अगली पीढ़ी को अपनी जिंदगी जीने न देने से ऐसे नुकसान

संपादकीय
27 अगस्त 2015

वैसे तो हिन्दुस्तान में रोज ही कहीं न कहीं से प्रेम संबंधों को लेकर परिवार के हाथों जान खोने वालों की खबरें आती हैं, लेकिन अभी मुम्बई से जो ताजा खबर आई है, उसमें बड़े-बड़े चर्चित नाम हैं, और पारिवारिक संबंधों की जैसी जटिलता इस मामले में दिख रही है, वैसी कत्ल के किसी मामले में कम ही दिखती होगी। मीडिया से जुड़े एक नामी-गिरामी आदमी, पीटर मुखर्जी की दूसरी या तीसरी पत्नी के वे तीसरे या चौथे पति थे। इस पत्नी की पहले की किसी शादी से एक बेटी थी, जिसे उसने अपने मौजूदा पति से भी छुपाकर, उसे अपनी बहन बताकर रखा था, ताकि मां की अपनी उम्र अधिक न लगे कि वह एक जवान बेटी की मां है। अब इस मौजूदा पति का एक बेटा जो कि उसकी पहले की किसी बीवी से था, उसका अपनी सौतेली मां की इस पिछली बेटी से प्रेम हो गया। और इसी प्रेम का विरोध करते हुए इस मां ने अपनी ही बेटी का कत्ल करवा दिया, ऐसा पुलिस का दावा है, और उसने इसे गिरफ्तार भी किया है। अब इस मां के साथ-साथ, उसका एक कोई पिछला पति भी इस कत्ल में मददगार होने के नाते गिरफ्तार किया गया है। 
समाज के सबसे संपन्न और सबसे आधुनिक तबके, इस तरह की पारिवारिक व्यवस्था वाले लोग भी अपने बच्चों के प्रेम संबंध देख नहीं पाते, और उनका कत्ल करवा दिया। अब सवाल यह है कि दो अलग-अलग माता-पिता के, दो अलग-अलग लोगों से पैदा हुए बच्चों का आपस में तो कोई रिश्ता था नहीं, और अपने पिता, और अपनी मां की दूसरी-तीसरी शादी के चलते वे किसी तरह से सौतेले भाई-बहन करार दिए जा सकते थे। लेकिन ऐसे रिश्ते का कोई मतलब नहीं था, क्योंकि ये बच्चे न साथ में बड़े हुए, न इनका खून का कोई रिश्ता था। और ऐसे में उनकी आपस में शादी कोई वर्जित संबंध भी नहीं थी, न तो जेनेटिक्स के हिसाब से, और न ही इस किस्म की पारिवारिक व्यवस्था के हिसाब से। और फिर दो बालिग लोगों का साथ रहना उनकी अपनी मर्जी है, और यह भी देखने लायक बात है कि यह कत्ल उस मां का किया या करवाया हुआ बतलाया जा रहा है जो अपनी बेटी को बेटी न कहकर बहन बताकर चल रही थी। 
हिन्दुस्तान में मां-बाप बच्चों पर अपनी मर्जी थोपने को अपना हक मानते हैं। ऐसे में बहुत से बच्चे खुदकुशी कर लेते हैं, और बहुत से बच्चे घुट-घुटकर जीते हैं, मर जाते हैं। दूसरी तरफ अपनी मर्जी थोपने वालों में जो अधिक हिंसक होते हैं, वे इस तरह के कत्ल करवाते हैं। हिन्दुस्तान के बाहर भी ब्रिटेन जैसे देश में बसे हुए हिन्दुस्तानी और पाकिस्तानी मां-बाप इस किस्म की ऑनर-किलिंग कहे जाने वाले जुर्म में सजा पा चुके हैं। भारतीय समाज को इस किस्म की हिंसा से उबरना होगा। हम इन सौतेले भाई-बहनों की आपसी शादी की बात नहीं कर रहे, इस संबंध में और भी बहुत से लोगों को आपत्ति हो सकती है, लेकिन किसी भी किस्म के प्रेम संबंधों को लेकर अगर आधुनिक विचारधारा वाले, और बहुत ही दुस्साहसी किस्म की अपनी निजी जिंदगी वाले मां-बाप भी अगर औलाद का कत्ल करवा रहे हैं, तो यह ही भयानक हालत है। समाज को यह समझना होगा कि अपने जवान बच्चों पर अपनी मर्जी को इस हद तक थोपना न तो जायज है, और न ही मौजूदा कानूनों के चलते हुए यह मुमकिन ही है। इस किस्म के दो अलग-अलग मां-बाप के बच्चों के बीच शादी के खिलाफ कोई कानून भी नहीं है। 
देश में समाज व्यवस्था को अपनी फौलादी जकड़ को खत्म करना होगा, क्योंकि फौलाद अब फैशन में नहीं रह गया। टेक्नालॉजी में भी फौलाद के कई किस्म के विकल्प इस्तेमाल होने लगे हैं, और रूस जैसा देश जिसे सोवियत संघ रहते हुए एक वक्त फौलादी पर्दे वाला देश कहा जाता था, वह भी उस फौलाद को छोड़ चुका है। इसलिए लोगों को अपने आपको लचीला बनाना चाहिए, और अगली पीढ़ी को अपने हिसाब से जीने का हक देना चाहिए। मां-बाप को बच्चों की जिंदगी में दखल सलाह-मशविरे तक सीमित रखना चाहिए, और किसी भी हालत में आत्मघाती या किसी और किस्म की हिंसक नौबत नहीं आने देनी चाहिए। 

आरक्षण की बहस के बीच क्रीमीलेयर हटाने की जरूरत

संपादकीय
26 अगस्त 2015

गुजरात में ओबीसी दर्जा पाने के लिए वहां का पटेल समाज जिस तरह से एक बड़े आंदोलन को छेड़ चुका है, उससे जूझना गुजरात सरकार को कुछ मुश्किल पड़ रहा है। लेकिन अलग-अलग वक्त पर अलग-अलग राज्यों में ओबीसी दर्जा पाने के लिए कई जातियां ऐसे आंदोलन करती हैं, और कभी वे सरकार को मंजूर होते हैं, और कभी मांग पूरी नहीं हो पाती। फिर आरक्षण अकेले सरकार की मर्जी पर नहीं है, इसके लिए सुप्रीम कोर्ट के फैसले भी हैं, और आज आरक्षित तबकों के हक भी नई जातियों के आने से घटते हैं, इसलिए एक अलग सामाजिक तनाव का खतरा भी इससे बना रहता है। 
लेकिन आज हम इस बात पर चर्चा करना नहीं चाहते कि गुजरात में इस जाति को ओबीसी का दर्जा मिलना चाहिए या नहीं। इसके लिए आरक्षण के जो पैमाने हैं, उन पर इस जाति की मांग को तौलना राज्य सरकार का काम है, और आखिरी में अदालतें तो हैं ही। हम आज की बहस में आरक्षण की व्यवस्था पर ऐसे हर मौके पर छिड़ जाने वाली बहस को भी यहां छूना नहीं चाहते कि देश में आरक्षण होना चाहिए या नहीं। हम इनके बीच केवल एक पहलू पर आज बात करना चाहते हैं कि आरक्षित तबकों के बीच जो क्रीमीलेयर कही जाती है, उस मलाईदार तबके का क्या किया जाना चाहिए? यह तबका आदिवासियों के बीच भी है, दलितों के बीच भी है, और ओबीसी में इनके मुकाबले कुछ और अधिक है। और आरक्षण के फायदे का जितना बड़ा हिस्सा यह एक छोटा तबका ले जाता है, उसके बारे में सोचने की जरूरत है। 
आरक्षण के पीछे की सोच यही थी कि सामाजिक और आर्थिक रूप से, ऐतिहासिक कारणों से, जो जातियां समाज की बाकी जातियों के मुकाबले बहुत अधिक पिछड़ी हुई हैं, उन्हें समाज और विकास की मूल धारा में लाने के लिए उनको आरक्षण का सहारा देना जरूरी है। अब जब किसी जाति में जन्म के आधार पर आरक्षण तय हो गया, तो उस जाति के अनगिनत लोगों के बीच जो गिने-चुने मौके नौकरी या चुनाव के लिए रहते हैं, उन तक पहुंच अधिकतर लोगों की हो ही नहीं पाती। आरक्षित तबकों के भीतर सत्ता की ताकत से, किसी ओहदे के महत्व के चलते, या संपन्नता की वजह से गिने-चुने लोग ऐसी हालत में रहते हैं कि वे और उनके परिवार के लोग आरक्षित मौकों का अधिकतम फायदा उठाने के लायक अपने आपको अधिक सक्षम बना चुके रहते हैं। ऐसा मलाईदार तबका चुनावी टिकटों को पाने, नौकरी के मुकाबले के इम्तिहान की तैयारी में अधिक ताकत रखता है, और आरक्षित तबकों के बाकी लोग इनके मुकाबले कहीं टिक नहीं पाते। 
लंबे समय से यह बात चल रही है कि आरक्षण का फायदा एक पीढ़ी को मिलना चाहिए, और जब कोई सरकारी नौकरी, या संसद-विधानसभा जैसी सदस्यता पा लेते हैं, तो वे अपने अगली पीढ़ी को समाज के आम पैमाने तक पहुंचाने के लिए सक्षम हो जाते हैं, और अगली पीढ़ी को आरक्षण का फायदा देने के बजाय उसी तबके के बाकी लोगों को ऐसे मौके देने चाहिए। दूसरी बात यह कि जो लोग संपन्नता का एक दर्जा पा चुके रहते हैं, उनको भी आरक्षण का फायदा नहीं मिलना चाहिए, क्योंकि ऐसे परिवार समाज में मौके के लिए अपने आपको तैयार कर सकते हैं। इन तमाम स्थितियों को सोचें तो यह बात साफ दिखती है कि आरक्षण का फायदा पाने के बाद ऐसे लोगों की अगली पीढ़ी भी अपना वक्त आने पर आरक्षण का फायदा पाने के लिए एक बेहतर तैयारी कर चुकी रहती है। और कमजोर तबकों के सबसे कमजोर लोग शायद ही कभी ऐसी तैयारी तक पहुंच पाते हों। 
हर आरक्षित तबके के सबसे संपन्न और ओहदे वाले लोग अपने-अपने तबकों के कमजोर लोगों के मौकों को कुचलने वाले हो गए हैं। अगर आरक्षण से क्रीमीलेयर को हटाया नहीं गया, तो आरक्षण का मकसद ही कुचला जा रहा है। इसलिए आज जब किसी जाति को आरक्षण की बात उठती है, तो उसके साथ-साथ मौजूदा आरक्षण पर भी इस नजरिए से बहस होनी चाहिए कि मलाईदार तबके को फायदे से हटाया क्यों नहीं जाए। ऐसा इसलिए मुमकिन नहीं हो पा रहा है कि क्रीमीलेयर के जो पैमाने हैं, उसमें आने वाले सांसदों और विधायकों को ही ऐसा संविधान संशोधन करना पड़ेगा, और वे क्यों अपने हक पर कुल्हाड़ी चलाने चले? दूसरी बात यह कि बड़े अफसर और बड़े जज, जो ऐसे किसी संवैधानिक फैसले के पहले और बाद उससे जुड़़े रहेंगे, उनमें भी आरक्षित तबकों के जो लोग हैं, वे अपनी अगली पीढ़ी के हक भला क्यों कुचलेंगे? इसलिए आज का ताकतवर तबका अपनी ताकत को, अपनी अगली पीढ़ी के मौकों को कम नहीं होने देना चाहता, और क्रीमीलेयर को बनाए रखने में उनका एक बड़ा साफ-साफ वर्गहित है। 

केजरीवाल के बाद गुजरात में एक नौजवान की हवा

25 अगस्त 2015
संपादकीय 
जिस गुजरात के नाम पर प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी पूरे देश में विकास और जनकल्याण की मिसाल देते हैं, वही गुजरात आज एक बड़ा ओबीसी आंदोलन झेल रहा है, भाजपा सरकार उसके सामने बेबस दिख रही है। एक बिल्कुल ही नया अनजाना और अनसुना नौजवान, हार्दिक पटेल, एकाएक जमीन से उठकर इस आंदोलन के आसमान पर पहुंच गया है, और लाखों की भीड़ उसके पीछे खड़ी हो गई है। अभी हम ओबीसी आरक्षण की पटेल समुदाय की मांग पर कुछ नहीं कह रहे, लेकिन यह बात चर्चा के लायक है कि किस तरह एक नया नौजवान इतना बड़ा समर्थन पा सकता है। 
लोगों को याद होगा कि अभी दो-चार बरस के भीतर ही दिल्ली में अरविंद केजरीवाल ने इसी तरह का करिश्मा कर दिखाया है, और लोगों को शुरू में लगता था कि उन्होंने अन्ना हजारे की पीठ पर सवार होकर कामयाबी तक का सफर पूरा किया है, लेकिन हकीकत यह निकली कि अन्ना से अलग होने के बाद, अन्ना के विरोध के बाद, किरण बेदी जैसे कई साथियों के अलग हो जाने के बाद भी अरविंद केजरीवाल दिल्ली के चुनावी इतिहास का सबसे बड़ा समर्थन जुटा पाए। अब उनकी सरकार कैसी चल रही, उनका भविष्य क्या है, यह एक अलग बात है, लेकिन दिल्ली में एक पहेली यह है कि कांग्रेस और भाजपा जैसे दो दलों की दशकों की परंपरा को खत्म करके एक बिल्कुल नया गैर राजनीतिक नौजवान किस तरह दशकों से जमे हुए कांग्रेस-भाजपा के नेताओं को खत्म कर सकता है। ऐसा हाल बहुत पहले लोगों ने एक लंबे छात्र आंदोलन के बाद असम में देखा था जहां पर कांग्रेस पार्टी का एकाधिकार चले आता था, और छात्र आंदोलन ने कांग्रेस की जमींदारी को उखाड़ फेंका था।
देश के बाकी हिस्सों में भी बरगद की तरह जमे हुए राजनीतिक दलों को यह समझना चाहिए कि जिसे वे अपनी बपौती मानते हैं, वह दबदबा भी, ऐसे दबदबों से थके हुए लोग उखाड़कर फेंक सकते हैं, और किसी अनजाने चेहरे को भी भरोसेमंद पाकर उसे जिता सकते हैं। जो राजनीतिक दल परंपरागत मुकाबलों से परे कोई खतरा नहीं देखते हैं, उनको भी यह समझना चाहिए कि किसी भी राज्य में केजरीवाल जैसे लोग आ सकते हैं, और चुनावी तस्वीर को बदल सकते हैं। बेहतर तो यह होगा कि राजनीतिक दलों से परे दबंग सांसद-विधायक भी इस खतरे को समझ लें कि उनके इलाके में ऐसी कोई पार्टी, या ऐसे कोई नेता, चुनाव लड़ते हुए, या महज जनआंदोलन चलाते हुए सामने आ सकते हैं और चुनावी तस्वीर को उलट-पुलट कर सकते हैं। मध्यप्रदेश से लेकर छत्तीसगढ़ तक में कुछ चुनावों में लोगों ने किन्नर-प्रत्याशी को भी चुना था, जिनका राजनीति में कोई अस्तित्व नहीं था। उसका एक मतलब यह था कि वहां के लोग परंपरागत राजनीतिक दलों और नेताओं से थके हुए थे, और उनसे बिल्कुल अलग विकल्प को चुनने के लिए वे दौड़ पड़े थे।
जमी-जमाई चुनावी राजनीति लोगों को ऐसे किसी अंधड़ के लिए तैयार नहीं होने देती। लेकिन न सिर्फ राजनीति में, बल्कि किसी कारोबार में भी, किसी कारखाने के सामान में भी एकाधिकार कब खत्म हो जाता है, इसका कोई ठिकाना नहीं रहता। इसलिए लोगों को बदलाव के लिए तैयार रहना चाहिए, और बदलाव की आज की रफ्तार का एहसास भी उनको रहना चाहिए। 
—-

