सरहद के दोनों ओर के जंगी हसरत वालों पर काबू की जरूरत

संपादकीय
10 जुलाई 2015

भारत और पाकिस्तान प्रधानमंत्रियों के बीच बातचीत का कोई मौका आता है तो सरहद के दोनों तरफ युद्धोन्माद कुछ इस तरह उछाल मारने लगता है कि मानो मानसून की ऊंची लहरों वाला मुंबई का दिन हो, और जगह मरीनड्राइव के किनारे की हो। जंग की हसरत रखने वाले दोनों देशों के बहुत से ऐसे लोग रहते हैं जो चाहते हैं कि बात की जगह लात का इस्तेमाल हो, और सरहद पार करके दूसरे देश की राजधानी तक पहुंचकर कब्जा कर लिया जाए। दोनों देशों में सरकारों का रूख अगर बातचीत का रहता भी है, तो विपक्षी दल सरकार को कोंचने लगते हैं कि जब सत्तारूढ़ पार्टी विपक्ष में थी, तो सरहद पर होने वाली एक-एक शहादत पर वह पड़ोस के दुश्मन के कितने सिर काटने का दावा करती थी, और उस हिसाब से अभी कितने हजार सिर काटकर लाने बाकी हैं। दोनों प्रधानमंत्री मिल भी नहीं पाए थे, कि हिन्दुस्तान में ऐसे आंकड़े हवा में तैरने लगे, कांग्रेस याद दिलाने लगी कि मोदी चुनाव प्रचार के समय कैसे दावे करते थे, और अब सिर काटकर क्यों नहीं ला रहे हैं। दूसरी तरफ पाकिस्तान में हुकूमत के बड़े लोगों के बयान दो दिन पहले ही आए कि उन्होंने परमाणु हथियार दिखाने के लिए नहीं बनाए हैं, जरूरत और नौबत पर उनका इस्तेमाल भी किया जा सकता है। 
दरअसल इन दोनों देशों के बीच क्रिकेट से लेकर प्रधानमंत्रियों तक के बीच के मुकाबले दोनों तरफ के जंग के शौकीनों को याद दिलाते हैं कि किस तरह 1947 में ये दो देश बीच की सरहद के दोनों तरफ बंटे, और उस वक्त कितना कत्लेआम हुआ। वे जख्म और वे यादें खत्म होने का नाम भी नहीं लेते। और आज इन दोनों देशों में अपनी-अपनी बहुत सी खामियों के लिए पड़ोसी की शक्ल में एक बड़ा बहाना मिल जाता है जैसे कि मोहल्ले में कोई बदनाम लड़का रहता है, और हर गलत काम की तोहमत के लिए उसका नाम हाजिर रहता है। इस आग में हवा देने का काम भारत में हमारा देखा हुआ इलेक्ट्रॉनिक मीडिया पसीना बहाते हुए मेहनत से करता है, और भारत-पाक रिश्तों की बातचीत के लिए टीवी पर वे तमाम फौजी अफसर बकवास करते दिखते हैं जो अपने वक्त पर जंग का मौका नहीं पा सके, या जिनकी खूनी हसरतें पूरी नहीं हुईं। इनके अलावा कुछ पुराने और चल गुजरे ऐसे विदेश सेवा के अफसर दिखाए जाते हैं, जिनकी सोच कूटनीतिक सुरंग के बाहर की रौशनी नहीं देख पाती। यह हैरानी और तकलीफ की बात है कि ऐसे किसी भी मौके पर कोई समाचार चैनल ऐसे लोगों को बहसों में नहीं बुलाता जो कि भारत-पाक रिश्तों की बेहतरी के लिए लगातार काम करते हैं, सड़कों से लेकर सोशल मीडिया तक पर सरहद को मिटाकर मोहब्बत लिखने में लगे रहते हैं। दरअसल अमन की बात दर्शकों को उस तरह बांधकर नहीं रख सकती जिस तरह नफरत और जंग की बातें बांधती हैं। इसलिए हिन्दुस्तानी टीवी चैनल अपनी इस हसरत को पूरा करने के लिए लगे रहते हैं कि कैसे दोनों देशों के बीच अधिक से अधिक नफरत की बातें उठाई जाएं। भारत में रहते हुए हमको पाकिस्तानी समाचार चैनल देखने नहीं मिलते, इसलिए बिना देखे उन पर बराबरी की तोहमत लगाना नाजायज होगा, लेकिन हो सकता है कि जिस तरह पाकिस्तान के बहुत से लोग जंगी हसरतें हवा में लहराने लगते हैं, वहां के मीडिया में भी वैसे कुछ लोग हों। 
हमारा ख्याल है कि दोनों देशों के अमन-पसंद लोगों को अपने-अपने मीडिया पर, अपने-अपने बकवासी नेताओं पर, अपने-अपने कुंठा में जीते मौजूदा और रिटायर्ड फौजी अफसरों पर एक दबाव बनाना चाहिए कि वे नफरत को जंग तक बढ़ाने की अपनी कोशिशें खत्म करें। सरहद के दोनों तरफ अनगिनत ऐसे लोग हैं जो कि रात-दिन सरहद पार से आती गजलों को सुनते हैं, सरहद पार से आई फिल्मों को देखते हैं, सरहद पार से आए हुए गायकों के साथ रियलिटी शो में मुकाबले करते हैं, सरहद पार के क्रिकेट खिलाडिय़ों के साथ बैठकर कमेंट्री करते हैं, सरहद पार की कविताओं और कहानियों का अनुवाद करते हैं। इस सरहद पर नफरत के कंटीले पेड़ लगाने वालों, और खासकर मीडिया के इस तरह के लोगों के खिलाफ एक आवाज उठनी चाहिए। हम भारत और पाकिस्तान के प्रधानमंत्रियों के बीच की बातचीत को एक मौका देने के हिमायती हैं। यह बात जब भी हो, जहां भी हो, बात तो लात से बेहतर ही रहेगी। जो बिल्कुल ही नासमझ और असभ्य रहते हैं, वे ही सोच सकते हैं, वे सोचते हैं कि किसी समस्या का समाधान लात से निकल सकता है, बाकी तमाम लोग बात की ही बात करते हैं। जब जहां मौका मिले, हिन्दुस्तान और पाकिस्तान के समझदार लोगों को बैठकर दिक्कतों को दूर करना चाहिए, शक दूर करने चाहिए, और आम लोगों को साथ जीने का एक बेसरहदी मौका देना चाहिए। 

कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें