मुलायम के कुनबे तले पूरी तरह कुचला लोकतंत्र, और समाजवाद

संपादकीय
11 जुलाई 2015

उत्तरप्रदेश से अच्छी खबरें आना बरसों से बंद है। अब वहां के एक वरिष्ठ आईपीएस अफसर ने पुलिस में रिपोर्ट की है कि मुख्यमंत्री के पिता, और देश में विपक्ष के एक गठबंधन के सबसे बड़े नेता मुलायम सिंह यादव ने फोन पर उन्हें धमकी दी है। उन्होंने टेलीफोन पर मिली इस धमकी की रिकॉर्डिंग कर ली है, और उसे मीडिया को जारी करने के साथ-साथ पुलिस में शिकायत कर दी है। पहली नजर में यह मामला सही लगता है, और आवाज मुलायम सिंह की ही दिखती है। आगे की बात तो पुलिस की जांच में साबित होगी, लेकिन देश के इस सबसे बड़े प्रदेश पर काबिज यह कुनबा अपनी पार्टी के लोगों के साथ मिलकर सरकार को जिस तरह से कुचल रहा है, उससे लोहिया का पूरा समाजवाद तो बदनाम हो ही रहा है, लोकतंत्र के लिए इस कुनबे की हिकारत हर कुछ हफ्तों में सामने आती है। अब उत्तरप्रदेश के बाहर भी इस कुनबे के पैर पसरने की खबरें आ रही हैं, कि मुख्यमंत्री अखिलेश यादव की पत्नी, समाजवादी पार्टी की सांसद, डिंपल यादव को उत्तराखंड के चुनाव में वहां की मुख्यमंत्री का दावेदार बनाकर चुनाव में उतारा जाए, क्योंकि वे शादी के पहले उत्तराखंड की थीं। 
एक के बाद एक अफसर का यह बुरा हाल उत्तरप्रदेश में किया जा रहा है, और आईएएस-आईपीएस अफसरों के अलावा पत्रकारों को कहीं जलाकर मारा जा रहा है, तो कहीं मोटरसाइकिल के पीछे बांधकर घसीटा जा रहा है। उत्तरप्रदेश की पुलिस थानों में कहीं बलात्कार कर रही है, तो कहीं पर लोगों को जलाकर मार रही है। और प्रदेश की हालत यह है कि मुलायम सिंह यादव की समाजवादी पार्टी का विकल्प बनने की संभावना एक वक्त जिस बसपा में थी, वह पार्टी अपनी ही मुखिया मायावती के भ्रष्टाचार और उनकी तानाशाही के तले कुचलकर दम तोड़ चुकी है, कांग्रेस उत्तरप्रदेश में सोनिया-राहुल-प्रियंका के बावजूद हाशिए के भी बाहर खिसककर पूरी तरह अप्रासंगिक हो चुकी है। अब वहां सिर्फ भाजपा और समाजवादी पार्टी आमने-सामने हैं, और चुनाव के वक्त मुलायम सिंह का कुनबा एक बार फिर धर्मनिरपेक्षता का नारा लगाएगा, और भाजपा को साम्प्रदायिक कहते हुए उसे हराने की अपील करेगा। 
इस देश में धर्मनिरपेक्षता के सबसे बड़े दुश्मन अपने आपको साम्प्रदायिकता-विरोधी करार देने वाले ऐसे गैरभाजपाई नेता और दल हैं, जो कि अपने भ्रष्टाचार की वजह से, अपनी कुनबापरस्ती की वजह से धर्मनिरपेक्षता शब्द को ही बदनाम कर चुके हैं। आज इस देश में कुछ इस तरह का माहौल है कि या तो साम्प्रदायिकता रहे, या फिर उसका विरोध करने का दावा करने वाली पूरी तरह से भ्रष्ट-धर्मनिरपेक्षता की कुनबापरस्ती रहे। और इसके बाद जब चुनावी नतीजों में भाजपा-शिवसेना जीतें, तो मतदाताओं पर यह तोहमत लगा दी जाए कि वे साम्प्रदायिकता के झांसे में आ गए। आज पूरे देश में वामपंथी पार्टियों के अलावा कोई ऐसी पार्टी नहीं रह गई है जो कि साम्प्रदायिकता के खिलाफ भी हो, और ईमानदार भी हो। फिर इसके साथ-साथ वामपंथी पार्टियों में कुनबापरस्ती की भी कोई जगह नहीं है, जिसकी कि शिकार ममता बैनर्जी जैसी नेता पश्चिम बंगाल में हो चुकी है, और भाई-भतीजावाद को बढ़ावा देते हुए अपनी जगह खो रही है। 
उत्तरप्रदेश वैसे भी सबसे गरीब, सबसे पिछड़ा, और सबसे अराजक प्रदेश माना जाता है। पता नहीं मुख्यमंत्री अखिलेश यादव किस मुंह से विदेशों में जाकर वहां के उद्योगपतियों और पूंजीनिवेशकों को उत्तरप्रदेश आमंत्रित कर पाते हैं। यह पार्टी पूरी तरह से अलोकतांत्रिक बर्ताव करती है, अपने मंत्रियों पर हत्या के आरोप तक झेलते हुए उनको बनाए रखती है, अनुपातहीन सम्पत्ति से लदी हुई यह पार्टी समाजवाद के नाम पर एक कलंक है। और उत्तरप्रदेश की त्रासदी यह है कि भाजपा के विकल्प के रूप में यही एक पार्टी मतदाताओं के सामने हैं, और आने वाले चुनावों में इसके पूरी तरह से खारिज हो जाने का खासा खतरा खड़ा है। 

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