बंदर की दुम तो कायम रहेगी, इंसान ही उस्तरे से अपनी नाक..

17 अगस्त 2015
कुछ लोग अपने दिन की शुरुआत कुछ महान लोगों की कही हुई बातों से बनी हुई सूक्तियों से करते हैं, और यह मानते हैं कि उनके दिन भर पर उसका असर होगा। और यह बात काफी हद तक सही भी है कि लोग अपने आपको जिस तरह की बातों से घेरकर रखते हैं, उनका असर होता है। बहुत से लोग यह लिखते हैं कि नकारात्मक लोगों से दूर रहना इसलिए ठीक होता है कि किसी संक्रामक रोग की तरह निराश और नकारात्मक लोग आसपास के लोगों का हौसला भी पस्त कर देते हैं। इसी तरह उत्साह से भरे और सकारात्मक लोग किसी डूबते के लिए भी तिनके से अधिक बड़ा सहारा रहते हैं, और महज अपनी बात से वे लोगों को ताकत दे देते हैं। 
लेकिन बहुत सी सूक्तियां कहावतों और मुहावरों की तरह कुछ खास संदर्भों में ही लागू होती हैं, और कुछ विपरीत संदर्भों में उनका मतलब ठीक उल्टा और नुकसानदेह भी हो सकता है। इंसान की समझ की बातें उसके दायरे से कटी हुई नहीं हो सकतीं, और दायरे के अलावा किसी खास जमाने से भी उसका लेना-देना होता है। अठारहवीं सदी में जो बातें जायज हो सकती थीं, वे इक्कीसवीं सदी में जुर्म हो सकती हैं। और अठारहवीं सदी में जो बातें जुर्म समझी जाती थीं, वैसी सैकड़ों बातें आज जायज हो चुकी हैं। इसलिए लोगों की कही बातों को उनके संदर्भों से जोड़कर, और जहां उसे इस्तेमाल करना है, उस संदर्भ से भी जोड़कर देखना चाहिए। इसके बिना ज्ञान और समझ की बातें भी नुकसानदेह हो सकती हैं। 
न सिर्फ दिन की शुरुआत, बल्कि पढऩे-लिखने के, बातचीत के अधिकतर समय का इस्तेमाल एक सकारात्मक माहौल को बनाने के लिए किया जा सकता है। और जब कभी ऐसा इस्तेमाल नहीं होता है, तो लोगों के बीच होने वाली गैरजरूरी, घटिया, अन्यायपूर्ण, और महज सनसनीखेज बातें लोगों का वक्त खासा खराब भी करती हैं। अब जैसे आज के मोबाइल फोन के एक खासे इस्तेमाल होने वाले एप्लीकेशन को देखें, तो वॉट्सऐप से लोग टाईप की हुई बातें, तस्वीरें, संगीत और फिल्में एक-दूसरे को लगभग मुफ्त में ही भेज देते हैं। अब सवाल यह उठता है कि आपके पास अगर रोज ऐसे दर्जनों संदेश आते हैं, तो उनको सिर्फ खोलकर देखने में, या सुनने में इतना वक्त लग जाता है कि उनका असर आप पर चाहे-अनचाहे होता ही है। फिर ऐसे संदेशों का जवाब देने में लोग लग जाते हैं, उनको आगे बढ़ाने में लग जाते हैं, और घूरा परोसने से, दूसरे लोग भी अपना पकाया घूरा, या कहीं और से आया हुआ घूरा आपको परोसते हैं। 
आप अगर सावधान नहीं हैं, तो आज की टेक्नालॉजी, और हर हाथ या जेब में रखा मोबाइल फोन आपकी जिंदगी को रोज कुछ और गहरे गड्ढे की तरफ ले जा सकता है। इसी तरह अगर आप अपना दायरा ठीक रखते हैं, तो आपके पास सकारात्मक और अच्छी तस्वीरें, अच्छे पोस्टर आ सकते हैं, और आपका पूरा दिन एक बेहतर दिन हो सकता है। लेकिन जैसा कि समझदार लोग हमेशा से कहते आए हैं कि अपनी संगत का ख्याल रखना चाहिए, तो आज यह बात और अधिक जरूरी हो गई है, क्योंकि संगत सिर्फ शाम को साथ पीने-खाने, या जुआ खेलने जैसे कामों के लिए नहीं होती, बहुत सी संगत अब फोन पर या इंटरनेट पर हो जाती है, सोशल साईटों पर हो जाती है, और वहां भी आपके आसपास वह घूरा इक_ा कर सकती है, या आपको किसी जुर्म की तरफ खींच सकती है। 
