क्रिकेट नाम के जुर्म में चोर-चोर मौसेरे भाई

संपादकीय
24 जून 2015

ललित मोदी के मामले में कल से भाजपा ने सोनिया गांधी और कांग्रेस को निशाने पर लिया है, और इसमें कुछ भी अटपटा नहीं है। जब भारत में हजारों करोड़ सालाना के क्रिकेट-कारोबार की खबरें आती हैं, तो यह साफ दिखता है कि किस तरह उसमें भाजपा के बड़े-बड़े मंत्री, कांग्रेस के अपने वक्त के बड़े-बड़े मंत्री, शरद पवार जैसे बड़े-बड़े खरबपति समझे जाने वाले नेता, हर कोई भारतीय क्रिकेट के बदन पर परजीवी पंछियों की तरह बैठे अपना पेट भरते हैं। इस एक खजाने को दुहने और लूटने के मामले में किसी पार्टी को कोई परहेज नहीं दिखता, और ललित मोदी हो, या कि क्रिकेट का कोई और मुजरिम, उनका साथ देने के लिए देश के सबसे ताकतवर लोग कूद पड़ते हैं, क्योंकि उनके पास इतनी बड़ी दौलत है, और इतने मनमानी हक हैं कि उनकी मेहरबानी पाने के लिए हिन्दुस्तान के सबसे ताकतवर लोग कटोरा लिए कतार लगा लेते हैं। 
सरकारी कुर्सी पर, या विपक्ष के संवैधानिक पद पर बैठकर इन पर मेहरबानी करने के मामले में विदेश मंत्री सुषमा स्वराज अकेले बहुत बुरी तरह फंसी जरूर हैं, लेकिन हकीकत यह है कि इस देश में ऐसे कौन से ताकतवर लोग रहे जिन्होंने ललित मोदी के साथ रोटी-बोटी तोड़ी न हो? और जहां तक सुषमा स्वराज का सवाल है तो लोगों को उनकी वह तस्वीर याद है जो कि कर्नाटक की लोहा खदानों को लूटने वाले दो रेड्डी भाईयों के सिर पर हाथ रखकर उन्होंने खुशी-खुशी खिंचवाई थी। और राजनीति में मुजरिमों को बढ़ावा देने की जो संस्कृति भारत में व्यापक है, उसमें वे अकेली नहीं हैं। कांग्रेस का लगाया हुआ भ्रष्टाचार का बरगद कई शाखाओं को दूसरी पार्टियों तक पहुंचा चुका है, और अब देश में वामपंथियों को छोड़कर कोई पार्टी ऐसी नहीं बची है जो कि लूटपाट का कोई भी मौका छोड़ती हो। अधिकतर पार्टियों में नेता, मंत्री, और संगठन भी संगठित भ्रष्टाचार में लग जाते हैं, और जिसके हाथ जो लग जाए, उसी से वे अपनी आने वाली पीढिय़ों का इंतजाम कर लेते हैं। 
अब प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की बोलती इसलिए बंद है कि कल तक वे चुनावी सभाओं में घूम-घूमकर बेटे, दामाद, बेटी, भाई, ऐसे रिश्तों पर राजनीतिक मेहरबानियों को गिनाते थे, और भाई-भतीजावाद के नाम से कुख्यात भ्रष्टाचार पर हमला करते थे। अब आज उन्हीं की पार्टी की दो बहुत ताकतवर और प्रमुख महिला नेताओं को उनके परिवारों के साथ भ्रष्ट आचरण, और अनैतिक, असंवैधानिक काम करते हुए पकड़ा गया है, अब वे बोलें भी तो क्या बोलें? कमोबेश यही हाल कांग्रेस के नेताओं और पवार जैसे नेताओं का हो सकता है, अगर ललित मोदी अपनी आलमारी से और गंदगी निकालकर बिखेरना चालू करे। अब तक तो इंटरपोल का एक मुखिया रहा हुआ आदमी भी खबरों में आ चुका है जिसे कि ललित मोदी ने अपना भाई कहकर पेश किया है। यह बहुत ही गजब का मामला है जिसमें भाई-भतीजावाद की भारतीय संस्कृति को भारत के एक भगोड़े ललित मोदी ने अंग्रेजों की जमीन तक ले जाकर इंटरपोल के मुखिया को अपना भाई साबित कर दिया है। 
दुनिया में पैसे से बड़ी शायद ही कोई ताकत होती है। इतने बड़े पैसे से जब ललित मोदी और अदानी जैसे लोग मिलकर दुनिया के कारोबार पर कब्जा करने की कोशिश करते हैं, तो फिर योग-ध्यान में ध्यानस्थ भारतीय प्रधानमंत्री भी आंखें नहीं खोलते, सुनने के लिए कान नहीं खोलते, बोलने के लिए मुंह नहीं खोलते। अब सवाल यह है कि भारतीय लोकतंत्र में जब हर बड़ी पार्टी क्रिकेट नाम के जुर्म में भागीदार है, तो जनता कर भी क्या सकती है? अगर इस देश के अगले चुनाव इस मुद्दे पर तय हों, कि जिस पार्टी ने क्रिकेट के जुर्म का पैसा नहीं खाया है, उसकी सरकार बनाई जाए, तो हो सकता है कि देश में सिर्फ वामपंथी पार्टियां बच जाएं। लेकिन लोकतंत्र में जहां कि नैतिकता की मिसालें गढ़ी जानी चाहिए, वहां पर अनैतिकता के नए-नए पैमाने सामने आ रहे हैं, और उसे बर्दाश्त करने की चुप्पी के भी। बड़ी-बड़ी पार्टियों के लोग जिस तरह मौसेरे भाई साबित हो रहे हैं, उन्हें देखकर पेशेवर चोर भी शर्म में डूब रहे हैं।

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