लड़कियों की पढ़ाई से लेकर सेहत और आत्मनिर्भरता तक

29 जून 2015
संपादकीय

एक अफ्रीकी देश बोत्सवाना में हुए एक शोध में एक दिलचस्प तथ्य सामने आया कि स्कूल की बड़ी कक्षाओं में पढऩे वाली लड़कियों को एड्स का खतरा घटते चलता है, अगर वे पढ़ाई जारी रखती हैं। एक लंबे रिसर्च में यह पाया गया कि वहां पर हायर सेकेंडरी स्कूल में एक बरस पूरा करने वाली लड़कियों में एचआईवी संक्रमण 8 फीसदी तक घट जाता है। यह सीधे-सीधे पढ़ाई और परिपक्वता से जुड़ा हुआ है, और दूसरी बात इसके पीछे यह है कि स्कूल के अनुशासन में रहने वाली लड़की, और स्कूल के बाहर बिना काम करने वाली लड़की पर सामाजिक खतरे में बड़ा फर्क होता है। 
अफ्रीका के इस देश की इस बात का भारत में वैसे तो कोई मतलब नहीं है, क्योंकि यहां एचआईवी संक्रमण के खतरे अलग किस्म के हैं, लेकिन स्कूल की पढ़ाई लड़कियों के लिए कितनी मायने रखती है, यह बात महत्वपूर्ण है। अभी कल की ही खबर है कि राजस्थान में एक अधेड़ निर्वाचित पंच ने छह बरस की बच्ची से शादी की। इसकी तस्वीर भी देखने में भयानक लगती है। अब ऐसी लड़की न तो अपनी किसी तरह की हिफाजत कर सकती, न ही उसे गर्भ के खतरे का पता है, और न ही उसे सेक्स से होने वाली बीमारियों की कोई जानकारी है। इतने कम उम्र में गर्भवती होने और मां बनने के खतरे उसकी खुद की सेहत पर भी रहते हैं, और होने वाले बच्चे की सेहत पर भी। ऐसे में एक लड़की की पढ़ाई जारी रहना, उसे कम उम्र में शादी से कुछ तो दूर रखता ही है। ऐसा इसलिए जरूरी है कि भारत में पहले से चले आ रहे रीति-रिवाजों के तहत बच्चियों की बहुत कम उम्र में शादी का एक खतरा है, दूसरा खतरा यह है कि उनकी शादी इतनी अधिक उम्र के आदमी से हो जाए कि अपने आखिरी कई बरस वह एक विधवा के दर्जे के साथ ही गुजारने को मजबूर हो। तीसरा खतरा यह कि कम पढ़ाई-लिखाई के साथ शादी के बाद एक लड़की केवल घरेलू काम या मजदूरी के लायक रह जाती है, और उसकी आर्थिक आत्मनिर्भरता जिंदगी में कभी भी नहीं आ पाती। इसके अलावा जिन चिकित्सकीय खतरों को हमने गिनाया है, वे तो अपनी जगह हैं ही कि बाल विवाह के बाद कम उम्र की मां एक कमजोर अगली पीढ़ी को जन्म देती है। 
लेकिन भारत में केन्द्र और राज्य सरकारों के तमाम सरकारी और राजनीतिक नारों के बावजूद, सुप्रीम कोर्ट के कई-कई आदेशों के बावजूद देश में लड़कियों के स्कूलों में पखाने तक नहीं है, या हैं तो इस्तेमाल के लायक नहीं हैं, वहां पानी नहीं है, और ऐसे बहुत से प्रदेश हैं जहां पर इसी एक कमी के चलते लोग लड़कियों को स्कूलों से निकाल लेते हैं। इसके अलावा देश भर से आए दिन जिस तरह बच्चियों से बलात्कार की खबरें आ रही हैं, स्कूलों, छात्रावासों, खेल के मैदानों पर जिस तरह के यौन शोषण की खबरें आ रही हैं, वे भी गरीब और कमजोर मां-बाप को बच्चियों को बाहर भेजने से रोकती हैं। लोगों को लगता है कि लड़की को हिफाजत से रखने का यही एक तरीका है कि कम उम्र में ही, बलात्कार से बचे-बचे ही उसकी शादी कर दी जाए, ताकि ससुराल और पति मिलकर उसको सुरक्षित रख सकें। बहुत से मजदूर परिवारों में जहां मां-बाप दोनों ही काम करने निकल जाते हैं, वहां पर अकेली लड़की को घर पर छोडऩा एक बड़ा खतरा माना जाता है, और ऐसे में भी कम उम्र की शादी होती है। 
सरकार की स्कूली योजनाओं में इस तरह की सामाजिक जरूरतों और सामाजिक सुरक्षा का इंतजाम न तो है, और न ही हो सकता है। इसलिए समाज के लोगों को खुद ही अपने आसपास बच्चियों को बढ़ावा देने के लिए उनकी हिफाजत का एक सामाजिक इंतजाम करना चाहिए, और बच्चियों को परेशान करने वाले लोगों से निपटने का जिम्मा सिर्फ उनके मां-बाप का नहीं मानना चाहिए, बल्कि हर जिम्मेदार व्यक्ति को किसी तरह का खतरा किसी बच्ची पर दिखने पर दखल देनी चाहिए। यह मानना चाहिए कि आज जो खतरा किसी और पर है, वह खतरा कल अनदेखा करने वाले लोगों के अपने बच्चों पर भी आ सकता है। यह एक बड़ी जटिल स्थिति है, और बाल विवाह की रोकथाम से लेकर, लड़कियों की पढ़ाई के खास इंतजाम तक, और लड़कियों की आर्थिक आत्मनिर्भरता की तैयारी तक, इन सबमें समाज और सरकार दोनों को मिलकर काम करना चाहिए। ये लड़कियां ही रहती हैं जो कि अगली पीढ़ी तैयार करती हैं, देश और दुनिया का भविष्य तय करती हैं।

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