दो हत्यारे बने मिसाल एक अच्छी बात की

संपादकीय
9 अगस्त 2015

भारत के इंदिरा गांधी खुले विश्वविद्यालय, इग्नू, के दीक्षांत समारोह में दो लोगों को डिग्री मिलने की खबर थोड़ी सी अटपटी रही। वाराणसी जेल में बंद एक कैदी को एक पाठ्यक्रम में गोल्ड मेडल मिला, उसने देश में इस कोर्स में तो पहला नंबर पाया ही, उसने और भी कई कोर्स जेल में रहते हुए किए। कत्ल के जुर्म में उम्रकैद काट रहा यह कैदी आज दूसरों के लिए एक मिसाल कहा जा रहा है। दूसरी डिग्री पाने के लिए आज पास होने वाला खुद मौजूद नहीं था। मुंबई धमाकों में इसी पखवाड़े फांसी पाने वाले याकूब मेमन ने भी जेल में रहते हुए कई इम्तिहान दिए थे, और उसे भी आज इग्नू की तरफ से डिग्री जारी हुई है। 
इन दो बातों को देखें, तो लगता है कि हालात चाहे कितने ही खिलाफ क्यों न हो, लोगों का अगर हौसला हो, तो वे जेल में रहकर भी कामयाबी पा सकते हैं, और अगर हौसला न हो तो खाते-पीते घरों के, सहूलियत का मजा लेते हुए नौजवान भी न पढ़ते हैं, न पास होते हैं, और न सीखते हैं। जिंदगी में आगे बढऩे के लिए, कुछ करने के लिए उनमें हौसला नहीं रहता। आज भारत में नब्बे फीसदी कॉलेज छात्र-छात्राओं को बहुत ही मामूली और सतही दर्जे की पढ़ाई ही नसीब होती है। देश के गिने-चुने अच्छे कॉलेजों को छोड़ दें, तो बाकी का ज्ञान और उत्कृष्टता से अधिक लेना-देना नहीं रहता। नतीजा यह होता है कि तीन से लेकर छह बरस तक कॉलेज की पढ़ाई के नाम पर नौजवानी बर्बाद होती है, लड़के-लड़कियों का वक्त जाता है, मां-बाप के पैसे जाते हैं, और देश की संभावनाएं जाती हैं। 
आज भारत में उच्च शिक्षा को लेकर नौजवानों के बीच सबसे पहले तो जानकारी और जागरूकता, दोनों का टोटा पड़ा हुआ है। स्कूल से निकलने के बाद बच्चों को आगे की पसंद की संभावनाएं ही ठीक से मालूम नहीं रहतीं। ऐसे में वो या तो खरीदी हुई, या बची-खुची मिल गई, किसी भी तरह की सीट पर पहुंच जाते हैं, और उनको यह भी एहसास आमतौर पर नहीं रहता कि इस पढ़ाई के बाद उनकी संभावनाएं क्या-क्या हैं। नतीजा यह होता है कि किताबों से परे वे जिंदगी की कोई बातें सीख नहीं पाते, और किताबों को पढऩे का वक्त भी भारत के अधिकांश हिस्से में झंडे से झंडे तक का रहता है, मतलब 15 अगस्त के बाद पढ़ाई शुरू होती है, और 26 जनवरी से इम्तिहान की तैयारी की छुट्टियां शुरू हो जाती हैं। यह सिलसिला देश की छात्र-छात्राओं के बीच अधिकतर जगह पर दिखता है, और पीढ़ी-दर-पीढ़ी यही बर्बादी जारी है। 
दरअसल देश की नौजवान पीढ़ी के सामने बुरी मिसालें इतनी अधिक हैं कि उनको यह लगता है कि पढऩे के बाद बिना रिश्वत दिए तो कोई नौकरी मिलनी नहीं है, किसी राजनीतिक दल में जाने के लिए किसी काबिलीयत की जरूरत नहीं है, स्वरोजगार सिखाया नहीं गया है, और मां-बाप की छाती पर बैठकर मूंग दलने की सुविधा बहुतों को हासिल रहती है। भारत के अधिकतर नौजवानों का यह हाल दुनिया के कामयाब और समझदार देशों के मुकाबले इतनी खराब हालत में है, कि आगे की दुनिया में हिन्दुस्तान के अधिकतर लोग किसी मुकाबले में टिकने वाले नहीं हैं। ऐसे ही हालात में हम जेल की इन दो मिसालों को सामने रख रहे हैं, कि जिनके सामने उम्रकैद या फांसी का फंदा तय था, उन लोगों ने भी मेहनत करके किस तरह पढ़ाई-लिखाई की। जरूरी नहीं है कि मिसालें अच्छे लोगों से ही मिलें, बुरे लोगों से भी कई बार अच्छी मिसालें मिल सकती हैं, और कई बार अच्छे लगने वाले लोग सबसे बुरी मिसाल साबित होते हैं। 
भारत की नौजवान पीढ़ी को यह समझना चाहिए कि कॉलेज की कागजी सी लगती, महत्वहीन लगती पढ़ाई के साथ-साथ वे और कितना कुछ कर सकते हैं, जिंदगी में कितना कुछ सीख सकते हैं। स्कूल से लेकर कॉलेज की पढ़ाई तक औसत हिन्दुस्तानी के पन्द्रह-बीस बरस खर्च होते ही हैं, इतने लंबे अरसे को लापरवाही से गुजारने का मतलब जिंदगी के मायने रखने वाले हिस्से के आधे हिस्से को बर्बाद कर देना है, और जिंदगी का बाकी का हिस्सा इन्हीं बरसों पर टिका होता है। इसलिए जेल में रहकर भी जो मेहनत हो सकती है, क्या वह मेहनत लोग बाहर रहकर नहीं कर सकते?

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