के बहुत से मामले तो सुबूत और गवाह न मिलने से जांच एजेंसियां वैसे भी हार चुके मान लेती हैं। ऐसे में सरकार से इजाजत के लिए अगर मामले बरसों पड़े रहें, लोकायुक्त से कार्रवाई की सिफारिश के बाद भ्रष्ट लोगों के मामले बरसों पड़े रहें, तो राज्य में भ्रष्टाचार कभी कम नहीं हो सकता। 
नान के इस भ्रष्टाचार के केस में जिस तरह से टेलीफोन टैपिंग की गई है, और भ्रष्ट लेन-देन की बातचीत रिकॉर्ड की गई है, वह अगर एक सही कानूनी कार्रवाई थी, तो उसका इस्तेमाल और मामलों में भी करना चाहिए। इसके अलावा सरकार अपने उन दफ्तरों में खुफिया रिकॉर्डिंग बिना किसी कानूनी मंजूरी के भी करवा सकती है जहां पर संगठित भ्रष्टाचार जाना-माना है। सिर्फ टेलीफोन और इंटरनेट की निगरानी के लिए केन्द्र सरकार के कानून के तहत औपचारिकता पूरी करनी पड़ती है, लेकिन किसी दफ्तर में कैमरा या माइक्रोफोन छुपाने के लिए राज्य सरकार को किसी केन्द्रीय कानून के तहत मंजूरी नहीं लेनी पड़ती। यह काम बड़े पैमाने पर किया जाना चाहिए, और राज्य सरकार सूचना तकनीक में कई तरह की कामयाबी के दावे करती है, भ्रष्टाचार रोकने के लिए डिजिटल खुफिया उपकरणों का इस्तेमाल एक योजना के तहत किया जाना चाहिए, इस पर किया गया खर्च राज्य को उससे कई गुना अधिक बचत करके देगा।

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