मदरसों को स्कूली दर्जा देने से नुकसान मुस्लिम बच्चों का ही

संपादकीय
4 जुलाई 2015

महाराष्ट्र सरकार ने यह तय किया है कि वहां चल रहे मदरसों को स्कूलों का जो दर्जा चले आ रहा था उसे खत्म किया जाएगा। और इस बात को लेकर एक बवाल खड़ा हो गया है क्योंकि भाजपा-शिवसेना गठबंधन की राज्य सरकार का मुस्लिमों के लिए रूख एक उग्र हिन्दूवाद का है, और इसे अल्पसंख्यक मुस्लिम समुदाय के खिलाफ चल रही सत्ता की सोच का एक और फैसला माना जा रहा है। सोशल मीडिया पर लगातार इस फैसले पर हमले हो रहे हैं, और इसे देश के भगवाकरण की कार्रवाई की एक कड़ी लिखा जा रहा है। 
लेकिन हम कुछ देर के लिए इस बात को अलग रखते हैं कि यह फैसला भाजपा अगुवाई वाली सरकार का लिया हुआ है, और यह सरकार गोवंश को काटने और खाने को एक सजा के लायक जुर्म का कानून बनाकर वैसे भी महाराष्ट्र के दसियों लाख लोगों का रोजगार छीन चुकी है। इस बात को परे रखकर अगर सोचें कि बच्चों को मदरसे में धर्म की शिक्षा देना और उसे स्कूल शिक्षा मान लेना क्या ठीक है? मुस्लिम समाज के ओवैसी जैसे जो सबसे आक्रामक नेता हैं, उन्होंने भी अधिक से अधिक इतना ही कहा है कि मदरसों में मजहब की तालीम के साथ-साथ कई जगहों पर विज्ञान और गणित भी पढ़ाया जाता है। जाहिर है कि मदरसों में अधिक जोर मजहब की पढ़ाई पर रहता है, और साथ-साथ हो सकता है कि बाकी आम स्कूलों की तरह के कुछ विषय पढ़ाए जाते हों। भारत के संविधान में अल्पसंख्यक तबकों को अपनी शैक्षणिक संस्थाओं को लेकर भी कई तरह की छूट मिली हुई है। लेकिन ऐसी छूट के साथ-साथ भी जब हम इस बारे में सोचते हैं कि क्या ईसाई-स्कूलों को ईसाई धर्म पढ़ाने पर जोर देना चाहिए, और लगे हाथों कुछ और विषय पढ़ाना हो तो पढ़ा दें, क्या जैन-स्कूलें जैन धर्म पढ़ाएं, सिक्ख-स्कूलें ग्रंथसाहब पढ़ाकर जिम्मा पूरा कर लें, बौद्ध-स्कूलें बौद्ध धर्म और निर्वाण को पढ़ाकर बच्चों की पढ़ाई पूरी मान लें? 
धर्म के नाम पर बच्चों से स्कूली उम्र में दुनिया के लिए जरूरी विषयों को पढऩे का हक छीन लेना, और उन्हें सिर्फ धर्म पढ़ाना, धर्म के ठेकेदारों के लिए तो फायदे का हो सकता है, लेकिन ऐसे बच्चों के लिए यह शर्तिया घाटे का काम होगा। और किसी अल्पसंख्यक समुदाय के लिए ही यह बात लागू नहीं होती, भारत जैसे सामाजिक ताने-बाने में बहुसंख्यक हिन्दू समुदाय पर भी यह बात लागू होती है, और हिन्दू-स्कूलें अगर सिर्फ हिन्दू धर्म पढ़ाएं, सिर्फ वैदिक-गणित पढ़ाएं, सिर्फ पुराण पढ़ाएं, तो इससे बड़ा नुकसान हिन्दू बच्चों का और कुछ नहीं हो सकता। इसलिए अगर मुस्लिम बच्चों को महज मदरसे नसीब होंगे, तो देश और दुनिया के मुकाबले में वे हमेशा ही पीछे रह जाएंगे, और उनकी वजह से