शांताकुमार की चिट्टी के पीछे और आगे के मुद्दे

संपादकीय
21 जुलाई 2015

भाजपा के एक बड़े-बुजुर्ग नेता, हिमाचल के मुख्यमंत्री और केन्द्रीय मंत्री रह चुके शांताकुमार ने पार्टी अध्यक्ष को एक कड़ी चि_ी लिखी है और कहा है कि जिस तरह के घोटालों की चर्चा हो रही है उससे भाजपा के कार्यकर्ताओं का सिर शर्म से झुक गया है। उनकी बात को इस संदर्भ में देखना ठीक होगा कि जिंदगी की तीन चौथाई सदी पूरी कर चुके जिन नेताओं को भाजपा ने आज सरकार से, और संगठन से दूर, घर बिठा दिया है, शांताकुमार उन्हीं में से एक हैं। हमारे कहने का यह मतलब नहीं है कि उनकी नाराजगी या उनकी तकलीफ इसी वजह से उपजी हैं, लेकिन इस बात को ध्यान में रखकर ही उनकी कही बातों को समझना ठीक होगा। 
जिंदगी में एक दौर ऐसा आता है जब लोगों के पास खोने को कुछ नहीं बचता। जैसे कि कर्नाटक के राज्यपाल रहे हंसराज भारद्वाज एक ताकतवर केन्द्रीय कांग्रेसी मंत्री रहने के बाद अब जब बयान देते हैं, कांग्रेस पार्टी और राहुल गांधी के खिलाफ बोलते हैं। ऐसे और भी कुछ नेता हैं जिनका वक्त गुजर गया है, जिनकी संभावनाएं बची नहीं हैं, और अब वे शहादत के अंदाज में मसीहाई बयान देकर अपनी बहादुरी का इतिहास छोड़कर जाना चाहते हैं। आज मोदी के संदर्भ में जब चर्चा चलती है तो नाम लिए बिना लालकृष्ण अडवानी को यह लगता है कि देश से आपातकाल के फिर लागू होने का खतरा टला नहीं है। मुरली मनोहर जोशी या सिंघल को यह लगता है कि इस सरकार की योजनाएं कभी गंगा साफ नहीं कर पाएंगी। ऐसा ही अलग-अलग बुजुर्गों को कुछ न कुछ लगते रहता है। दरअसल किसी संगठन या सरकार में जब बहुत से लोगों की लंबे समय तक अनदेखी होती है, तो उन्हें अपने मौजूदगी दर्ज कराने के लिए भी ऐसी कुछ बातें सूझती हैं। यह कुछ वैसा ही होता है जैसा कि किसी संयुक्त परिवार में दिन भर अनदेखी के शिकार बुजुर्गों को अपनी हस्ती दर्ज कराने के लिए कभी खांसी आने लगती है, तो कभी वे किसी और बात को लेकर बड़बड़ाने लगते हैं।
लेकिन हम शांताकुमार की खुली चि_ी को महज इतना ही मानकर छोड़ देना नहीं चाहते। हो सकता है कि उनकी नीयत निजी उपेक्षा से घायल का दर्द न हो, और भाजपा के बारे में आज चल रही बदनामी को लेकर उठ रहा एक निष्ठावान दर्द हो। भाजपा के खिलाफ आज बदनामी कम नहीं हो रही है, शांताकुमार ने राजस्थान से लेकर मुम्बई तक और मध्यप्रदेश के व्यापम तक के कई मुद्दे गिनाए हैं। भाजपा के किसी भी शुभचिंतक का यह मानना है कि इन तमाम घोटालों से भाजपा का बड़ा नुकसान हो रहा है। चूंकि आज पूरे देश में कोई चुनाव नहीं है, और मोदी या भाजपा की पिछले आम चुनाव की लोकप्रियता पर आज दुबारा कोई जनमतसंग्रह नहीं हो रहा है, इसलिए भाजपा को बदनामी की फिक्र नहीं दिख रही है। लेकिन बहुत सी सरकारें अपना कार्यकाल पूरा करने के बाद, जीत की पूरी उम्मीद के बाद भी, आम चुनाव हार जाती हैं। एनडीए की ही पिछली अटल-सरकार को देखें तो उसका यही हाल हुआ था। इंडिया शाइनिंग नाम के अभियान के साथ भाजपा का आत्मविश्वास सिर चढ़कर बोल रहा था, लेकिन मतदाताओं ने उसे दस बरस के लिए खारिज कर दिया था। इसलिए आज खुद मोदी और अमित शाह के हित में है कि पार्टी को होते चल रहे छोटे-छोटे नुकसान को अनदेखा न करे, और किसी भी बदनामी को छोटा न माने। एक-एक करके हर राज्य में कुछ-कुछ बदनामी होगी, तो कुल मिलाकर हो सकता है कि अगला लोकसभा चुनाव हाथ से निकलने की नौबत आ जाए। अमित शाह को यह भी देखना होगा कि भाजपा के शांताकुमार से परे, मुम्बई की शिवसेना की मेयर ने कल ही एक सार्वजनिक बयान में कहा है कि नरेन्द्र मोदी को देखकर उनको हिटलर की याद आती है। अब अगर भाजपा का सबसे पुराना चुनावी-साथी अगर लगातार इस तरह तिरछा-तिरछा चले, और अपने अखबार में आए दिन मोदी और भाजपा सरकार की आलोचना करे, तो यह बात भाजपा के लिए कुछ सोचने की तो बनती है। शांताकुमार ने जो मुद्दे उठाए हैं, वे आज देश की जनता के दिल-दिमाग पर भी छाए हुए हैं। देश और प्रदेशों के हित से परे, भाजपा को आत्महित में भी इन पर आत्ममंथन करना चाहिए, और कड़ी कार्रवाई करनी चाहिए। 

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