सस्ता रोए बार-बार महंगा रोए एक बार

संपादकीय
2 जुलाई 2015

संसद की एक समिति ने सांसदों की तनख्वाह और सहूलियतें बढ़ाने की सिफारिश की है। ऐसा अगर हो जाता है तो यह तनख्वाह दोगुनी हो जाएगी। इसके अलावा भूतपूर्व सांसदों को पेंशन भी पौने दो गुना करने की सिफारिश है। कई और बातें भी हैं जिनमें यह भी है कि सांसदों के बच्चों और पोते-पोतियों को भी मुफ्त इलाज मिले। पिछले बहुत बरसों से भारत के लोगों के मन में यह नाराजगी बैठी हुई है कि देश के गरीब बच्चे कुपोषण के शिकार हैं और सांसद संसद की कैंटीन में बहुत ही रियायती खाना पाते हैं। इसलिए अब यह सवाल उठ रहा है कि जो संसद और सांसद न्यूनतम मजदूरी कानून में संशोधन करके इस देश के मजदूरों की न्यूनतम मजदूरी बढ़ाने की परवाह नहीं कर रहे, वे सांसद अपनी तनख्वाह दुगुनी करने के फेर में हैं। 
इस बारे में हमारी सोच कुछ अलग है। भारत जैसे चुनावी लोकतंत्र में सांसद और विधायक पर जितना बोझ रहता है, उसे ईमानदारी से ढोना नामुमकिन सा रहता है। लोग अपनी नाली-पानी की दिक्कतों को लेकर भी विधायकों से लेकर सांसदों तक जाने के आदी रहते हैं, और अपने घर के मुंडन से लेकर जगराता तक में उम्मीद करते हैं कि सांसद आए, और चढ़ावा चढ़ाए। इसके अलावा इलाज में, पढ़ाई में, मकान बनाने में, और शादी में भी लोग सांसदों से, विधायकों से मदद की उम्मीद करते हैं। अभी हम महंगे चुनावों और उसमें सीमा से अधिक जाकर कालेधन के खर्च की बात कर भी नहीं रहे हैं, सिर्फ जायज खर्च ही इतने अधिक होते हैं कि सांसद-विधायक अपने चुनाव क्षेत्र से लेकर राजधानियों तक के खर्च उठा नहीं पाते। फिर इसके अलावा बाकी तमाम लोगों की तरह सांसदों-विधायकों के भी अपने परिवार होते हैं, और रिटायर होने के बाद पेंंशन के अलावा वे किसी और काम के बच भी नहीं जाते हैं। 
ऐसे में भारत को अगर अच्छे सांसद और विधायक चाहिए, तो उसे लोकतंत्र के बाजार में सस्ती खरीदी और सेल के माल की उम्मीद नहीं करना चाहिए। अंग्रेजी की एक कहावत है कि अगर मालिक तनख्वाह में मूंगफली देता है, तो उसे बंदर जैसे ही नौकर नसीब होते हैं। जनता अगर अपने निर्वाचित नेता बहुत सस्ते में चाहती है, तो अपने निजी जीवन में मामूली सुख-सहूलियत की उम्मीद रखने वाले काबिल लोग चुनाव लड़कर संसद-विधानसभा में आना नहीं चाहेंगे। हमारा मानना है कि देश के बजट में संसद का कुल खर्च इतना कम होता है, कि सांसदों को अधिक मेहनत के लायक सुविधाएं देनी चाहिए, और उनको घरेलू जिम्मेदारियों को ठीक से निभाने के लिए अच्छी तनख्वाह भी देनी चाहिए। सस्ते सांसद देश को कुल मिलाकर महंगे पड़ते हैं, और सिर्फ बेईमानी की बदौलत सांसद-विधायक अपना काम चला लेंगे यह सोचकर जो देश उनको कम तनख्वाह देगा, वह उनके ईमानदार बने रहने की थोड़ी-बहुत संभावना को भी खत्म कर देगा। इसी देश की संसद में सवाल पूछने के लिए पैसे लेते सांसदों को टीवी पर देखा है, और यह बड़ी आम बात है कि दिल्ली में सांसद अलग-अलग कारखानेदारों के लिए किस तरह लॉबिंग करते हैं। यह नौबत खत्म करके लोगों की ईमानदारी को एक मौका देना चाहिए। 
चुनावी राजनीति वैसे भी ईमानदार, शरीफ, और कामयाब लोगों को नहीं सुहाती है। भारतीय राजनीति में अच्छे लोगों का आना अच्छी तनख्वाह के बिना आसान नहीं है। बहुत से लोग यह सोच सकते हैं कि राजनीति एक जनसेवा होनी चाहिए, और लोगों को समर्पित भाव से इसमें काम करना चाहिए। हम इससे बिल्कुल सहमत नहीं हैं। संसदीय राजनीति एक पूर्णकालिक पेशा है, और जिस तरह मुफ्त का डॉक्टर, मुफ्त का वकील, महंगे पड़ सकते हैं, उसी तरह मुफ्त के नेता या सस्ते नेता देश को अधिक महंगे पड़ सकते हैं। लोगों को निर्वाचित नेताओं को तनख्वाह अधिक न देने की सोच के साथ-साथ यह भी सोचना चाहिए कि क्यों कोई कामयाब इंसान महज पांच बरस के कार्यकाल की संभावना पर अपने जमे-जमाए काम को छोड़कर चुनावी राजनीति में उतरेंगे? एक बार के कार्यकाल के बाद अगला चुनाव न लडऩे की गारंटी होती है, और न ही जीतने की। ऐसे में लोगों का भरी जवानी में एक अजीब सा रिटायरमेंट शुरू हो जाता है। ऐसी नौबत कोई भी कामयाब लोग अपनी जिंदगी में आने नहीं देना चाहते। और जब जनता को खरीददारी करनी है, तो याद रखना चाहिए कि बड़े-बूढ़ों ने कहा भी है- सस्ता रोए बार-बार, महंगा रोए एक बार। 

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