मरने का हक जायज

24 अगस्त 2015

जैन समाज में भूखे रहकर अपनी मर्जी से जान दे देने की एक धार्मिक प्रथा, संथारा, के खिलाफ अभी राजस्थान हाईकोर्ट ने एक फैसला दिया, और इसे आत्महत्या के दर्जे में रखकर इसे गैरकानूनी करार दिया। यह मामला अदालत में कई बरस से चल रहा था, और दूसरी तरफ अदालत में यह मामला भी चल रहा था कि आत्महत्या की कोशिश में नाकामयाब रहने वाले लोगों पर क्या बाद में और मुकदमा चलाना चाहिए? आज भारत में कानून आत्महत्या की कोशिश को जुर्म करार देता है और उस पर सजा है। अगर जान चली गई तब तो ठीक है, और अगर जान बच गई तो इस नाकामयाबी के लिए कैद काटनी होगी। 
ये दो अलग-अलग नौबतें हैं, एक में किसी धार्मिक संस्कार के तहत सोच-समझकर, और आमतौर पर जिंदगी के आखिरी दौर में लोग अपनी मर्जी से खाना-पीना छोड़कर जिंदगी को छोड़ देते हैं। इसमें समाज के लोग उनके आसपास रहते हैं, और उनके फैसले के साथ रहते हैं। दूसरी तरफ आत्महत्या करने वाले लोग अमूमन अकेले रह जाते हैं, किसी से अपनी तकलीफ बांटने की गुंजाइश नहीं बचती है, और जिंदगी से थक-हारकर वे एकदम अकेले यह फैसला लेते हैं कि उन्हें खुदकुशी करनी है, और उनके ऐसे फैसले को कोई सामाजिक मान्यता भी नहीं रहती। 
इन दो अलग-अलग तरह से जान दे देने पर अलग-अलग अदालतों के फैसले हैं, लेकिन इन दोनों में एक बात एक सरीखी है कि लोग अपनी मर्जी से अपनी जान देते हैं। अब अगर खुदकुशी करने वालों को देखें, तो वे जिंदगी की तकलीफों, या नाकामयाबी, या किसी तरह का धोखा खाकर, या कोई जुर्म करके उसके अपराधबोध के नीचे दबे हुए, ऐसी किसी एक या अधिक वजह से जान देते हैं। इनमें से बहुत सी वजहें ऐसी रहती हैं, जिनमें सरकार या समाज ऐसे लोगों की कोई मदद नहीं कर पाते। परिवार मदद करना चाहे, तो भी खुदकुशी करने वाले गरीब किसान के परिवार की तरह, वे कोई मदद करने के लायक रहते नहीं। नतीजा यह होता है कि एकदम अकेला पड़कर, या एकदम असहाय होकर लोग खुदकुशी करते हैं। सरकार, समाज, या किसी और के पास उनकी मदद के लिए कुछ नहीं होता। 
अब ऐसे में किसी के लिए जीना अगर मुश्किल हो जाए, और इतना मुश्किल हो जाए कि उस जीने के मुकाबले मरना आरामदेह लगे, तो ऐसी खुदकुशी को जुर्म क्यों मानना चाहिए? लोग कहते हैं कि लोग अपने आपको जिंदगी दे नहीं सकते, तो वे जिंदगी छीनने के हकदार कैसे हो सकते हैं? अब इसी तर्क का एक दूसरा पहलू यह है कि जो समाज जिंदा रहने में मदद नहीं कर सकता, नहीं करता, उसे किसी के मरने को रोकने का क्या हक है? 
मेरा यह मानना है कि जिंदा रहना, या मरना, हर किसी का निजी हक होना चाहिए, और खुदकुशी को जुर्म बनाना उसी समाज के लिए जायज हो सकता है जो कि लोगों के जिंदा रहने में मदद करने के लिए जिम्मेदार हो सके। जो मर जाते हैं, उनको तो सजा देना मुमकिन नहीं होता, लेकिन जो खुदकुशी की कोशिश में नाकामयाब रहते हैं, वे सजा पा जाते हैं जो कि एक तकलीफजदा पर और तकलीफ थोपने का कानूनी इंतजाम है। 
आज दुनिया के कई देशों में मरीजों की हालत एक सीमा से गुजर जाने के बाद उनको डॉक्टरी मदद से मर जाने का हक देने की चर्चा चल रही है। स्विटजरलैंड शायद ऐसा अकेला देश है जिसमें ऐसी आत्महत्या की जा सकती है, और इसके लिए वहां एक-दो डॉक्टर मदद भी करते हैं। लेकिन इसके पहले बहुत सी कानूनी कार्रवाई, बहुत सी मेडिकल जांच के नियम भी हैं। 
भारत में समाज और अदालत शायद ही ऐसे किसी हक के साथ खड़े हों, क्योंकि यहां पर लोगों को रोक लगाकर अधिकार महसूस करना, और उसका मजा लेना अच्छा लगता है। जिस तरह किताबों पर रोक, फिल्मों पर रोक, धर्म की आलोचना पर रोक, वेबसाइटों पर रोक लगाई जाती है, उसी तरह लोगों के बिना शादी साथ रहने पर रोक, प्रेम-विवाह पर रोक, समलैंगिक रिश्तों पर रोक में हिन्दुस्तानी समाज और उसी से बना हुआ कानून बड़ा मजा पाता है। ऐसे में खुदकुशी का हक देना, हिन्दुस्तानियों को रोकने का अपना हक छोड़ देने जैसा लगेगा। इसलिए यहां पर लोग जिंदगी से थक चुके लोगों पर जिंदगी को उसी तरह थोपकर रखना चाहेंगे, जिस तरह भूखों मरते हुए जिंदगी से थकी हुई गाय को हिन्दू समाज जिंदा रखना चाहता है। उसे खाने के लिए सिर्फ घूरे का पॉलीथीन मुहैया कराएगा, लेकिन उसे मरने नहीं देगा। यह नौबत कुछ उसी तरह की है कि घर में बूढ़ी और तिरस्कृत मां को पेटभर खाना नहीं दिया जाएगा, प्रेम के दो शब्द नहीं दिए जाएंगे, इलाज नहीं दिया जाएगा, इज्जत नहीं दी जाएगी, लेकिन फिर भी उसे मरने की छूट नहीं दी जाएगी, और वह वक्त के हाथों मर जाए, तो सिर मुंडाकर उसका अंतिम संस्कार किया जाएगा। 
जो समाज जिंदा रहने की बुनियादी जरूरतों का हक नहीं दे सकता, उस समाज को किसी को मरने से रोकने का कोई हक नहीं हो सकता। 
अभी कुछ बरस पहले की असल जिंदगी की एक कहानी है जिसमें मेरे ही शहर में एक कॉलोनी में पड़ोसियों की शिकायत पर एक महिला को देह बेचने के जुर्म में गिरफ्तार किया गया। उसने पुलिस को बताया कि उसका पति कैंसर की वजह से बिस्तर पर है, और इलाज मुश्किल और महंगा है। दो या तीन बच्चे हैं, और वह खुद कुछ खास पढ़ी हुई नहीं है। नौकरी ढूंढने की कोशिश की, तो कुछ हजार की नौकरी के साथ भूखे मालिक भी जुड़े हुए मिले। ऐसे में जब तनख्वाह के लिए काम के साथ-साथ देह भी देने की मजबूरी हो, तो फिर उसने देह बेचकर ही घर चलाने का फैसला लिया। और इसके बिना कोई दूसरा चारा भी नहीं था। 
अब जो समाज एक मरीज को इलाज नहीं दे सकता, उसके बच्चों को खाना और पढ़ाई नहीं दे सकता, काम चाहने वाली एक महिला को काम नहीं दे सकता, वह उसके देह बेचने के खिलाफ एक कानून बनाकर, हाथ में पत्थर लिए चारों तरफ घेरकर खड़ा जरूर रह सकता है। इससे मंटो की एक कहानी याद पड़ती है कि एक तांगेवाले की मौत के बाद उसकी बीवी ने म्युनिसिपल से तांगा चलाने का लाइसेंस मांगा। उसकी अर्जी पर बार-बार उसे लौटा दिया गया कि एक औरत को तांगा चलाने का लाइसेंस नहीं मिल सकता। थक-हारकर उसने चकले पर बैठना तय किया, और म्युनिसिपल ने उसे पल भर में देह बेचने का लाइसेंस दे दिया क्योंकि देह बेचना एक औरत के लिए कानूनी काम था, और म्युनिसिपल के नियमों में उसका इंतजाम था। 
लेकिन अगर कैंसर के मरीज की बीवी, या तांगेवाले की बीवी आज खुदकुशी की इजाजत मांगें, तो भारत या पाकिस्तान के कानूनों में इसकी इजाजत नहीं है। कोई सड़क किनारे फुटपाथ पर भूख से मर जाए, तो उसे बचाने के लिए कोई कानून नहीं है, लेकिन कोई यह मुनादी कर दे कि वह जान देने वाला है, या जान देने वाली है, तो सरकार उसे उठाकर अस्पताल ले जाकर उसे जबर्दस्ती दवा और खाने पर जिंदा रखेगी। मणिपुर में एक आंदोलनकारी शर्मिला शायद दस बरस से अधिक से अस्पताल में ऐसे ही अनशन पर जिंदा रखी गई है। लेकिन अगर कोई यह मुनादी करे कि उसके पास खाने को नहीं है, और वह भूख से ही मर जाएगा, या उसकी बीमारी के इलाज की गुंजाइश नहीं है, और वह बिना इलाज मर जाएगी, तो ऐसे लोगों को जिंदा रखने का न कानून है, न ही किसी की कानूनी जिम्मेदारी है। 
जिंदा रखने का बोझ खासा बड़ा होता है, खासा भारी-भरकम होता है। लेकिन मौत की बात आ जाए, तो यही समाज मौत का हक नहीं देना चाहता, वह लाठी लेकर खड़े हो जाता है कि हमारे रहते तुम मरने वाले कौन हो? और यह समाज खाना या दवा लेकर खड़ा नहीं होता कि हमारे रहते हम तुमको मरने नहीं देंगे। खुदकुशी की नौबत वाले लोगों के लिए भी सरकार और समाज के पास कानून है, मदद नहीं है। यह तो जब कोई औपचारिक मुनादी कर दें कि वे जान देने वाले हैं, तो सरकार की मजबूरी हो जाती है कि उन्हें ताकत का इस्तेमाल करके जिंदा रखे। 
जान देने का हक एक बुनियादी हक होना चाहिए। हिन्दुस्तान जैसे देश में जहां पर खुदकुशी करने वाले लोग आमतौर पर मानसिक तनाव से गुजरने वाले लोग भी होते हैं, उनमें से अधिकतर की किसी मनोचिकित्सक तक कोई पहुंच नहीं होती, क्योंकि ऐसे विशेषज्ञ हिन्दुस्तान में आबादी की जरूरत के अनुपात में न के बराबर हैं। तो यह समाज किसी परेशान को मानसिक राहत देने की हालत में भी नहीं है, लेकिन उसे मौत का हक देने के खिलाफ है। 
हर किसी को आत्मसम्मान के साथ जीने का हक होना चाहिए। और जब ऐसा मुमकिन न हो तो बचे-खुचे आत्मसम्मान के साथ मरने का हक होना चाहिए। इस तर्क का जैन धर्म के किसी रिवाज से लेना-देना नहीं है, लेकिन अगर जिंदगी की पूरी संतुष्टि के साथ में अगर कोई अपने आखिरी दिनों में खाना-पीना छोड़कर जान देना चाहते हैं, तो उनको भी इसी तर्क के तहत मरने की इजाजत मिलनी चाहिए। यह एक अलग बात है कि जैन धर्म के ऐसे लोगों के सामने जिंदा रहने की दिक्कत नहीं होती, लेकिन अगर वे चाहते हैं कि वे जिंदा न रहें, तो उन्हें उनकी सोच के मुताबिक मरने का हक मिलना चाहिए। 

पाकिस्तान में घुसकर दाऊद को मारना भारत की जिम्मेदारी

24 अगस्त 2015
संपादकीय

भूतपूर्व केन्द्रीय गृहसचिव और आज के भाजपा सांसद आर.के. सिंह ने एक टीवी चैनल पर बातचीत में यह कहा है कि एनडीए की पिछली सरकार के रहते हुए, अटल बिहारी वाजपेयी के प्रधानमंत्री-कार्यकाल में भारत में ऐसी तैयारी हो गई थी कि दाऊद इब्राहिम को पाकिस्तान से भारत लाया जाए। उन्होंने इस तैयारी के सिलसिले में दी गई फौजी ट्रेनिंग की जानकारी देते हुए कहा कि जिस तरह अमरीका ने पाकिस्तान में जाकर ओसामा-बिन-लादेन को मारा था, उसी तरह भारत, पाकिस्तान से दाऊद को उठाकर लाने की तैयारी कर चुका था, लेकिन इस मुहिम से जुड़े मुम्बई पुलिस के कुछ लोग दगाबाज निकले जो कि दाऊद से जुड़े हुए थे, और उन्होंने यह जानकारी वहां तक पहुंचा दी, इसलिए यह अभियान छोड़ देना पड़ा। आर.के. सिंह ने यह भी कहा कि इस ऑपरेशन के लिए दाऊद के जानी दुश्मन छोटा राजन गैंग के कुछ लोगों को महाराष्ट्र में ही फौजी ट्रेनिंग दी गई थी। 
देश में सत्तारूढ़ भाजपा के एक सांसद, जो कि केन्द्रीय गृहसचिव रह चुके हैं, उनका यह भांडाफोड़ बड़ा खतरनाक है। और उन्होंने चूंकि एक टीवी चैनल पर कैमरे के सामने ये बातें कही हैं, इसलिए इन बातों के उनके कहन को लेकर कोई शक नहीं रह जाता। लेकिन भारत के किसी जिम्मेदार व्यक्ति ने पहली बार ये बातें कही हैं। अब यह एक अलग बात है कि सरकार से जुड़े किसी महत्वपूर्ण व्यक्ति को ऐसा राज उजागर करना चाहिए, या नहीं? हमारे नियमित पाठकों को याद होगा कि बरसों पहले हमने इसी तरह की एक बात लिखी थी, जिसमें हमने यह माना था कि किसी देश के हित कई बार नैतिकता के कड़े पैमानों से परे भी रहते हैं, और मूल्यों की ईमानदारी निभाना किसी देश के लिए हमेशा मुमकिन नहीं भी हो सकता है। यह बात हमने दाऊद पर हाथ डालने के सिलसिले में ही लिखे संपादकीय में इसी जगह लिखी थी। और शायद ओसामा-बिन-लादेन को मारने के लिए अमरीका के पाकिस्तान में घुसकर फौजी कार्रवाई करने के संदर्भ में ही लिखी थी। 
यह बात सही है कि दो देशों के अपने-अपने दायरे हैं, लेकिन जब कोई देश किसी दूसरे देश के मामलों में इतनी बड़ी दखल दे, कि वहां के सबसे बड़े मुजरिम को अपने यहां सरकारी हिफाजत में डेरा डालने दें, उसका बचाव करे, तो ऐसे में जुर्म के शिकार देश को यह हक रहता है कि वह देशों के संबंधों से परे जाकर अपना हिसाब सीधे-सीधे चुकता करे। यह दुनिया के इतिहास में कोई नया या अनोखा काम नहीं होगा, अधिकतर देश अपना बस चलने पर ऐसा करते हैं, और हमारा मानना है कि अगर दाऊद इब्राहिम को पाकिस्तान में रखा गया है, तो भारत को एक फौजी कार्रवाई करने का, या किसी भाड़े के हत्यारे को लेकर दाऊद इब्राहिम को खत्म करने का एक राष्ट्रीय-हक भी बनता है, और ऐसा करना उसकी राष्ट्रीय जिम्मेदारी भी बनती है। अब ऐसा करना कूटनीति के खिलाफ हो सकता है, नैतिकता के खिलाफ हो सकता है, लेकिन अपने देश के हजारों लोगों की जिंदगी की कीमत पर नैतिकता निभाना हर समय शायद मुमकिन भी नहीं हो सकता, और शायद ऐसी नैतिकता जायज भी नहीं हो सकती। 
ऐसी कार्रवाई भारत और पाकिस्तान के बीच रिश्तों में बड़ी खटास ला सकती है। लेकिन आज ही कौन सी मोहब्बत का वक्त चल रहा है? लोगों को याद होगा कि बाजपेयी के प्रधानमंत्री रहते हुए पाकिस्तान ने भारत के कारगिल पर जो हमला किया था, और जो बाद में जंग में तब्दील हो गया था, उसके बारे में उस वक्त वहां के फौजी शासक जनरल परवेज मुशर्रफ ने अनगिनत टीवी कैमरों के सामने सौ-सौ बार बड़ी फख्र के साथ यह खुलासा किया है कि किस तरह उन्होंने एक लापरवाह और सोए हुए हिन्दुस्तान की सरहद में दूर तक फौजी घुसपैठ की थी, और वह कितनी कामयाब फौजी कार्रवाई थी। इसलिए किसी देश की सीमा में घुसकर फौजी कार्रवाई करना कोई बड़ी बात नहीं है, और कई देश ऐसा करते हैं। अब यह भारत पर है कि वह बरसों से अपने किए जा रहे इस दावे को सही साबित करके दिखाए कि दाऊद इब्राहिम पाकिस्तान सरकार की हिफाजत में, पाकिस्तान में बसा हुआ है। ऐसे दाऊद को जाकर मारना भारत सरकार की जिम्मेदारी है। 

