किसकी है जनवरी, किसका अगस्त है....

14 अगस्त 2015 
संपादकीय 

आजादी की सालगिरह पर राष्ट्रपति से लेकर प्रधानमंत्री तक, और राज्यपाल से लेकर मुख्यमंत्री तक देश-प्रदेश के संदेश देंगे। देश की हर स्कूल-कॉलेज में लोगों के भाषण होंगे, और आजादी की लड़ाई को याद किया जाएगा, शहीदों को श्रद्धांजलि दी जाएगी। और इसके साथ ही आजादी शब्द को इतिहास से जोड़कर उसे दफन कर दिया जाएगा, ताकि कोई आज के संदर्भ में आजादी की बात न छेड़ बैठे। बहुत सी बातें इतिहास के रूप में सहूलियत की होती हैं, और वर्तमान से अगर उनको जोड़ दिया जाए, तो वे खतरनाक और तकलीफदेह साबित हो जाती हैं। 
देश को अंग्रेजों से आजादी दिलाना तो चुका, लेकिन उसकी पौन सदी करीब आ रही है, और हाल यह है कि उस वक्त देश जिन बातों का गुलाम था, उनसे कहीं अधिक बातों का गुलाम हिन्दुस्तान आज हो गया है। उस वक्त तो गुलाम बनाने वाले हमलावर सात समंदर पार से आए हुए गोरे थे, आज तो गुलाम बनाने वाले लोग घर के ही हैं, देश के ही हैं, और कोई समंदर पार करके भी नहीं आए हैं। आज हिन्दुस्तान में लोकतंत्र के नाम पर जिस तरह की ताकतें राज कर रही हैं, उनमें सरकार और कारोबार इन दोनों में रहते हुए की गई काली कमाई से ऐसी जंजीरें बनाई गई हैं, जिनसे आम लोगों के लोकतांत्रिक अधिकारों को बांधकर रख दिया गया है। फिर बहुत से ऐसे मामले हैं जिनमें सरकार और कारोबार ने मिलकर आम जनता के हक, और आम जनता के खजाने, इन दोनों पर तरह-तरह से कब्जा कर लिया है, और जब लूटपाट पूरी हो चुकी रहती है, तब देश-प्रदेश के मंत्री-अफसर अदालती कटघरों में गाहे-बगाहे पहुंचाए जाते हैं, और अदालत से सजा पाने के बाद भी वे लालू यादव बने हुए देश-प्रदेश चलाने में लगे रहते हैं। बात सिर्फ एक नेता या एक पार्टी की नहीं है, बात सिर्फ भारत सरकार, या किसी प्रदेश की सरकार की भी नहीं है, देश में वामपंथियों को छोड़कर तकरीबन हर पार्टी की सरकार ने ऐसा हाल कर रखा है। 
इस देश को अंग्रेजों की गुलामी से आजादी कराने के लिए गांधी से लेकर भगत सिंह तक अनगिनत लोगों ने तरह-तरह की शहादत दी थी, लेकिन आज भ्रष्टाचार और सरकार-कारोबार की लूटपाट से आजादी दिलाने की कोई संभावना भी नहीं दिखती है। देश में एक भी कोई ऐसा भरोसेमंद नेता और आंदोलनकारी नहीं बच गया है, जो कि जनता को जीत सके, और लूटने वाले ताकतवर लोगों को हरा सके। यही वजह है कि आजकल में देशभर में होने वाले भाषणों में इतिहास भरा रहेगा, क्योंकि वर्तमान तो गिनाने के लायक है नहीं, और भविष्य को लेकर आम जनता को उम्मीद बहुत कम है। देशभर में जगह-जगह ताकत पर बैठे हुए लोग यह साबित करने में लगे हुए हैं कि आजादी किस तरह महज उन्हें है, और आम जनता किस तरह आज भी महज गुलाम है। 
इस देश की जनता हर पांच बरस के चुनाव को आजादी मान बैठी है। एक वक्त राममनोहर लोहिया ने लिखा था कि आजाद कौमें पांच बरस इंतजार नहीं करतीं, आज हिन्दुस्तान की पीढ़ी-दर-पीढ़ी, चुनाव-दर-चुनाव गुजारते हुए चैन से अपने आपको आजाद माने बैठी हैं। जिस देश में जनता इस तरह अपने आपको आजाद मान बैठी हो, और जिसे सरकार-कारोबार का गुलाम होने का अहसास भी न हो, वह जनता, वह देश इस अघोषित गुलामी के तहत उसी तरह लुटते रहेंगे, जैसे की ईस्ट इंडिया कंपनी और अंग्रेजराज में यह देश लुटते रहा है। आजादी की सालगिरह पर बाबा नागार्जुन की कविता याद पड़ती है कि किसकी है जनवरी, किसका अगस्त है....
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