सबको मालूम है जुमलों की हकीकत लेकिन...

10 अगस्त 2015
संपादकीय

प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने कुछ दिन पहले बिहार की एक आमसभा में वहां के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के डीएनए पर वार किया था कि उनका डीएनए कुछ गड़बड़ है। इसके जवाब में नीतीश ने आज यह हमला बोला है कि बिहार से पचास लाख लोग अपना डीएनए सैम्पल नरेन्द्र मोदी को भेजेंगे। उन्होंने अभी चार दिन पहले ही एक खुली चि_ी लिखकर प्रधानमंत्री से कहा था कि वे डीएनए वाला अपना बयान वापिस लें क्योंकि भारत के प्रधानमंत्री का किसी राज्य के लोगों के डीएनए पर हमला शोभा नहीं देता। लेकिन मोदी अभी कल बिहार की अपनी सभा में फिर नीतीश पर तगड़ा हमला करके आए हैं, और यह सभा राज्य विधानसभा के चुनाव घोषित होने के पहले मोदी की एक बड़ी सभा थी, जिसमें बड़ा हमला होना तय भी था। लेकिन आज हम यहां पर डीएनए को लेकर बात करना चाहते हैं, कि मोदी ने जो कहा और नीतीश ने उसे जो मोड़ दिया, उसके बीच भारत की राजनीति किधर जा रही है। 
दरअसल कुछ महीने पहले जब भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह ने यह बयान दिया था कि मोदी के काले धन को विदेशों से भारत वापिस लाने के नारे का अलग से कोई महत्व नहीं था, और वह एक जुमला था। अमित शाह की कही बात सही भी थी क्योंकि मोदी ने वह नारा चुनाव के वक्त लगाया था, यह एक अलग बात है कि सैकड़ों करोड़ के काले धन की अफरा-तफरी के आरोपी ललित मोदी को भारत लाने के बजाय मोदी की मंत्री उसे दर्जन भर देशों में घूमने में मदद करते रंगे हाथों पकड़ाई हैं। लेकिन मोदी की काले धन की बात भी जुमला थी, और मोदी की नीतीश के डीएनए की बात भी जुमला थी। और ऐसे जुमले मौत के सौदागर से लेकर गूंगा-गुड्डा तक रोज इस्तेमाल होते हैं। भारत का इलेक्ट्रॉनिक मीडिया जिसके सामने स्क्रीन पर शब्दों की सीमा बड़ी तंग होती है, और दर्शक का ध्यान कुछ पलों के लिए ही जो खींच पाता है, वह जुमलों की तलाश में रहता है। इलेक्ट्रॉनिक मीडिया की सीमा यही है कि उसे जुमलों पर अधिक से अधिक निर्भर रहना पड़ता है। इसलिए टीवी से नफा पाने के लिए नेता रात-दिन जुमले गढ़ते हैं, और उन्हें इसी भरोसे के साथ उछालते हैं कि इलेक्ट्रॉनिक मीडिया उनको कूदकर लपक लेगा। 
लेकिन नेताओं और पार्टियों की जुमलेबाजी से परे आज सवाल यह है कि क्या भारत का लोकतंत्र केन्द्र और राज्य के असल मुद्दों पर निर्भर ही नहीं रह गया है? क्या सिर्फ जुमलों और नारों से देश की जनता अगली सरकारें तय करेंगी? नारों को देखें तो उनमें गिने-चुने शब्दों की तुकबंदी से लोगों को खींचने की कोशिश होती है। पाकिस्तान के एक चुनाव में बेनजीर भुट्टो की तरफ से सामने खड़े नवाज शरीफ के खिलाफ एक नारा लगाकर नवाज शरीफ के डीएनए को गाली बकी गई थी, और बेनजीर की पार्टी ने ऐसे बैनर बनाकर टांगे थे जिन पर लिखा था- न मां शरीफ, न बाप शरीफ, नवाज शरीफ, नवाज शरीफ। 
आज हिन्दुस्तान ऐसे ही डीएनए के जुमले में फंस गया है। अखबारों में देश की अर्थव्यवस्था, समाज की हकीकत, इनको गंभीरता से पढऩे वाले पाठक कम हैं, और वे चुनावी जीत को तय करने के लिए काफी नहीं हैं। इसलिए जिस तरह भेड़ों के रेवड़ों को मनचाहे तरफ ले जाने के लिए मुंह से जैसी निरर्थक आवाजें निकाली जाती हैं, वैसी ही आवाजें आज हिन्दुस्तान के नेता चुनावी सभा में जुमलों की शक्ल में निकाल रहे हैं। किसी के डीएनए से उसका अच्छा या बुरा होना तय नहीं होता। गांधी के मां-बाप का समाजसेवा का कोई इतिहास नहीं था, और गोडसे के मां-बाप हत्यारे नहीं थे। डीएनए की सोच धार्मिक कट्टरता, और रक्त की शुद्धि जैसी अवैज्ञानिक सोच है, और वह जुमले की शक्ल में तो ठीक है, उसका अक्ल से कुछ लेना-देना नहीं है। लेकिन आने वाले दिन देश की राजनीति में ऐसी ही गंदगी के रहने वाले हैं, क्योंकि बिहार एक ऐसा राज्य है जहां कल तक के एनडीए गठबंधन के दो भागीदारों के बीच आज सांप-नेवले जैसी लड़ाई है। और दुनिया का इतिहास इस बात का गवाह है कि दो भाईयों के बीच जब दीवारें उठती हैं, तो जरूरत से बहुत अधिक ऊंची उठती हैं। यही हाल आज भाजपा और नीतीश के बीच है। 
फिलहाल भारत के लोगों को यह समझने की जरूरत है कि क्या जुमलेबाजी से परे वे जिंदगी के असल मुद्दों को पढऩा-सुनना और समझना चाहेंगे, या फिर वे लोकतंत्र को महज चुनावी सभा समझकर तुकबंदी पर ताली बजाते अगली सदी में जाना चाहेंगे। 

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