इसके दाम सरहद के दोनों तरफ महज गरीब चुकाने जा रहे हैं

संपादकीय
23 अगस्त 2015

 भारत और पाकिस्तान के बीच राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार स्तर की बातचीत आखिर रद्द हो गई। इसे लेकर उम्मीद के मुताबिक दोनों देश एक-दूसरे के खिलाफ बातचीत का माहौल खराब करने का आरोप लगा रहे हैं, और इस बातचीत से तनाव घटने की जो उम्मीद थी, वह खत्म होकर अब तनाव बढ़ चुका है, और यह माना जा रहा है कि अगले कुछ महीने किसी तरह की बातचीत का माहौल बनते नहीं दिख रहा है। दोनों तरफ से इस मामले में गड़बड़ी हुई है, और जैसा कि कांग्रेस प्रवक्ता ने कहा है, कि दोनों पालों से शब्दों की कबड्डी खेली जा रही है। 
भारत ने इस बात पर आपत्ति जताई थी कि पाकिस्तान के राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार सरताज अजीज के दिल्ली पहुंचने के पहले से कश्मीर के अलगाववादियों को दिल्ली आकर अजीज से मिलने का न्यौता दिया गया था, और अलगवादी नेताओं को ऐसी किसी मुलाकात का वक्त आने के पहले ही श्रीनगर और दिल्ली में पुलिस ने नजरबंद करके भारत का रूख साफ कर दिया था। अब यहां पर दो सवाल उठते हैं, एक तो यह कि सरताज अजीज भारत से बात करने के ठीक पहले अलगाववादियों से बात करने को टाल सकते थे, या नहीं? और पाकिस्तान का ऐसा रूख बातचीत खराब होने की कीमत पर भी उसे क्यों पसंद था? क्या भारत और पाकिस्तान के बीच आतंक को लेकर होने जा रही इस बैठक के पहले कश्मीर के भारतीय अलगाववादियों से पाकिस्तानी सुरक्षा सलाहकार की मुलाकात दोनों पक्षों के बीच पहले चर्चा में नहीं आई थी? दूसरा सवाल यह उठता है कि कश्मीर के अलगाववादी तो वाजपेयी सरकार के समय ही दिल्ली में आए हुए पाकिस्तानी सरकार के बड़े लोगों से मिलते आए हैं, और इसमें कोई नई बात नहीं थी। फिर अगर दो देशों को आपस में बैठकर आतंक खत्म करने के लिए चर्चा करनी है, तो क्या कश्मीर के घोषित रूप से अलगाववादी नेताओं से पाकिस्तान की मुलाकात को महत्व देने से बचा जा सकता था? अगर भारत एक मेजबानी कर रहा था, तो आने वाले मेहमान को ऐसी किसी मुलाकात का मौका देने से भारत का क्या बिगड़ रहा था? और अगर भारत ऐसी किसी मुलाकात का इतना ही बड़ा विरोधी है, तो जब एनएसए स्तर की इस बातचीत को तय किया गया था, उसी वक्त इस बारे में भारत ने पाकिस्तान के सामने अपना नजरिया साफ क्यों नहीं किया था? लोगों को याद है कि मोदी सरकार आने के बाद अलगाववादियों से मुलाकात के मुद्दे पर ही भारत-पाकिस्तान की बातचीत एक बार भारत रद्द भी कर चुका है। ऐसे में अपनी जमीन पर आने वाले मेहमान से यह खुलासा पहले ही कर लेना बेहतर होता कि पाकिस्तानी सुरक्षा सलाहकार यहां पर क्या करे, और क्या न करे, भारत को क्या बर्दाश्त होगा, और क्या नहीं। 
दोनों देशों का एक बड़ा नुकसान इससे यह हो रहा है कि सरहद के दोनों तरफ जो युद्धोन्मादी और धर्मान्ध लोग हैं, उनको एक-दूसरे के लिए गालियां बकने का एक मौका दोनों सरकारों ने मिलकर मुहैया करा दिया है। जहां आम जनता एक-दूसरे से तनाव खत्म चाहती है, और दोनों देशों के हर तरह के शांतिपूर्ण संबंध चाहती है, वहीं पर गिने-चुने बड़बोले-बकवासी, हमलावर तेवरों वाले लोगों को सोशल मीडिया पर नफरत फैलाने का सामान दोनों देशों ने दे दिया है। कहां तो एक तरफ आतंक को खत्म करने के लिए दोनों देशों के दो सबसे बड़े सुरक्षा सलाहकारों के बीच बातचीत होने जा रही थी, और कहां वह तनाव को बढ़ाते हुए खारिज कर दी गई। दोनों देशों का रवैया बहुत ही बचकाना, और भड़काऊ रहा है। अभी यह हमारी समझ से परे है कि कूटनीति और अंतरराष्ट्रीय संबंधों के तहत ऐसी किसी असहमति का अंदाज लगाकर पहले ही यह बात निपटा क्यों नहीं ली गई थी? दोनों देशों की सरकारें कई स्तरों पर औपचारिक और अनौपचारिक बात करते आई है, और यह बात तो पहले से जुबानी बातचीत में ही साफ हो सकती थी, और असहमति रहने पर ऐसी किसी बैठक को रखा ही नहीं गया होता तो बेहतर होता। 
दोनों देशों में जो जंगखोर लोग हैं, वे इससे बहुत खुश होंगे। लेकिन यह नहीं भूला चाहिए कि जंग के पहले भी जंग की जो तैयारी होती है, वह दोनों देशों की जनता को बुरी तरह से गरीब और बदहाल करके छोड़ती है। गांव-गांव में बसे गरीबों के हक की कुर्बानी देकर जो फौज पाली जाती है, वह दोनों ही देशों के हित में नहीं है। आज यूरोप के देश एक-दूसरे की फौजी दहशत में नहीं जीते, वे एक यूरोपीय समुदाय बनाकर बीच की सरहदें भी तकरीबन खत्म कर चुके हैं। भारत और पाकिस्तान कम से कम जंग के उकसावे से बचते हुए बातचीत कायम रखें, उसी में गरीबों का भला है। यह बात जाहिर है कि दुनिया में कोई भी देश चाहे कितना ही गरीब क्यों न हो, उसकी राजधानियों में बसे हुए लोग, सरकारों को हांकने वाले लोग कभी भूखे नहीं मरते, कभी गरीब नहीं रहते। इसलिए उनको जंग के दाम का अंदाज नहीं लगता है। दोनों देशों की तरफ से यह एक बड़ी गैरजिम्मेदारी रही, और इसके दाम सरहद के दोनों तरफ महज गरीब चुकाने जा रहे हैं। 

मुलायम सिंह जैसे लोगों को जगह-जगह धिक्कारा जाए

संपादकीय
22 अगस्त 2015

सोशल मीडिया पर अमिताभ बच्चन के प्रशंसकों ने उनसे अपील की है कि वे मुलायम सिंह यादव की जिंदगी पर बनने जा रही एक फिल्म को बढ़ावा न दें। इसके पीछे हाल ही में मुलायम का एक सार्वजनिक बयान है जिसमें उन्होंने कहा था कि चार लोग किसी एक से बलात्कार नहीं कर सकते और बलात्कार एक व्यक्ति करता है, और रिपोर्ट चार के खिलाफ लिखा दी जाती है। इसके पहले भी मुलायम सिंह यादव सार्वजनिक बयान दे चुके हैं कि लड़कों से गलतियां हो जाती हैं, इसके लिए उन्हें फांसी देना गलत है। 
मुलायम सिंह यादव अपनी पार्टी की उसी सोच को आगे बढ़ाते हैं, जिसके चलते भारतीय संसद में महिला आरक्षण विधेयक कभी पास हो ही नहीं सका। जो भी पार्टी या गठबंधन सरकार में हो, मुलायम सिंह की सहमति के बिना इतना बड़ा संविधान संशोधन नहीं हो सकता, और मुलायम-लालू जैसे उत्तर भारतीय नेता अपने संसदीय बाहुबल की बदौलत महिला आरक्षण को रोकते आए हैं। ये दोनों नेता समाजवाद के नाम पर बहुत बड़े कलंक हैं, और धर्मनिरपेक्षता-समाजवाद जैसे नारों को लगाते हुए ये दोनों अपने परिवार की अनुपातहीन संपत्ति, परले दर्जे की कुनबापरस्ती, और बहुत ही अश्लील किस्म की पार्टी-तानाशाही का प्रदर्शन करते आए हैं। देश के ये दो सबसे बड़े राज्य इन दोनों कुनबों के नीचे ऐसे कुचल गए हैं, कि वहां धर्मनिरपेक्षता ने दम तोड़ दिया है। लोगों को यह लगने लगा है कि जो धर्मनिरपेक्ष है, या साम्प्रदायिकता-विरोधी है, वह भ्रष्ट तो होगा ही। अब जनता पिछले लोकसभा चुनाव में, या उसके पहले के विधानसभा चुनाव में इन दोनों को अलग-अलग सबक भी सिखा चुकी है, और देश की राजनीति में साम्प्रदायिक ताकतों को इन्हीं दो नेताओं की वजह से एक बड़ी साख मिल जाती है। 
मुलायम सिंह यादव की बातें हैवानियत की हैं। हालांकि हैवान कुछ होता नहीं है, वह इंसान के ही भीतर का एक हिस्सा होता है, जिसे अपना मानने से इंकार करते हुए लोग एक काल्पनिक हैवान खड़ा कर देते हैं, और तमाम बुराइयां उसके माथे पर थोप देते हैं। जिस तरह किसी घर या स्कूल में तोहमत के लिए कुछ शरारती बच्चों की शिनाख्त कर दी जाती है, उसी तरह इंसान अपनी हिंसा के लिए हैवान शब्द गढ़कर काम चलाता है, और उसी भाषा के मुताबिक मुलायम सिंह की बातें हैवानियत की हैं। बलात्कार को लेकर मुलायम सिंह के अलावा अधिकतर दूसरी पार्टियों के नेता बहुत ही गैरजिम्मेदारी और हिंसा के साथ बातें करते हैं, और बलात्कार की शिकार महिलाओं को ही तरह-तरह से जिम्मेदार ठहराने, बलात्कारियों को बचाने में लगे रहते हैं। इक्कीसवीं सदी का लोकतांत्रिक भारत ऐसी जुबानों को उनके मुंह के बाहर खींच लेने की कानूनी ताकत भी नहीं रखता है। हमारा तो मानना है कि सुप्रीम कोर्ट को दखल देकर खुद ही ऐसे लोगों को नोटिस भेजना चाहिए, लेकिन अदालत तो दूर, महिला अधिकारों की हिफाजत के लिए बने हुए राष्ट्रीय महिला आयोग को भी ऐसे नेताओं को नोटिस भेजने की फुर्सत नहीं रहती है। 
भारत में महिलाओं की हालत खराब होने के लिए ऐसे ही नेता, और आयोगों से लेकर अदालतों तक, संवैधानिक कुर्सियों पर बैठे हुए लोगों का निकम्मापन जिम्मेदार है। आज भी हिन्दुस्तानी ताकतवर मर्दों का बस चले, तो वे गर्भ में ही अजन्मी बच्ची की हत्या को बढ़ावा देते चलें, जवान होने तक बच्चियों से बलात्कार करें, दहेज वसूलने के लिए उनको जलाकर मार डालें, और फिर भी अगर कोई महिला बच जाए, तो उसके पति खो देने पर उसे विधवाश्रम भेज दें। इस देश में ऐसे भी नेता और जज अभी जिंदा हैं जिन्होंने राजस्थान में सतीप्रथा का समर्थन किया था, और जो रात-दिन बलात्कार के हिमायती हैं। लेकिन इस बारे में जिन लोगों ने अमिताभ बच्चन से इसी जिम्मेदारी की अपील की है, उनको याद रहना चाहिए कि आज तक अमिताभ बच्चन ने जलते-सुलगते सामाजिक-राजनीतिक मुद्दों पर कुछ भी नहीं कहा है, और अपनी अरबों की दौलत में से समाजसेवा के लिए उन्होंने शायद ही कभी किसी को कुछ दिया है। लेकिन आम जनता को ऐसे हिंसक मुलायम सिंह यादव के खिलाफ जमकर लिखना चाहिए, और जगह-जगह ऐसे लोगों को धिक्कारना चाहिए। 

नाजायज मीडिया के खिलाफ मुकदमे के लिए सरकारी खर्च

संपादकीय
21 अगस्त 2015
तेलंगाना की एक महिला आईएएस अधिकारी के बारे में बड़ी भद्दी और अपमानजनक बात लिखने वाली देश की एक प्रमुख पत्रिका, आउटलुक, के खिलाफ इस अफसर ने मानहानि का मुकदमा दायर करने की घोषणा कुछ समय पहले की थी, और अब राज्य सरकार ने उसे सरकारी खजाने से इस मुकदमे के लिए 15 लाख रूपए मंजूर किए हैं। उसने इस पत्रिका से 10 करोड़ रूपए मुआवजा मांगते हुए नोटिस दिया था और ऐसे मामलों में होने वाले खर्च, और अदालत में जमा करने के लिए जरूरी फीस को देखते हुए सरकार ने यह रकम मंजूर की है। इस पत्रिका ने इस अफसर के लिए नयनसुख (आईकैंडी) जैसे शब्द लिखे थे, और उसकी साडिय़ों पर फैशन परेड जैसी होने की टिप्पणी की थी। इसके तुरंत बाद सोशल मीडिया सहित मीडिया के दूसरे मंचों पर पत्रिका के ऐसे लिखने के खिलाफ लोगों ने जमकर प्रतिक्रिया दी थी, और इसे एक महिला होने की वजह से किया गया एक ओछा हमला करार दिया गया था।  यह मामला थोड़ा सा अलग है, क्योंकि बहुत से राज्यों में अधिकारी मीडिया के खिलाफ मानहानि के मुकदमे दायर करते हैं, कुछ मुकदमे जीतते भी हैं, और कुछ मामलों में संपादक-प्रकाशक को कैद भी होती है। छत्तीसगढ़ भी ऐसे मुकदमे देख चुका है, और अभी एक-दो बरस में ही ऐसी कैद का एक मामला सामने आ चुका है। 
भारत में मानहानि का कानून मोटे तौर पर मीडिया को अधिक हक देने वाला रहा है, और परंपरागत रूप से कम ही लोग मीडिया के मुंह लगते हैं। यह एक गैरबराबरी की लड़ाई मानी जाती है, और ऐसा समझा जाता है कि मीडिया को कटघरे में ले जाने पर वह हाथ धोकर और पीछे पड़ सकता है, और सार्वजनिक जीवन के लोगों की जितनी मानहानि मुकदमे के पहले हुई है, उससे और अधिक मुकदमे के चलते, या मुकदमे के बाद हो सकती है। लेकिन ऐसी सोच ही मीडिया को अधिक गैरजिम्मेदार बनाने के लिए जिम्मेदार रही है। देश का कानून जो मीडिया को एक नागरिक के अभिव्यक्ति के अधिकार के तहत अखबार या पत्रिका शुरू करने का हक देता है, वही कानून बाकी लोगों को भी अपनी निजी जिंदगी का अधिकार देता है और सार्वजनिक जीवन में नाजायज हमलों से बचने का हक भी देता है। एक वक्त था जब अदालतों में मानहानि के मुकदमे दशकों तक नहीं निपटते थे, लेकिन जब से लोग ऐसे मुकदमों को आपराधिक धाराओं के तहत दायर करने लगे हैं, उनमें फैसला जल्दी आने लगा है, और मीडिया के कुसूर पर सजा भी होने लगी है। 
सरकार के किसी मंत्री या अफसर के सरकारी कामकाज को लेकर अगर उसकी ऐसी मानहानि होती है, तो उस पर सरकार को मुकदमे की इजाजत देने के साथ-साथ, मुकदमा लडऩे का खर्च भी देना चाहिए। सरकार में काम करने वाले लोग जनता और मीडिया दोनों की नजरों के सामने रहते हैं, और उनके कामकाज, चाल-चलन पर बारीक निगाहें टिकी रहती हैं। उनमें से बहुत से लोग गलत काम करते हैं, लेकिन जिन्होंने गलत काम नहीं किए हैं, या जिनके गलत काम अदालतों में साबित नहीं किए जा सकते हैं, उनको अपनी प्रतिष्ठा को बचाने का हक होना चाहिए, और इसके लिए सरकार का खर्च करना जायज है। जरूरी होने पर मीडिया को अगर कटघरे में खड़ा किया जाता है, और उसके कुसूरवार होने पर उसे जुर्माना या कैद झेलनी पड़ती हैं, तो इससे मीडिया का अपने आप पर एक काबू बढ़ेगा। अब मीडिया के नीति-सिद्धांत, या पत्रकारिता से जुड़े हुए कई किस्म के मूल्यों के कोई रखवाले बच नहीं गए हैं। प्रेस कौंसिल भी बस फटकार लगाने का काम कर सकती है, उससे अधिक कोई अधिकार उसके पास नहीं हैं। और मीडिया का खुद पर काबू भी बहुत से मामलों में नहीं दिखता है। इसलिए देश के बहुत ही लचीले कानून के तहत अगर बहुत ही गैरजिम्मेदार मीडिया को कटघरा देखना पड़ता है, तो यह अपमानित अफसर के साथ-साथ खुद मीडिया के लिए अच्छा होगा, ताकि वह दो-चार बार सजा पाकर सम्हल सके। 
यह बात सुनने में अलोकतांत्रिक लग सकती है, और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के खिलाफ लग सकती है, लेकिन भारतीय कानून इतना लचीला है कि वह कई गुनहगार छोड़ देने का हिमायती है, बजाय किसी बेकसूर को सजा देने के। और जुर्माने या सजा, या मानहानि की भरपाई के हर्जाने की नौबत तभी आएगी, जब किसी का सचमुच ही बदनीयत से अपमान किया गया होगा। लोकतंत्र मीडिया को जितना लिखने, कहने, या दिखाने का हक देता है, वह इस जिम्मेदारी के साथ ही देता है कि देश के बाकी कानूनों का ध्यान रखते हुए ही मीडिया इस अधिकार का इस्तेमाल करेगा, और ऐसे बाकी कानूनों में बाकी लोगों की प्रतिष्ठा के अधिकार भी शामिल हैं। 

