आदिवासी हकों के साथ ऐसा जुर्म नक्सलियों के बने रहने की गारंटी

संपादकीय
23 जुलाई 2015

देश भर में संसद से विधानसभाओं तक में भ्रष्टाचार की बड़ी खबरें इस कदर छाई हुई हैं कि दिल्ली में छत्तीसगढ़ की एक खबर को कोई नामलेवा नहीं मिला। यहां के आदिवासी बस्तर से जिन प्रतिभाशाली आदिवासी बच्चों को लाकर सरकारी खर्च पर राजधानी में बड़ी निजी स्कूलों में पढ़ाने की सरकार की योजना है, उसके तहत वहां से लाए बच्चों को एक नामौजूद कागजी स्कूल में दाखिल करना बताया गया, और वे हकीकत में उस फर्जी स्कूल के मालिक के घर पर साल भर से बंधुआ मजदूरी करते हुए मिले। इन प्रतिभाशाली बच्चों को महंगी निजी शिक्षा तो नहीं मिल पाई, लेकिन इन आदिवासी बच्चों को स्कूल के सवर्ण मालिक के घर पर बर्तन मांजने, कपड़े धोने, और फर्श पोंछने का काम जरूर मिल गया, और इनको स्कूल का चेहरा भी देखना नसीब नहीं हुआ। बस्तर के इनके इलाके के एक कांग्रेस विधायक ने वहीं से पुलिस लाकर यह मामला पकड़वाया, तो अब सरकार के हाथ-पांव फूले हैं, और आनन-फानन में दर्जन भर सरकारी अफसर निलंबित हुए हैं, और यह पता लगा है कि किस तरह एक फर्जी स्कूल को सरकार के दर्जन भर अफसरों से झूठे सर्टिफिकेट दिए जा रहे थे, और सरकार इन बच्चों की बंधुआ मजदूरी के लिए इस मुजरिम स्कूल-मालिक को फीस का भुगतान भी कर रही थी। 
सरकार के कामकाज में कदम-कदम पर ऐसा ही भ्रष्टाचार भरा हुआ है। दो दिन पहले ही राज्य के भ्रष्टाचार निरोधक ब्यूरो ने अलग-अलग विभागों के आठ ऐसे अफसरों पर छापे डाले हैं जिनमें से हर किसी के पास दस-दस करोड़ से ज्यादा की दौलत निकली है। यह हाल सरकारी अधिकारियों और कर्मचारियों में बड़ी संख्या में लोगों का है, और इनमें से कार्रवाई सिर्फ नमूने की हो पाती है। हांडी का चावल पका है या नहीं, इसे देखने के लिए जिस तरह एक-दो दाने निकालकर देखे जाते हैं, करीब उतना ही अनुपात भ्रष्ट सरकारी अफसरों में से पकड़ाने वालों का होता होगा। 
लेकिन भ्रष्टाचार के बारे में लिखने के लिए हमारे पास ऐसा कुछ नया नहीं है जो कि दो-तीन दिन पहले इसी जगह पर हम लिख नहीं चुके हैं। आज तो यह चर्चा करने की जरूरत है कि क्या समाज अपनी जिम्मेदारी से पूरी तरह बरी हो चुका है कि उसे सरकारी ढांचे में पनपे हुए ऐसे जुर्म दिखते नहीं हैं? ऐसा जुर्म करने वाले सरकारी और गैरसरकारी लोग, उनका जुर्म निश्चित ही सैकड़ों लोगों की नजरों में रहता होगा, लेकिन इनमें से कोई एक भी अपने नाम सहित या गुमनाम होकर सरकार के पास जाकर शिकायत नहीं करता? ऐसे तो सरकार के अपने निगरानी के इंतजाम पुख्ता रहना चाहिए, लेकिन सरकार के कामकाज में भ्रष्टाचार का आकार इतना बड़ा है कि सरकार की कई जांच एजेंसियां भी संगठित भ्रष्टाचार और अपराध के बरसों निकल जाने पर भी कुछ का सिरा ही थाम पाती हैं, और सजा तो उनमें से भी शायद ही किसी को होती है। लेकिन इनसे परे समाज के लोगों की नजरों में जब भ्रष्टाचार आता है, तब वे इसे उजागर करने में दिलचस्पी कम ही दिखाते हैं। ऐसा नहीं हो सकता कि जो परिवार बच्चों से बंधुआ मजदूरी करवाता है, वह परिवार समाज से बाहर किसी टापू पर रहता हो। अड़ोस-पड़ोस के लोग अगर बाल-बंधुआ मजदूरी की शिकायत करते तो पहले भी कार्रवाई हो सकती थी। 
आदिवासी समाज के लिए सुरक्षा के अलग और कड़े कानून हैं। इसके बावजूद अगर ऐसे जुर्म का हौसला लोग करते हैं, तो उसका मतलब यही है कि सरकार में ऊपर तक की भागीदारी है। और स्कूल शिक्षा से लेकर आदिवासी विभाग तक के लोग जिस तरह इस जुर्म में हिस्सेदार मिले हैं वह शर्मनाक है। राज्य सरकार कमजोर तबकों की भलाई के लिए योजनाएं बनाती है, लेकिन उनका फायदा इस तरह से मुजरिम और भ्रष्ट सरकारी मशीनरी लूट ले जाते हैं। अभी जो मामला पकड़ाया है, उसके बाद सरकार को अपने घर को सुधारना चाहिए। यह मामूली मामला नहीं है, और दर्जन भर लोगों को निलंबित कर देना भी काफी नहीं है, सरकार को एक-एक कर अपने हर विभाग से ऐसे संगठित और फैले हुए भ्रष्टाचार को खत्म करना होगा, वरना जिस बस्तर से ये बच्चे पढऩे की उम्मीद में राजधानी आए थे, उसी बस्तर में नक्सलियों की जड़ें वहां की दबी-कुचली और शोषित आदिवासी जनता की हमदर्दी से ही जमी हैं। जिस दिन तक आदिवासी हकों के साथ सरकार ऐसा जुर्म करती रहेगी, उस दिन तक नक्सलियों को कितनी भी सरकारी बंदूकें खत्म नहीं कर पाएंगी।

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