बहुत से लोगों को ऐसी संगत, संगत नहीं लगती है, जबकि यह मोबाइल-पूर्व के जमाने की आम संगत के मुकाबले अधिक गहरी, मजबूत, और खतरनाक संगत है। आज लोग अपनी अधिक बातों को खुद होकर सोशल वेबसाईटों पर उजागर करते हैं, बड़े दुस्साहस के साथ अनजाने लोगों से भी दोस्ती करते हैं, और अपनी निजी बातों को पूरी दुनिया के लिए खोलकर रख देते हैं। एक वक्त था जब आपकी कही बात बिना किसी सुबूत आगे बढ़ जाती थी, आज तो डिजिटल जमाने में लोग अपनी की-बोर्ड के हर अक्षर के पदचिन्ह छोड़ते चल रहे हैं, और हकीकत तो यह है कि मिटा देने के बाद भी कुछ भी नहीं मिटता। इसलिए मानो इंटरनेट पर बचपन की संगत बुढ़ापे तक सुबूत बनकर बनी रहने वाली है। 
दरअसल टेक्नालॉजी एक सुनामी की तरह लहरों का अंधड़ लेकर इंसान की जिंदगी में आई, और उसने ऐसे औजार लोगों को थमा दिए, जो कि बंदर के हाथ में उस्तरे जैसी कहावत को साबित करती है। यह एक अलग बात है कि आज तक किसी ने ऐसा बंदर देखा नहीं है जो कि उस्तरे से अपनी ही दुम को काटे, और इंसान ने अपनी बेवकूफियों की कहावत बनाने के लिए जानवरों, और नीम चढ़े करेले जैसे कई पेड़-पौधों का इस्तेमाल भी कर लिया है। खैर, वह नाजायज इस्तेमाल एक अलग मुद्दा है, और दुनिया में कमजोर या बेजुबान पर तोहमत धरना ताकतवर का हक सा रहता है, इसलिए कहावतें और मुहावरे ऐसी ही ज्यादती के बने होते हैं। लेकिन यह आज की इस बहस का मुद्दा नहीं है। आज की बातचीत इस पर है कि डिजिटल सुनामी-सैलाब के बीच अपनी समझदारी के पैर कैसे टिकाकर रखे जाएं। 
यह थोड़ा मुश्किल काम है, क्योंकि समझदारी एक किस्म से चर्बी चढ़े बदन को कसरत करने कहती है। और नासमझी या गैरजिम्मेदारी मानो किसी को नर्म सोफा पर बिठाकर उसकी दिलचस्पी की फिल्म दिखाने जैसी होती हैं। लोगों को लगता है कि गैरजिम्मेदारी की चीजें गुपचुप या चाट जैसी मजेदार स्वाद वाली हैं, और समझदारी की बात मानो सादी खिचड़ी और बिना तली सब्जी जैसी है। इसलिए हमारा यह नसीहत देना तो आसान है कि लोग अश्लील या हिंसक, साम्प्रदायिक या दूसरी तरह के भड़काऊ संदेशों को पाने, बढ़ाने, और पढऩे-पढ़ाने में न उलझें, लेकिन इस पर अमल को भला किसका दिल मानेगा? गांधी की जीवनी पूरी जिंदगी में जितनी बिकी होगी, उससे अधिक गुलशन नंदा की एक-एक किताब शायद बिकी हो। लेकिन अगर किसी की जिंदगी पर कोई अच्छा असर पड़ सकता है, तो वह बेहतर चीजों को पढऩे, सुनने, बेहतर बातचीत का हिस्सा बनने, और बेहतर सोच वाले लोगों के बीच उठने-बैठने से पड़ सकता है। 
