स्कूली पढ़ाई के बाद बच्चों को एक बरस राहत की सोचें

13 जुलाई 2015
संपादकीय

इन दिनों चारों तरफ इम्तिहान और कॉलेजों में दाखिले की मारामारी चल रही है। कई नतीजे आ चुके हैं, बहुत से दाखिले हो चुके हैं, और हिन्दुस्तानी छात्र-छात्राएं अब भी सड़कों पर भटक रहे हैं। अच्छे कॉलेजों में दाखिला अच्छा-खासा मुश्किल काम है। और जो देश के सबसे अच्छे कॉलेज हैं, वहां पर दाखिला और भी मुश्किल। जो कॉलेज ऐसे हैं जहां नगद भुगतान करके सीट खरीदी जा सकती है, वहां पर साल के इन कुछ महीनों में खरबों का कारोबार हो जाता है, और एक-एक कॉलेज करोड़ों रूपए कमाने में कामयाब हो जाते हैं। 
लेकिन अपने आसपास के परिवारों और उनके बच्चों को देखकर दस-बीस बरस लगातार यह लगते आ रहा है कि कॉलेजों में दाखिला जिंदगी का सबसे बड़ा इम्तिहान बना लेने के पहले ये परिवार अपने बच्चों को दुनिया की एक झलक भी नहीं दिखा पाते। भारत के आम मां-बाप से लेकर खास तबके के अधिकतर लोगों तक भी बच्चों को मेडिकल, इंजीनियरिंग, मैनेजमेंट, कानून, और सीए जैसी गिनी-चुनी पढ़ाई में डालकर खुश हो लेते हैं कि उनके बच्चे सही राह पर चले गए हैं। लेकिन दुनिया के विकसित देशों को देखें, तो भारत की इन लोकप्रिय आधा दर्जन डिग्रियों से परे सैकड़ों ऐसी पढ़ाईयां हैं, जो लोगों को दूर-दूर तक पहुंचाती है, और जहां लोग अपनी पसंद और अपने हुनर में खूबी हासिल करते हैं। 
हिन्दुस्तान में अधिकतर मां-बाप अपने बच्चों के हिस्से का यह फैसला खुद करते हैं कि उनको क्या पढऩा है। और चूंकि इम्तिहान की तैयारी से लेकर कॉलेज में लगने वाले भुगतान तक हर काम में मां-बाप की जरूरत है, इसलिए भी, और पारिवारिक सम्मान भी बनाए रखने के लिए अधिकतर बच्चे अपने मां-बाप की बात को मान भी लेते हैं। मान लेने के पीछे एक दूसरी वजह यह भी है कि उन्होंने खुद ने दुनिया को बहुत कम देखा है। स्कूल से बाहर निकलने तक अब वे इन आधा दर्जन पाठ्यक्रमों से परे वे दुनिया के बाकी रोजगार, कामकाज, और उसके लिए जरूरी या गैरजरूरी पढ़ाई या ट्रेनिंग के बारे में बहुत ही कम जान पाते हैं। नतीजा यह निकलता है कि इन बच्चों के सामने स्कूल से बाहर आने तक कुल आधा दर्जन सुरंगें रहती हैं जिनमें से किसी एक को छांटकर उसमें घुसने की आजादी उनको रहती है। 
आज होना यह चाहिए कि सरकार, समाज, और परिवार, इन सबकी तरफ से बच्चों को स्कूल के आखिरी बरसों में दुनिया के बारे में इतनी जानकारी देनी चाहिए कि उनके पास स्कूल के बाद क्या-क्या विकल्प हैं। आज मां-बाप अपने घरेलू कारोबार को देखकर यह तय करते हैं कि किस बच्चे को क्या पढ़ाना, क्या बनाना ठीक रहेगा। बहुत से मां-बाप अपनी खुद की स्कूल-कॉलेज के वक्त की अपूरित इच्छाओं को लेकर अपने बच्चों पर उनका टोकरा लाद देते हैं कि हम तो डॉक्टर बन नहीं पाए थे, हम चाहते हैं कि तुम डॉक्टर बनो। फिर आसपास के लोगों और समाज, अपने वर्ग और अपने परिवार के बाकी बच्चों को देखते हुए लोगों के मन में यह रहता है कि उनके बच्चे ऐसी पढ़ाई करें जिससे कुनबे का नाम भी रौशन हो। ऐसी सोच कम मां-बाप रखते हैं कि बच्चे ऐसे पढ़ाई करें जिससे उनके भीतर की प्रतिभा और निखरे, और उनकी रौशनी से दुनिया रौशन हो। मां-बाप की सोच अपने कुनबे के नाम को रौशन करने से परे नहीं जा पाती। इसलिए जिन बच्चों की दिलचस्पी गणित पढऩे में है, या कि संगीत सीखने में है, उन्हें डॉक्टरी में धकेल दिया जाता है, जो बच्चे अपनी पूरी जिंदगी सिर्फ फोटोग्राफी करना चाहते हैं, उन्हें इंजीनियर बना दिया जाता है। ऐसा ही सिलसिला सभी तरह के बच्चों के साथ, कम से कम अधिकतर बच्चों के साथ तो चलता ही है। और जब वे पढ़ाई के बरस पूरे करके 20-25 बरस की उम्र पार कर लेते हैं, उनके पास पढ़ाई में गंवाने के लिए और बरस नहीं रहते हैं, तब उन्हें समझ आता है कि वे एक नापसंद विषय की पढ़ाई करते रहे हैं। 
यूरोप के विकसित देशों में जो जिम्मेदार समाज होता है, वहां पर बच्चों को स्कूल के बाद एक बरस का वक्त खाली गुजारने कहा जाता है, ताकि वे देश-दुनिया घूम सकें, देख सकें, और अब तक की पढ़ाई से परे बाकी दुनिया में अपने लिए मौजूद संभावनाओं पर सोच सकें। ऐसे एक बरस का योगदान किसी भी बच्चे की जिंदगी में किसी भी दूसरे बरस के मुकाबले अधिक हो सकता है। लेकिन हिन्दुस्तानी सोच ऐसे एक बरस को बर्बाद करना कहेगी, और यह मानकर चलेगी कि इसके बाद बच्चे बर्बाद ही हो जाएंगे। ऐसा देश कभी भी अपने लोगों की पूरी संभावनाओं को हासिल नहीं कर सकता। यह चर्चा हम इसलिए छेड़ रहे हैं कि कुछ लोग स्कूलों के बाद बच्चों को एक बरस देखने, समझने, और सोचने-विचारने के लिए देने का हौसला जुटा सकें। 

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