कौशल विकास एक और सरकारी धांधली होकर न रह जाए...

15 जुलाई 2015
संपादकीय

पन्द्रह जुलाई को विश्व युवा कौशल विकास दिवस मनाया जा रहा है। तकरीबन सभी प्रदेशों में, देशों में इस मौके पर कार्यक्रम होंगे। लेकिन कौशल विकास को अगर सिर्फ रोजगार दिलाने वाले हुनर सिखाने तक सीमित मान लिया जाएगा, तो यह नौजवानों के लिए खासी बेइंसाफी की बात होगी। रोजगार के लिए कुछ हुनर सीधे-सीधे पहचाने जाते हैं, लेकिन आज की दुनिया में नौजवानों के लिए बहुत सी दूसरी बातें भी हर हुनर के साथ जुड़ी हुई रहती हैं, जिनको गिना नहीं जाता है।
अब दुनिया का कौन सा ऐसा हुनर है जिसके साथ नौजवानों को एक अच्छे व्यक्तित्व की जरूरत न हो? विनम्रता की जरूरत न हो? देश और दुनिया में अधिक प्रचलित, अंगे्रजी जैसी किसी दूसरी भाषा की जरूरत न हो, कम्प्यूटर की जानकारी की जरूरत न हो? ड्राइविंग की जरूरत न हो? अर्जी बनाना, ई-मेल करना सीखने की जरूरत न हो? हर काम या रोजगार के साथ, हर हुनर के साथ नौजवानों को ये आम खूबियां अगर सीखने मिलें, तो उनका हर हुनर अधिक संभावनाएं पा सकता है।
जब तक नौजवानों को अपने कौशल या अपने हुनर के मुताबिक काम या रोजगार मिल नहीं जाता, तब तक उनके पास इन खूबियों को सीखने का वक्त रहता है, लेकिन सहूलियत नहीं रहती। भारत अगर अपनी युवा पीढ़ी का कौशल विकास चाहता है, तो उसे इस पीढ़ी को बुनियादी हुनर के साथ-साथ दूसरी बातें भी सिखानी होंगी। आज तो इस देश में जिस तरह की धांधली किसी भी दूसरे सरकारी काम में होती है, वैसी ही धांधली कौशल विकास कार्यक्रमों के तहत भी हो रही है। फर्जी संस्थाएं कौशल विकास के नाम पर कागजों पर फसल उगाकर काटने और बेचने जैसा काम कर रही हैं। ऐसे में कौशल विकास के आंकड़े तो पनपते जाएंगे, लेकिन न तो देश में किसी हुनर की उत्कृष्टता बढ़ेगी और न ही दुनिया में ऐसे हुनर की कोई कद्र होगी।
सरकार को अपने अनुदान के साथ-साथ भरोसेमंद सामाजिक संगठनों को भी कौशल विकास से जोडऩा होगा। भारत में पोलियो के खात्मे के लिए देश भर में सरकारी कोशिशों के साथ-साथ रोटरी जैसे संगठन ने बरसों से इसमें कंधे से कंधा भिड़ाकर काम किया, तब जाकर पोलियो खत्म हुआ। हिंदुस्तान के देश-प्रदेशों की सरकारों के जब तक गैरसरकारी संगठनों, सामाजिक संस्थाओं का योगदान कहीं मिलेगा, कौशल विकास के नाम पर मोटे तौर पर महज जालसाजों का विकास होगा। 
आज देश के भीतर भी अलग-अलग हुनर के कामगारों की डिमांड और सप्लाई के बीच बड़ा फासला है। देश में आज करोड़ों नौजवान बिना काम भटक रहे हैं और दसियों लाख ड्राइवरों की जरूरत है, दसियों लाख रसोईयों की, दसियों लाख नर्सों की जरूरत है। ऐसे दर्जनों हुनर हैं जिसमें माहिर लोगों की जरूरत दस-दस लाख से अधिक एक-एक काम में है, लेकिन ये जरूरतें अच्छे प्रशिक्षित और माहिर लोगों की है, औने-पौने काम चलाऊ लोगों की नहीं। सरकार और समाज को मिलकर देश और जनता के लिए अगर अच्छे दिन लाने हैं, तो भारत के हुनर को विश्वस्तरीय बनाना होगा। ऐसा होने पर यहां की आबादी बोझ न बनकर यहां की दौलत बन जाएगी। आज विकसित और सम्पन्न दुनिया में लोग हफ्ते में चार दिन के काम को घटाकर तीन दिन का करने के फेर में हैं। ऐसे में हर देश में माली से लेकर मालिश वाले तक की जरूरत बढ़ती जाएगी। ऐसे दुनिया के लिए भारत को अपनी नौजवान पीढ़ी को मुख्य हुनर के साथ-साथ बाकी आम खूबियां भी सिखानी होंगी। तभी केरल की तरह बाकी हिंदुस्तान में भी बाहर गया हुआ हुनर डॉलर कमाकर लाएगा।

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