हिन्दुस्तान की हर तरफ गंदगी का एक बहुत बड़ा फायदा भी

संपादकीय
29 जुलाई 2015

दुनिया भर से अलग-अलग कई खबरें आती हैं कि लोग अपनी निजी जिम्मेदारी से परे जाकर किस तरह एक सामाजिक जिम्मेदारी के तहत और लोगों के लिए काम करते हैं। अमरीका के बॉस्टन शहर से खबर और तस्वीर आई है कि किस तरह वहां तीन बार राज्य के गवर्नर रहे हुए, और राष्ट्रपति चुनाव में उम्मीदवार रहे हुए माइकल डुकाकिस आज भी सड़क-फुटपाथ पर बिखरा कचरा बीनकर घूरे पर डालते देखे जाते हैं। वे झोला लेकर निकलते हैं, और अपने शहर को साफ करने के लिए जो कर सकते हैं करते हैं। ऐसी ही एक खबर चीन से आई है कि वहां के एक पहाड़ पर पर्वतारोही और सैलानी जो कचरा छोड़ आते हैं, उसे साफ करने के लिए पर्यावरण प्रेमियों का एक संगठन वहां हर बरस जाता है, और पहाड़ से रस्सियों से लटककर भी बिखरे हुए कचरे को हर जगह से साफ करता है। इस बरस बच्चों को भी ले जाकर सफाई में लगाया गया ताकि उन्हें एक सीख मिले। मुम्बई में बरसों से देश के एक प्रमुख कार्टूनिस्ट आबिद सुरती घर-घर जाकर पूछते हैं कि क्या उनके यहां कोई नल टपकता है, और अगर ऐसा रहता है तो वे अपने साथ औजारों का बैग लेकर चलते हैं, वॉशर जैसे छोटे-मोटे पुर्जे भी लेकर चलते हैं, और अपने खर्च पर, अपनी मेहनत से, पानी का टपकना बंद करके लौटते हैं। 
लेकिन हिन्दुस्तान के अधिकतर हिस्से में लोग अपने कचरे को सड़क के दूसरी तरफ फेंककर अपने को सफाईपसंद साबित करते चलते हैं। लोग जहां बैठते हैं, वहीं पर कचरा करना, वहीं पर थूकना शुरू कर देते हैं। कोई कोना दिखते ही लोगों के मुंह में थूक तैयार होने लगता है, और जरा सी आड़ कहीं दिखी तो बदन के भीतर पेशाब का जलस्तर बाढ़ वाली नदी की तरह एकदम से ऊपर हो जाता है। दुनिया के कई देशों में हिन्दुस्तानियों को लेकर लतीफे चलते हैं कि वे कितने गंदे रहते हैं। और यह बात गलत भी नहीं है। लोग घूरों के साथ जीने के वैसे ही आदी हो गए हैं जैसे कि वफादार कुत्ते बेईमान इंसानी नस्ल के साथ जीना सीख गए हैं। सड़क और घूरे से परे भी किसी बगीचे या तालाब के किनारे घूमने की जगह साफ-सुथरी हो तो भी हिन्दुस्तानी तन-मन उसे गंदा करने के लिए एकदम कुलबुलाने लगता है। सफाई एक किस्म से भारतीय अहंकार के सामने चुनौती बनकर खड़ी हो जाती है कि इतने हिन्दुस्तानियों के रहते जगह अब तक साफ कैसी बची हुई है। इसके बाद फिर उस साफ जगह के लिए हिन्दुस्तानियों के बदन के हर रास्ते से कुछ न कुछ बाहर निकलना शुरू हो जाता है। 
बहुत से लोगों ने भारत के बाहर सभ्य देश देखे हैं, उनमें से जो लोग पुनर्जन्म में भरोसा रखते हैं, वे भारत लौटने तक इस बात पर हैरान होने लगते हैं कि वे कौन से लोग होते हैं जो बहुत से जन्म अच्छा काम करने के बाद साफ-सुथरे देशों में पैदा होते हैं? और ऐसे लोग हिन्दुस्तान लौटते ही इस बात पर भी हैरान होने लगते हैं कि उन्होंने पिछले जन्मों में कौन-कौन से कुकर्म किए होंगे जो कि इतने गंदे देश में पैदा होकर, इतने गंदे देश में मर जाएंगे? यह दार्शनिक जिज्ञासा आस्थावान लोगों को और अधिक परेशान करती है क्योंकि वे लोग पाप और पुण्य, पिछले और अगले जन्म, पर भरोसा करते हैं। इस धार्मिक देश का हाल यह है कि सार्वजनिक इमारतों में सीढिय़ों के कोने लोगों की पीक और थूक से बचाने के लिए जगह-जगह देवी-देवताओं की तस्वीरों वाले टाईल्स दीवारों में स्थाई रूप से लगा दिए जाते हैं, क्योंकि वही एक तरीका लोगों को गंदगी फैलाने से रोक पाता है। 
गंदगी के लिए हिन्दुस्तानियों का बर्दाश्त देखने लायक है, और गंदगी फैलाने की उनकी क्षमता भी गजब की है। एक खतरा यह भी दिखता है कि हिन्दुस्तान से अगर गंदगी गायब हो जाए, तो यहां आने वाले विदेशी सैलानी इतने गुना बढ़ जाएंगे, कि उनके रूकने के लिए होटलें कम पडऩे लगेंगी, टैक्सियां बचेंगी भी नहीं, और ताजमहल पर भीड़ में दंगा होने लगेगा। इसलिए कभी-कभी यह भी लगता है कि विदेशियों के हमलों से भारत को बचाने के लिए इसे इतना गंदा रखा जाता है कि अब अंग्रेज, फ्रेंच, पुर्तगाली, और डच लोग इधर दुबारा मुंह भी न करें। गंदगी का यह एक बड़ा फायदा है कि विदेशी हमलावर कितनी भी बंदूकें लेकर आएं, उनसे वे हिन्दुस्तान का कचरा साफ नहीं कर पाएंगे। 
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