खत्म होता बर्दाश्त

30 जून 2015
संपादकीय 

बांग्लादेश की एक पत्रिका ने वहां की टीम की भारत पर जीत की खुशी मानते हुए एक ऐसा पोस्टर बनाकर छापा है जिसमें भारतीय क्रिकेट टीम के खिलाडिय़ों के सिर आधे-आधे मुंड़े हुए हैं। वन-डे क्रिकेट में यह बांग्लादेश की भारत पर पहली जीत थी, और इसके पहले विश्व कप में भारत की जीत से बांग्लादेश में एक तनाव चले भी आ रहा था। एंपायर के एक फैसले को लेकर विश्व कप में भारत को फायदा हुआ था, ऐसी चर्चा थी, और इसे लेकर कई तरह के लतीफे भी सोशल मीडिया पर चल रहे थे। 
अभी बांग्लादेश की पत्रिका का यह मजाक भारत के क्रिकेट प्रेमियों पर कुछ भारी पड़ रहा है, और भारत का मीडिया भी बांग्लादेश की इस पत्रिका पर टूट पड़ा है। लोगों में अब मजाक के लिए बर्दाश्त कुछ कम होते चल रहा है। एक अखबार या मैग्जीन का मजाक चाहे वह कुछ कड़वा ही क्यों न हो, उसके लिए लोगों में कुछ बर्दाश्त होना चाहिए। अभी कुछ ही दिन पहले इन्हीं मैचों में बांग्लादेश के एक खिलाड़ी को भारत के कप्तान महेन्द्र सिंह धोनी ने जिस तरह धक्का देकर गिराया था, और उसके एवज में जिस तरह से उनको जुर्माना भी सुनाया गया था, वह सबको याद ही है। और ऐसा नहीं भी हुआ होता, तो भी लोगों को हंसी मजाक की आजादी बड़ी दूर तक रहनी चाहिए। एक वक्त था जब भारत में सबसे बड़े कार्टूनिस्ट प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू पर तगड़ा वार करते थे, और यह नेहरू का बड़प्पन था कि वे उनसे कार्टून दस्तखत करवाकर मांग लेते थे, और अपने संग्रह में रखते थे। किसी ने यह नहीं सुना कि किसी कार्टून के लिए नेहरू ने बौखलाकर किसी को धमकाया हो। लेकिन नेहरू की ही बेटी इंदिरा ने आपातकाल के दौरान जिस तरह की तानाशाही दिखाई थी उसके चलते देश की सबसे बड़ा व्यंग्य-कार्टून की पत्रिका शंकर्स वीकली के संपादक- प्रकाशक ने उसे बंद ही कर देना ठीक समझा था। 
भारत के लोगों में धीरे-धीरे करके विचारों की असहमति का सम्मान खत्म होते जा रहा है। लोग अब बात-बात पर किसी कार्टून के खिलाफ, किसी लेख या फिल्म के खिलाफ, किसी पेंटिंग या इतिहास के किसी किताब के खिलाफ आग लगाने पर उतारू हो जाते हैं। पुणे में एक बड़े महत्वपूर्ण इतिहास शोध केंद्र को बर्बाद कर दिया गया, एमएफ हुसैन को देश से निकाल ही दिया गया, और बहुत से नाटकों को बंद कर दिया गया, बहुत सी किताबों को प्रतिबंधित कर दिया गया, और इस देश के इतिहास के एक झूठे गौरवगान के लिए खरे इतिहास को खोटा करार देने का अभियान चल रहा है। जो लोकतंत्र आईना देखने से डरता हो, और अपनी बदशक्ल देखकर आईने पर पत्थर चलाता हो, वह लोकतंत्र विकसित नहीं हो सकता। वहां पर आर्थिक तरक्की चाहे हो जाए, सभ्यता की तरक्की नहीं हो सकती, और भारत आज उसी राह पर ले जाया जा रहा है। 
मजाक या व्यंग्य, कटाक्ष या कोई कलाकृति चाहे कड़वी क्यों न लगे, उसका जवाब हमला नहीं हो सकता। भारतीय लोकतंत्र में विज्ञान, वैज्ञानिक सोच, और प्रगतिशील-सुधारवादी मूल्यों के खिलाफ जिस तरह का उकसावा-भड़कावा चल रहा है, जिस तरह एक उग्र राष्ट्रवाद को बढ़ावा दिया जा रहा है, उसके चलते यह देश अड़ोस-पड़ोस के सारे देशों के साथ दुश्मनी पाल सकता है, और फिर बिना सुख-चैन के जी सकता है। आज क्रिकेट के इस कार्टून को लेकर कोई हिंसा तो शुरू नहीं हुई है, लेकिन इस बहाने हम यह चर्चा कर रहे हैं, क्योंकि हिंसा इधर-उधर समय-समय पर सामने आती ही रहती है। 
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