भारत-पाक बातचीत हर नौबत में आगे बढ़ती रहे

संपादकीय
20 अगस्त 2015

भारत और पाकिस्तान के बीच राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार स्तर की बातचीत शुरू होने के ठीक पहले फिर एक बार उसी तरह कोशिश से तनाव खड़ा किया जा रहा है कि यह बात हो ही न पाए। भारत में पाकिस्तान के उच्चायोग ने भारतीय-कश्मीर के अलगाववादी आंदोलनकारियों को बातचीत के लिए दिल्ली बुलाया, और ऐसा ही उस वक्त किया गया था जब भारत में मोदी सरकार आने के बाद ऐसी ही एक दूसरी बातचीत होनी थी। इसके साथ-साथ श्रीनगर में ऐसे कई आंदोलनकारियों को आज सुबह पहले गिरफ्तार किया गया, और फिर रिहा कर दिया गया। ऐसा बताया जा रहा है कि राज्य सरकार ने केन्द्र सरकार के निर्देश पर ये दोनों कार्रवाईयां कीं। दूसरी तरफ भारत की एक प्रमुख विपक्षी पार्टी कांग्रेस सरहद पर पाकिस्तान की तरफ से हमलों का आरोप लगाते हुए इस बातचीत का विरोध कर रही है, और भाजपा के ही एक भूतपूर्व विदेश मंत्री रह चुके यशवंत सिन्हा भी मौजूदा माहौल में इस बातचीत को बेमतलब बतला रहे हैं। 
भारत और पाकिस्तान के बीच शक के गहरे स्याह धुंधलके में भी हम बातचीत के हिमायती हैं। दोनों तरफ एक-दूसरे पर आरोप लगने का पुराना सिलसिला है, और दोनों देशों के मीडिया भी दूसरे देश के खिलाफ एक उग्र और आक्रामक राष्ट्रवाद का झंडा लेकर कूद पड़ते हैं। नतीजा यह होता है कि टकराव और तनाव को घटाने के लिए बातचीत से जो मदद मिल सकती है, उसके बजाय अपने-अपने देश में मीडिया इस तरह का युद्धोन्माद और धर्मोन्माद खड़ा कर देते हैं, कि सरकार के लिए विचलित जनभावना के खिलाफ जाकर बातचीत करना खासा मुश्किल हो जाता है। भारत में खुद मोदी सरकार की भागीदार शिवसेना जैसे राजनीतिक दल हैं, तोगडिय़ा जैसे साम्प्रदायिक सहयोगी हैं, जो कि पाकिस्तान पर हमला कर देने, पाकिस्तानियों के सिर काटकर ले आने जैसे फतवे जारी करते रहते हैं। और दूसरी तरफ पाकिस्तान अपनी बहुत कमजोर पड़ चुकी डेमोक्रेसी की वजह से वहां पर आतंकियों और हिंसक हमलावरों की बातों को काबू नहीं कर पा रहा है। 
लेकिन इन दोनों देशों के समझदार लोगों को इस बात को समझना होगा कि एक-दूसरे से तनातनी पर दोनों देश खरबों रूपए सालाना खर्च करते हैं, और हर बरस सियाचीन जैसे बर्फीले मोर्चे पर दोनों तरफ के सैकड़ों लोग मौसम की मार तले मारे जाते हैं। यह तनातनी हुकूमत हांक रहे लोगों के लिए फायदे की हो सकती है कि उनको फौजी सामानों पर लाखों करोड़ रूपए साल खर्च करने का मौका मिलता है, और शायद उसमें से कमाई का भी। इसके बाद इस तनातनी की चलते अपने-अपने देश में वोटों को पहले भड़काने और फिर लुभाने का मौका भी मिलता है। सत्ता चला रहे लोगों को जिस तनाव में नोट और वोट दोनों भरपूर मिलते हों, उनको तो इन दोनों देशों के बीच फौजी तनाव, टकराव, और जंग के हालात पसंद आ सकते हैं, लेकिन दोनों तरफ के गरीब का निवाला छीनकर जिस तरह जंग की तैयारी की जाती है, उन गरीबों का जंग के बिना भी सबसे बड़ा नुकसान हो जाता है। 
जो लोग यह समझते हैं कि सरहद पर टकराव या आतंकी हमलों के चलते हुए कोई बातचीत नहीं होनी चाहिए, क्रिकेट के मैच नहीं खेलने चाहिए, दूसरे देशों के गायक या कलाकार नहीं आने-जाने चाहिए, वे लोग जंगखोर सोच के झांसे में आए हुए लोग हैं जिनको जंग के दाम की खबर नहीं है। ऐसे लोग सरहदों से दूर बसते हैं, और सरहदों की गोलाबारी उनके बच्चों को खत्म नहीं करती है। बातचीत हर हाल में जारी रहनी चाहिए, और दुनिया के किसी भी फौजी टकराव, आतंकी टकराव का इलाज बातचीत से ही निकलता है, हथियारों से नहीं। भारत और पाकिस्तान के बीच अमन कायम होने से दोनों देशों के पास अपने-अपने देश के विकास के लिए हर बरस खरबों रूपए बचेंगे, और एक-दूसरे पर जुबानी या जंगी हमले करने में वक्त बर्बाद नहीं होगा। दोनों देशों में राजनेता और फौजी अफसर बातचीत के खिलाफ इतनी बकवास कर चुके रहते हैं, कि वे बातचीत के हिमायती उस वक्त भी नहीं बन पाते जब उन पर बातचीत का जिम्मा आ जाता है। ऐसे बड़बोले लोगों के भड़कावे में आए बिना, दोनों देशों की सरकारों को यह चाहिए कि वे हर मुमकिन तरीके की बातचीत लगातार जारी रखें, और एक-दूसरे पर अपने आपको बर्बाद न करें। ऐसा करना अपने-अपने देश में दोनों सरकारों के लिए बड़ा ही अलोकप्रिय काम तो होगा, लेकिन इन दोनों देशों का इतिहास है कि भड़काऊ माहौल के बीच भी जब-जब दोनों तरफ के समझदार नेताओं ने बैठकर बातचीत की है, उसी से तनाव घटा है, फौजी टकराव से नहीं। आज भी टकराव को घटाने की संभावना मौजूद है। 

इलाहाबाद हाईकोर्ट की क्रांतिकारी सोच पर अमल होना नामुमकिन

संपादकीय
19 अगस्त 2015

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने एक महत्वपूर्ण फैसले में कहा है कि नौकरशाहों, नेताओं और सरकारी खजाने से वेतन या मानदेय पाने वाले प्रत्येक व्यक्ति के बच्चों को सरकारी प्राइमरी स्कूलों में पढऩा अनिवार्य किया जाए। साथ ही ऐसा न करने वालों के खिलाफ दंडात्मक कार्यवाही का प्रावधान किया जाए। जिनके बच्चे कॉन्वेंट स्कूलों में पढ़ें, वहां की फीस के बराबर रकम उनके वेतन से काट ली जाए। साथ ही ऐसे लोगों का कुछ समय के लिए इन्क्रीमेंट व प्रमोशन रोकने की व्यवस्था की जाए। अगले शिक्षा सत्र से इसे लागू भी किया जाए। कोर्ट ने साफ किया कि जब तक इन लोगों के बच्चे सरकारी स्कूलों में नहीं पढ़ेंगे, वहां के हालात नहीं सुधरेंगे। कोर्ट ने राज्य सरकार को छह माह के भीतर यह व्यवस्था करने का आदेश दिया है। न्यायमूर्ति सुधीर अग्रवाल ने जूनियर हाईस्कूलों में गणित व विज्ञान के सहायक अध्यापकों की चयन प्रक्रिया को लेकर दाखिल याचिकाओं पर सुनवाई के दौरान सरकारी स्कूलों की दुर्दशा सामने आने पर दिया है। अदालत को बताया गया था कि उप्र के एक लाख 40 हजार जूनियर व सीनियर बेसिक स्कूलों में अध्यापकों के दो लाख 70 हजार पद रिक्त हैं। सैकड़ों स्कूलों में पानी, शौचालय, बैठने की व्यवस्था जैसी बुनियादी सुविधाएं नहीं हैं तो कईयों में छत भी नहीं है। सरकार, नेता व अफसर इस बदहाली के बावजूद बुनियादी शिक्षा के प्रति संजीदा नहीं हैं क्योंकि उनके बच्चे सरकारी स्कूलों में नहीं बल्कि कॉन्वेंट स्कूलों में पढ़ते हैं।
हाईकोर्ट का यह फैसला बड़ा क्रांतिकारी है, और उत्तरप्रदेश सरकार की फर्जी समाजवादी सोच के बिल्कुल विपरीत, संविधान की समाजवादी सोच के मुताबिक है। अगर देश में सरकारी स्कूल और सरकारी अस्पताल, ये दो जगहें सत्ता पर काबिज लोगों, और उनके परिवारों के लिए अनिवार्य की जा सकें, तो ये दोनों बुनियादी सुविधाएं कुछ बरसों के भीतर ही दुनिया की सबसे अच्छी किस्म की हो सकती हैं। लेकिन अदालत की इस अच्छी नीयत, और उसके हौसले को देखते हुए भी हमारा यह मानना है कि भारतीय संविधान के मौजूदा ढांचे में ऐसा नहीं हो पाएगा। हम पूरी तरह से यह चाहेंगे कि ऐसा हो सके, और अगर इसके लिए जरूरी हो तो देश के संविधान में एक बुनियादी फेरबदल भी किया जाए, लेकिन आज का संवैधानिक ढांचा इलाहाबाद हाईकोर्ट का साथ नहीं देगा। इसकी वजह यह है कि सत्ता की किसी भी ऊंची या नीची कुर्सी पर बैठे हुए लोगों, या देश के किसी भी दूसरे नागरिक को इस बात के लिए मजबूर नहीं किया जा सकता कि वे अपने बच्चों को कहां पढ़ाएं, या उनका इलाज कहां कराएं। आज तो छत्तीसगढ़ सहित देश के अधिकतर राज्य और शायद केन्द्र सरकार भी, देश-प्रदेश के बड़े-बड़े निजी अस्पतालों को सरकारी कर्मचारियों के लिए मान्यता प्राप्त बना चुकी हैं, और वहां का निजी महंगा इलाज सरकारी नौकरी की सुविधाओं के दायरे में जोड़ा जा चुका है। जब सरकार अपने लोगों के इलाज के लिए निजी अस्पतालों में महंगा खर्च करती है, और अपने अस्पतालों को चौपट हो जाने देती है, तब स्कूलों की बहुत मामूली खर्च की पढ़ाई किसी पर कैसे थोपी जा सकती है? लोग अपने बच्चों को अगर निजी स्कूलों में पढ़ाते हैं, तो उसका खर्च भी खुद उठाते हैं। उनको किसी कानून के तहत सरकारी स्कूलों में अपने बच्चे भेजने के लिए बेबस नहीं किया जा सकता। सरकार अगर कुछ कर सकती हैं तो सरकारी कर्मचारियों और सरकारी खर्च पर इलाज पाने वाले तमाम लोगों के लिए सरकारी अस्पताल की ही मंजूरी लागू कर सकती हैं। लेकिन अब तो धीरे-धीरे राज्य सरकारें अपनी सहायता से गरीब नागरिकों का इलाज भी महंगे निजी अस्पतालों में करवाने लगी हैं, और जाहिर तौर पर ऐसी मानवीय सरकारी मदद से निजी अस्पताल पनप रहे हैं, और सरकारी अस्पताल चौपट हुए जा रहे हैं। हम इलाहाबाद हाईकोर्ट की भावना की तारीफ करते हैं, लेकिन उस पर अमल की कोई संभावना नहीं देखते। लेकिन इस मुद्दे पर चर्चा के दौरान यह बात जरूर उठनी चाहिए कि सत्ता पर बैठे तमाम लोग जनता के पैसों से अपना इलाज निजी अस्पतालों में करवाने के बजाय सिर्फ सरकारी अस्पतालों में करवाएं, और उसी में सरकारी अस्पतालों की हालत सुधर जाएगी। 

संघीय लोकतांत्रिक ढांचे की विसंगतियों पर सोचें

संपादकीय 
18 अगस्त 2015 

प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने बिहार के चुनाव ठीक पहले इस राज्य के लिए सवा लाख करोड़ रूपयों के विशेष केंद्रीय सहायता पैकेज की घोषणा वहां जाकर एक आमसभा में की है। इसकी उम्मीद की जा रही थी, और बिहार में सत्तारूढ़ नीतिश कुमार ने इसे चुनावी रिश्वत कहा जरूर है, लेकिन यह मांग तो वे उस यूपीए सरकार से बरसों से करते आ रहे थे, जिसकी मुखिया रही कांग्रेस आज बिहार में नीतिश-लालू की चुनावी भागीदार है। ऐसा ही विशेष केंद्रीय पैकेज मांगते-मांगते बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बैनर्जी थक चुकी हैं, और बिहार के बाद अब कुछ और पिछड़े राज्य भी ऐसी ही मांग करने लगेंगे। 
अब सवाल यह है कि भारत के संघीय ढांचे में केंद्र की मर्जी से राज्यों की ऐसी मांग को कहां-कहां और किस हद तक पूरा करना जायज है? लंबे समय से राज्यों की यह मांग भी चली आ रही है कि केंद्र सरकार के टैक्स-कलेक्शन का अधिक बड़ा हिस्सा राज्यों को सीधे मिलना चाहिए, ताकि वे अपनी मर्जी से अपने राज्य में उसे खर्च कर सकें। लेकिन भारत जैसे देश में कम कमाई वाले राज्यों को भूखे मरने के लिए छोड़ा नहीं जा सकता, और केंद्र सरकार का यह भी जिम्मा रहता है कि राज्यों के बीच सुविधाओं और साधनों को लेकर एक ऐसा संतुलन बनाकर चले कि राज्यों के बीच एक-दूसरे से गैरबराबरी का तनाव खड़ा न हो। एक राज्य में लोग भूख से मरें, और दूसरा राज्य आलीशान शहर बनाते चले, तो देश कभी एक नहीं रह पाएगा। इसलिए राज्यों को केंद्र सरकार के विशेष पैकेज का अधिकार केंद्र को दिया गया है, और उसका कभी राजनीतिक, कभी गैरराजनीतिक इस्तेमाल होते आया है। 
लेकिन ऐसे पैकेज के वक्त यह बात आ खड़ी होती है कि अगर कोई राज्य अपनी बढ़ती हुई आबादी की वजह से, प्रशासनिक निकम्मेपन की वजह से, फिजूलखर्ची की वजह से, योजनाओं की नामौजूदगी की वजह से अगर पीछे रह जाते हैं, तो बाकी राज्यों की कमाई से केंद्र सरकार ऐसे पिछड़े राज्यों को कब तक ढोए? राज्य का हक अपने खर्च पर इस तरह का रहता है कि मायावती हजारों करोड़ के अपने स्मारक बनवा सकती हैं, और मोदी गुजरात में हजारों करोड़ के सरकारी खर्च से सरदार पटेल की प्रतिमा बनवा सकते हैं, देखा-देखी महाराष्ट्र शिवाजी की हजारों करोड़ की प्रतिमा बनवाने का फैसला ले सकता है। ऐसे में कल को उत्तरप्रदेश आर्थिक पैकेज की मांग करे, और परसों वह अपने खुद के बजट से मुलायम सिंह के परिवार की हजारों करोड़ की प्रतिमाएं बनवाने लगे, तो क्या केंद्रीय सहायता का मतलब बाकी राज्यों की जेब से अपने राज्य में प्रतिमाएं बनवाना नहीं होगा? 
संघीय ढांचे का मतलब ही एक जटिल व्यवस्था होता है। लेकिन हमारा यह मानना है कि राज्यों की अपनी फिजूलखर्ची पर केंद्र सरकार का, या नीति आयोग जैसी किसी संस्था का कोई तो काबू होना चाहिए। ऐसा न होने पर वह दिन दूर नहीं है, जब प्रतिमाओं और स्मारकों की फिजूलखर्ची रोकने के लिए लोगों को जनहित याचिका लेकर अदालतों तक जाना पड़ेगा। राज्य सरकारें अगर अपने गैरउत्पादक खर्च नहीं घटाएंगी, अपने राज्य का आर्थिक विकास नहीं करेंगी, तो चुनाव के वक्त केंद्र सरकार देश की जनता के पैसों से ऐसे चुनावी-पैकेज देती ही रहेंगी। आज यहां हमारे पास किसी तरह का समाधान नहीं है, लेकिन एक संघीय लोकतांत्रिक ढांचे की विसंगतियां हम पाठकों के सामने रखना चाहते हैं। 

बंदर की दुम तो कायम रहेगी, इंसान ही उस्तरे से अपनी नाक..

