महानता के बहुत पुराने प्रतीक बेअसर, नए प्रतीकों को जगह देें

13 अगस्त 2015
संपादकीय

दो दिन पहले हमने जेल में रहते हुए कैदियों ने पढ़ाई और इम्तिहान में जो कामयाबी पाई थी, उसके बारे में लिखा था कि बुरे लोगों के अच्छे काम से भी लोग प्रेरणा ले सकते हैं। जो लोग जेलों के बाहर हैं, और मां-बाप के पैसों पर सहूलियत से पढ़ते हैं, उनको तो कैदियों के मुकाबले अधिक मेहनत करके अधिक कामयाबी पानी चाहिए। अब यह लिखे दो ही दिन हुए थे कि एक अच्छी और एक बुरी खबर और आ गई। अच्छी खबर यह है कि पैरों के काम न करने पर भी व्हीलचेयर पर चलने वाले एक पर्वतारोही ने 11 बार एवरेस्ट पर चढऩे में कामयाबी पाई। दूसरी खबर अभी-अभी आई है कि रायपुर में दर्जनभर चोरियों के सामान के साथ एक ऐसा चोर पकड़ाया है, जिसके दोनों हाथ कटे हुए हैं। इसके बावजूद वह अपने ठूंठ जैसे बचे हुए हाथों से पानी की बोतल भी खोल लेता है, मोबाइल फोन का इस्तेमाल भी कर लेता है, और जाहिर है कि उसके पास से बरामद सामान चोरी करने के लिए तो उसने अधिक मेहनत की ही होगी। 
लोगों के शरीर में अगर कोई कमी रह जाती है, तो उससे हौसला पस्त करने की जरूरत नहीं रहती। लोग आंखों के बिना अकेले ही पूरी दुनिया की सैर कर आते हैं, अंग्रेजी जाने बिना लोग बहुत से देशों में घूम लेते हैं, जहां लोग सिर्फ अंग्रेजी में बात करते हैं, पैरों के बिना एवरेस्ट पर दर्जनभर बार जाने की तस्वीरें देखने लायक हैं, फिलिस्तीन के एक ऐसे फोटोग्राफर की तस्वीरें छपती रहती हैं, जिसने इजराइली हमले में दोनों पैर खो दिए थे, और जो अब पहियों की कुर्सी पर चलता है, और दुनियाभर के लिए तस्वीरें खींचता है। ऐसे में जिन लोगों के हाथ-पैर, आंख-कान, सब कुछ अच्छी तरह काम करते हैं, उनको अपने बारे में सोचना चाहिए कि उनको कितनी अधिक कामयाबी पाने की सहूलियत कुदरत की तरफ से मिली हुई है। 
दुनिया में जब शारीरिक दिक्कतों के चलते हुए भी लोग बड़ी-बड़ी मंजिलों तक पहुंचते हैं, तो उन्हें देखकर सिर ऊंचा हो जाता है, और सलाम करने को दिल करता है। फिर शारीरिक दिक्कतों से परे हिन्दुस्तान में अनगिनत ऐसे गरीब बच्चे हैं, जिनके मां-बाप रोजी-मजदूरी करते हैं, लेकिन वे देश की सबसे बड़ी-बड़ी परीक्षाओं में कामयाबी पाते हैं। सरकार और समाज इन दोनों को चाहिए कि विपरीत परिस्थितियों में अपने हौसले और अपनी मेहनत से कामयाबी पाने वाले लोगों की मिसाल स्कूल-कॉलेज के बच्चों के सामने रखे। आज आजादी की पौन सदी पूरी होने को है, और अब तक आजादी की लड़ाई की वे ही कहानियां स्कूलों में पढ़ाई जाती हैं, जो कि किताबों की शक्ल में पौन सदी से बाजार में हैं। इनका असर भी अब सीमित हो चला है, क्योंकि देश को आज वैसी किसी गुलामी से आजादी पाने की जरूरत नहीं है। आज सामाजिक गैरबराबरी से टक्कर लेकर, कुदरत की बेइंसाफी से टक्कर लेकर जो लोग बहादुरी दिखाते हैं, उनकी असल कहानियां बच्चों को अधिक प्रभावित कर सकती हैं। सामाजिक विरोधों के बीच जिस तरह सानिया मिर्जा खेल के कपड़ों में दुनिया के सबसे बड़े मुकाबलों को जीतकर आती है, उससे सामाजिक विरोध करने वाले दकियानूसी लोगों के मुंह भी बंद हो जाते हैं, हो चुके हैं। वरना ऐसे दकियानूसी लोग अपने बिरादरी की लड़कियों को आगे बढऩे से रोकने के लिए सबकुछ करते हैं। 
इसी तरह, गांवों में, जातपात मानने वाले इलाकों में, महिलाओं से भेदभाव करने वाले समाज में जो महिलाएं, जो दलित, या गरीब और कमजोर सामाजिक संघर्ष करके सफल होते हैं, उनकी कहानियां सरकार को और समाज को चारों तरफ फैलानी चाहिए। महानता के बहुत पुराने प्रतीक बेअसर होते जाते हैं, और नए प्रतीकों को जगह देनी चाहिए। 

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