क्या यह राज्य महज शाकाहारियों का है?

संपादकीय
5 अगस्त 2015

दो-तीन दिनों से छत्तीसगढ़ में कुछ लोगों ने यह अफवाह फैलाना शुरू किया था कि राजनांदगांव जिले में बूचडख़ाना खुलने वाला है। बात यहां तक बढ़ी कि स्थानीय भाजपा सांसद अभिषेक सिंह को वहां के लोगों को साथ लाकर मुख्यमंत्री डॉ. रमन सिंह से मिलवाना पड़ा, और उन्होंने कहा कि राजनांदगांव जिला तो दूर पूरे प्रदेश में कहीं भी कोई बूचडख़ाना नहीं खुलने दिया जाएगा। उन्होंने गाय और भैंस प्रजातियों के किसी भी जानवर को काटने के खिलाफ राज्य में लागू एक कड़ा कानून गिनाया। दरअसल यह बवाल राजनांदगांव के ही कुछ लोगों ने मोबाइल फोन पर संदेश भेजकर शुरू किया था, और इसका निशाना वहां के मुर्गीपालन के कारोबार और उद्योग में लगे हुए एक कारोबारी थे जिन्होंने अभी पिछले बरस ही राज्य शासन के साथ प्रदेश में एक चिकन प्रोसेसिंग प्लांट लगाने का एमओयू किया था।
खैर, हमारी फिक्र अकेला राजनांदगांव जिला नहीं है, और न ही छत्तीसगढ़ है। यह फिक्र पूरे देश में एक भड़काऊ माहौल खड़े होने की है, जो कि गाय कटने से शुरू होकर भैंसों तक पहुंचकर, अब मुर्गियों को काटने के भी खिलाफ जनभावना खड़ी कर रहा है। यह माहौल देश को एक सनातनी-शाकाहारी हिन्दुओं और बाकी धर्म-जाति के तमाम लोगों में बांट रहा है। जो लोग हिन्दुत्व के नाम पर शाकाहार का यह आंदोलन चला रहे हैं, उनका तर्क गाय से बहुत आगे निकलकर अब सभी तरह के पशु-पक्षियों के कटने के खिलाफ पहुंच गया है। हकीकत यह है, और इतिहास से लेकर सबसे ताजा जनगणना तक की हकीकत यह है कि भारत के हिन्दू समाज में भी अधिकतर लोग मांसाहारी हैं। अब अगर पवित्रतावादी और सनातनी हिन्दू आदिवासियों को हिन्दू न गिनें, दलितों को हिन्दू न गिनें, मांसाहारियों को हिन्दू न गिनें, तो वे खुद भारत में पारसी समाज की तरह एक अल्पसंख्यक हिन्दू समाज बन जाएंगे। हिन्दू धर्म और संस्कृति के नाम पर एक हमलावर ठेकेदारी करने वाले कुछ संगठन अपने राजनीतिक परिवार की भाजपा के लिए देश भर मेें फजीहत खड़ी कर रहे हैं। और भाजपा शायद यह समझ नहीं पा रही है कि ऐसी धर्मान्धता कितनी दूरी तक उसे फायदा देगी, और कितनी दूरी तक उसका नुकसान करेगी। नतीजा यह हो रहा है कि प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी जिस उत्तर-पूर्व के उग्रवादी संगठनों के साथ शांति कायम करने के लिए समझौते कर रहे हैं, उसी उत्तर-पूर्व के खानपान पर सनातनी जिद लागू करने में दूसरे लोग लगे हुए हैं। 
कुछ दूसरे मामलों में तो यह कहा जा सकता है कि भारत के ऐसे लोग बहुमत के आधार पर राज करना चाहते हैं, बजाय लोकतांत्रिक विविधता के। लेकिन जहां तक खानपान का सवाल है, तो देश भर के तमाम राज्यों में मांसाहारी लोगों में हिन्दुओं की गिनती ही सबसे अधिक होगी, क्योंकि आबादी में उनका अनुपात ही सबसे अधिक है। दूसरी बात यह कि इतिहास के भी पहले के पुराणों को देख लें, तो हिन्दुओं में मांसाहार हमेशा से प्रचलन में रहा है। आज भी छत्तीसगढ़ जैसे राज्यों में भैंस प्रजाति के किसी भी पशु को काटने पर रोक है, लेकिन बंगाल के काली घाट से लेकर असम की कामाख्या देवी तक अनगिनत ऐसे हिन्दू तीर्थ हैं जहां भैंसों की बलि देने की प्रथा खत्म नहीं हो पा रही है। इसलिए जहां-जहां खानपान की जिद को दूसरों पर लादा जा रहा है, वहां-वहां एक अभूतपूर्व सामाजिक तनाव खड़ा हो रहा है। 
दूसरी बात यह कि छत्तीसगढ़ में अगर चिकन प्रोसेसिंग प्लांट लगाने के ऐसे अफवाही-विरोध से किसी उद्योगपति को जिला बदलना पड़ता है, तो इस किस्म के दूसरे उद्योग-धंधे इस राज्य में क्यों आएंगे? और खुद सरकार की पशुपालन की नीति में मछलीपालन, मुर्गीपालन, बत्तखपालन, बकरीपालन, सुअरपालन जैसी तमाम योजनाएं हैं और इनके लिए सरकारी मदद भी मौजूद है। राज्य की गली-गली में मछली-मुर्गी-मटन बिकने का कारोबार चलता है, और बहुत ही गंदगी के बीच चलता है। राज्य में कहीं भी बूचडख़ाना न खुलने की जो बात है, तो राज्य के हर शहर में खुद म्युनिसिपल के बूचडख़ाने हैं, जहां पशुओं को काटकर मटन-कारोबारियों को बेचा जाता है, और उनसे मांसाहारी लोग खरीदकर ले जाते हैं। यह बात हमारी समझ से परे है कि इस प्रदेश में इस कानून के तहत पशुओं को काटने के बूचडख़ाने पर रोक लगाई जा सकती है? आज तो अच्छे-बीमार, साफ-गंदे, सभी तरह के जानवरों को भारी गंदगी के बीच काटकर सेहत के लिए बहुत ही खतरनाक तरीके से बेचा जाता है, और शायद राज्य की तीन-चौथाई से अधिक आबादी मांसाहारी है, जो कि ऐसे ही कारोबारियों पर निर्भर है। ऐसे में खुद सरकार की यह जिम्मेदारी है कि हर शहर में म्युनिसिपल के कसाईघर या बूचडख़ाने साफ-सुथरे बनाए, और अगर कोई कारोबार इसमें आना चाहता है, तो उसे कागजी विरोध के आधार पर न भगाए। धर्म और धर्मान्धता के आधार पर विरोध को जब एक बार बढ़ावा मिल जाता है, तो फिर ऐसे लोगों के मुंह खून लग जाता है, और जगह-जगह ऐसे विरोध होने लगेंगे। क्या सरकार राज्य के एक-चौथाई से भी कम शाकाहारी लोगों में से गिने-चुने हमलावर तेवरों वाले कागजी लोगों के बयानों को बाकी पूरी जनता के बुनियादी हकों को कुचलने का हक देना चाहती है? 
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