इसके दाम सरहद के दोनों तरफ महज गरीब चुकाने जा रहे हैं

संपादकीय
23 अगस्त 2015

 भारत और पाकिस्तान के बीच राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार स्तर की बातचीत आखिर रद्द हो गई। इसे लेकर उम्मीद के मुताबिक दोनों देश एक-दूसरे के खिलाफ बातचीत का माहौल खराब करने का आरोप लगा रहे हैं, और इस बातचीत से तनाव घटने की जो उम्मीद थी, वह खत्म होकर अब तनाव बढ़ चुका है, और यह माना जा रहा है कि अगले कुछ महीने किसी तरह की बातचीत का माहौल बनते नहीं दिख रहा है। दोनों तरफ से इस मामले में गड़बड़ी हुई है, और जैसा कि कांग्रेस प्रवक्ता ने कहा है, कि दोनों पालों से शब्दों की कबड्डी खेली जा रही है। 
भारत ने इस बात पर आपत्ति जताई थी कि पाकिस्तान के राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार सरताज अजीज के दिल्ली पहुंचने के पहले से कश्मीर के अलगाववादियों को दिल्ली आकर अजीज से मिलने का न्यौता दिया गया था, और अलगवादी नेताओं को ऐसी किसी मुलाकात का वक्त आने के पहले ही श्रीनगर और दिल्ली में पुलिस ने नजरबंद करके भारत का रूख साफ कर दिया था। अब यहां पर दो सवाल उठते हैं, एक तो यह कि सरताज अजीज भारत से बात करने के ठीक पहले अलगाववादियों से बात करने को टाल सकते थे, या नहीं? और पाकिस्तान का ऐसा रूख बातचीत खराब होने की कीमत पर भी उसे क्यों पसंद था? क्या भारत और पाकिस्तान के बीच आतंक को लेकर होने जा रही इस बैठक के पहले कश्मीर के भारतीय अलगाववादियों से पाकिस्तानी सुरक्षा सलाहकार की मुलाकात दोनों पक्षों के बीच पहले चर्चा में नहीं आई थी? दूसरा सवाल यह उठता है कि कश्मीर के अलगाववादी तो वाजपेयी सरकार के समय ही दिल्ली में आए हुए पाकिस्तानी सरकार के बड़े लोगों से मिलते आए हैं, और इसमें कोई नई बात नहीं थी। फिर अगर दो देशों को आपस में बैठकर आतंक खत्म करने के लिए चर्चा करनी है, तो क्या कश्मीर के घोषित रूप से अलगाववादी नेताओं से पाकिस्तान की मुलाकात को महत्व देने से बचा जा सकता था? अगर भारत एक मेजबानी कर रहा था, तो आने वाले मेहमान को ऐसी किसी मुलाकात का मौका देने से भारत का क्या बिगड़ रहा था? और अगर भारत ऐसी किसी मुलाकात का इतना ही बड़ा विरोधी है, तो जब एनएसए स्तर की इस बातचीत को तय किया गया था, उसी वक्त इस बारे में भारत ने पाकिस्तान के सामने अपना नजरिया साफ क्यों नहीं किया था? लोगों को याद है कि मोदी सरकार आने के बाद अलगाववादियों से मुलाकात के मुद्दे पर ही भारत-पाकिस्तान की बातचीत एक बार भारत रद्द भी कर चुका है। ऐसे में अपनी जमीन पर आने वाले मेहमान से यह खुलासा पहले ही कर लेना बेहतर होता कि पाकिस्तानी सुरक्षा सलाहकार यहां पर क्या करे, और क्या न करे, भारत को क्या बर्दाश्त होगा, और क्या नहीं। 
दोनों देशों का एक बड़ा नुकसान इससे यह हो रहा है कि सरहद के दोनों तरफ जो युद्धोन्मादी और धर्मान्ध लोग हैं, उनको एक-दूसरे के लिए गालियां बकने का एक मौका दोनों सरकारों ने मिलकर मुहैया करा दिया है। जहां आम जनता एक-दूसरे से तनाव खत्म चाहती है, और दोनों देशों के हर तरह के शांतिपूर्ण संबंध चाहती है, वहीं पर गिने-चुने बड़बोले-बकवासी, हमलावर तेवरों वाले लोगों को सोशल मीडिया पर नफरत फैलाने का सामान दोनों देशों ने दे दिया है। कहां तो एक तरफ आतंक को खत्म करने के लिए दोनों देशों के दो सबसे बड़े सुरक्षा सलाहकारों के बीच बातचीत होने जा रही थी, और कहां वह तनाव को बढ़ाते हुए खारिज कर दी गई। दोनों देशों का रवैया बहुत ही बचकाना, और भड़काऊ रहा है। अभी यह हमारी समझ से परे है कि कूटनीति और अंतरराष्ट्रीय संबंधों के तहत ऐसी किसी असहमति का अंदाज लगाकर पहले ही यह बात निपटा क्यों नहीं ली गई थी? दोनों देशों की सरकारें कई स्तरों पर औपचारिक और अनौपचारिक बात करते आई है, और यह बात तो पहले से जुबानी बातचीत में ही साफ हो सकती थी, और असहमति रहने पर ऐसी किसी बैठक को रखा ही नहीं गया होता तो बेहतर होता। 
दोनों देशों में जो जंगखोर लोग हैं, वे इससे बहुत खुश होंगे। लेकिन यह नहीं भूला चाहिए कि जंग के पहले भी जंग की जो तैयारी होती है, वह दोनों देशों की जनता को बुरी तरह से गरीब और बदहाल करके छोड़ती है। गांव-गांव में बसे गरीबों के हक की कुर्बानी देकर जो फौज पाली जाती है, वह दोनों ही देशों के हित में नहीं है। आज यूरोप के देश एक-दूसरे की फौजी दहशत में नहीं जीते, वे एक यूरोपीय समुदाय बनाकर बीच की सरहदें भी तकरीबन खत्म कर चुके हैं। भारत और पाकिस्तान कम से कम जंग के उकसावे से बचते हुए बातचीत कायम रखें, उसी में गरीबों का भला है। यह बात जाहिर है कि दुनिया में कोई भी देश चाहे कितना ही गरीब क्यों न हो, उसकी राजधानियों में बसे हुए लोग, सरकारों को हांकने वाले लोग कभी भूखे नहीं मरते, कभी गरीब नहीं रहते। इसलिए उनको जंग के दाम का अंदाज नहीं लगता है। दोनों देशों की तरफ से यह एक बड़ी गैरजिम्मेदारी रही, और इसके दाम सरहद के दोनों तरफ महज गरीब चुकाने जा रहे हैं। 

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