17 अगस्त 2015
कुछ लोग अपने दिन की शुरुआत कुछ महान लोगों की कही हुई बातों से बनी हुई सूक्तियों से करते हैं, और यह मानते हैं कि उनके दिन भर पर उसका असर होगा। और यह बात काफी हद तक सही भी है कि लोग अपने आपको जिस तरह की बातों से घेरकर रखते हैं, उनका असर होता है। बहुत से लोग यह लिखते हैं कि नकारात्मक लोगों से दूर रहना इसलिए ठीक होता है कि किसी संक्रामक रोग की तरह निराश और नकारात्मक लोग आसपास के लोगों का हौसला भी पस्त कर देते हैं। इसी तरह उत्साह से भरे और सकारात्मक लोग किसी डूबते के लिए भी तिनके से अधिक बड़ा सहारा रहते हैं, और महज अपनी बात से वे लोगों को ताकत दे देते हैं। 
लेकिन बहुत सी सूक्तियां कहावतों और मुहावरों की तरह कुछ खास संदर्भों में ही लागू होती हैं, और कुछ विपरीत संदर्भों में उनका मतलब ठीक उल्टा और नुकसानदेह भी हो सकता है। इंसान की समझ की बातें उसके दायरे से कटी हुई नहीं हो सकतीं, और दायरे के अलावा किसी खास जमाने से भी उसका लेना-देना होता है। अठारहवीं सदी में जो बातें जायज हो सकती थीं, वे इक्कीसवीं सदी में जुर्म हो सकती हैं। और अठारहवीं सदी में जो बातें जुर्म समझी जाती थीं, वैसी सैकड़ों बातें आज जायज हो चुकी हैं। इसलिए लोगों की कही बातों को उनके संदर्भों से जोड़कर, और जहां उसे इस्तेमाल करना है, उस संदर्भ से भी जोड़कर देखना चाहिए। इसके बिना ज्ञान और समझ की बातें भी नुकसानदेह हो सकती हैं। 
न सिर्फ दिन की शुरुआत, बल्कि पढऩे-लिखने के, बातचीत के अधिकतर समय का इस्तेमाल एक सकारात्मक माहौल को बनाने के लिए किया जा सकता है। और जब कभी ऐसा इस्तेमाल नहीं होता है, तो लोगों के बीच होने वाली गैरजरूरी, घटिया, अन्यायपूर्ण, और महज सनसनीखेज बातें लोगों का वक्त खासा खराब भी करती हैं। अब जैसे आज के मोबाइल फोन के एक खासे इस्तेमाल होने वाले एप्लीकेशन को देखें, तो वॉट्सऐप से लोग टाईप की हुई बातें, तस्वीरें, संगीत और फिल्में एक-दूसरे को लगभग मुफ्त में ही भेज देते हैं। अब सवाल यह उठता है कि आपके पास अगर रोज ऐसे दर्जनों संदेश आते हैं, तो उनको सिर्फ खोलकर देखने में, या सुनने में इतना वक्त लग जाता है कि उनका असर आप पर चाहे-अनचाहे होता ही है। फिर ऐसे संदेशों का जवाब देने में लोग लग जाते हैं, उनको आगे बढ़ाने में लग जाते हैं, और घूरा परोसने से, दूसरे लोग भी अपना पकाया घूरा, या कहीं और से आया हुआ घूरा आपको परोसते हैं। 
आप अगर सावधान नहीं हैं, तो आज की टेक्नालॉजी, और हर हाथ या जेब में रखा मोबाइल फोन आपकी जिंदगी को रोज कुछ और गहरे गड्ढे की तरफ ले जा सकता है। इसी तरह अगर आप अपना दायरा ठीक रखते हैं, तो आपके पास सकारात्मक और अच्छी तस्वीरें, अच्छे पोस्टर आ सकते हैं, और आपका पूरा दिन एक बेहतर दिन हो सकता है। लेकिन जैसा कि समझदार लोग हमेशा से कहते आए हैं कि अपनी संगत का ख्याल रखना चाहिए, तो आज यह बात और अधिक जरूरी हो गई है, क्योंकि संगत सिर्फ शाम को साथ पीने-खाने, या जुआ खेलने जैसे कामों के लिए नहीं होती, बहुत सी संगत अब फोन पर या इंटरनेट पर हो जाती है, सोशल साईटों पर हो जाती है, और वहां भी आपके आसपास वह घूरा इक_ा कर सकती है, या आपको किसी जुर्म की तरफ खींच सकती है। 
बहुत से लोगों को ऐसी संगत, संगत नहीं लगती है, जबकि यह मोबाइल-पूर्व के जमाने की आम संगत के मुकाबले अधिक गहरी, मजबूत, और खतरनाक संगत है। आज लोग अपनी अधिक बातों को खुद होकर सोशल वेबसाईटों पर उजागर करते हैं, बड़े दुस्साहस के साथ अनजाने लोगों से भी दोस्ती करते हैं, और अपनी निजी बातों को पूरी दुनिया के लिए खोलकर रख देते हैं। एक वक्त था जब आपकी कही बात बिना किसी सुबूत आगे बढ़ जाती थी, आज तो डिजिटल जमाने में लोग अपनी की-बोर्ड के हर अक्षर के पदचिन्ह छोड़ते चल रहे हैं, और हकीकत तो यह है कि मिटा देने के बाद भी कुछ भी नहीं मिटता। इसलिए मानो इंटरनेट पर बचपन की संगत बुढ़ापे तक सुबूत बनकर बनी रहने वाली है। 
दरअसल टेक्नालॉजी एक सुनामी की तरह लहरों का अंधड़ लेकर इंसान की जिंदगी में आई, और उसने ऐसे औजार लोगों को थमा दिए, जो कि बंदर के हाथ में उस्तरे जैसी कहावत को साबित करती है। यह एक अलग बात है कि आज तक किसी ने ऐसा बंदर देखा नहीं है जो कि उस्तरे से अपनी ही दुम को काटे, और इंसान ने अपनी बेवकूफियों की कहावत बनाने के लिए जानवरों, और नीम चढ़े करेले जैसे कई पेड़-पौधों का इस्तेमाल भी कर लिया है। खैर, वह नाजायज इस्तेमाल एक अलग मुद्दा है, और दुनिया में कमजोर या बेजुबान पर तोहमत धरना ताकतवर का हक सा रहता है, इसलिए कहावतें और मुहावरे ऐसी ही ज्यादती के बने होते हैं। लेकिन यह आज की इस बहस का मुद्दा नहीं है। आज की बातचीत इस पर है कि डिजिटल सुनामी-सैलाब के बीच अपनी समझदारी के पैर कैसे टिकाकर रखे जाएं। 
यह थोड़ा मुश्किल काम है, क्योंकि समझदारी एक किस्म से चर्बी चढ़े बदन को कसरत करने कहती है। और नासमझी या गैरजिम्मेदारी मानो किसी को नर्म सोफा पर बिठाकर उसकी दिलचस्पी की फिल्म दिखाने जैसी होती हैं। लोगों को लगता है कि गैरजिम्मेदारी की चीजें गुपचुप या चाट जैसी मजेदार स्वाद वाली हैं, और समझदारी की बात मानो सादी खिचड़ी और बिना तली सब्जी जैसी है। इसलिए हमारा यह नसीहत देना तो आसान है कि लोग अश्लील या हिंसक, साम्प्रदायिक या दूसरी तरह के भड़काऊ संदेशों को पाने, बढ़ाने, और पढऩे-पढ़ाने में न उलझें, लेकिन इस पर अमल को भला किसका दिल मानेगा? गांधी की जीवनी पूरी जिंदगी में जितनी बिकी होगी, उससे अधिक गुलशन नंदा की एक-एक किताब शायद बिकी हो। लेकिन अगर किसी की जिंदगी पर कोई अच्छा असर पड़ सकता है, तो वह बेहतर चीजों को पढऩे, सुनने, बेहतर बातचीत का हिस्सा बनने, और बेहतर सोच वाले लोगों के बीच उठने-बैठने से पड़ सकता है। 
यह पूरी बातचीत इस कॉलम में बड़ी फीकी लग सकती है, लेकिन यह आज का बहुत चुभने वाला मुद्दा है, और इसे किसी गंभीर बातचीत के लायक पाया भी नहीं जाता। जिस तरह हिन्दुस्तान में लोग यह मान लेते हैं कि नौजवान पीढ़ी को किसी तरह की सेक्स-शिक्षा की जरूरत नहीं है, उसी तरह लोग यह भी मान लेते हैं कि डिजिटल-समझदारी, या डिजिटल-जिम्मेदारी, या डिजिटल-तहजीब को लोग मां के पेट से ही सीखकर आते हैं, और हर किसी को इस औजार के इस्तेमाल का हुनर आता ही है। हकीकत तो यह है कि लोगों को आज यह भी अहसास नहीं है कि सोशल मीडिया में उनका लिखा हुआ, या फोन-कम्प्यूटर पर कुछ लिखकर इंटरनेट या फोन-सर्विस से किसी को भेजा हुआ कैसे नए कानूनों में एक बड़ा जुर्म है, जिस पर बड़ी कड़ी सजा है। एक वक्त कागज पर लिखने या अखबारों में लिखकर भेजने से जो बातें जुर्म के दायरे में नहीं आती थीं, वे भी भारत के नए आईटी कानून में एक बड़ा जुर्म हैं। 
आज जो लोग खुद होकर इन खतरों को नहीं समझ रहे हैं, उनके लिए परिवार को, समाज या सरकार को, कुछ करने की जरूरत है। आज बंदर तो सुरक्षित हैं, लेकिन इंसान के हाथ में मोबाइल नाम का जो उस्तरा है, उससे इंसान रोज ही अपनी नाक काटने का खतरा खड़ा करते चल रहे हैं। मोबाइल फोन के लिए जितने किस्म के लुभावने एप्लीकेशन मुफ्त में दिखते हैं, उनके भीतर जाकर देखें तो उनका इस्तेमाल शुरू करने के पहले ही लोगों को उस कंपनी को यह मंजूरी देनी पड़ती है कि वह कंपनी फोन या कम्प्यूटर पर जमा हर फाईल, हर तस्वीर, हर वीडियो को देख सकती है, और इस फोन के मालिक की तरफ से उनको पोस्ट कर सकती है, जानकारी का इस्तेमाल कर सकती है। लेकिन इस खतरे का एहसास बहुत ही कम लोगों को है, क्योंकि चौकन्ने लोगों की संगत कम गुदगुदी होती है, और गैरजिम्मेदार लोगों की संगत बड़ी सनसनीखेज और चटखारों वाली होती है। एक संगत लोगों को योग और कसरत की तरफ ले जाती है, तो दूसरी संगत लोगों को दारू-जुआ और मौज-मस्ती की तरफ। यही वजह है कि आज लोगों की सोशल मीडिया या फोन पर संगत ऐसे लोगों से आसानी से और अधिक हो जाती है, जो कि एक गैरजिम्मेदार मौज-मस्ती को बढ़ावा देते हैं। इससे परे साम्प्रदायिकता या नफरत को बढ़ावा देते हैं। 
लेकिन लोगों को यह भी याद रखने की जरूरत है कि आज दुनिया के अच्छे विश्वविद्यालय या कॉलेज दाखिला देने के पहले, और अच्छे दफ्तर नौकरी देने के पहले, जिम्मेदार बैंक कर्ज देने के पहले, क्रेडिट कार्ड कंपनियां उधार देने के पहले लोगों के सोशल मीडिया पन्नों पर झांक लेते हैं। इसलिए अपनी संगत, अपनी सोच, और अपने चाल-चलन को आज इंटरनेट, फोन, या सोशल मीडिया पर सम्हालकर रखना कुछ बरस पहले की गैर-डिजिटल जिंदगी के मुकाबले अधिक जरूरी है। बंदर की दुम तो बची रहेगी, इंसान ही उस्तरे से अपनी नाक काटने के खतरे में है। 

मोदी के मस्जिद चले जाने पर हड़बड़ाए आलोचक समझें, डाका तो नहीं डाला, चोरी तो..

17 अगस्त 2015
संपादकीय

संयुक्त अरब अमीरात की यात्रा पर गए भारतीय प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी का वहां की सबसे बड़ी मस्जिद में जाना, कई तरह की बहस छेड़ गया है। लोगों को गुजरात के 2002 के दंगे भी याद आ गए, और उसके बाद एक सार्वजनिक समारोह में उनका मुस्लिम-टोपी पहनने से इंकार करना भी याद आ गया, और बाबरी मस्जिद से लेकर अब तक का भाजपा का पूरा रूख भी लोगों को इस मौके पर याद आया। लेकिन 1992 के एक भाजपा नेता से लेकर 2002 के गुजरात के मुख्यमंत्री तक का सफर पूरा हुए खासा वक्त हो चुका है, और अब 2014 के भारतीय प्रधानमंत्री की बात हो रही है। इस नाते उनके रूख में अगर कोई निजी या सार्वजनिक बदलाव है, तो यह ओहदे की जिम्मेदारियों के साथ जुड़ी हुई बात भी हो सकती है, और ऐसे बदलाव को लेकर आलोचना की जगह एक तारीफ की जरूरत है। बदलाव न हो तो आलोचना, और बदलाव हो जाए तो भी आलोचना, यह दोनों बातें एक साथ जायज नहीं हो सकतीं।
तीन दशक बाद कोई भारतीय प्रधानमंत्री पड़ोस के इस महत्वपूर्ण देश में पहुंचा है। इंदिरा गांधी के बाद वहां कोई भारतीय पीएम नहीं गया था। और वहां की विश्व विख्यात शेख जायद मस्जिद में जाना मोटे तौर पर बाहर से आने वाले राष्ट्र-प्रमुखों, या शासन-प्रमुखों के लिए एक स्थानीय रिवाज जैसा है, क्योंकि इस मस्जिद से ही संयुक्त अरब अमीरात के संस्थापक कहे जाने वाले शासक की कब्र भी जुड़ी हुई है। इसलिए नरेन्द्र मोदी का वहां जाना उनकी सोच के  बदलने से परे एक राजकीय रस्म-रिवाज भी हो सकती है। लेकिन इस मौके पर उन्होंने इस्लाम के बारे में लिखा की यह मस्जिद शांति, दया, सद्भाव, और सबको साथ लेकर चलने की जिन बातों का प्रतीक है, वे तमाम बातें इस्लाम की आस्था की बुनियादी बातें हैं। 
भारत देश और दुनिया के सामने ये विकल्प मौजूद हैं कि या तो वे मोदी के इतिहास से आगे बढऩे से इंकार कर दें, या फिर वे मोदी के वर्तमान को देखते हुए मोदी के भविष्य, और देश-दुनिया के भविष्य के भले के लिए मोदी को भी एक मौका दें। ऐसे में भारत के बहुत से समझदार लोगों का यह भी मानना है कि चाहे प्रधानमंत्री के ओहदे की वजह से ही सही, अगर मोदी देश और दुनिया के मुस्लिमों को कुछ बेहतर समझ रहे हैं, तो यह नई समझ मोदी के अपने समुदाय, और बाकी समुदायों के बीच एक बेहतर तालमेल में मददगार होगी। कुछ वामपंथियों का यह मानना है कि धार्मिक आधार पर भेदभाव करने वाले कुछ आक्रामक हिंदू संगठन हिंदुओं को मुस्लिमों से इतने परे रखने की रीति-नीति का इस्तेमाल करते हैं, कि किसी तरह की आपसी समझ की गुंजाइश पैदा न हो जाए, और नफरत के लिए ही गुंजाइश बची रहे। लेकिन भारतीय प्रधानमंत्री, चाहे वे जो भी हों, वे अगर सवा सौ करोड़  हिंदुस्तानियों की बात करेंगे, तो इस आबादी में आक्रामक-हिंदुत्व वाली आबादी एक चौथाई भी नहीं हो सकती। न ही साम्प्रदायिक सोच रखने वाली सभी धर्मों की आबादी मिलाकर देश की आबादी की एक चौथाई हो सकती है। इसलिए जब मोदी पूरे देश की तरक्की के आधार पर अपने को एक कामयाब प्रधानमंत्री साबित करना चाहते हैं, तो यह कामयाबी किसी भी तबके को अलग रखकर नहीं हो सकती। और अटल बिहारी वाजपेयी से लेकर नरेन्द्र मोदी तक यह बात जाहिर है कि सरकार चला रहे प्रधानमंत्री का किसी साम्प्रदायिक एजेंडे में शामिल होना कुछ मुश्किल ही रहता है। ऐसे में मोदी को यह मौका तो मिलना ही चाहिए कि अगर वे किसी मस्जिद में किसी राजकीय रिवाज के तहत, या उससे परे, जैसे भी, जा रहे हैं, तो इसे लेकर उनकी आलोचना न हो। किसी भी धर्म की साम्प्रदायिक ताकतें चाहती यही हैं कि अपने-अपने धर्म के लोगों को बटोरकर उनको एक टापू पर रखा जाए, और दूसरे धर्म को एक दुश्मन की तरह दिखाया जाए। प्रधानमंत्री बनने के पहले तक जिस नरेन्द्र मोदी ने एक दिन भी विदेश नीति से जुड़ा काम नहीं किया था, उस मोदी को आज सात समंदर पार जाकर हिंदुस्तानियों से मिलने का एक अभूतपूर्व सिलसिला शुरू करते देखना एक हैरानी की बात भी है। हिंदुस्तानी प्रधानमंत्री बाहर जाकर उन देशों की सरकारों से तो बात करते थे, लेकिन वहां बसे हिंदुस्तानी कामगारों, या भारतवंशी लोगों को साथ जोडऩा एक बिल्कुल ही नया तजुर्बा है। 
आखिर में यह देखना भी जरूरी है कि मोदी ने मस्जिद जाकर क्या खोया, और क्या पाया। संयुक्त अरब अमीरात की राजधानी आबूधाबी में कोई हिंदू मंदिर नहीं है। मोदी ने मस्जिद जाकर दुआ की, और वहां की सरकार ने मंदिर के लिए जमीन दे दी। इन दो बातों से दोनों समुदायों के बीच चाहे प्रतीकात्मक स्तर की ही सही, एक बेहतर समझ तो बनेगी ही। 

