विदेश प्रवासों के बीच में मन की बात और मोदी

संपादकीय
6 जुलाई 2015
प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी एक बार फिर विदेश प्रवास पर निकल गए हैं, और इस बार वे आधा दर्जन देशों से होकर लौटेंगे। अब तक वे 19 देश जा चुके हैं, जिनमें अमरीका और चीन जैसे महत्वपूर्ण देश शामिल हैं। भारत के किसी प्रधानमंत्री ने इस रफ्तार से विदेश यात्राएं नहीं की थीं, और नरेन्द्र मोदी ने अंतरराष्ट्रीय संबंधों का कोई राष्ट्रीय अनुभव रहे बिना यह काम कर दिखाया है। यह एक और बात है कि बहुत से लोगों का यह मानना है कि इस रफ्तार से हुए विदेश प्रवासों का कोई खास नतीजा विदेशी संबंधों पर नहीं हो रहा है, और भारत को कोई कूटनीतिक या कारोबारी फायदा नहीं हो रहा है। 
हम इस सोच से अधिक सहमत नहीं हैं, क्योंकि हमारा यह मानना है कि पिछले दस बरसों की यूपीए सरकार के आखिरी पांच बरस जिस शर्मिंदगी के थे, उसके चलते दुनिया में भारत की जगह बड़ी कमजोर भी हो गई थी। लोग भारत को गंभीरता से नहीं लेते थे, और दुनिया भर में बिखरा हुआ भारतवंशी समाज भी अपनी जन्मभूमि को लेकर किसी गौरव से परे था। मोदी ने न सिर्फ दुनिया के देशों की सरकारों से बातचीत की है, कारोबारियों के साथ संभावनाएं टटोली हैं, बल्कि भारतवंशियों को भी भारतीय प्रधानमंत्री से जोडऩे का काम किया है। अब इस बात के अपने अलग फायदे तो हैं ही। भारत के बाहर जो भारतवंशी बसे हुए हैं, वे चाहे किसी भी नागरिकता के हों, उनको अगर भारत की सरकार पर भरोसा होगा, तो वे भारत में किसी सामाजिक काम से भी जुड़ सकते हैं, और आर्थिक मदद भी कर सकते हैं। फिर हमारा यह भी मानना है कि अंतरराष्ट्रीय संबंधों में जितनी कामयाबी सरकार के अपने विदेश मंत्रालय, और दूतावासों के माध्यम से मिल सकती है, उससे कहीं अधिक कामयाबी भारतवंशियों के माध्यम से मिल सकती है, अगर उन्हें भारत पर गौरव हो। शर्मिंदगी में डूबे हुए भारतवंशी दुनिया में भारत का नाम रौशन भी नहीं कर सकते। 
मोदी के विदेशी दौरों से मिलने वाले फायदे सिर्फ आर्थिक समझौतों के आंकड़ों में गिनना ठीक नहीं है। कोई दस बरस बाद मोदी की शक्ल में दुनिया को एक ऐसा भारतीय प्रधानमंत्री मिला है, जो अपनी सरकार का मुखिया भी है, और जिसकी पार्टी उसकी जेब में भी है। मनमोहन सिंह की छवि दुनिया में एक ऐसे प्रधानमंत्री की थी जो कि अपनी पार्टी की मुखिया का कर्मचारी जैसा था। और यह बात बहुत हद तक गलत भी नहीं थी, क्योंकि दुनिया ने यह देखा है कि मनमोहन सिंह मंत्रिमंडल के फैसले को किस तरह राहुल गांधी ने दिल्ली प्रेस क्लब में फाड़कर फेंक दिया था, और फिर मंत्रिमंडल को अपना फैसला बदलना पड़ा था। दस बरस के ऐसे प्रधानमंत्री के बाद अब अगर भारत का एक मजबूत प्रधानमंत्री दुनिया के नेताओं से बात करता है, तो उसकी बात का वजन कुछ अलग होता है। मनमोहन सिंह को लेकर यह चर्चा कांग्रेस बहुत करती है कि वे दुनिया के सबसे विद्वान, और सबसे पढ़े-लिखे नेताओं में से एक हैं। लेकिन उनका इतना विद्वान होना उनके आखिरी पांच बरसों में उन्हें सिलसिलेवार घोटालों से बचा नहीं पाया। इसलिए अब मोदी अगर अपने तेजरफ्तार अंदाज में विदेश-संबंध बना और बढ़ा रहे हैं, तो उन्हें इसका हक भी है, और वे भारत के भविष्य के प्रधानमंत्रियों के सामने चुनौती की एक मिसाल भी खड़ी करते चल रहे हैं। 
बहुत से लोग भारत की विदेश नीति को पाकिस्तान तक सीमित रखकर देखते हैं, कि दुनिया जहान घूमकर तो आ गए, लेकिन पाकिस्तान के साथ रिश्तों का क्या हुआ? नजरों की ऐसी कमजोरी किसी देश के लिए ठीक नहीं होती, कि ठीक पड़ोसी से परे के कोई देश दिखें ही नहीं। मोदी और उनकी अगुवाई में भारत अगर पाकिस्तान से परे के देशों के साथ अपने रिश्ते मजबूत करते चल रहा है, भारत के हितों की बात छोटे-बड़े हर किस्म के देशों से करते चल रहा है, तो इसकी आलोचना करने की कोई वजह दिखती नहीं है। भारत का प्रधानमंत्री अपने देश और अपने ओहदे की खोई हुई साख को दुनिया भर में एक बार फिर अगर कायम कर रहा है, तो यह मोदी के चले जाने के बाद भी देश के लिए फायदे की बात होगी। यह एक अलग बात है कि भारत के लोग यह उम्मीद भी करते हैं कि मोदी देश के भीतर के जलते-सुलगते मुद्दों पर जुबान खोलें। पता नहीं दूसरे देशों में भारत के इन मुद्दों पर उनसे सवाल होंगे या नहीं, लेकिन भारत में तो मोदी के इर्द-गिर्द की बंदूकों के ठीक बाहर, चारों तरफ घरेलू सवालों की फसल लहलहा रही है, और वे इन सबको अनसुना करके, विदेश प्रवासों के बीच-बीच में अपने मन की बात रेडियो पर कहते हैं, और फिर पेटी-बिस्तरा बांधने लगते हैं। 
—-

कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें