केजरीवाल के बाद गुजरात में एक नौजवान की हवा

25 अगस्त 2015
संपादकीय 
जिस गुजरात के नाम पर प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी पूरे देश में विकास और जनकल्याण की मिसाल देते हैं, वही गुजरात आज एक बड़ा ओबीसी आंदोलन झेल रहा है, भाजपा सरकार उसके सामने बेबस दिख रही है। एक बिल्कुल ही नया अनजाना और अनसुना नौजवान, हार्दिक पटेल, एकाएक जमीन से उठकर इस आंदोलन के आसमान पर पहुंच गया है, और लाखों की भीड़ उसके पीछे खड़ी हो गई है। अभी हम ओबीसी आरक्षण की पटेल समुदाय की मांग पर कुछ नहीं कह रहे, लेकिन यह बात चर्चा के लायक है कि किस तरह एक नया नौजवान इतना बड़ा समर्थन पा सकता है। 
लोगों को याद होगा कि अभी दो-चार बरस के भीतर ही दिल्ली में अरविंद केजरीवाल ने इसी तरह का करिश्मा कर दिखाया है, और लोगों को शुरू में लगता था कि उन्होंने अन्ना हजारे की पीठ पर सवार होकर कामयाबी तक का सफर पूरा किया है, लेकिन हकीकत यह निकली कि अन्ना से अलग होने के बाद, अन्ना के विरोध के बाद, किरण बेदी जैसे कई साथियों के अलग हो जाने के बाद भी अरविंद केजरीवाल दिल्ली के चुनावी इतिहास का सबसे बड़ा समर्थन जुटा पाए। अब उनकी सरकार कैसी चल रही, उनका भविष्य क्या है, यह एक अलग बात है, लेकिन दिल्ली में एक पहेली यह है कि कांग्रेस और भाजपा जैसे दो दलों की दशकों की परंपरा को खत्म करके एक बिल्कुल नया गैर राजनीतिक नौजवान किस तरह दशकों से जमे हुए कांग्रेस-भाजपा के नेताओं को खत्म कर सकता है। ऐसा हाल बहुत पहले लोगों ने एक लंबे छात्र आंदोलन के बाद असम में देखा था जहां पर कांग्रेस पार्टी का एकाधिकार चले आता था, और छात्र आंदोलन ने कांग्रेस की जमींदारी को उखाड़ फेंका था।
देश के बाकी हिस्सों में भी बरगद की तरह जमे हुए राजनीतिक दलों को यह समझना चाहिए कि जिसे वे अपनी बपौती मानते हैं, वह दबदबा भी, ऐसे दबदबों से थके हुए लोग उखाड़कर फेंक सकते हैं, और किसी अनजाने चेहरे को भी भरोसेमंद पाकर उसे जिता सकते हैं। जो राजनीतिक दल परंपरागत मुकाबलों से परे कोई खतरा नहीं देखते हैं, उनको भी यह समझना चाहिए कि किसी भी राज्य में केजरीवाल जैसे लोग आ सकते हैं, और चुनावी तस्वीर को बदल सकते हैं। बेहतर तो यह होगा कि राजनीतिक दलों से परे दबंग सांसद-विधायक भी इस खतरे को समझ लें कि उनके इलाके में ऐसी कोई पार्टी, या ऐसे कोई नेता, चुनाव लड़ते हुए, या महज जनआंदोलन चलाते हुए सामने आ सकते हैं और चुनावी तस्वीर को उलट-पुलट कर सकते हैं। मध्यप्रदेश से लेकर छत्तीसगढ़ तक में कुछ चुनावों में लोगों ने किन्नर-प्रत्याशी को भी चुना था, जिनका राजनीति में कोई अस्तित्व नहीं था। उसका एक मतलब यह था कि वहां के लोग परंपरागत राजनीतिक दलों और नेताओं से थके हुए थे, और उनसे बिल्कुल अलग विकल्प को चुनने के लिए वे दौड़ पड़े थे।
जमी-जमाई चुनावी राजनीति लोगों को ऐसे किसी अंधड़ के लिए तैयार नहीं होने देती। लेकिन न सिर्फ राजनीति में, बल्कि किसी कारोबार में भी, किसी कारखाने के सामान में भी एकाधिकार कब खत्म हो जाता है, इसका कोई ठिकाना नहीं रहता। इसलिए लोगों को बदलाव के लिए तैयार रहना चाहिए, और बदलाव की आज की रफ्तार का एहसास भी उनको रहना चाहिए। 
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