मोदी का भाषण, रिकॉर्ड कायम हुआ, असर नहीं

16 अगस्त 2015
संपादकीय

प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने लालकिले से अपने दूसरे भाषण में नेहरू का लालकिले से सबसे लंबे भाषण का रिकॉर्ड तोड़ दिया। वे करीब डेढ़ घंटे बोलते रहे और उनकी कही एक-एक बात ट्विटर पर, और डिजिटल मीडिया पर भी आती रही। नेहरू ने जब वह भाषण दिया होगा, तो लोगों के पास सुनने के लिए महज रेडियो रहा होगा, और बिना इंटरनेट, बिना टीवी वाली वह पीढ़ी बहुत सा खाली वक्त लेकर बैठी रही होगी। लेकिन आज 140 अक्षरों की सीमा वाले ट्विटर, या एसएमएस, या टीवी चैनलों की बे्रकिंग न्यूज के बीच डेढ़ घंटे किसी को सुन पाना खासा मुश्किल रहा होगा। लेकिन यह तो प्रधानमंत्री का विशेषाधिकार है कि वे कितनी देर बोलें, और मोदी को पसीना-पसीना हो जाने तक बोलते रहे, और दर्जनों बार उन्हें चेहरे से पसीना पोंछना भी पड़ा।
लेकिन प्रधानमंत्री के भाषण को देखें, तो आज उनके सलाहकारों को यह भी ध्यान रखना चाहिए कि आज की पीढ़ी, आज के दर्शक या पाठक का ध्यान कितनी देर तक बांधकर रखा जा सकता है? इसके साथ-साथ एक दूसरी बात यह भी जरूरी है कि एक भाषण या एक बयान में कितने मुद्दों को रखा जा चाहिए, और उनमें से कितने मुद्दों पर लोग ध्यान दे सकते हैं। बहुत सी अच्छी बातों का ही सही, एक गुलदस्ता अगर इतना बड़ा बना दिया जाए कि हर फूल को देखते-देखते डेढ़ घंटे लग जाएं, तो फिर किस फूल पर लोगों का ध्यान अधिक खींचना है, यह तरकीब काम की नहीं रह जाती। लंबाई-चौड़ाई का समय या शब्दों का एक रिकॉर्ड तो बनाया जा सकता है, लेकिन फिर ऐसे लंबे भाषण या बयान लोगों को छुए बिना सीधे इतिहास के रिकॉर्ड में चले जाते हैं। लोगों का मनोविज्ञान यह रहता है कि वे जिसे पसंद करते हैं, उसकी कही अनगिनत बातों को भी वे लंबी देर तक सुनते रह सकते हैं, लेकिन बातों को भक्तों के लिए नहीं कहा जाता, उनके लिए कहा जाता है जो कि दिमाग को खुला रखकर, दिमाग का इस्तेमाल करके सुनते हैं। भक्त या नफरत करने वालों को प्रभावित करने की जरूरत नहीं होती क्योंकि वे तो सुनने के पहले ही अपनी मजबूत धारणा बनाए हुए रहते हैं। लेकिन जो लोग बीच के रहते हैं, जो कि तर्कसंगत और न्यायसंगत तरीके से सुनकर विश्लेषण करते हैं, उनका ध्यान इतनी लंबी देर तक बांधा नहीं जा सकता।
आज का वक्त कम शब्दों में असरदार बातों को कहने का है। और यह बात बहुत नई भी नहीं है, सौ बरस पहले भी जो टेलीग्राम भेजे जाते थे, उनमें भी एक-एक शब्द का पैसा देना पड़ता था। आज सड़कों के किनारे जो विज्ञापन-बोर्ड लगते हैं, उन पर उतनी ही बातें लिखी जाती हैं जिनको लोग गिने-चुने कुछ सेकंड में पढ़ सकें। लोगों का अटेंशन-स्पान अलग-अलग जगह, अलग-अलग मौकों पर अलग-अलग होता है। आज जिन लोगों को इंटरनेट की सुविधा है, वे पल-पल अलग-अलग पन्नों पर जाकर चुनिंदा बातों को पढऩे, सुनने, या देखने में लगे रहते हैं। ऐसे में प्रधानमंत्री के इतने लंबे भाषण में उठाए गए अनगिनत मुद्दों पर खर्च किए गए अनगिनत शब्दों में उनके मन की बात का फोकस खो जाना तय ही था। होना तो यह चाहिए था कि वे बिना दुहराए हुए, एक-एक बात के लिए कई मिसालें दिए बिना, कम शब्दों में असरदार बात करते, तो भाषण खत्म होने तक शुरू की बातें लोगों को भूल नहीं जातीं। एक रिकॉर्ड कायम करने से परे, प्रधानमंत्री के इस भाषण से असर कायम नहीं हो पाया।

किसकी है जनवरी, किसका अगस्त है....

14 अगस्त 2015 
संपादकीय 

आजादी की सालगिरह पर राष्ट्रपति से लेकर प्रधानमंत्री तक, और राज्यपाल से लेकर मुख्यमंत्री तक देश-प्रदेश के संदेश देंगे। देश की हर स्कूल-कॉलेज में लोगों के भाषण होंगे, और आजादी की लड़ाई को याद किया जाएगा, शहीदों को श्रद्धांजलि दी जाएगी। और इसके साथ ही आजादी शब्द को इतिहास से जोड़कर उसे दफन कर दिया जाएगा, ताकि कोई आज के संदर्भ में आजादी की बात न छेड़ बैठे। बहुत सी बातें इतिहास के रूप में सहूलियत की होती हैं, और वर्तमान से अगर उनको जोड़ दिया जाए, तो वे खतरनाक और तकलीफदेह साबित हो जाती हैं। 
देश को अंग्रेजों से आजादी दिलाना तो चुका, लेकिन उसकी पौन सदी करीब आ रही है, और हाल यह है कि उस वक्त देश जिन बातों का गुलाम था, उनसे कहीं अधिक बातों का गुलाम हिन्दुस्तान आज हो गया है। उस वक्त तो गुलाम बनाने वाले हमलावर सात समंदर पार से आए हुए गोरे थे, आज तो गुलाम बनाने वाले लोग घर के ही हैं, देश के ही हैं, और कोई समंदर पार करके भी नहीं आए हैं। आज हिन्दुस्तान में लोकतंत्र के नाम पर जिस तरह की ताकतें राज कर रही हैं, उनमें सरकार और कारोबार इन दोनों में रहते हुए की गई काली कमाई से ऐसी जंजीरें बनाई गई हैं, जिनसे आम लोगों के लोकतांत्रिक अधिकारों को बांधकर रख दिया गया है। फिर बहुत से ऐसे मामले हैं जिनमें सरकार और कारोबार ने मिलकर आम जनता के हक, और आम जनता के खजाने, इन दोनों पर तरह-तरह से कब्जा कर लिया है, और जब लूटपाट पूरी हो चुकी रहती है, तब देश-प्रदेश के मंत्री-अफसर अदालती कटघरों में गाहे-बगाहे पहुंचाए जाते हैं, और अदालत से सजा पाने के बाद भी वे लालू यादव बने हुए देश-प्रदेश चलाने में लगे रहते हैं। बात सिर्फ एक नेता या एक पार्टी की नहीं है, बात सिर्फ भारत सरकार, या किसी प्रदेश की सरकार की भी नहीं है, देश में वामपंथियों को छोड़कर तकरीबन हर पार्टी की सरकार ने ऐसा हाल कर रखा है। 
इस देश को अंग्रेजों की गुलामी से आजादी कराने के लिए गांधी से लेकर भगत सिंह तक अनगिनत लोगों ने तरह-तरह की शहादत दी थी, लेकिन आज भ्रष्टाचार और सरकार-कारोबार की लूटपाट से आजादी दिलाने की कोई संभावना भी नहीं दिखती है। देश में एक भी कोई ऐसा भरोसेमंद नेता और आंदोलनकारी नहीं बच गया है, जो कि जनता को जीत सके, और लूटने वाले ताकतवर लोगों को हरा सके। यही वजह है कि आजकल में देशभर में होने वाले भाषणों में इतिहास भरा रहेगा, क्योंकि वर्तमान तो गिनाने के लायक है नहीं, और भविष्य को लेकर आम जनता को उम्मीद बहुत कम है। देशभर में जगह-जगह ताकत पर बैठे हुए लोग यह साबित करने में लगे हुए हैं कि आजादी किस तरह महज उन्हें है, और आम जनता किस तरह आज भी महज गुलाम है। 
इस देश की जनता हर पांच बरस के चुनाव को आजादी मान बैठी है। एक वक्त राममनोहर लोहिया ने लिखा था कि आजाद कौमें पांच बरस इंतजार नहीं करतीं, आज हिन्दुस्तान की पीढ़ी-दर-पीढ़ी, चुनाव-दर-चुनाव गुजारते हुए चैन से अपने आपको आजाद माने बैठी हैं। जिस देश में जनता इस तरह अपने आपको आजाद मान बैठी हो, और जिसे सरकार-कारोबार का गुलाम होने का अहसास भी न हो, वह जनता, वह देश इस अघोषित गुलामी के तहत उसी तरह लुटते रहेंगे, जैसे की ईस्ट इंडिया कंपनी और अंग्रेजराज में यह देश लुटते रहा है। आजादी की सालगिरह पर बाबा नागार्जुन की कविता याद पड़ती है कि किसकी है जनवरी, किसका अगस्त है....
—-

महानता के बहुत पुराने प्रतीक बेअसर, नए प्रतीकों को जगह देें

13 अगस्त 2015
संपादकीय

दो दिन पहले हमने जेल में रहते हुए कैदियों ने पढ़ाई और इम्तिहान में जो कामयाबी पाई थी, उसके बारे में लिखा था कि बुरे लोगों के अच्छे काम से भी लोग प्रेरणा ले सकते हैं। जो लोग जेलों के बाहर हैं, और मां-बाप के पैसों पर सहूलियत से पढ़ते हैं, उनको तो कैदियों के मुकाबले अधिक मेहनत करके अधिक कामयाबी पानी चाहिए। अब यह लिखे दो ही दिन हुए थे कि एक अच्छी और एक बुरी खबर और आ गई। अच्छी खबर यह है कि पैरों के काम न करने पर भी व्हीलचेयर पर चलने वाले एक पर्वतारोही ने 11 बार एवरेस्ट पर चढऩे में कामयाबी पाई। दूसरी खबर अभी-अभी आई है कि रायपुर में दर्जनभर चोरियों के सामान के साथ एक ऐसा चोर पकड़ाया है, जिसके दोनों हाथ कटे हुए हैं। इसके बावजूद वह अपने ठूंठ जैसे बचे हुए हाथों से पानी की बोतल भी खोल लेता है, मोबाइल फोन का इस्तेमाल भी कर लेता है, और जाहिर है कि उसके पास से बरामद सामान चोरी करने के लिए तो उसने अधिक मेहनत की ही होगी। 
लोगों के शरीर में अगर कोई कमी रह जाती है, तो उससे हौसला पस्त करने की जरूरत नहीं रहती। लोग आंखों के बिना अकेले ही पूरी दुनिया की सैर कर आते हैं, अंग्रेजी जाने बिना लोग बहुत से देशों में घूम लेते हैं, जहां लोग सिर्फ अंग्रेजी में बात करते हैं, पैरों के बिना एवरेस्ट पर दर्जनभर बार जाने की तस्वीरें देखने लायक हैं, फिलिस्तीन के एक ऐसे फोटोग्राफर की तस्वीरें छपती रहती हैं, जिसने इजराइली हमले में दोनों पैर खो दिए थे, और जो अब पहियों की कुर्सी पर चलता है, और दुनियाभर के लिए तस्वीरें खींचता है। ऐसे में जिन लोगों के हाथ-पैर, आंख-कान, सब कुछ अच्छी तरह काम करते हैं, उनको अपने बारे में सोचना चाहिए कि उनको कितनी अधिक कामयाबी पाने की सहूलियत कुदरत की तरफ से मिली हुई है। 
दुनिया में जब शारीरिक दिक्कतों के चलते हुए भी लोग बड़ी-बड़ी मंजिलों तक पहुंचते हैं, तो उन्हें देखकर सिर ऊंचा हो जाता है, और सलाम करने को दिल करता है। फिर शारीरिक दिक्कतों से परे हिन्दुस्तान में अनगिनत ऐसे गरीब बच्चे हैं, जिनके मां-बाप रोजी-मजदूरी करते हैं, लेकिन वे देश की सबसे बड़ी-बड़ी परीक्षाओं में कामयाबी पाते हैं। सरकार और समाज इन दोनों को चाहिए कि विपरीत परिस्थितियों में अपने हौसले और अपनी मेहनत से कामयाबी पाने वाले लोगों की मिसाल स्कूल-कॉलेज के बच्चों के सामने रखे। आज आजादी की पौन सदी पूरी होने को है, और अब तक आजादी की लड़ाई की वे ही कहानियां स्कूलों में पढ़ाई जाती हैं, जो कि किताबों की शक्ल में पौन सदी से बाजार में हैं। इनका असर भी अब सीमित हो चला है, क्योंकि देश को आज वैसी किसी गुलामी से आजादी पाने की जरूरत नहीं है। आज सामाजिक गैरबराबरी से टक्कर लेकर, कुदरत की बेइंसाफी से टक्कर लेकर जो लोग बहादुरी दिखाते हैं, उनकी असल कहानियां बच्चों को अधिक प्रभावित कर सकती हैं। सामाजिक विरोधों के बीच जिस तरह सानिया मिर्जा खेल के कपड़ों में दुनिया के सबसे बड़े मुकाबलों को जीतकर आती है, उससे सामाजिक विरोध करने वाले दकियानूसी लोगों के मुंह भी बंद हो जाते हैं, हो चुके हैं। वरना ऐसे दकियानूसी लोग अपने बिरादरी की लड़कियों को आगे बढऩे से रोकने के लिए सबकुछ करते हैं। 
इसी तरह, गांवों में, जातपात मानने वाले इलाकों में, महिलाओं से भेदभाव करने वाले समाज में जो महिलाएं, जो दलित, या गरीब और कमजोर सामाजिक संघर्ष करके सफल होते हैं, उनकी कहानियां सरकार को और समाज को चारों तरफ फैलानी चाहिए। महानता के बहुत पुराने प्रतीक बेअसर होते जाते हैं, और नए प्रतीकों को जगह देनी चाहिए। 

अखबार न चला पाने वाली कांग्रेस टीवी चैनल शुरू तो कर सकती है, देखेंगे कौन?

संपादकीय
12 अगस्त 2015

केरल कांग्रेस ने कुछ समय पहले जयहिन्द टीवी नाम से एक चैनल शुरू किया है, और अब कांग्रेस पार्टी उस चैनल को एक राष्ट्रीय चैनल बनाने का विचार कर रही है। यह कांग्रेस पार्टी का अपना चैनल होगा, और इससे पार्टी की विचारधारा लोगों के सामने रखने में मदद मिलेगी। आज भी कई प्रदेशों में पार्टियों के अपने घोषित या अघोषित टीवी चैनल हैं भी, और यह एक अच्छी बात है कि अपने अखबार, अपनी पत्रिकाओं के साथ-साथ पार्टियां अपने टीवी या रेडियो चैनल भी चलाएं। आज का वक्त मीडिया और सोशल मीडिया पर अपने को बेचने का इस तरह का हो चुका है कि देश के सबसे नामी-गिरामी पत्रकार, कलाकार, नेता, सभी ट्विटर और फेसबुक पर अपने आपको बढ़ावा देते चलते हैं, और अमिताभ बच्चन से लेकर लालकृष्ण अडवानी तक, नरेन्द्र मोदी से लेकर लता मंगेशकर तक, अपने ब्लॉग या दूसरे एकाऊंट पर अपने मन की बातों को पोस्ट करते जाते हैं। एक समय था जब मीडिया के लोग मशहूर लोगों से बात करके खबर बनाते थे, अब मीडिया ऐसे लोगों के इंटरनेट-खातों पर नजर रखकर वहां से खबर ले लेता है। 
लेकिन हम बात को कांग्रेस के इस चैनल तक रखना चाहते हैं। इसके पहले की भी बात याद करें, तो नेहरू के वक्त कांग्रेस पार्टी ने नेशनल हैराल्ड नाम का एक अखबार शुरू किया था, और नेहरू ने वंशवाद का अपना किया हुआ पहला मनोनयन इसी अखबार की कंपनी में किया था। उन्होंने अपने दामाद फिरोज गांधी को इस अखबार की प्रकाशन कंपनी का चेयरमेन बनाया था, और इसके साथ-साथ आजाद भारत की पहली और सबसे बड़ी पेट्रोलियम कंपनी इंडियन ऑयल के चेयरमेन पद पर भी उन्होंने फिरोज गांधी को मनोनीत किया था। नेशनल हैराल्ड ठीक से निकल सके इसलिए नेहरू के वक्त से ही देश भर में इस अखबार के लिए बड़ी-बड़ी जमीनें सरकार ने दी थीं, और आज अंदाज यह है कि इसके पास हजारों करोड़ की जमीन-जायदाद है। इस कंपनी के शेयरों को लेकर सोनिया गांधी सहित कांग्रेस के कुछ नेताओं के खिलाफ अदालत में मामला भी चल रहा है। 
जो पार्टी अपने अखबार को ऐसे बुरे हाल में रखने का लंबा इतिहास रखती है कि वहां के कर्मचारियों को तनख्वाह तक नहीं मिली, और अखबार बंद होते चले गए। ऐसी पार्टी ने यह परवाह भी नहीं की, कि अपने उपाध्यक्ष का कोई सोशल मीडिया खाता खोले। अब अचानक वह सीधे एक टीवी चैनल के बारे में सोच रही है, जो कि हो सकता है कि आज की चुनावी राजनीति की एक जरूरत हो, लेकिन कांग्रेस पार्टी ऐसे चैनल पर क्या कहेगी? जहां तक हमारी समझ है, किसी राजनीतिक दल का ऐसा चैनल चुनाव के पूरे दौर में आचार संहिता की वजह से प्रसारित नहीं हो पाएगा। ऐसे में उसका राजनीतिक उपयोग चुनाव से परे ही हो पाएगा, और वह भी तब हो पाएगा जब उस चैनल पर जनता को बांधने के लायक कुछ होगा। देश की सबसे बड़ी पार्टी अगर चाहती तो अपने खुद के अखबार के करोड़ों ग्राहक बनाकर अपनी पार्टी के लोगों तक अपनी विचारधारा पहुंचाती। लेकिन कांग्रेस यह काम नहीं कर पाई, न एक अखबार ठीक से जारी रख पाई, न उस पर खर्च करने की कांग्रेस की नीयत रही, और न ही अपनी पार्टी के लोगों को वह इस अखबार से जोड़ पाई। ऐसे में उसके टीवी चैनल को कौन देखेगा? 
कांग्रेस पार्टी हो, या कोई और पार्टी, अगर उसकी कही बातों में लोगों को बांधने की ताकत है, तो देश के अनगिनत समाचार चैनल ही घंटों तक मोदी को मुफ्त में दिखाते हैं, वे सोनिया या राहुल को भी दिखा सकते थे, लेकिन कांग्रेस के नेताओं के पास बोलने को कम है, मुद्दे कम हैं। छत्तीसगढ़ में कांग्रेस पार्टी एक मजबूत विपक्ष के रूप में लगातार लड़ रही है, तो मीडिया उसकी खबरों को खासी जगह देता भी है। लेकिन बाकी देश में कांग्रेस का हाल बदहाल है। इसलिए टीवी चैनल हो या अखबार, किसी राजनीतिक दल के हाथ में यह औजार तभी काम का हो सकता है, जब उसे इस्तेमाल करने का हुनर पार्टी के पास हो। एक टीवी चैनल सिर्फ टेक्नालॉजी और खर्च, इन दो चीजों से चल सकता है, लेकिन जब तक जनता से जोडऩे के मुद्दे नहीं रहेंगे, तब तक उसे देखेंगे कौन? 