उनका पूरा समाज अपनी संभावनाओं तक पहुंचने से मीलों पीछे रह जाएगा। अभी हम इस बात पर नहीं जा रहे कि क्या भारत के कुछ मदरसे बच्चों में एक धार्मिक कट्टरता पैदा कर रहे हैं, या नहीं। धार्मिक कट्टरता तो किसी भी धर्म से जुड़ी हुई स्कूलों में पैदा हो सकती है, और उस पर किसी मदरसे का एकाधिकार नहीं हो सकता। दरअसल धर्म की पूरी सोच ही कट्टरता की है, और चाहे वह कोई भी धर्म क्यों न हो। 
महाराष्ट्र सरकार चाहे जिस पार्टी की अगुवाई वाली हो, उसका यह फैसला हमको ठीक लगता है कि मदरसों को स्कूल न माना जाए। आज भारत में ही अल्पसंख्यक बच्चों को बाकी बच्चों के मुकाबले खड़े भी होने के लिए औपचारिक स्कूली शिक्षा जरूरी है, जो कि मदरसों से नहीं मिल सकती। वैसे भी चाहे मुस्लिम धर्म पढ़ाने वाली स्कूल हो, या हिन्दू पंडित-पुजारी बनाने वाली कोई स्कूल हो, ऐसे तमाम शैक्षणिक संस्थान बच्चों को कमजोर बनाकर छोड़ते हैं, और आज इक्कीसवीं सदी की जरूरतों से वे सैकड़ों बरस पीछे चल रहे हैं। सिर्फ अल्पसंख्यकों के अधिकार का भारतीय संविधान में जिक्र, अल्पसंख्यकों के फायदे का हो यह जरूरी नहीं है। कानून के साथ-साथ एक सामान्य समझबूझ भी जरूरी है, वरना भारतीय संविधान तो एक नाबालिग मुस्लिम लड़की की शादी को भी जायज करार देता है। धर्म को जिंदगी में इतना अधिक दखल देने देना उस धर्म के मानने वाले लोगों के लिए ही नुकसानदेह है। मदरसों को जो लोग स्कूल जितना काफी मानते हैं, और ऐसा ही जारी रखना चाहते हैं, वे मुस्लिम बच्चों के हिमायती नहीं हो सकते। केन्द्र और राज्य सरकारों के बहुत से फैसले देश के भगवाकरण के हो सकते हैं, लेकिन इसका विरोध करने के लिए मुस्लिम बच्चों के नसीब में सिर्फ मदरसे लिखना एक और बड़ी ज्यादती होगी। मुस्लिम समाज वैसे भी सामाजिक और आर्थिक रूप से पिछड़ा हुआ है, और उसे बाकी आबादी की बराबरी से लाने की बातें लंबे समय से चल रही हैं। इन्हीं बातों में से एक बात यह भी है कि मदरसों को सरकारी मदद देकर और अधिक सुविधा-संपन्न बनाया जाए। हमारा मानना है कि धर्म की पढ़ाई पर केन्द्रित कोई भी शैक्षणिक संस्थान स्कूल का विकल्प नहीं हो सकते। इस बात को भाजपा और गैरभाजपा सरकारों के फैसलों से जोड़कर देखना अल्पसंख्यक समुदाय के साथ ही ज्यादती है। महाराष्ट्र सरकार ने यह भी साफ किया है कि किसी भी और धर्म के शैक्षणिक संस्थान अगर सिर्फ धर्म पढ़ा रहे होंगे, और बाकी विषयों को नहीं पढ़ाते होंगे, तो उनका भी स्कूल का दर्जा खत्म कर दिया जाएगा। ऐसे में मदरसों पर अड़े रहने वाले मुस्लिम नेता वे ही हैं, जिनकी ठेकेदारी के लिए मुस्लिमों का कम पढ़ा-लिखा रहना जरूरी है।


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