बंगले खाली कराना तो मुश्किल राजधानियों से बंगले खत्म करें

संपादकीय
31 जुलाई 2015

दिल्ली हाईकोर्ट ने यूपीए सरकार में मंत्री रहीं कांग्रेस की दो नेताओं के बंगले खाली करवाने का आदेश दिया है, और उन पर जुर्माना भी ठोका है। कार्यकाल खत्म होने के बाद भी अंबिका सोनी, कुमारी शैलजा बंगलों पर काबिज थीं, और कानूनी लड़ाई को लंबा खींचते हुए वहां बने रहने की कोशिश कर रही थीं। दूसरी तरफ ऐसी खबरें छपती रही हैं कि नए सांसदों को बंगले या मकान न मिलने से उनको होटलों में ठहराने पर केन्द्र सरकार का करोड़ों रूपया हर महीने कैसे खर्च हो रहा है। 
हम इसे सत्ता की एक बड़ी बेशर्मी मानते हैं कि हक खत्म हो जाने के बाद भी लोग बंगलों पर काबिज रहते हैं। ऐसा अकेले कांग्रेस नेताओं ने किया हो वैसा भी नहीं है। समय-समय पर कई पार्टियों के लोग ऐसा करते आए हैं, और केन्द्र सरकार या संसद के अफसर इनसे जूझते ही रहते हैं। दूसरी तरफ एक अलग मिसाल वामपंथी सांसद सामने रखते हैं जब उन्हें मिले बंगलों या मकानों के बड़े हिस्सों पर पार्टी संगठन के दफ्तरों के लिए जगह देनी पड़ती है, ठीक उसी तरह जिस तरह कि वामपंथी सांसद अपनी तनख्वाह पार्टी में जमा कराते हैं, और वहां से उन्हें गुजारा-भत्ता मिलता है। जो लोग भी सरकारी बंगलों पर जमे रहना चाहते हैं, वे इस गरीब देश की जनता के पैसों की बर्बादी करते हैं। 
दूसरी तरफ ब्रिटेन जैसे देश हैं जहां से भारत ने संसदीय व्यवस्था सीखी है, और वहां पर सांसदों को लंदन में रहने के लिए मकान किराया भर मिलता है, किसी तरह का मकान नहीं मिलता। भारत में न सिर्फ दिल्ली में, बल्कि प्रदेशों की राजधानियों में भी एक-एक मंत्री के लिए, जज या अफसर के लिए, संवैधानिक पदों पर बैठे लोगों के लिए जितने बड़े-बड़े बंगले सरकार ढोती है, वह पूरा सिलसिला खत्म कर देना चाहिए। या तो सरकार बहुमंजिली इमारतें बनवाएं, जिससे कि बंगलों की जमीन खाली हो सके, उनके रख-रखाव पर होने वाला करोड़ों रूपए सालाना का अघोषित खर्च खत्म हो, बंगलों पर तैनात दर्जनों कर्मचारियों का जनहित में दूसरी जगह इस्तेमाल हो, और पर्यावरण भी बच सके। देश की तमाम राजधानियों में मंत्रियों जैसे बड़े बंगलों को खाली कराकर वहां पर बगीचे बना दिए जाएं, या उन इमारतों में कोई आर्ट गैलरी बना दी जाए, कोई सभागृह बना दिया जाए, तो जनता की इस दौलत का जनकल्याण में उपयोग हो सकता है। 
आज शहरों में जमीन की कमी भी है, और खुली जगह की कमी भी है। सरकारी इमारतों को ऊंचा बनाकर वहां अधिक लोगों को रहने की जगह दी जा सकती है, और सरकार का खर्च भी बहुत घटाया जा सकता है। लेकिन जब सरकार अपने खुद पर खर्च करने पर उतारू होती है, तो उस पर काबू पाना मुश्किल होता है। अदालतें भी ऐसी फिजूलखर्ची पर रोक इसलिए नहीं लगातीं, क्योंकि जज खुद ऐसे ही बंगलों में रहते हैं, मंत्रियों जैसे ही गाडिय़ों के काफिले में चलते हैं, अदालतों के कमरे भी वैसी ही महंगे बनवाते हैं, और उनका कोई नैतिक अधिकार सरकारी फिजूलखर्ची रोकने पर नहीं बच जाता। 
भारत की संसद भी इस बारे में चर्चा करना नहीं चाहती क्योंकि वहां बैठे हुए हर सांसद की हसरत शायद और बड़े बंगले की रहती है, बंगला बड़ा मिले, और संसद की कैंटीन में खाना और सस्ता मिले। भारत में बोलचाल की हिन्दी में एक लाईन कही जाती है कि मस्त रहो मस्ती में, आग लगे बस्ती में। यही बात सांसदों और सत्ता को भोग रहे बाकी तमाम सरकारी-संवैधानिक संस्थाओं पर लागू होती है। चूंकि हर सरकार बंगलों पर कब्जों को लेकर कई तरह की रियायत का फैसला लेती है इसलिए हमारा मानना है कि यह सिलसिला ही खत्म करना चाहिए, और किसी भी राजधानी में कुछ बंगलों को बेचकर ही उतने दर्जन मकान किसी इमारत में सरकार बनवा सकती है, और गरीब देश, गरीब जनता पर अहसान कर सकती है। 

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