दिल्ली में प्रदूषण के चलते पुरानी गाडिय़ों पर लगी रोक से बाकी देश भी सबक ले

संपादकीय
11 अगस्त 2015

देश की राजधानी दिल्ली में कई बरस पहले पन्द्रह बरस से अधिक पुरानी डीजल गाडिय़ां पर रोक लगाई गई थी, और उस वक्त बड़े विरोध के बीच भी सुप्रीम कोर्ट के आदेश की वजह से वह लागू हुई, और कुछ बरस शायद दिल्ली में डीजल-प्रदूषण घटा भी था। अब वहां पर ऐसे ही प्रतिबंध को बढ़ाया जा रहा है, और विरोध के बीच लोगों को उम्मीद है कि इस रोक से हवा कुछ और साफ हो सकती है। लगातार ऐसे मेडिकल सर्वे के आंकड़े आ रहे हैं कि देश की इस राजधानी में किस तरह ग्यारह फीसदी लोग अस्थमा जैसी सांस की बीमारियों को झेल रहे हैं क्योंकि वे दिल्ली की हवा का प्रदूषण नहीं झेल पा रहे हैं। 
लेकिन बात आज सिर्फ दिल्ली की नहीं है, देश के दूसरे शहरों की भी है। एक तरफ तो केन्द्र सरकार राज्यों को तोहफे के टोकरे की तरह कुछ स्मार्ट सिटी बनाने के लिए सैकड़ों करोड़ रूपए देने जा रही है, दूसरी तरफ जो मौजूदा शहर हैं, उनकी बदहाली किसी से छुपी हुई नहीं है। भारत के अधिकतर शहरों का ढांचा बढ़ती हुई आबादी के लायक बना भी नहीं था, उनका योजनाबद्ध विकास भी नहीं हुआ था, और देश में शहरों की तरफ लोगों का गांव छोड़कर आना बड़ी रफ्तार से हुआ है। इसके साथ-साथ शहरी आबादी की संपन्नता बढऩे से, और सार्वजनिक परिवहन की सहूलियत न रहने से देश के अधिकतर शहरों में निजी गाडिय़ां खूब बढ़ीं, उन गाडिय़ों से प्रदूषण बढ़ा, और उन गाडिय़ों से होने वाले ट्रैफिक जाम से प्रदूषण और भी बढ़ गया। लेकिन आज देश के अधिकतर राज्य स्मार्ट सिटी के प्रस्ताव बनाकर केन्द्र सरकार से सैकड़ों-हजारों करोड़ पाने की उम्मीद में हैं, लेकिन मौजूदा शहरों को स्मार्ट बनाना, उन्हें जीने लायक बनाना प्राथमिकता में नहीं दिखता। 
देश की राजधानी में बढ़ती गाडिय़ों और बढ़ते ट्रैफिक जाम की वजह से जो प्रदूषण बढ़ा था, उसको कम करने में पुरानी गाडिय़ों को हटाना एक इलाज रहा, और दूसरी बड़ी बात दिल्ली मेट्रो रही, जिस पर रोज दसियों लाख लोग चलते हैं, और बिना प्रदूषण बढ़ाए चलते हैं। समय भी बचता है, किफायत भी होती है, और पार्किंग की जगह भी नहीं लगती। यह काम मुम्बई में आधी-पौन सदी से चल रहा है, और वहां की लोकल ट्रेन मुम्बई की जिंदगी की नस-नाड़ी जैसी है, जिसके बिना एक पल भी मुम्बई की धड़कन नहीं चल सकती। इनसे सबक लेकर देश के बाकी शहरों को सार्वजनिक परिवहन पर जोर देना चाहिए, और उनको कमाई का धंधा बनाने के बजाय राज्य सरकारों को घाटे में भी बसें चलानी चाहिए, क्योंकि उनसे शहर की मौत टलेगी। हम छत्तीसगढ़ की राजधानी में बरसों से यह देख रहे हैं कि केन्द्र सरकार की मदद से सिटी बसें तो आ गईं, लेकिन न तो उनका आल-जाल ऐसा बनाया गया कि लोग निजी गाडिय़ों पर निर्भर न रहें। आज भी चुनिंदा रास्तों पर बसें चलती हैं, और लोगों का बाकी रास्तों पर जाना इन बसों से नहीं हो पाता। ऐसे में निजी गाडिय़ों का इस्तेमाल कम नहीं हो सकता। 
दूसरी बात यह कि केन्द्र सरकार की मदद से मिलने वाली ऐसी बसों की जानकारी राज्य सरकार और स्थानीय प्रशासन को महीनों पहले से रहती है, लेकिन हाल यह है कि इनको खड़ा करने की जगह का इंतजाम भी बसों के आने के बाद तक नहीं हो पाता, और इस्तेमाल भी शुरू नहीं हो पाता। देश के छोटे शहरों में भी सड़क पर गाडिय़ों का प्रदूषण भयानक बढ़ा हुआ है, और सार्वजनिक-सिटी बसों को चलाना एक किस्म से बीमारी को रोकने का काम भी मानना चाहिए। लोगों को अस्थमा जैसी बीमारी हो, और फिर उसके बाद सरकार इलाज पर खर्च करे, उसके बजाय वह खर्च आज अगर सड़क पर प्रदूषण घटाने में हो, तो वह अधिक काम का है और सरकार को सस्ता भी पड़ेगा। राज्यों को अपने शहरों में पुरानी गाडिय़ों पर रोक लगाने, और डीजल की गाडिय़ों को शहर के  बाहर करने जैसी सावधानी किसी अदालती आदेश के पहले भी खुद होकर करनी चाहिए। छत्तीसगढ़ में ऐसा कोई चौकन्नापन दिखाई नहीं पड़ता है, और नई राजधानी, या स्मार्ट सिटी के प्रस्ताव को ही प्रदेश का भविष्य मानना ठीक नहीं है। मौजूदा शहरों में बसों का इंतजाम इतना पुख्ता करना चाहिए कि लोग अपनी निजी मोटरसाइकिलों, या गाडिय़ों को जरूरी न पाएं।

सत्ता और जनता, दो तबके एक खाई के दो तरफ हैं...

10 अगस्त 2015
मुम्बई में अभी दो दिन पहले अतिउत्साही पुलिस ने एक होटल पर छापा मारा और 40 कमरों में ठहरे हुए लोगों को पकड़कर पुलिस थाने ले गई। पुलिस का कहना था कि होटल में बिना शादीशुदा जोड़े भी रूके हुए थे, और यह सार्वजनिक जगह पर अश्लीलता थी इसलिए कानून के तहत उन पर कार्रवाई की गई। लोगों का कहना था कि वे तमाम बालिग लोग थे, बहुत से लोग शादीशुदा थे, और सभी लोग आपसी सहमति से रूके हुए थे, और उसमें कोई अश्लीलता नहीं थी। 
देर रात बंद कमरों को खुलवाकर लोगों को बाहर निकालकर, पुलिस स्टेशन ले जाकर सार्वजनिक जगह पर अगर कोई अश्लीलता पेश की, तो वह तो पुलिस ने की।  लेकिन पुलिस का यह हाल सारे देश में है जबकि हर प्रदेश में पुलिस वहां की राज्य सरकार के मातहत काम करती है, और हर प्रदेश की संस्कृति अलग है, इसके बावजूद अपने को मिले हुए अधिकारों के बेजा इस्तेमाल में कश्मीर से कन्याकुमारी तक खाकी वर्दी का हाल एक सा दिखता है। अधिक फिक्र की बात यह है कि देश के सबसे बड़े महानगर और कारोबार के सबसे बड़े अंतरराष्ट्रीय केन्द्र मुम्बई में अगर पुलिस का यह हाल है, तो वहां क्या तो बाहर से कारोबारी आकर रहना चाहेंगे, और क्या ही वहां पर्यटक रहना चाहेंगे। 
लेकिन इससे भी परे जो दूसरी बात अधिक फिक्र की है, वह यह कि जिस देश में सुप्रीम कोर्ट कई-कई फैसलों में बिना शादी के जोड़ों के साथ जीने के हक को, उनके कानूनी दर्जे को मान्यता दे चुका है, उसे पूरी तरह कानूनी ठहरा चुका है, यहां तक कि लिव इन रिलेशनशिप वाले जोड़ों के अगर बच्चे होते हैं, तो जायदाद में ऐसे बच्चों के हक के बारे में भी सुप्रीम कोर्ट फैसला दे चुका है, तब फिर किसी जोड़े के आपसी सहमति से घर पर रहने, या होटल में रूकने में पुलिस का क्या दखल बनता है? 
अब सोशल मीडिया की मेहरबानी से उदारवादियों से लेकर कट्टरपंथियों तक हर किसी की आवाज तुरंत गूंजने लगती है, और मुम्बई में पुलिस के इस बर्ताव के खिलाफ जिस तेजी से नौजवान पीढ़ी ने और उदार तबके ने सोशल मीडिया पर पुलिस की धज्जियां उड़ाईं, उसे देखते हुए मुम्बई के पुलिस कमिश्नर ने दो दिन के भीतर ही पुलिस की इस कार्रवाई की जांच शुरू करवा दी है। लेकिन इसके पहले होटल में ठहरे लोगों को जिस तरह से देर रात कमरों से निकालकर थाने ले जाया गया, वहां पर पुलिस ने लोगों को मारा-पीटा, महिलाओं को भी पीटा, उससे कुछ बुनियादी सवाल उठते हैं जिन पर पुलिस से परे बाकी सरकार से भी जवाब मांगना चाहिए। 
पुलिस के हाथ हिन्दुस्तान में कब तक ऐसे अधिकार जारी रखे जाएंगे, जो बनाए ही गए थे बेजा इस्तेमाल के लिए, और जो पुलिस को भ्रष्ट बनने में औजार और हथियार की तरह काम आते हैं। किसी गरीब, या बेघर को जब पुलिस गिरफ्तार करके कैद करना चाहती है, तो उसके हाथ एक ऐसा कानून है जिसमें उसे गिरफ्तारी के साथ बस इतना दर्ज करना होता है कि वह व्यक्ति चोरी की नीयत से, लुकी-छिपी हालत में पाया गया। अब सवाल यह उठता है कि किसी व्यक्ति की नीयत साबित करने के लिए लंबी-चौड़ी अदालती कार्रवाई के बाद किसी-किसी मामले में नारको टेस्ट की इजाजत मिलती है, और ऐसे टेस्ट के बिना, बिना किसी प्रयोगशाला के, सड़क से गुजरता सिपाही पल भर में यह तय कर लेता है कि किसी आदमी की नीयत क्या थी। इसके अलावा किसी दुकान के बाहर चबूतरे पर सोए हुए बेघर इंसान के बारे में यह तय करना भी उतना ही आसान है कि वह लुक-छिपकर वहां सोया था। 
दरअसल सुप्रीम कोर्ट के अनगिनत फैसलों के बाद भी सरकारों पर उनका कोई फर्क नहीं पड़ता। आज यहां लिखने का मकसद सिर्फ पुलिस के बारे में लिखना नहीं है, देश की सबसे बड़ी अदालतों के फैसलों पर सरकारों का क्या रूख रहता है, यह फिक्र की बात है। जो बातें सरकारों की अपनी जिम्मेदारी होनी चाहिए, वे बातें भी अगर अदालत के हुक्म की शक्ल में आने की नौबत आती है, और उसके बाद भी अनसुनी कर दी जाती है, तो ऐसी नौबत के खिलाफ भारतीय लोकतंत्र में बहुत अधिक इलाज रखे भी नहीं गए हैं। 
शहरी जिंदगी को देखें, तो सड़कों पर जुलूस से लेकर राजनीतिक दलों और संगठनों के करवाए गए बंद तक, बहुत से ऐसे मामले हैं जिनमें कई प्रदेशों के हाईकोर्ट और कई बार सुप्रीम कोर्ट ने फैसले दिए हैं, लेकिन उन पर राज्य सरकारें अमल नहीं करतीं। सड़कों पर या सार्वजनिक जगहों पर लाऊड स्पीकरों के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट के साफ-साफ फैसले के बावजूद राज्यों में उन पर कहीं अमल नहीं होता। 
सुप्रीम कोर्ट ने सरकारी और सार्वजनिक जगहों पर अवैध कब्जा करके धर्मस्थलों के अवैध निर्माण के बारे में बड़ा कड़ा फैसला दिया है, और जिला कलेक्टरों को इसके लिए सीधा जिम्मेदार ठहराया है। लेकिन यह फैसला आए शायद दस बरस हो रहे हैं, और हम अपने आसपास जितने जिलों को देख पाते हैं, उनमें से किसी कलेक्टर के चेहरे पर ऐसे अवैध निर्माण से शिकन भी नहीं पड़ती, और छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर में हर सड़क पर ऐसे अवैध निर्माण लगातार हुए हैं, उनकी तस्वीरें छपती रही हैं, और अफसरों ने कोई कार्रवाई नहीं की। बाकी देश का भी ऐसा ही हाल दिखता है। धर्म के आतंक के तले चलती राजनीति कभी जनहित को कट्टरता के ऊपर नहीं रख पाएगी, लेकिन सुप्रीम कोर्ट के आदेश की मदद से भी अफसरों ने भी यह हौसला शायद ही कहीं दिखाया हो। 
जब सरकारों को चलाने वाले लोग, नेता और अफसर दोनों ही अपने अधिकारों का अधिकतम इस्तेमाल, और अपनी जिम्मेदारी की अधिकतम अनदेखी करके आसानी से रह सकते हैं, तो अदालतें सड़कों पर झाड़ू लगाने तो निकल नहीं सकतीं। भारत के संविधान में संसद, अदालत, और सरकार के बीच रिश्तों का एक संतुलन बनाया गया है, अदालतें सरकार नहीं चला सकतीं, संसद रोज के रोज अदालतों को लेकर कानून नहीं बना सकतीं, और सरकार संसद नहीं चला सकतीं। लोकतंत्र के इन तीनों पायों को लोकतंत्र की तिपाई का संतुलन बनाकर उसे खड़ा रखना चाहिए। लेकिन आज ये पाये अगर अपने आपको बाकी दोनों पायों से ऊपर समझें, तो ऐसा एक पाया लोकतंत्र को नहीं ढो सकता। 
राज्य सरकारों की नीयत में, और उनके बर्ताव में अगर न लोकतंत्र की बुनियादी सोच के लिए सम्मान है, और न ही संविधान में आम लोगों को दिए गए हक के लिए कोई इज्जत है, और न ही सुप्रीम कोर्ट के दिए हुए आदेश-निर्देश की कोई फिक्र है, तो इस देश में आज भी आम जनता का हाल वैसा ही है जैसा कि अंग्रेजों के वक्त था। आज भी एक खास और एक आम के बीच अगर कोई लड़ाई होती है, तो उस आम के कुचले जाने से कम और कुछ नहीं हो सकता। यह बात बार-बार दिखती है जब उत्तर भारत के अधिकतर राज्यों में, और मध्यप्रदेश में कुछ अधिक ही, दलितों को बलात्कार और हत्या के लायक ही मान लिया जाता है, और सरकारें आजादी की पौन सदी तक भी कुछ कर पाती नहीं दिखती हैं। जगह-जगह दलितों पर जुल्म सामने आते हैं, खबरों में छपता है कि दबंगों ने क्या-क्या किया, लेकिन ऐसे दबंगों को अदालती इंसाफ तक पहुंचाने का काम भी सरकारें नहीं कर पाती हैं, और शायद करना भी नहीं चाहती हैं। 
अभी चार दिन बाद आजादी की सालगिरह आने को है, चारों तरफ फिर एक ऐसे इतिहास की तारीफ में कसीदे पढ़े जाएंगे, जिस इतिहास का आज के वर्तमान में कोई लेना-देना नहीं रह गया है। छत्तीसगढ़ में जगह-जगह यह सालगिरह मनाई जाएगी, बिना यह देखे कि इस राज्य के मूल निवासी जो आदिवासी हैं, वे आज किस तरह के पुलिस जुल्म और किस तरह के पुलिस राज में जी रहे हैं। आए दिन बस्तर से खबर आती है कि किस तरह फर्जी मुठभेड़ में बेकसूरों को मार डाला जाता है, लोगों को नक्सली बताने की फर्जी कहानियां गढ़ी जाती हैं, और किस तरह पुलिस असली बलात्कार करती है, लेकिन इन सब को देखे बिना, सुप्रीम कोर्ट में खड़ी हुई पुलिस और सरकार भी बेपरवाह हैं कि सरकार के खिलाफ लडऩे की आम लोगों की ताकत कहां तक काम आएगी? 
यह पूरा देश एक पुलिस राज है, और पुलिस के बारे में एक हाईकोर्ट के एक जज का लिखा हुआ ऐतिहासिक फैसला किसी को नहीं भूलता कि भारत में पुलिस एक वर्दीधारी गुंडा है। इस देश के लोग तभी तक हिफाजत से हैं, जब तक कि पुलिस को उनको कुचलने की कोई वजह नहीं है। और ऐसी पुलिस जब बाकी अफसरों और बाकी नेताओं के मातहत काम करती है, तो फिर सत्ता और जनता ये दो तबके एक खाई के दो तरफ हैं, एक तबका वर्दी तले का बूट है, और दूसरा तबका कुचले जाने की नौबत में जमीन पर बिछा हुआ है। इसी खाई के एक तरफ आजादी का झंडा सरकारी इमारतों पर, सरकारी खर्च से फहराया जाएगा, और खाई के दूसरी तरफ की जनता से यह उम्मीद की जाएगी कि वह इस झंडे के सामने राष्ट्रगान में खड़ी रहे।

सबको मालूम है जुमलों की हकीकत लेकिन...

