एक-दूसरे के दिमाग तक पहुंच के खतरे...

संपादकीय
16 जुलाई 2015
वैज्ञानिकों ने अभी एक प्रयोग किया है कि किस तरह दो चूहों के दिमाग तारों से एक-दूसरे से जोड़कर उनके दिमागों के बीच बातचीत हो सकती है, या एक-दूसरे पर नियंत्रण हो सकता है। वैज्ञानिकों ने यह प्रयोग बंदरों के साथ भी किया, और इंसानों के साथ कुछ अलग तरह के प्रयोग चल ही रहे हैं। अब इंसान सिर्फ सोचकर कम्प्यूटरों पर कुछ काम करने के कामयाब प्रयोग कर भी चुके हैं, यहां तक कि कुछ आम मोबाईल फोन भी इंसानी भाव-भंगिमा, चेहरे-आंखों को देखकर स्क्रीन पर कुछ तरह के काम कर रहे हैं। मतलब यह कि मशीनें इंसानों को पढ़ रही हैं, इंसान मशीनों पर सिर्फ दिमाग या नजरों से काबू कर रहे हैं, इंसानी दिमाग दूसरे इंसानी दिमागों को पढऩे के करीब हैं, और जल्द ही विज्ञान का बाजार या बाजार का विज्ञान कुछ इंसानों को दूसरे इंसानों के दिमागों पर काबू भी दे देगा।
यहां पर एक छोटी सी बात भी समझने की जरूरत है कि बातचीत में जिसे दिल और दिमाग दो अलग-अलग सोचने वाली चीजें कहा जाता है, वह दरअसल अकेला दिमाग ही है, और दिल के सोचने-समझने की बातें वैसी ही जुमला है जैसे इन दिनों भारत की राजनीति में तैर रहे हैं। ऐसे में किसी के दिमाग तक पहुंच जाने का मतलब ही हो जाएगा उसके तन की तरह उसके मन को भी नंगा देख लेना। इसके बाद का हाल करीब-करीब वैसा ही हो जाएगा जिस तरह सौ बरस पहले गोरों के मुल्क में काले गुलामों की नीलामी होती थी, या आज जिस तरह चकलाघर चलाने वाले मुजरिम बालिग-नाबालिग लड़कियों की देह नीलाम करते हैं।
इंसानी फितरत औरों पर काबू की है, मर्द, औरत पर और बच्चों पर काबू चाहता है, मालिक नौकर पर, अफसर जूनियर पर और प्रेमी प्रेमिका पर। अब विज्ञान एक दूसरा काबू बाजार के मार्फत इंसानों को देने जा रहा है, दूसरों के दिमाग पर। आज भी दफ्तरों में मैनेजमेंट अपने कर्मचारियों के कम्प्यूटरों और कम्यूनिकेशन पर सौ फीसदी काबू रखने की तकनीकी ताकत रखता है। कई जगहों पर कर्मचारियों को कानूनी रूप से यह बता भी दिया जाता है। अब आगे चलकर इक्कीसवीं या बाईसवीं सदी के नवगुलामों के दिमाग भी किसी विज्ञानकथा की तरह सरकार या बाजार के काबू में रहेंगे।
लेकिन सरकार और बाजार से परे, निजी रिश्तों में भी देखें तो एक-दूसरे के दिमाग पढऩा ही दुनिया को तबाह करने के लिए काफी होगा, काबू करने की जरूरत भी नहीं होगी। लोग एक-दूसरे के बारे में क्या सोचते हैं यह पता लगते ही दुनिया का पारिवारिक, भावनात्मक, और सामाजिक ढांचा चरमरा जाएगा। कुछ जिंदगियों मिनटों में तबाह हो जाएगी, और कुछ दिनों में। दरअसल निजी और सामाजिक इंसानी रिश्ते सच कम, और झूठ अधिक, की बुनियाद पर खड़े रहते हैं। जब झूठ की ईंटें खिसक जाएंगी तो तमाम रिश्ते दरारों के रास्ते तबाही तक पहुंच जाएंगे। 
यह विज्ञान के विनाश तक पहुंचाने का सिलसिला है। जापान में अभी-अभी एक रोबो ने एक इंसान पर हमला करने उसे मार डाला। रोबो जैसी मशीनों में कृत्रिम-बुद्धि (आर्टीफीशियल इंटेलिजेंस) बढ़ते चलने की बात अब आम हो गई है। अब छोटे से साधारण मोबाइल फोन भी आपकी पिछले बातों से सीखकर, आपको अगले शब्द सुझाने लगते हैं। विज्ञान और टेक्नालॉजी, दूसरे इंसानों के दिमाग पढ़कर, उन पर काबू करके, दुनिया को खात्मे की तरफ ले जाएंगे। 

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