समाजवादी पार्टी की तेजरफ्तार समझदारी, वरना अकाली तो हत्यारों का सम्मान करते आए हैं

संपादकीय
01 अगस्त 2015
समाजवादी पार्टी के महाराष्ट्र उपाध्यक्ष मोहम्मद फारूक ने याकूब मेमन को फांसी दिए जाने के बाद उसकी पत्नी राहीन को सांसद बनाने के लिए कल पार्टी अध्यक्ष मुलायम सिंह यादव को एक चि_ी लिखी, हालांकि उन्होंने यह चि_ी बाद में वापिस ले ली, और दूसरी तरफ समाजवादी पार्टी ने रफ्तार से समझ दिखाते हुए इस नेता को पार्टी के पद से हटा दिया है। लेकिन कुछ देर के लिए हवा में यह बात तैरी कि किस तरह मुस्लिम समाज का एक हिस्सा मुंबई धमाकों के लिए मौत की सजा पा चुके मुजरिम को शहादत का दर्जा देने के लिए उसकी पत्नी को देश की संसद में भेजना चाहता है। इसके पहले कि देश में भावनाएं समाजवादी पार्टी के खिलाफ भड़कें, पार्टी ने एक सही फैसला लिया। लेकिन इतनी देर में जिन लोगों ने इस पार्टी और इस नेता को, और मुस्लिम समाज को कोसना शुरू किया, उनको कुछ बातें याद दिलाने की जरूरत है। 
1989 की बात है, आम चुनावों के नतीजे आए, और पंजाब से जो लोग जीतकर संसद में पहुंचे, उनमें अकाली दल की टिकट पाकर जीतने वाले दो लोग थे, इंदिरा गांधी के हत्यारे बेअंत सिंह की पत्नी, और बेअंत के पिता। इन दोनों को भाजपा-एनडीए की पुरानी साथी, अकाली दल ने टिकट दी थी, और दोनों चुनाव जीतकर आए। कोई अगर यह पूछे कि इंदिरा गांधी की हत्या के पहले इनका ऐसा कौन सा योगदान था कि इन्हें देश की संसद में लाने के लिए अकालियों ने टिकट दी, तो शायद इसका कोई तर्कसंगत जवाब नहीं होगा। लेकिन कांग्रेस के खिलाफ जनभावनाओं को भड़काने के लिए एक हत्यारे के घर के दो लोगों को टिकट देना, और उन्हें जिताकर लाना, भारतीय लोकतंत्र के लचीलेपन की सीमा की एक मिसाल रही। यह लोकतंत्र बहुत कुछ बर्दाश्त करता है, हत्यारों को शहादत का दर्जा देना भी, और उसी आधार पर लोगों को संसद पहुंचाना भी। 
समाजवादी पार्टी ने एक वक्त बहुत सी हत्याओं की आरोपी रही, दस्यु सुंदरी कहलाने वाली फूलन देवी को टिकट देकर संसद पहुंचाया था। और देश में ऐसी कई पार्टियां है जो गंभीर अपराधों में जुड़े हुए लोगों को धर्म या जाति, या किसी और भावनात्मक आधार पर वोट बटोरने के लिए टिकट देती हैं, चुनाव लड़वाती हैं, या फिर सीधे ही राज्यसभा में भेज देती हैं। यह संसदीय लोकतंत्र का एक बड़ा बुरा पतन है, कि इसमें पार्टियों और नेताओं के ऐसे जुर्म के खिलाफ कोई रोक नहीं है। पंजाब के जिस चुनाव का जिक्र हम कर रहे हैं उसी चुनाव में इंदिरा हत्या की साजिश में जेल में बंद दो और लोग भी कैदी रहते हुए चुनाव में जीतकर आ गए थे। इसका एक मतलब यह भी है कि वोटरों को भी जुर्म से रिश्तेदारी से कोई खास परहेज नहीं है। 
आज देश में जिस तरह एक तबका गांधी के हत्यारे नाथूराम गोडसे को महिमामंडित करने में लगा हुआ है, कोई हैरानी नहीं है कि कोई एक चुनिंदा संसदीय सीट छांटकर उसके भी किसी रिश्तेदार को ऐसे ही टिकट दे दी जाए, और हत्यारे का लहू संसद में ले जाकर बिठा दिया जाए। भारत जैसा संसदीय लोकतंत्र, कानून कम, और परंपराओं पर ज्यादा चलने वाला रहता है। अगर पार्टियां मनमानी पर उतरें, तो देश में अपने विधायकों और लोकसभा सदस्यों की संख्या के आधार पर बड़े-बड़े कुख्यात लोगों को राज्यसभा में ले जाकर बिठा सकती हैं। और ऐसी चर्चा रहती है कि कुछ पार्टियां राज्यसभा की अपनी सीटों को बेचती हैं, और खराब लोगों को इन सीटों पर लाना तो आम बात है। 
भारतीय राजनीति में अब अपराधों से रिश्ता किसी भी ओहदे के लिए अड़ंगा नहीं रह गया है। लोग हर किस्म के जुर्म के साथ, परले दर्जे की बेशर्मी के साथ किसी भी कुर्सी पर काबिज हो जाते हैं, और अदालत से बरी हो जाने तक का लिहाज भी अब नहीं रह गया है। समाजवादी पार्टी एक आतंकी की बीवी को संसद ले जा सकती थी, लेकिन उसने अकाली दल जैसा काम नहीं किया। आज जो लोग एनडीए के प्रशंसक हैं, उन्हें 1989 की ये बातें बड़ी सुविधाजनक तरीके से भूल चुकी होंगी। 

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