कलाम पर आंसू बहाने का हक किसे? जो सरकारी किफायत बरते, महज उसे...

28 जुलाई 2015
विशेष संपादकीय
सुनील कुमार

डॉ. अब्दुल कलाम आजाद के गुजरने से देश के अनगिनत आम लोगों को ऐसा लगा कि देश के सबसे बड़े ओहदे पर पहुंचने वाले सबसे आम आदमी की मौत हो गई। किसी ने ऐसी सादगी देखी-सुनी नहीं थी, और ऐसे मौके भी कम ही आते हैं जब सत्तारूढ़ पार्टी इतने और ऐसे काबिल इंसान को देश की सबसे बड़ी कुर्सी पर बिठाए। वे अपनी तकनीकी और वैज्ञानिक विशेषज्ञता के साथ-साथ एक गजब के इंसान भी थे। कभी-कभी विज्ञान, अंतरिक्ष, या हथियारों के मामलों में देश को इतनी बड़ी कामयाबी तक पहुंचाने वाले लोगों में कहीं न कहीं एक अहंकार आ जाता है। लेकिन डॉ. अब्दुल कलाम अहंकार से आजाद थे। वे सरकारी ओहदे से उपजने वाली बददिमागी से भी आजाद थे। वे राष्ट्रपति भवन की सामंती बेडिय़ों से भी आजाद थे, और उनमें यह हौसला था कि चुनाव में वोटरों की कतार में लगकर वे वोट डालने जाएं। वे राष्ट्रपति के पद के साथ जुड़ी हुई सामंती पोशाक की गुलामी से भी आजाद थे, और कई बार वे आम शर्ट-पैंट में नजर आते थे, और अपने उठने-बैठने में भी वे आम इंसान की तरह बेतकल्लुफी के साथ याद किए जाते थे। 
राष्ट्रपति की कुर्सी पर पहुंचने वाले वे एक गैरराजनेता थे, इसलिए उनकी बहुत सी खूबियां ऐसी थीं जो किसी ने किसी राष्ट्रपति में देखी-सुनी नहीं थीं। जब उन्होंने राष्ट्रपति पद की शपथ ली, तो उनके परिवार के लोग दूर दक्षिण के रामेश्वरम से दिल्ली तक अपने खर्चे पर ट्रेन के आम डिब्बे में सफर करके पहुंचे थे, और उसके बाद से किसी ने किसी और मौके पर उनके परिवार के लोगों को देखा भी नहीं था। राष्ट्रपति भवन में उनके परिवार के खाने-पीने पर जो खर्च हुआ, उसका एक-एक पैसा डॉ. अब्दुल कलाम ने अपनी जेब से राष्ट्रपति भवन को दिया। देश के लोग उनको ऐसी सादगी के लिए भी याद करते हैं, और करेंगे। लेकिन आज उनके गुजरने पर सत्ता पर काबिज देश भर के जो लोग बयान जारी कर रहे हैं, और शोक जता रहे हैं, उनमें से सादगी में भरोसा रखने वाले तो उंगलियों पर गिने जा सकने लायक भी नहीं हैं। इसलिए उनकी वाहवाही करके, उनकी खूबियां गिनाकर लोग अपनी खुद की खामियों की तरफ भी लोगों का ध्यान खींच रहे हैं। उनको ऐसी श्रद्धांजलि देने का कोई मतलब नहीं है जिसके साथ-साथ लोग जनता के पैसों से होने वाले खर्च में किफायत की सोचें, सादगी की सोचें, विनम्रता की सोचें, और बिना स्वार्थ वाले सामाजिक योगदान की सोचें। हालांकि आज चारों तरफ यही सब हो रहा है, और सादगी-किफायत की मिसालों को जल्द से जल्द दफन कर देने में ही भारतीय लोकतंत्र में सत्ता के सामंती मिजाज की सुरक्षा है। 
देश की नौजवान पीढ़ी डॉ. अब्दुल कलाम आजाद को इसलिए भी याद करती है कि वे राष्ट्रपति के ओहदे के कटघरे से बाहर निकलकर एक नौजवान जिंदादिली के साथ बच्चों और नौजवानों से बातें करते थे, खुलकर उनको नसीहतें देते थे, हौसला बढ़ाते थे, रास्ता दिखाते थे। उनकी इन बातों में असर इसलिए भी था क्योंकि वे अपनी कही बातों की मिसाल खुद थे। बचपन में जिसने अखबार बेचे हों, वह भारत का मिसाइल मैन कहलाए, बिना अपनी किसी कोशिश के राष्ट्रपति बनाया जाए, जिसे भारत रत्न से सम्मानित किया जाए और लोगों को लगे कि इस सम्मान के वे सबसे जायज हकदार थे, उसे लोगों को नसीहत देने का हक भी था, और उस नसीहत का वजन भी था। लेकिन आज यह सोचें कि उनके मुकाबले देश में ऐसे और कितने चर्चित या प्रमुख लोग हैं जिनकी बात का लोगों पर वजन पड़े, तो शायद कोई दूसरा नाम ऐसी ऊंचाई पर नहीं सूझता। देश की मिसाइल तकनीक में उनका योगदान आम समझ से परे का है, लेकिन देश में इंसानियत को बढ़ावा देने में उनका गैरवैज्ञानिक, अनकहा योगदान, अपने खुद के जीवन के माध्यम से खासा बड़ा रहा। लोगों को लगा कि देश की सबसे बड़ी कुर्सियों में से किसी पर कभी कोई ऐसा भी पहुंच सकता है जो कि भ्रष्ट न हो, दुष्ट न हो, जनता के पैसों की बर्बादी जिसका शगल न हो। लेकिन हम फिर आखिर में यह कहेंगे कि जिनको जनता के पैसों पर सादगी से रहते न बनता हो, उनको अपनी श्रद्धांजलि इस सीधे-सादे आदमी से दूर रखनी चाहिए।

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