10 अगस्त 2015
संपादकीय

प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने कुछ दिन पहले बिहार की एक आमसभा में वहां के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के डीएनए पर वार किया था कि उनका डीएनए कुछ गड़बड़ है। इसके जवाब में नीतीश ने आज यह हमला बोला है कि बिहार से पचास लाख लोग अपना डीएनए सैम्पल नरेन्द्र मोदी को भेजेंगे। उन्होंने अभी चार दिन पहले ही एक खुली चि_ी लिखकर प्रधानमंत्री से कहा था कि वे डीएनए वाला अपना बयान वापिस लें क्योंकि भारत के प्रधानमंत्री का किसी राज्य के लोगों के डीएनए पर हमला शोभा नहीं देता। लेकिन मोदी अभी कल बिहार की अपनी सभा में फिर नीतीश पर तगड़ा हमला करके आए हैं, और यह सभा राज्य विधानसभा के चुनाव घोषित होने के पहले मोदी की एक बड़ी सभा थी, जिसमें बड़ा हमला होना तय भी था। लेकिन आज हम यहां पर डीएनए को लेकर बात करना चाहते हैं, कि मोदी ने जो कहा और नीतीश ने उसे जो मोड़ दिया, उसके बीच भारत की राजनीति किधर जा रही है। 
दरअसल कुछ महीने पहले जब भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह ने यह बयान दिया था कि मोदी के काले धन को विदेशों से भारत वापिस लाने के नारे का अलग से कोई महत्व नहीं था, और वह एक जुमला था। अमित शाह की कही बात सही भी थी क्योंकि मोदी ने वह नारा चुनाव के वक्त लगाया था, यह एक अलग बात है कि सैकड़ों करोड़ के काले धन की अफरा-तफरी के आरोपी ललित मोदी को भारत लाने के बजाय मोदी की मंत्री उसे दर्जन भर देशों में घूमने में मदद करते रंगे हाथों पकड़ाई हैं। लेकिन मोदी की काले धन की बात भी जुमला थी, और मोदी की नीतीश के डीएनए की बात भी जुमला थी। और ऐसे जुमले मौत के सौदागर से लेकर गूंगा-गुड्डा तक रोज इस्तेमाल होते हैं। भारत का इलेक्ट्रॉनिक मीडिया जिसके सामने स्क्रीन पर शब्दों की सीमा बड़ी तंग होती है, और दर्शक का ध्यान कुछ पलों के लिए ही जो खींच पाता है, वह जुमलों की तलाश में रहता है। इलेक्ट्रॉनिक मीडिया की सीमा यही है कि उसे जुमलों पर अधिक से अधिक निर्भर रहना पड़ता है। इसलिए टीवी से नफा पाने के लिए नेता रात-दिन जुमले गढ़ते हैं, और उन्हें इसी भरोसे के साथ उछालते हैं कि इलेक्ट्रॉनिक मीडिया उनको कूदकर लपक लेगा। 
लेकिन नेताओं और पार्टियों की जुमलेबाजी से परे आज सवाल यह है कि क्या भारत का लोकतंत्र केन्द्र और राज्य के असल मुद्दों पर निर्भर ही नहीं रह गया है? क्या सिर्फ जुमलों और नारों से देश की जनता अगली सरकारें तय करेंगी? नारों को देखें तो उनमें गिने-चुने शब्दों की तुकबंदी से लोगों को खींचने की कोशिश होती है। पाकिस्तान के एक चुनाव में बेनजीर भुट्टो की तरफ से सामने खड़े नवाज शरीफ के खिलाफ एक नारा लगाकर नवाज शरीफ के डीएनए को गाली बकी गई थी, और बेनजीर की पार्टी ने ऐसे बैनर बनाकर टांगे थे जिन पर लिखा था- न मां शरीफ, न बाप शरीफ, नवाज शरीफ, नवाज शरीफ। 
आज हिन्दुस्तान ऐसे ही डीएनए के जुमले में फंस गया है। अखबारों में देश की अर्थव्यवस्था, समाज की हकीकत, इनको गंभीरता से पढऩे वाले पाठक कम हैं, और वे चुनावी जीत को तय करने के लिए काफी नहीं हैं। इसलिए जिस तरह भेड़ों के रेवड़ों को मनचाहे तरफ ले जाने के लिए मुंह से जैसी निरर्थक आवाजें निकाली जाती हैं, वैसी ही आवाजें आज हिन्दुस्तान के नेता चुनावी सभा में जुमलों की शक्ल में निकाल रहे हैं। किसी के डीएनए से उसका अच्छा या बुरा होना तय नहीं होता। गांधी के मां-बाप का समाजसेवा का कोई इतिहास नहीं था, और गोडसे के मां-बाप हत्यारे नहीं थे। डीएनए की सोच धार्मिक कट्टरता, और रक्त की शुद्धि जैसी अवैज्ञानिक सोच है, और वह जुमले की शक्ल में तो ठीक है, उसका अक्ल से कुछ लेना-देना नहीं है। लेकिन आने वाले दिन देश की राजनीति में ऐसी ही गंदगी के रहने वाले हैं, क्योंकि बिहार एक ऐसा राज्य है जहां कल तक के एनडीए गठबंधन के दो भागीदारों के बीच आज सांप-नेवले जैसी लड़ाई है। और दुनिया का इतिहास इस बात का गवाह है कि दो भाईयों के बीच जब दीवारें उठती हैं, तो जरूरत से बहुत अधिक ऊंची उठती हैं। यही हाल आज भाजपा और नीतीश के बीच है। 
फिलहाल भारत के लोगों को यह समझने की जरूरत है कि क्या जुमलेबाजी से परे वे जिंदगी के असल मुद्दों को पढऩा-सुनना और समझना चाहेंगे, या फिर वे लोकतंत्र को महज चुनावी सभा समझकर तुकबंदी पर ताली बजाते अगली सदी में जाना चाहेंगे। 

दो हत्यारे बने मिसाल एक अच्छी बात की

संपादकीय
9 अगस्त 2015

भारत के इंदिरा गांधी खुले विश्वविद्यालय, इग्नू, के दीक्षांत समारोह में दो लोगों को डिग्री मिलने की खबर थोड़ी सी अटपटी रही। वाराणसी जेल में बंद एक कैदी को एक पाठ्यक्रम में गोल्ड मेडल मिला, उसने देश में इस कोर्स में तो पहला नंबर पाया ही, उसने और भी कई कोर्स जेल में रहते हुए किए। कत्ल के जुर्म में उम्रकैद काट रहा यह कैदी आज दूसरों के लिए एक मिसाल कहा जा रहा है। दूसरी डिग्री पाने के लिए आज पास होने वाला खुद मौजूद नहीं था। मुंबई धमाकों में इसी पखवाड़े फांसी पाने वाले याकूब मेमन ने भी जेल में रहते हुए कई इम्तिहान दिए थे, और उसे भी आज इग्नू की तरफ से डिग्री जारी हुई है। 
इन दो बातों को देखें, तो लगता है कि हालात चाहे कितने ही खिलाफ क्यों न हो, लोगों का अगर हौसला हो, तो वे जेल में रहकर भी कामयाबी पा सकते हैं, और अगर हौसला न हो तो खाते-पीते घरों के, सहूलियत का मजा लेते हुए नौजवान भी न पढ़ते हैं, न पास होते हैं, और न सीखते हैं। जिंदगी में आगे बढऩे के लिए, कुछ करने के लिए उनमें हौसला नहीं रहता। आज भारत में नब्बे फीसदी कॉलेज छात्र-छात्राओं को बहुत ही मामूली और सतही दर्जे की पढ़ाई ही नसीब होती है। देश के गिने-चुने अच्छे कॉलेजों को छोड़ दें, तो बाकी का ज्ञान और उत्कृष्टता से अधिक लेना-देना नहीं रहता। नतीजा यह होता है कि तीन से लेकर छह बरस तक कॉलेज की पढ़ाई के नाम पर नौजवानी बर्बाद होती है, लड़के-लड़कियों का वक्त जाता है, मां-बाप के पैसे जाते हैं, और देश की संभावनाएं जाती हैं। 
आज भारत में उच्च शिक्षा को लेकर नौजवानों के बीच सबसे पहले तो जानकारी और जागरूकता, दोनों का टोटा पड़ा हुआ है। स्कूल से निकलने के बाद बच्चों को आगे की पसंद की संभावनाएं ही ठीक से मालूम नहीं रहतीं। ऐसे में वो या तो खरीदी हुई, या बची-खुची मिल गई, किसी भी तरह की सीट पर पहुंच जाते हैं, और उनको यह भी एहसास आमतौर पर नहीं रहता कि इस पढ़ाई के बाद उनकी संभावनाएं क्या-क्या हैं। नतीजा यह होता है कि किताबों से परे वे जिंदगी की कोई बातें सीख नहीं पाते, और किताबों को पढऩे का वक्त भी भारत के अधिकांश हिस्से में झंडे से झंडे तक का रहता है, मतलब 15 अगस्त के बाद पढ़ाई शुरू होती है, और 26 जनवरी से इम्तिहान की तैयारी की छुट्टियां शुरू हो जाती हैं। यह सिलसिला देश की छात्र-छात्राओं के बीच अधिकतर जगह पर दिखता है, और पीढ़ी-दर-पीढ़ी यही बर्बादी जारी है। 
दरअसल देश की नौजवान पीढ़ी के सामने बुरी मिसालें इतनी अधिक हैं कि उनको यह लगता है कि पढऩे के बाद बिना रिश्वत दिए तो कोई नौकरी मिलनी नहीं है, किसी राजनीतिक दल में जाने के लिए किसी काबिलीयत की जरूरत नहीं है, स्वरोजगार सिखाया नहीं गया है, और मां-बाप की छाती पर बैठकर मूंग दलने की सुविधा बहुतों को हासिल रहती है। भारत के अधिकतर नौजवानों का यह हाल दुनिया के कामयाब और समझदार देशों के मुकाबले इतनी खराब हालत में है, कि आगे की दुनिया में हिन्दुस्तान के अधिकतर लोग किसी मुकाबले में टिकने वाले नहीं हैं। ऐसे ही हालात में हम जेल की इन दो मिसालों को सामने रख रहे हैं, कि जिनके सामने उम्रकैद या फांसी का फंदा तय था, उन लोगों ने भी मेहनत करके किस तरह पढ़ाई-लिखाई की। जरूरी नहीं है कि मिसालें अच्छे लोगों से ही मिलें, बुरे लोगों से भी कई बार अच्छी मिसालें मिल सकती हैं, और कई बार अच्छे लगने वाले लोग सबसे बुरी मिसाल साबित होते हैं। 
भारत की नौजवान पीढ़ी को यह समझना चाहिए कि कॉलेज की कागजी सी लगती, महत्वहीन लगती पढ़ाई के साथ-साथ वे और कितना कुछ कर सकते हैं, जिंदगी में कितना कुछ सीख सकते हैं। स्कूल से लेकर कॉलेज की पढ़ाई तक औसत हिन्दुस्तानी के पन्द्रह-बीस बरस खर्च होते ही हैं, इतने लंबे अरसे को लापरवाही से गुजारने का मतलब जिंदगी के मायने रखने वाले हिस्से के आधे हिस्से को बर्बाद कर देना है, और जिंदगी का बाकी का हिस्सा इन्हीं बरसों पर टिका होता है। इसलिए जेल में रहकर भी जो मेहनत हो सकती है, क्या वह मेहनत लोग बाहर रहकर नहीं कर सकते?

धर्म-आध्यात्म के नाम पर पाखंड का घड़ा फूट रहा...

संपादकीय
8 अगस्त 2015

पुराने जमाने से समझदार बुजुर्ग यह कहते आए हैं कि अति हर बात की बुरी होती है। इन दिनों धर्म को लेकर आए दिन कुछ न कुछ ऐसा साबित हो रहा है। टीवी की जुर्म की खबरों में, बलात्कार की कहानियों में, आसाराम का दिखना अब रोजाना के बजाय हफ्तावार सा हो गया है, लेकिन कोई न कोई ऐसा बाबा या बीबी या बेबी धर्म से जुड़े हुए सामने आते ही रहते हैं, और कभी कोई संत, कभी कोई महंत, और कभी कोई पादरी सेक्स की खबरों से समाचार चैनलों का पेट भरते रहते हैं। धर्म और आध्यात्म के नाम पर, या उसी के तहत, जितने तरह के सेक्स-अपराध होते हैं, जितने तरह की अनैतिक बातें होती हैं, उतनी दुनिया के और किसी धंधे में नहीं होतीं। और इसमें कोई नई बात भी नहीं है। 
आज जो राधे मां खबरों में है, उसके वीडियो देखें, तो यह वजह साफ लगती है कि भक्तों में इतनी बड़ी भीड़ मर्दों की क्यों लगती है। जैसा लिपटना, और जैसे कपड़ों में नाचना यह औरत कर रही थी, उससे पता नहीं कैसे उन धर्मालुओं की भावनाओं को कोई ठेस नहीं पहुंची जो कि बात-बात पर धार्मिक भावनाएं आहत होने की पुलिस रपट लिखाते हैं। चारों तरफ ऐसी खबरें हैं कि यह राधे मां रात-दिन देवी बनी, और सजी-धजी रहती थी, और भक्तों की भीड़ में जब चाहे तब कूदकर किसी मर्द की भक्त की गोद में भी चढ़ जाती थी। कभी दक्षिण भारत के स्वामी नित्यानंद के वीडियो, तो कभी आसाराम और उसके बेटे नारायण सांईं की बलात्कार की कहानियां, तो कभी पंजाब-हरियाणा के कुछ और स्वघोषित संतों की रंगीन कहानियां, धर्म जिंदगी में जरूरत से अधिक दखल पैदा कर लेने के बाद अब अपना नुकसान खुद करते चल रहा है, और यही शायद प्रकृति का नियम भी है। 
उधर पश्चिम में देखें तो रोमन कैथोलिक धर्म का मुख्यालय वेटिकन दशकों से इस जुर्म से घिरा हुआ है कि चर्च के पादरी और बाकी चोगेदार लोग बच्चों का देह शोषण करते हैं, और पोप से लेकर वेटिकन के बाकी साम्राज्य तक को हांकने वाले तमाम लोग इस जुर्म को दबाते चलते हैं। यही हाल हरे कृष्ण आंदोलन ईस्कॉन का रहा, जिसने अपनी स्कूलों में बच्चों के देह शोषण के हर्जाने के रूप में अमरीकी अदालतों में दसियों करोड़ का भुगतान किया। और आज इस्लाम के नाम पर इराक और सीरिया, और अफ्रीकी देशों में मुस्लिम आतंकी जिस दर्जे के सेक्स-अपराध कर रहे हैं, उसे सुनकर तो मुजरिमों के भी दिल दहल जाते हैं, और यह सब इस उम्मीद और वायदे के साथ किया जा रहा है कि इसके बाद जब ये जेहादी जन्नत पहुंचेंगे, तो वहां 72 कुंवारी हूरें उनके लिए तैयार रहेंगी। 
धर्म का नाम लेकर जितनी महानता और दरियादिली की बातें की जाएं, धर्म का जिंदगी पर अच्छा असर तो पता नहीं घर बैठे रहता है, लेकिन धर्म से सीखी गई हिंसा, धर्म से सीखे गए पाखंड, धर्म के नाम पर धोखाधड़ी, और धर्म के नाम पर सेक्स-अपराध का लंबा इतिहास है। हिन्दू धर्म के जिन लोगों को अपने धर्म में कोई खामी नहीं दिखती, उन लोगों को दक्षिण भारत के मंदिरों में देव-दासियों के नाम पर देह का धंधा करने के लिए मजबूर की गई औरतों की परंपरा और उनकी कहानियां पढऩी चाहिए। मंदिरों के अहातों में ही जिस तरह औरतों को बलात्कार झेलने के लिए देवदासी बनाकर रखा जाता था, उसे धर्म की पूरी मान्यता भी थी। 
अब एक के बाद एक, धर्म और आध्यात्म के पाखंड का भांडाफोड़ होने से लोगों के मन में धर्म के लिए, आध्यात्म के लिए, गुरुओं और पादरियों के लिए, साध्वियों और संत-महंतों के लिए जिस तरह की हिकारत बढ़ती चल रही है, वह समाज के भले की बात है। भारत में तो आज धर्म का नाम लेकर राजनीति में आए, और उसके बाद रात-दिन हिंसा और साम्प्रदायिकता की बात करने वाले लोग केन्द्र की मोदी सरकार को ही डुबाने में लगे हुए हैं। भारत के आम लोग धर्म को आस्था के रूप में लेते हैं, लेकिन धर्म को लेकर, आध्यात्म को लेकर सेक्स-अपराध लगातार सामने आने से अब लोगों का धर्म-आध्यात्म से मोहभंग होने लगा है। पुराने जमाने से यह बात कही जाती है कि पाप का घड़ा पूरा भरने के बाद फूटता है, आज यह घड़ा फूट रहा है, और ऐसे पाखंड के बिखरने के बाद हो सकता है कि अगली पीढ़ी की एक वैज्ञानिक सोच विकसित हो सके, जिससे कि लोगों का नजरिया लोकतांत्रिक और न्यायप्रिय भी हो सकेगा, जो कि धर्मतले मुमकिन नहीं है।