डिजिटल इंडिया तो ठीक है, लेकिन समझबूझ भी जरूरी

1 जुलाई 2015 
संपादकीय 

केंद्र की मोदी सरकार देशभर में डिजिटल इंडिया नाम से एक बड़ी महत्वाकांक्षी योजना शुरू करने जा रही है, जिसमें देशभर के लोगों को इंटरनेट और कम्प्यूटर सुविधाओं से जोड़ा जाएगा। इन दोनों की अपनी सहूलियत होती है, और लोगों का काम आसान होने के साथ-साथ तेज रफ्तार भी हो जाता है। देश के हर नागरिक को एक डिजिटल लॉकर देने की घोषणा की जा चुकी है, जिसमें लोग अपने दस्तावेज रख सकेंगे, और किसी सरकारी दफ्तर में, अदालत में देने के वक्त कहीं से भी उस लॉकर तक पहुंच सकेंगे। 
यह बड़े अफसोस की बात है कि नरेन्द्र मोदी के मुकाबले जिस नौजवान राहुल गांधी को कांग्रेस और यूपीए की तरफ से पेश किया गया था, वह मोदी से पूरी एक पीढ़ी छोटा है, लेकिन उसकी तरफ से आधुनिक तकनीकों के इस्तेमाल की कोई सोच 10 बरस की सत्ता के बाद भी सामने नहीं आई। और चाय बेचने से जिंदगी की शुरूआत करने वाले नरेन्द्र मोदी ने चुनाव अभियान के पहले से ही डिजिटल तकनीक और संचार साधनों का जो जबर्दस्त इस्तेमाल किया, वह देखने लायक था। खैर, कांग्रेस के न किए हुए पर किसी अफसोस की जरूरत इसलिए नहीं है कि वह उसका भुगतान कर चुकी है, और कम से कम अगले पांच बरस तो सत्ता के बाहर हो ही चुकी है। अब मोदी सरकार आम जनता की जिंदगी की छोटी-छोटी बातों को आसान बनाने का काम अगर करती है, तो इससे चुनावी नफे-नुकसान से परे भी देश का भला होगा। 
डिजिटल इंडिया की सोच के साथ-साथ यह कोशिश करना भी जरूरी है कि सरकारी खानापूरी का बोझ जनता पर कैसे कम किया जाए। आज हालत यह है कि लोग जब सरकारी दफ्तरों में जाते हैं, तो उनसे बिना जरूरत दर्जनों कागज मांगे जाते हैं, इन कागजों का सत्यापन किसी सरकारी अफसर या नोटरी से करवाना जरूरी रहता है, जबकि ये कागज सरकार के उन्हीं दफ्तरों में पड़े रहते हैं, और उनको जनता से बार-बार मांगा जाता है, कई तरह के हलफनामे लिए जाते हैं, और लोग एक-एक कागज के लिए कई-कई दिन धक्के खाते रहते हैं। ऐसे में दलाल कागजों की जालसाजी करवाते हैं, और रिश्वत का एक ढांचा खड़ा करते हैं। सरकार आधुनिक तकनीक का इस्तेमाल करे, यह तो ठीक है, लेकिन तकनीक के अलावा जो सामान्य समझबूझ है, उसके इस्तेमाल से परहेज भी नहीं होना चाहिए। 
हम यहां पर अमरीकी सरकार की मिसाल देना चाहेंगे, जिसके जनता के भरे जाने वाले हर कागज पर अनुमानित समय भी लिखा होता है कि इन जानकारियों को भरने में कितना वक्त लगेगा। हर कागजात पर सवाल कम से कम किए जाते हैं, जानकारी कम से कम मांगी जाती है, और यह हिन्दुस्तान में भी जनता का हक है, लेकिन उसे मिलता नहीं है। भारत में बात-बात पर जानकारी और कागज मांगने और चक्कर खिलाने का सिलसिला कोई आधुनिक तकनीक या कम्प्यूटर खत्म नहीं कर सकते। इसके लिए सरकार चला रहे लोगों की सोच लोकतांत्रिक होनी जरूरी है, और आम जनता के लिए सत्ता के मन में लबालब भरी हुई हिकारत खत्म होना जरूरी है। आज सत्ता में बैठा तबका खास है, और आम जनता आम भी नहीं रह गई है, वह गुठली से भी गई-बीती बची है। 
सरकारों में डिजिटल तकनीक को एक तिलस्म या ताबीज की तरह इस्तेमाल किया जाने लगा है। जब तक इन तकनीकों को लोकतांत्रिक समझ से जोड़ा नहीं जाएगा, तब तक जनता को उसकी जेब से किए गए इस बड़े खर्च का कोई फायदा नहीं मिलेगा। 
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