यह पूरी बातचीत इस कॉलम में बड़ी फीकी लग सकती है, लेकिन यह आज का बहुत चुभने वाला मुद्दा है, और इसे किसी गंभीर बातचीत के लायक पाया भी नहीं जाता। जिस तरह हिन्दुस्तान में लोग यह मान लेते हैं कि नौजवान पीढ़ी को किसी तरह की सेक्स-शिक्षा की जरूरत नहीं है, उसी तरह लोग यह भी मान लेते हैं कि डिजिटल-समझदारी, या डिजिटल-जिम्मेदारी, या डिजिटल-तहजीब को लोग मां के पेट से ही सीखकर आते हैं, और हर किसी को इस औजार के इस्तेमाल का हुनर आता ही है। हकीकत तो यह है कि लोगों को आज यह भी अहसास नहीं है कि सोशल मीडिया में उनका लिखा हुआ, या फोन-कम्प्यूटर पर कुछ लिखकर इंटरनेट या फोन-सर्विस से किसी को भेजा हुआ कैसे नए कानूनों में एक बड़ा जुर्म है, जिस पर बड़ी कड़ी सजा है। एक वक्त कागज पर लिखने या अखबारों में लिखकर भेजने से जो बातें जुर्म के दायरे में नहीं आती थीं, वे भी भारत के नए आईटी कानून में एक बड़ा जुर्म हैं। 
आज जो लोग खुद होकर इन खतरों को नहीं समझ रहे हैं, उनके लिए परिवार को, समाज या सरकार को, कुछ करने की जरूरत है। आज बंदर तो सुरक्षित हैं, लेकिन इंसान के हाथ में मोबाइल नाम का जो उस्तरा है, उससे इंसान रोज ही अपनी नाक काटने का खतरा खड़ा करते चल रहे हैं। मोबाइल फोन के लिए जितने किस्म के लुभावने एप्लीकेशन मुफ्त में दिखते हैं, उनके भीतर जाकर देखें तो उनका इस्तेमाल शुरू करने के पहले ही लोगों को उस कंपनी को यह मंजूरी देनी पड़ती है कि वह कंपनी फोन या कम्प्यूटर पर जमा हर फाईल, हर तस्वीर, हर वीडियो को देख सकती है, और इस फोन के मालिक की तरफ से उनको पोस्ट कर सकती है, जानकारी का इस्तेमाल कर सकती है। लेकिन इस खतरे का एहसास बहुत ही कम लोगों को है, क्योंकि चौकन्ने लोगों की संगत कम गुदगुदी होती है, और गैरजिम्मेदार लोगों की संगत बड़ी सनसनीखेज और चटखारों वाली होती है। एक संगत लोगों को योग और कसरत की तरफ ले जाती है, तो दूसरी संगत लोगों को दारू-जुआ और मौज-मस्ती की तरफ। यही वजह है कि आज लोगों की सोशल मीडिया या फोन पर संगत ऐसे लोगों से आसानी से और अधिक हो जाती है, जो कि एक गैरजिम्मेदार मौज-मस्ती को बढ़ावा देते हैं। इससे परे साम्प्रदायिकता या नफरत को बढ़ावा देते हैं। 
लेकिन लोगों को यह भी याद रखने की जरूरत है कि आज दुनिया के अच्छे विश्वविद्यालय या कॉलेज दाखिला देने के पहले, और अच्छे दफ्तर नौकरी देने के पहले, जिम्मेदार बैंक कर्ज देने के पहले, क्रेडिट कार्ड कंपनियां उधार देने के पहले लोगों के सोशल मीडिया पन्नों पर झांक लेते हैं। इसलिए अपनी संगत, अपनी सोच, और अपने चाल-चलन को आज इंटरनेट, फोन, या सोशल मीडिया पर सम्हालकर रखना कुछ बरस पहले की गैर-डिजिटल जिंदगी के मुकाबले अधिक जरूरी है। बंदर की दुम तो बची रहेगी, इंसान ही उस्तरे से अपनी नाक काटने के खतरे में है। 

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