मोदी का भाषण, रिकॉर्ड कायम हुआ, असर नहीं

16 अगस्त 2015
संपादकीय

प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने लालकिले से अपने दूसरे भाषण में नेहरू का लालकिले से सबसे लंबे भाषण का रिकॉर्ड तोड़ दिया। वे करीब डेढ़ घंटे बोलते रहे और उनकी कही एक-एक बात ट्विटर पर, और डिजिटल मीडिया पर भी आती रही। नेहरू ने जब वह भाषण दिया होगा, तो लोगों के पास सुनने के लिए महज रेडियो रहा होगा, और बिना इंटरनेट, बिना टीवी वाली वह पीढ़ी बहुत सा खाली वक्त लेकर बैठी रही होगी। लेकिन आज 140 अक्षरों की सीमा वाले ट्विटर, या एसएमएस, या टीवी चैनलों की बे्रकिंग न्यूज के बीच डेढ़ घंटे किसी को सुन पाना खासा मुश्किल रहा होगा। लेकिन यह तो प्रधानमंत्री का विशेषाधिकार है कि वे कितनी देर बोलें, और मोदी को पसीना-पसीना हो जाने तक बोलते रहे, और दर्जनों बार उन्हें चेहरे से पसीना पोंछना भी पड़ा।
लेकिन प्रधानमंत्री के भाषण को देखें, तो आज उनके सलाहकारों को यह भी ध्यान रखना चाहिए कि आज की पीढ़ी, आज के दर्शक या पाठक का ध्यान कितनी देर तक बांधकर रखा जा सकता है? इसके साथ-साथ एक दूसरी बात यह भी जरूरी है कि एक भाषण या एक बयान में कितने मुद्दों को रखा जा चाहिए, और उनमें से कितने मुद्दों पर लोग ध्यान दे सकते हैं। बहुत सी अच्छी बातों का ही सही, एक गुलदस्ता अगर इतना बड़ा बना दिया जाए कि हर फूल को देखते-देखते डेढ़ घंटे लग जाएं, तो फिर किस फूल पर लोगों का ध्यान अधिक खींचना है, यह तरकीब काम की नहीं रह जाती। लंबाई-चौड़ाई का समय या शब्दों का एक रिकॉर्ड तो बनाया जा सकता है, लेकिन फिर ऐसे लंबे भाषण या बयान लोगों को छुए बिना सीधे इतिहास के रिकॉर्ड में चले जाते हैं। लोगों का मनोविज्ञान यह रहता है कि वे जिसे पसंद करते हैं, उसकी कही अनगिनत बातों को भी वे लंबी देर तक सुनते रह सकते हैं, लेकिन बातों को भक्तों के लिए नहीं कहा जाता, उनके लिए कहा जाता है जो कि दिमाग को खुला रखकर, दिमाग का इस्तेमाल करके सुनते हैं। भक्त या नफरत करने वालों को प्रभावित करने की जरूरत नहीं होती क्योंकि वे तो सुनने के पहले ही अपनी मजबूत धारणा बनाए हुए रहते हैं। लेकिन जो लोग बीच के रहते हैं, जो कि तर्कसंगत और न्यायसंगत तरीके से सुनकर विश्लेषण करते हैं, उनका ध्यान इतनी लंबी देर तक बांधा नहीं जा सकता।
आज का वक्त कम शब्दों में असरदार बातों को कहने का है। और यह बात बहुत नई भी नहीं है, सौ बरस पहले भी जो टेलीग्राम भेजे जाते थे, उनमें भी एक-एक शब्द का पैसा देना पड़ता था। आज सड़कों के किनारे जो विज्ञापन-बोर्ड लगते हैं, उन पर उतनी ही बातें लिखी जाती हैं जिनको लोग गिने-चुने कुछ सेकंड में पढ़ सकें। लोगों का अटेंशन-स्पान अलग-अलग जगह, अलग-अलग मौकों पर अलग-अलग होता है। आज जिन लोगों को इंटरनेट की सुविधा है, वे पल-पल अलग-अलग पन्नों पर जाकर चुनिंदा बातों को पढऩे, सुनने, या देखने में लगे रहते हैं। ऐसे में प्रधानमंत्री के इतने लंबे भाषण में उठाए गए अनगिनत मुद्दों पर खर्च किए गए अनगिनत शब्दों में उनके मन की बात का फोकस खो जाना तय ही था। होना तो यह चाहिए था कि वे बिना दुहराए हुए, एक-एक बात के लिए कई मिसालें दिए बिना, कम शब्दों में असरदार बात करते, तो भाषण खत्म होने तक शुरू की बातें लोगों को भूल नहीं जातीं। एक रिकॉर्ड कायम करने से परे, प्रधानमंत्री के इस भाषण से असर कायम नहीं हो पाया।

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