दिल्ली में प्रदूषण के चलते पुरानी गाडिय़ों पर लगी रोक से बाकी देश भी सबक ले

संपादकीय
11 अगस्त 2015

देश की राजधानी दिल्ली में कई बरस पहले पन्द्रह बरस से अधिक पुरानी डीजल गाडिय़ां पर रोक लगाई गई थी, और उस वक्त बड़े विरोध के बीच भी सुप्रीम कोर्ट के आदेश की वजह से वह लागू हुई, और कुछ बरस शायद दिल्ली में डीजल-प्रदूषण घटा भी था। अब वहां पर ऐसे ही प्रतिबंध को बढ़ाया जा रहा है, और विरोध के बीच लोगों को उम्मीद है कि इस रोक से हवा कुछ और साफ हो सकती है। लगातार ऐसे मेडिकल सर्वे के आंकड़े आ रहे हैं कि देश की इस राजधानी में किस तरह ग्यारह फीसदी लोग अस्थमा जैसी सांस की बीमारियों को झेल रहे हैं क्योंकि वे दिल्ली की हवा का प्रदूषण नहीं झेल पा रहे हैं। 
लेकिन बात आज सिर्फ दिल्ली की नहीं है, देश के दूसरे शहरों की भी है। एक तरफ तो केन्द्र सरकार राज्यों को तोहफे के टोकरे की तरह कुछ स्मार्ट सिटी बनाने के लिए सैकड़ों करोड़ रूपए देने जा रही है, दूसरी तरफ जो मौजूदा शहर हैं, उनकी बदहाली किसी से छुपी हुई नहीं है। भारत के अधिकतर शहरों का ढांचा बढ़ती हुई आबादी के लायक बना भी नहीं था, उनका योजनाबद्ध विकास भी नहीं हुआ था, और देश में शहरों की तरफ लोगों का गांव छोड़कर आना बड़ी रफ्तार से हुआ है। इसके साथ-साथ शहरी आबादी की संपन्नता बढऩे से, और सार्वजनिक परिवहन की सहूलियत न रहने से देश के अधिकतर शहरों में निजी गाडिय़ां खूब बढ़ीं, उन गाडिय़ों से प्रदूषण बढ़ा, और उन गाडिय़ों से होने वाले ट्रैफिक जाम से प्रदूषण और भी बढ़ गया। लेकिन आज देश के अधिकतर राज्य स्मार्ट सिटी के प्रस्ताव बनाकर केन्द्र सरकार से सैकड़ों-हजारों करोड़ पाने की उम्मीद में हैं, लेकिन मौजूदा शहरों को स्मार्ट बनाना, उन्हें जीने लायक बनाना प्राथमिकता में नहीं दिखता। 
देश की राजधानी में बढ़ती गाडिय़ों और बढ़ते ट्रैफिक जाम की वजह से जो प्रदूषण बढ़ा था, उसको कम करने में पुरानी गाडिय़ों को हटाना एक इलाज रहा, और दूसरी बड़ी बात दिल्ली मेट्रो रही, जिस पर रोज दसियों लाख लोग चलते हैं, और बिना प्रदूषण बढ़ाए चलते हैं। समय भी बचता है, किफायत भी होती है, और पार्किंग की जगह भी नहीं लगती। यह काम मुम्बई में आधी-पौन सदी से चल रहा है, और वहां की लोकल ट्रेन मुम्बई की जिंदगी की नस-नाड़ी जैसी है, जिसके बिना एक पल भी मुम्बई की धड़कन नहीं चल सकती। इनसे सबक लेकर देश के बाकी शहरों को सार्वजनिक परिवहन पर जोर देना चाहिए, और उनको कमाई का धंधा बनाने के बजाय राज्य सरकारों को घाटे में भी बसें चलानी चाहिए, क्योंकि उनसे शहर की मौत टलेगी। हम छत्तीसगढ़ की राजधानी में बरसों से यह देख रहे हैं कि केन्द्र सरकार की मदद से सिटी बसें तो आ गईं, लेकिन न तो उनका आल-जाल ऐसा बनाया गया कि लोग निजी गाडिय़ों पर निर्भर न रहें। आज भी चुनिंदा रास्तों पर बसें चलती हैं, और लोगों का बाकी रास्तों पर जाना इन बसों से नहीं हो पाता। ऐसे में निजी गाडिय़ों का इस्तेमाल कम नहीं हो सकता। 
दूसरी बात यह कि केन्द्र सरकार की मदद से मिलने वाली ऐसी बसों की जानकारी राज्य सरकार और स्थानीय प्रशासन को महीनों पहले से रहती है, लेकिन हाल यह है कि इनको खड़ा करने की जगह का इंतजाम भी बसों के आने के बाद तक नहीं हो पाता, और इस्तेमाल भी शुरू नहीं हो पाता। देश के छोटे शहरों में भी सड़क पर गाडिय़ों का प्रदूषण भयानक बढ़ा हुआ है, और सार्वजनिक-सिटी बसों को चलाना एक किस्म से बीमारी को रोकने का काम भी मानना चाहिए। लोगों को अस्थमा जैसी बीमारी हो, और फिर उसके बाद सरकार इलाज पर खर्च करे, उसके बजाय वह खर्च आज अगर सड़क पर प्रदूषण घटाने में हो, तो वह अधिक काम का है और सरकार को सस्ता भी पड़ेगा। राज्यों को अपने शहरों में पुरानी गाडिय़ों पर रोक लगाने, और डीजल की गाडिय़ों को शहर के  बाहर करने जैसी सावधानी किसी अदालती आदेश के पहले भी खुद होकर करनी चाहिए। छत्तीसगढ़ में ऐसा कोई चौकन्नापन दिखाई नहीं पड़ता है, और नई राजधानी, या स्मार्ट सिटी के प्रस्ताव को ही प्रदेश का भविष्य मानना ठीक नहीं है। मौजूदा शहरों में बसों का इंतजाम इतना पुख्ता करना चाहिए कि लोग अपनी निजी मोटरसाइकिलों, या गाडिय़ों को जरूरी न पाएं।

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