मोदी के मस्जिद चले जाने पर हड़बड़ाए आलोचक समझें, डाका तो नहीं डाला, चोरी तो..

17 अगस्त 2015
संपादकीय

संयुक्त अरब अमीरात की यात्रा पर गए भारतीय प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी का वहां की सबसे बड़ी मस्जिद में जाना, कई तरह की बहस छेड़ गया है। लोगों को गुजरात के 2002 के दंगे भी याद आ गए, और उसके बाद एक सार्वजनिक समारोह में उनका मुस्लिम-टोपी पहनने से इंकार करना भी याद आ गया, और बाबरी मस्जिद से लेकर अब तक का भाजपा का पूरा रूख भी लोगों को इस मौके पर याद आया। लेकिन 1992 के एक भाजपा नेता से लेकर 2002 के गुजरात के मुख्यमंत्री तक का सफर पूरा हुए खासा वक्त हो चुका है, और अब 2014 के भारतीय प्रधानमंत्री की बात हो रही है। इस नाते उनके रूख में अगर कोई निजी या सार्वजनिक बदलाव है, तो यह ओहदे की जिम्मेदारियों के साथ जुड़ी हुई बात भी हो सकती है, और ऐसे बदलाव को लेकर आलोचना की जगह एक तारीफ की जरूरत है। बदलाव न हो तो आलोचना, और बदलाव हो जाए तो भी आलोचना, यह दोनों बातें एक साथ जायज नहीं हो सकतीं।
तीन दशक बाद कोई भारतीय प्रधानमंत्री पड़ोस के इस महत्वपूर्ण देश में पहुंचा है। इंदिरा गांधी के बाद वहां कोई भारतीय पीएम नहीं गया था। और वहां की विश्व विख्यात शेख जायद मस्जिद में जाना मोटे तौर पर बाहर से आने वाले राष्ट्र-प्रमुखों, या शासन-प्रमुखों के लिए एक स्थानीय रिवाज जैसा है, क्योंकि इस मस्जिद से ही संयुक्त अरब अमीरात के संस्थापक कहे जाने वाले शासक की कब्र भी जुड़ी हुई है। इसलिए नरेन्द्र मोदी का वहां जाना उनकी सोच के  बदलने से परे एक राजकीय रस्म-रिवाज भी हो सकती है। लेकिन इस मौके पर उन्होंने इस्लाम के बारे में लिखा की यह मस्जिद शांति, दया, सद्भाव, और सबको साथ लेकर चलने की जिन बातों का प्रतीक है, वे तमाम बातें इस्लाम की आस्था की बुनियादी बातें हैं। 
भारत देश और दुनिया के सामने ये विकल्प मौजूद हैं कि या तो वे मोदी के इतिहास से आगे बढऩे से इंकार कर दें, या फिर वे मोदी के वर्तमान को देखते हुए मोदी के भविष्य, और देश-दुनिया के भविष्य के भले के लिए मोदी को भी एक मौका दें। ऐसे में भारत के बहुत से समझदार लोगों का यह भी मानना है कि चाहे प्रधानमंत्री के ओहदे की वजह से ही सही, अगर मोदी देश और दुनिया के मुस्लिमों को कुछ बेहतर समझ रहे हैं, तो यह नई समझ मोदी के अपने समुदाय, और बाकी समुदायों के बीच एक बेहतर तालमेल में मददगार होगी। कुछ वामपंथियों का यह मानना है कि धार्मिक आधार पर भेदभाव करने वाले कुछ आक्रामक हिंदू संगठन हिंदुओं को मुस्लिमों से इतने परे रखने की रीति-नीति का इस्तेमाल करते हैं, कि किसी तरह की आपसी समझ की गुंजाइश पैदा न हो जाए, और नफरत के लिए ही गुंजाइश बची रहे। लेकिन भारतीय प्रधानमंत्री, चाहे वे जो भी हों, वे अगर सवा सौ करोड़  हिंदुस्तानियों की बात करेंगे, तो इस आबादी में आक्रामक-हिंदुत्व वाली आबादी एक चौथाई भी नहीं हो सकती। न ही साम्प्रदायिक सोच रखने वाली सभी धर्मों की आबादी मिलाकर देश की आबादी की एक चौथाई हो सकती है। इसलिए जब मोदी पूरे देश की तरक्की के आधार पर अपने को एक कामयाब प्रधानमंत्री साबित करना चाहते हैं, तो यह कामयाबी किसी भी तबके को अलग रखकर नहीं हो सकती। और अटल बिहारी वाजपेयी से लेकर नरेन्द्र मोदी तक यह बात जाहिर है कि सरकार चला रहे प्रधानमंत्री का किसी साम्प्रदायिक एजेंडे में शामिल होना कुछ मुश्किल ही रहता है। ऐसे में मोदी को यह मौका तो मिलना ही चाहिए कि अगर वे किसी मस्जिद में किसी राजकीय रिवाज के तहत, या उससे परे, जैसे भी, जा रहे हैं, तो इसे लेकर उनकी आलोचना न हो। किसी भी धर्म की साम्प्रदायिक ताकतें चाहती यही हैं कि अपने-अपने धर्म के लोगों को बटोरकर उनको एक टापू पर रखा जाए, और दूसरे धर्म को एक दुश्मन की तरह दिखाया जाए। प्रधानमंत्री बनने के पहले तक जिस नरेन्द्र मोदी ने एक दिन भी विदेश नीति से जुड़ा काम नहीं किया था, उस मोदी को आज सात समंदर पार जाकर हिंदुस्तानियों से मिलने का एक अभूतपूर्व सिलसिला शुरू करते देखना एक हैरानी की बात भी है। हिंदुस्तानी प्रधानमंत्री बाहर जाकर उन देशों की सरकारों से तो बात करते थे, लेकिन वहां बसे हिंदुस्तानी कामगारों, या भारतवंशी लोगों को साथ जोडऩा एक बिल्कुल ही नया तजुर्बा है। 
आखिर में यह देखना भी जरूरी है कि मोदी ने मस्जिद जाकर क्या खोया, और क्या पाया। संयुक्त अरब अमीरात की राजधानी आबूधाबी में कोई हिंदू मंदिर नहीं है। मोदी ने मस्जिद जाकर दुआ की, और वहां की सरकार ने मंदिर के लिए जमीन दे दी। इन दो बातों से दोनों समुदायों के बीच चाहे प्रतीकात्मक स्तर की ही सही, एक बेहतर समझ तो बनेगी ही। 

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