खेत और खेती के आसपास की बातें

संपादकीय
27 जून 2015

कल छत्तीसगढ़ के कबीरधाम जिले में कृषि विभाग के एक कार्यक्रम में राज्यपाल बलरामजी दास टंडन, और कृषि मंत्री बृजमोहन अग्रवाल ने इस बात पर जोर दिया कि खेती के साथ-साथ पशुपालन, मछलीपालन, कुक्कुट पालन, मधुमक्खी पालन जैसे खेती से जुड़े हुए काम बढ़ाने की जरूरत है। यह बात एक बड़ी साधारण समझ में आ जाने वाली बात है, लेकिन गांवों के इस देश में आजादी की पौन सदी के करीब भी यह बुनियादी बात बस चर्चा में जारी है। छत्तीसगढ़ को राज्य बने भी पन्द्रह बरस हो गए लेकिन खेती की अर्थव्यवस्था को मजबूत बनाने के लिए इन अतिरिक्त कामकाज और रोजगार को विकसित नहीं किया जा सका। 
आज स्मार्ट सिटी के शोर में गांवों की प्राथमिकता खत्म हो चली है। गांधी और प्रेमचंद के गांव अब उजड़ रहे हैं और लोग खेत-गांव छोड़कर शहरों की तरफ बढ़ रहे हैं। शहरीकरण एक खर्चीला काम है, और वह अपनी जगह चलता रहेगा लेकिन गांवों या खेत की अर्थव्यवस्था मजबूत करने से देश की अर्थव्यवस्था मजबूत हो पाएगी। आज भी खेती से जुड़े जिन दूसरे ग्रामीण कारोबार और रोजगार की ऊपर चर्चा हुई है, वे कम प्रदूषण वाले, कम लागत वाले, अधिक काम पैदा करने वाले हैं। ऐसे कामों से छत्तीसगढ़ जैसे धान-केन्द्रित राज्य का किसान इस सस्ती फसल पर बेबस रहकर उसे बेचने सरकार के दरवाजे खड़ा नहीं रहेगा। उसके पास पशुपालन जैसे कई विकल्प रहेंगे तो वह गांव में बने भी रह सकेगा, या खेती से जुड़ा रह सकेगा।
छत्तीसगढ़ में गांव और खेत के साथ जुड़े बहुत से और काम भी बढ़ावे के लायक हैं। रेशम-कोसा के कीड़े पालना, मशरूम उगाना, पेड़ों पर लाख की खेती करना, सब्जियां, फल और जड़ी-बूटी उगाना, प्राकृतिक वनोपज इक_ा करना, जैसे बहुत से काम हैं जिनसे गांव के किसानों या मजदूरों की हालत सुधर सकती है। फूलों की खेती से लेकर डेयरी के काम तक बहुत से कामयाब काम जगह-जगह हुए हैं, लेकिन सरकार इनकी पूरी संभावनाओं के करीब भी नहीं पहुंच पाई है। इसी राज्य में बहुत सी सफल मिसालें हैं, लेकिन उनको बाकी जगहों पर बढ़ाना नहीं हो पाया। 
छत्तीसगढ़ में खेती जिस तरह एक आसान फसल धान पर टिक गई है, उसके चलते आम किसान ने दूसरी फसलों के खतरे उठाने का सोचना भी बंद कर दिया है। आज दालों के भाव जिस तरह आसमान पर हैं, उसे देखते हुए जहां-जहां मुमकिन हो ऐसी कीमती पैदावार की कोशिश होनी चाहिए थी, लेकिन किसान धान के खेत में ही उलझे पड़े हैं। दरअसल गरीब किसान की ताकत भी नहीं रहती कि धान जैसी गारंटी वाली फसल से परे किसी और प्रयोग का खतरा उठाए। ऐसे में सरकार को गैरधान फसलों को बढ़ावा देने का काम करना चाहिए। 
देश और प्रदेश की भलाई इसमें है कि ग्रामीण रोजगार बढ़ाने वाले कामों को मेहनत से आगे बढ़ाए। इससे गांव-जंगल के मजदूरों की उन सरकारी योजनाओं पर मोहताजी भी खत्म होगी। जिनकी उत्पादकता कम रहती है। स्वरोजगार अगर बढ़ता है तो उससे नगद-अर्थव्यवस्था में ग्रामीण महिला की हिस्सेदारी भी बढ़ेगी। यह काम सरकार के लिए हाईवे और फ्लाईओवर बनाने से अधिक मुश्किल होगा, और शायद इसीलिए सरकारें दीर्घकालीन नतीजों वाली ऐसी जमीनी चुनौतियों से कतराती हैं। 

कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें