इस देश को पतलून के साथ-साथ सभ्यता भी आयात करने की जरूरतेे

संपादकीय
25 जून 2015

देश भर से हर हफ्ते कोई न कोई ऐसी खबर आती है जिसके बारे में पिछले कुछ बरसों में ऑनर-किलिंग शब्द का इस्तेमाल होने लगा है। इसका मतलब मोटे तौर पर परिवार के लोगों द्वारा अपनी बेटी की हत्या है जिसकी मोहब्बत या शादी से परिवार असहमत रहता है, और सामाजिक शर्मिंदगी से बचने के लिए बेटी को अकेले ही, या कि उसके प्रेमी या पति के साथ मार डाला जाता है। उत्तर भारत के कुछ राज्यों से आए दिन हिंसा की ऐसी खबरें आती हैं। छत्तीसगढ़ जैसे राज्य ऐसी हिंसा से अभी दूर हैं, लेकिन यहां भी हर कुछ हफ्तों में ऐसी खबर आती है कि प्रेम के बाद शादी करने न मिलने पर लड़के-लड़कियों ने आत्महत्या कर ली। अभी दो दिन पहले की एक खबर है कि एक लड़की अपने असफल प्रेम के बाद प्रेमी के घर जाकर वहां के पेड़ से फांसी लगा लेती है, और लड़की के मां-बाप उसकी लाश लेने से भी मना कर देते हैं, उनको सामाजिक बहिष्कार का खतरा दिखता है, या फिर उनकी निजी नफरत बेटी की लाश पर भी हावी हो जाती है। ऐसे में मरने वाली की एक सहपाठी छात्रा पोस्टमार्टम के बाद उसकी लाश को लेती है, और खुद अंतिम संस्कार करती है।
भारत में धर्म और जाति के आधार पर, आर्थिक स्थिति या अहंकार के आधार पर प्रेम विवाह के खिलाफ मां-बाप उसी तरह से दुश्मन बनकर खड़े हो जाते हैं जिस तरह शहंशाह अकबर सलीम और अनारकली के खिलाफ उठकर खड़े हो गए थे, और आखिर में उन्होंने अनारकली को दीवार में चुनवाकर दम लिया था। अब सलीम तो अकबर का वारिस था, इसलिए खानदान के चिराग को तो दफन किया नहीं जा सकता, इसलिए एक बांदी अनारकली को दीवार में दफन कर देने की कहानी है। लेकिन भारत की असल जिंदगी में शहंशाह अकबर कदम-कदम पर हैं, और औसतन हर दिन किसी न किसी शहर में एक सलीम या एक अनारकली को खुदकुशी करनी पड़ती है, और हर कुछ दिनों में कोई न कोई अकबर किसी न किसी को दीवार में चुनवा देता है। 
यह समाज दिमागी बीमारी का शिकार है। इसे धर्म और जाति की अपनी सामाजिक परंपराओं से इतनी मोहब्बत है, अपने खुद के तानाशाह मिजाज की इतनी फिक्र है कि एक बाप बेटी की लाश को देखने से भी मना कर देता है। यह भयानक नौबत हिन्दुस्तान में नौजवान पीढ़ी के भावनात्मक विकास की भी दुश्मन है। जहां पूरी की पूरी नौजवान पीढ़ी दर्जनभर किस्म की अलग-अलग कुंठाओं के बीच जीती है, जहां उसे स्कूल या कॉलेज के दाखिले में भ्रष्टाचार के चलते अपना हक छिन जाने की नौबत दिखती है, जहां नौकरी में भ्रष्टाचार की वजह से उसे बराबरी का हक नहीं मिलता, जहां दलित और आदिवासी तबके की नौजवान पीढ़ी को अब इक्कीसवीं सदी में भी अछूत कहकर मारा जाता है, जहां अल्पसंख्यक तबके के लड़के-लड़कियों को इस मानसिक तनाव के बीच जीना पड़ता है कि उन्हें पाकिस्तान जाने को कहा जा रहा है, जहां पर पढ़ाई-लिखाई के बाद भविष्य बनने की कोई गारंटी नहीं है, और राजनीति से लेकर नौकरियों तक कुनबापरस्ती दिखती है, वैसी कुंठाओं के बीच नौजवान पीढ़ी को अपनी निजी जिंदगी में अपनी भावनाओं के इस्तेमाल का मौका भी अगर नहीं मिलता, तो उस पीढ़ी से यह देश किस तरह की उत्पादकता और योगदान की उम्मीद कर सकता है? 
दुनिया में आज जो सभ्य देश हैं, वे अपनी नई पीढ़ी को हर तरह की आजादी देते हैं, और यही वजह है कि वहां के लोग चांद को कुचलकर आ जाते हैं, आविष्कारों से लेकर औद्योगिक उत्पादन तक सबसे आगे रहते हैं, दुनिया भर के शोध कार्यों में आगे रहते हैं, और खुशी से जिंदगी जीते हैं। यह भारत जैसे दकियानूसी और धर्मान्ध, जातिवादी और साम्प्रदायिक देश में ही मुमकिन है कि इंसानों को कुचलकर एक सामाजिक व्यवस्था, एक राजनीतिक नफरत लादी जाती है। इसमें ऐसे मां-बाप भी शामिल हैं, जिन्होंने एक पूरी पीढ़ी पहले खुद प्रेम विवाह किया था, या प्रेम विवाह का समर्थन किया था। वैसे मां-बाप भी आज अपने बच्चों को कुचलने के लिए अपने धर्म या जाति का, अपने परिवार या अपनी झूठी शान का अहंकार इस्तेमाल करते हैं, और अपने बच्चों की लाश को देखने से भी मना कर देते हैं। यह देश कभी भी, ऐसी नौबत में आज से हजार साल बाद भी अपनी संभावनाओं को नहीं छू सकता। यह एक हिंसक और असभ्य देश है, और तरह-तरह से इसकी वैज्ञानिक सोच को खत्म किया जा रहा है। आज यह देश एक झूठे इतिहास का हवाला देते हुए उस पर घमंड करता है, जबकि यह बात-बात में पश्चिम के विज्ञान और पश्चिम के तकनीक का मोहताज है। आज पश्चिम के बिना हिन्दुस्तान के लोग पतलून तक नहीं पहन सकते, और अपने घमंड को पहनकर घूम रहे हैं। ऐसे देश को पश्चिम से सामानों के साथ-साथ निजी और सामाजिक आजादी की सभ्यता भी आयात करनी चाहिए जो कि सदी गुजर जाने पर भी भारत में बढ़ नहीं पा रही है। 

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