अमरीकी समलैंगिक शादियां, और पोप का गुलाम भारत

संपादकीय
28 जून 2015

अमरीका के सुप्रीम कोर्ट ने वहां के अलग-अलग राज्यों की अदालतों के समलैंगिक विवाहों पर लिए गए अलग-अलग फैसलों का निपटारा करते हुए इसे कानूनी दर्जा दे दिया है। देश भर में लागू इस फैसले के स्वागत में बराक ओबामा के राष्ट्रपति भवन को समलैंगिकों के प्रतीक इन्द्रधनुषी-रंगों की रौशनी से सजाया गया है। इस मुद्दे पर अमरीका की जनता दो हिस्सों में बंटी हुई है। मोटे तौर पर ईसाई धार्मिक मूल्यों की बहुलता वाले अमरीका में गर्भपात से लेकर समलैंगिकता तक बहुत से मुद्दे ईसाई धर्म की मान्यताओं से जुड़े होने की वजह से अमरीकी जनता के बीच बड़ी कड़ी और विभाजित प्रतिक्रिया पैदा करते हैं। ऐसे में अदालत के इस फैसले को लेकर वहां की संकीर्णतावादी रिपब्लिकन पार्टी के राष्ट्रपति पद प्रत्याशी होने के महत्वाकांक्षी बॉबी जिंदल ने यह तक कह दिया है कि ऐसे सुप्रीम कोर्ट को खत्म कर देना चाहिए। जाहिर है कि इस मुद्दे पर वहां की ये दोनों बड़ी पार्टियां आपस में बहुत बुरी तरह आमने-सामने हो गई हैं, और आने वाले चुनाव में धार्मिक-सामाजिक मान्यताओं का मुद्दा पिछले चुनावों के मुकाबले कुछ अधिक आक्रामक हो सकता है। 
लेकिन अमरीका से परे, योरप के कई देश पहले ही समलैंगिक शादियों को मान्यता दे चुके हैं, और अमरीका के कुछ राज्यों में भी कुछ अरसे से ऐसी शादियां कानूनी हो चुकी हैं। इस बात की भारत में चर्चा इसलिए महत्वपूर्ण हो जाती है कि पिछले बरसों में भारत में दो बड़े अदालती फैसले देखे हैं जिनमें से एक, दिल्ली हाईकोर्ट का फैसला धारा 377 को जुर्म के दायरे से बाहर लाने वाला था, और फिर इसके खिलाफ सुप्रीम कोर्ट का फैसला आया जिसमें इस कानून को फिर से सही करार दिया। भारतीय कानून की यह धारा समलैंगिकता से जुड़ी हुई है, और देश की सामाजिक-सांस्कृतिक परंपराओं में सदियों से चली आ रही व्यवस्था के खिलाफ अंग्रेज-ईसाई असर से बनी धारा 377 को आज अंग्रेज-ईसाई विरोधी राजनीतिक ताकतें भी भारत के सिर पर लादकर चल रही हैं। समलैंगिकता का विरोध करने वाले आज के धर्मान्ध, कट्टर, और दकियानूसी लोग यह भी भूल जा रहे हैं कि जब भारत पर कब्जा करने के लिए अंग्रेज यहां आए, तो उनके साथ आए पादरियों ने ईसाई धर्म की इस आस्था को यहां पर लादा कि ऐसा सेक्स अनैतिक है जो कि मानवीय जीवन को आगे नहीं बढ़ा सकता। नतीजा यह हुआ कि भारतीय संस्कृति में चली आ रही समलैंगिकता को चर्चा ने गैरकानूनी करार करवा दिया, और सैकड़ों बरस पहले के बने खजुराहो जैसे अनगिनत मंदिरों पर तराशी गई सेक्स की मूर्तियों में से बहुत सी मूर्तियां अब जुर्म सिखाने वाली करार दी जा सकती हैं। 
भारत के सुप्रीम कोर्ट से यह उम्मीद की जाती थी कि दो वयस्क लोगों के बीच आपसी सहमति से बनने वाले देह संबंधों की आजादी को वह कायम करेगा, लेकिन इस अदालत ने चर्च की सोच को भारतीय लोकतांत्रिक कानून मान लेने के अंग्रेज और फिर हिन्दुस्तानी सरकारी फैसलों को सही करार दिया। यह सोच बताती है कि भारतीय लोकतंत्र को हांकने वाले देश के सबसे ताकतवर तबके एक स्वतंत्र सोच के बजाय चर्च की मानसिकता को ढोकर चलने वाले हैं। अंग्रेजों के वक्त के इतने-इतने कानून, इतने-इतने रिवाज भारतीय लोकतंत्र आज भी अंग्रेजों के मैले के टोकरे की तरह सिर पर ढोकर चल रहा है, और गुलाम सोच में गर्व हासिल करने वाले काले हिन्दुस्तानी इसमें खुश भी हैं। भारत का सुप्रीम कोर्ट ऐसी गुलाम सोच से बाहर निकलना चाहिए था, लेकिन वह हो नहीं पाया। समलैंगिक शादी दुनिया के कई हिस्सों में कानूनी हो रही है, और वयस्कों के बीच समलैंगिक देह संबंध भी इक्कीसवीं सदी के हिन्दुस्तान में एक जुर्म है। भारत जैसे गुलाम देश पर आज भी राज करता वेटिकन अपनी इस ताकत पर आज हॅंस रहा होगा, क्योंकि जिस इटली के बीच यह वेटिकन एक टापू की तरह का मोहल्ला है, उस वेटिकन की सोच को यह भारत अपनी किस्मत मानकर उस पर गौरवान्वित है। अमरीकी अदालत के फैसले का भारत तक कोई असर नहीं होना है, क्योंकि यह देश पोप को कंधों पर उठाकर अपने को स्वर्ग पहुंचता सोचता है।

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