भीड़ में हिन्दुस्तानी दिमाग खो बैठते हैं

संपादकीय
14 जुलाई 2015

आन्ध्र में गोदावरी तट पर आज से शुरू हुए एक हिन्दू पर्व पर नदी में नहाने के लिए भीड़ टूट पड़ी, और दो दर्जन से अधिक मौतें अब तक हो चुकी हैं। आज का यह त्यौहार, पुष्करालु, 144 बरस में एक बार आने वाला है, और आने वाले दिनों में आन्ध्र-तेलंगाना के गोदावरी-घाटों पर तीन-चार करोड़ श्रद्धालुओं के आने का अंदाज है। हर बरस भारत में एक-दो ऐसे मामले हो ही जाते हैं जिनमें दर्जनों लोग त्यौहारों पर, या तीर्थस्थानों पर इस तरह से मारे जाते हैं। लेकिन भारत अकेली ऐसी जगह नहीं है। हज का इंतजाम करने वाले सउदी अरब में सरकार एक हाथ में है, लेकिन वहां भी भगदड़ में एक बार में सैकड़ों लोगों के मरने का मामला दर्ज हो चुका है। 
और यह धर्म से अधिक भीड़ की बात है, दुनिया के सभ्य देशों में भीड़ भी कम रहती है, और लोग सभ्य भी रहते हैं। हिन्दुस्तान जैसे देश में जहां भीड़ रहती है, वहां धर्म रहे या न रहे, उस भीड़ में मौजूद सिरों के अलग-अलग दिमाग काम करना बंद कर देते हैं, और लोग एक भीड़ की तरह बर्ताव करने लगते हैं। ऐसा राजनीतिक रैलियों में भी होता है, किसी सम्प्रदाय या जाति के कार्यक्रमों में भी होता है, और ट्रेन के सफर में कई बार यह देखने में आता है कि वर्दीधारी फौजी भी कानून अपने हाथ में लेकर बाकी लोगों के खिलाफ जुर्म करने पर उतारू हो जाते हैं। जो लोग आम जुबान में अधिक बदकिस्मत होते हैं, उन्हें ट्रेन के सफर में किसी बारात वाले डिब्बे में सीट मिलती है, और पूरा सफर, अंग्रेजी के सफर (तकलीफ और फजीहत) में तब्दील हो जाता है। 
यह लोकतंत्र के विकसित होने का एक सुबूत होता है कि लोग सार्वजनिक जगहों पर अपनी जिम्मेदारियों और दूसरों के अधिकारों का सम्मान करते हैं। भारत के अधिकतर मौकों पर लोग अपने अधिकारों और दूसरों की जिम्मेदारियों के लिए एकदम चौकन्ना रहते हैं, और ऐसे में ही भगदड़ की मौतें होती हैं, लोग हिंसा करते हैं, और कानून की धज्जियां उड़ा दी जाती हैं। जिन लोगों ने दुनिया के सभ्य देश देखे हैं, उनको यह मलाल होता है कि वे असभ्य देशों में क्यों पैदा हुए हैं? और भारत तो उन देशों में से है जहां पर हिन्दू धर्म का यह दावा है कि यहां पर देवता भी जन्म लेने को तरसते हैं। यह हमारी कमसमझ से परे की बात है कि किस तरह के देवता यहां जन्म लेने को तरसते होंगे? यह जरूर हो सकता है कि हर देवता को यहां जितने भक्त नसीब होते हैं, गिनती में उतने भक्त दुनिया के कम ही देशों में, कम ही देवताओं को मिलते होंगे। इस एक वजह के अलावा और कोई वजह हमें दिखती नहीं है, और इस देश के अधिकतर तीर्थस्थानों को देखें, तो वहां पर गंदगी, अराजकता, पंडों जैसे लोगों की गुंडागर्दी इस कदर हावी है, लोग गंगा तक को इतनी मैली कर चुके हैं, कि अब शायद वह कभी भी साफ नहीं हो पाएगी, और ऐसे देश में नदियों में डुबकी लगाने को लोग ऐसे टूट पड़ते हैं कि चाहे जान चली जाए, पर पहली डुबकी नसीब हो। और आम लोगों के साथ-साथ साधुओं के अखाड़ों में भी इस बात को लेकर तलवारें खिंचती हैं कि पहले कौन सा अखाड़ा शाही स्नान करेगा। 
भारत में कई तबकों को अपनी संस्कृति को लेकर बड़ा घमंड है, लेकिन आज इस देश में उसी संस्कृति के पालन और प्रदर्शन को लेकर जिस तरह की असभ्य हिंसा दिखाई जाती है, वह तो ऐसी किसी असली या काल्पनिक संस्कृति को भी बदनाम करने के सिवाय कुछ नहीं करती। हम ऐसे हादसों के लिए सरकार के खिलाफ लिखने की एक सीमा मानते हैं। जब दसियों लाख लोगों की भीड़ नियम-कायदे तोडऩे पर आमादा हो, हिंसा पर आमादा हो, जानलेवा हड़बड़ी में पड़ी हो, तो उनको काबू करने के लिए कोई भी सरकार फौज तो तैनात कर नहीं सकती। लोगों के बीच लोकतंत्र, न्याय, सभ्यता, नियम-कायदे, और दूसरों का सम्मान रातों-रात नहीं आ सकता। इस देश की राजनीतिक, धार्मिक, और सामाजिक ताकतों ने जिस तरह से लोगों को अराजक बनाया है, उसके चलते ऐसी तबाही आती रहेगी। लेकिन लाशों की गिनती कम होने पर या न होने पर जिस तरह की अराजकता देश में रोजाना कदम-कदम पर  खड़ी होती है, उसकी तो गिनती भी नहीं होती। यह तस्वीर किसी भी सभ्य देश में नहीं खप सकती, और हिन्दुस्तान में आस्था के नाम पर सब कुछ खप जाता है। 

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