संघीय लोकतांत्रिक ढांचे की विसंगतियों पर सोचें

संपादकीय 
18 अगस्त 2015 

प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने बिहार के चुनाव ठीक पहले इस राज्य के लिए सवा लाख करोड़ रूपयों के विशेष केंद्रीय सहायता पैकेज की घोषणा वहां जाकर एक आमसभा में की है। इसकी उम्मीद की जा रही थी, और बिहार में सत्तारूढ़ नीतिश कुमार ने इसे चुनावी रिश्वत कहा जरूर है, लेकिन यह मांग तो वे उस यूपीए सरकार से बरसों से करते आ रहे थे, जिसकी मुखिया रही कांग्रेस आज बिहार में नीतिश-लालू की चुनावी भागीदार है। ऐसा ही विशेष केंद्रीय पैकेज मांगते-मांगते बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बैनर्जी थक चुकी हैं, और बिहार के बाद अब कुछ और पिछड़े राज्य भी ऐसी ही मांग करने लगेंगे। 
अब सवाल यह है कि भारत के संघीय ढांचे में केंद्र की मर्जी से राज्यों की ऐसी मांग को कहां-कहां और किस हद तक पूरा करना जायज है? लंबे समय से राज्यों की यह मांग भी चली आ रही है कि केंद्र सरकार के टैक्स-कलेक्शन का अधिक बड़ा हिस्सा राज्यों को सीधे मिलना चाहिए, ताकि वे अपनी मर्जी से अपने राज्य में उसे खर्च कर सकें। लेकिन भारत जैसे देश में कम कमाई वाले राज्यों को भूखे मरने के लिए छोड़ा नहीं जा सकता, और केंद्र सरकार का यह भी जिम्मा रहता है कि राज्यों के बीच सुविधाओं और साधनों को लेकर एक ऐसा संतुलन बनाकर चले कि राज्यों के बीच एक-दूसरे से गैरबराबरी का तनाव खड़ा न हो। एक राज्य में लोग भूख से मरें, और दूसरा राज्य आलीशान शहर बनाते चले, तो देश कभी एक नहीं रह पाएगा। इसलिए राज्यों को केंद्र सरकार के विशेष पैकेज का अधिकार केंद्र को दिया गया है, और उसका कभी राजनीतिक, कभी गैरराजनीतिक इस्तेमाल होते आया है। 
लेकिन ऐसे पैकेज के वक्त यह बात आ खड़ी होती है कि अगर कोई राज्य अपनी बढ़ती हुई आबादी की वजह से, प्रशासनिक निकम्मेपन की वजह से, फिजूलखर्ची की वजह से, योजनाओं की नामौजूदगी की वजह से अगर पीछे रह जाते हैं, तो बाकी राज्यों की कमाई से केंद्र सरकार ऐसे पिछड़े राज्यों को कब तक ढोए? राज्य का हक अपने खर्च पर इस तरह का रहता है कि मायावती हजारों करोड़ के अपने स्मारक बनवा सकती हैं, और मोदी गुजरात में हजारों करोड़ के सरकारी खर्च से सरदार पटेल की प्रतिमा बनवा सकते हैं, देखा-देखी महाराष्ट्र शिवाजी की हजारों करोड़ की प्रतिमा बनवाने का फैसला ले सकता है। ऐसे में कल को उत्तरप्रदेश आर्थिक पैकेज की मांग करे, और परसों वह अपने खुद के बजट से मुलायम सिंह के परिवार की हजारों करोड़ की प्रतिमाएं बनवाने लगे, तो क्या केंद्रीय सहायता का मतलब बाकी राज्यों की जेब से अपने राज्य में प्रतिमाएं बनवाना नहीं होगा? 
संघीय ढांचे का मतलब ही एक जटिल व्यवस्था होता है। लेकिन हमारा यह मानना है कि राज्यों की अपनी फिजूलखर्ची पर केंद्र सरकार का, या नीति आयोग जैसी किसी संस्था का कोई तो काबू होना चाहिए। ऐसा न होने पर वह दिन दूर नहीं है, जब प्रतिमाओं और स्मारकों की फिजूलखर्ची रोकने के लिए लोगों को जनहित याचिका लेकर अदालतों तक जाना पड़ेगा। राज्य सरकारें अगर अपने गैरउत्पादक खर्च नहीं घटाएंगी, अपने राज्य का आर्थिक विकास नहीं करेंगी, तो चुनाव के वक्त केंद्र सरकार देश की जनता के पैसों से ऐसे चुनावी-पैकेज देती ही रहेंगी। आज यहां हमारे पास किसी तरह का समाधान नहीं है, लेकिन एक संघीय लोकतांत्रिक ढांचे की विसंगतियां हम पाठकों के सामने रखना चाहते हैं। 

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