इस देश में प्राथमिकता पसीना बहाना है या खून

संपादकीय
2 अगस्त 2015

भारत में धर्म को लेकर जो खाई लोगों के बीच खड़ी हो जाती है, वह लोकतंत्र की सारी समझ को खत्म कर देती है। और ऐसा सिर्फ यहीं नहीं है, दुनिया के बहुत से देशों में आज धर्म के आधार पर आतंक और गृहयुद्ध चल रहे हैं, और उन तमाम जगहों पर लोगों की धार्मिक कट्टरता अपने-अपने देशों के कानून के खिलाफ जाकर चारों तरफ खून बिखरा रही है। और आज की दुनिया में किसी देश में राज-काज के लिए जो सबसे अच्छी व्यवस्था, लोकतंत्र है, उसका धार्मिक मान्यताओं के साथ कोई खास तालमेल बैठ भी नहीं सकता। धर्म पूरी तरह अपनी निजी आस्था की बात है, और आज इस निजी बात का सार्वजनिक प्रदर्शन, और सार्वजनिक इस्तेमाल इतना हिंसक हो गया है कि वह दूसरे किस्म की आस्था रखने वाले लोगों के कत्ल की वजह बन गया है। 
दुनिया भर के देशों को देखें तो जहां-जहां धर्म हावी है, वहां-वहां लोकतंत्र कुचला जा रहा है। आज सीरिया या इराक जैसे देशों में, या दूर क्यों जाएं, बगल के पाकिस्तान में धर्म के आधार पर जिस तरह थोक में कत्ल हो रहे हैं, कत्ल के नए-नए तरीके ढूंढे जा रहे हैं, इंसान जिसे हैवानियत कहते हैं, उसके नए-नए, ऊंचे-ऊंचे पैमाने तय हो रहे हैं, और यह सब कुछ धर्म के नाम पर हो रहा है। पड़ोस के म्यांमार में वहां के बौद्ध लोगों ने जिस तरह अल्पसंख्यक मुस्लिमों को मार-मारकर देश से निकाला है और जिस तरह वे नौकाओं में सफर करके कई देशों में जाकर शरण मांग रहे हैं, वह भयानक है, और हैरान करने वाली बात यह है कि बौद्ध समुदाय की ऐसी हिंसा के खिलाफ नोबल शांति पुरस्कार पाने वाले दुनिया के सबसे चर्चित बौद्ध, दलाई लामा, का कहा हुआ कुछ पढऩे में भी नहीं आता। 
भारत में भी म्यांमार की ऐसी बौद्ध-हिंसा के खिलाफ मुस्लिम-आतंक के बम फटे, लेकिन बहुत पहले धर्म का नाम लेकर भिंडरावाले जैसे आतंकी ने स्वर्ण मंदिर का इस्तेमाल करके पंजाब में आतंकी हिंसा फैलाई और हिन्दुओं को छांट-छांटकर मारा। उस भिंडरावाले पर कार्रवाई की वजह से नाराज सिख अंगरक्षकों ने इंदिरा को मारा, इसके जवाब में देश भर में 1984 के दंगों में हजारों सिख मारे गए, उधर धर्म को संविधान से ऊपर कहते हुए बाबरी मस्जिद गिराई गई, इधर मुंबई में बाल ठाकरे ने मस्जिद गिराने का श्रेय अपने शिवसैनिकों को दिया, इसके खिलाफ मुंबई दंगे और बम धमाके हुए। उधर गोधरा में कारसेवकों से भरे ट्रेन के डिब्बे को जलाया गया, और जवाब में गुजरात के ऐतिहासिक दंगे हुए। 
ऐसी अनगिनत घटनाएं हैं, लेकिन उनकी पूरी फेहरिस्त यहां लिखने का मकसद नहीं है। बात यह है कि भारत जैसे विविधता वाले लोकतंत्र में भी जब लोगों के दिमाग पर धार्मिक उन्माद सवार होता है, जब कट्टरता अपने पर धार करके लोगों के हाथों में हथियार बनकर पहुंच जाती है, तब कानून धरे रह जाता है, लोकतंत्र धरे रह जाता है, अपने धर्म को सबसे ऊपर साबित करने के लिए लोग लहू बहाने लगते हैं। धर्म और ईश्वर को लेकर जो एक धारणा फैलाई जाती है कि वह लोगों की सोच को बेहतर बनाते हैं, लोगों को मन की शांति देते हैं, वह सब धारणा किसी काम की नहीं दिखती। जो लोग अमन-पसंद हैं, वे अपनी निजी आस्था के साथ बिना हिंसा किए जीते हैं। और जो लोग हिंसक हैं, उनके पास धर्म और ईश्वर नाम के हथियार दोनों हाथों में आ जाते हैं, और वे सबसे पहले लोकतंत्र और कानून का गला काटते हैं, और उसके बाद दूसरे धर्म के लोगों की तरफ आगे बढ़ते हैं। 
भारतीय समाज में धर्म के महत्व को जब इतना अधिक बढ़ा दिया जाएगा, तो वह इतनी ही हिंसा का सामान बनेगा ही बनेगा। एक गरीब देश में जहां अधिकतर आबादी को जिंदा रहने के लिए पसीना बहाना पड़ता है, वहां लोग दूसरों का लहू बहाकर अपने ईश्वर को खुश करने की बात सोचते हैं। भारत जैसे लोकतंत्र को यह तय करना होगा कि यहां पर संविधान और लोकतंत्र का महत्व अधिक है या कि आस्था के नाम पर हो रही हिंसा अधिक अहमियत की बात है? इस जिंदगी में आस्था निजी रहे और घर पर रहे, तो हो सकता है कि वह इंसान की मदद भी करे। लेकिन जब वह हथियार लेकर सड़कों पर निकल पड़ती है, और लोग जब इस मुकाबले में जुट जाते हैं कि मेरा ईश्वर तेरे ईश्वर से बेहतर है, तो वह देश अपनी संभावनाओं से कोसों पीछे छूट जाता है। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी को अपने मेक-इन-इंडिया अभियान की कामयाबी के पहले यह भी सोचना होगा कि इस देश में प्राथमिकता पसीना बहाना है या खून बहाना?

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