आरक्षण की बहस के बीच क्रीमीलेयर हटाने की जरूरत

संपादकीय
26 अगस्त 2015

गुजरात में ओबीसी दर्जा पाने के लिए वहां का पटेल समाज जिस तरह से एक बड़े आंदोलन को छेड़ चुका है, उससे जूझना गुजरात सरकार को कुछ मुश्किल पड़ रहा है। लेकिन अलग-अलग वक्त पर अलग-अलग राज्यों में ओबीसी दर्जा पाने के लिए कई जातियां ऐसे आंदोलन करती हैं, और कभी वे सरकार को मंजूर होते हैं, और कभी मांग पूरी नहीं हो पाती। फिर आरक्षण अकेले सरकार की मर्जी पर नहीं है, इसके लिए सुप्रीम कोर्ट के फैसले भी हैं, और आज आरक्षित तबकों के हक भी नई जातियों के आने से घटते हैं, इसलिए एक अलग सामाजिक तनाव का खतरा भी इससे बना रहता है। 
लेकिन आज हम इस बात पर चर्चा करना नहीं चाहते कि गुजरात में इस जाति को ओबीसी का दर्जा मिलना चाहिए या नहीं। इसके लिए आरक्षण के जो पैमाने हैं, उन पर इस जाति की मांग को तौलना राज्य सरकार का काम है, और आखिरी में अदालतें तो हैं ही। हम आज की बहस में आरक्षण की व्यवस्था पर ऐसे हर मौके पर छिड़ जाने वाली बहस को भी यहां छूना नहीं चाहते कि देश में आरक्षण होना चाहिए या नहीं। हम इनके बीच केवल एक पहलू पर आज बात करना चाहते हैं कि आरक्षित तबकों के बीच जो क्रीमीलेयर कही जाती है, उस मलाईदार तबके का क्या किया जाना चाहिए? यह तबका आदिवासियों के बीच भी है, दलितों के बीच भी है, और ओबीसी में इनके मुकाबले कुछ और अधिक है। और आरक्षण के फायदे का जितना बड़ा हिस्सा यह एक छोटा तबका ले जाता है, उसके बारे में सोचने की जरूरत है। 
आरक्षण के पीछे की सोच यही थी कि सामाजिक और आर्थिक रूप से, ऐतिहासिक कारणों से, जो जातियां समाज की बाकी जातियों के मुकाबले बहुत अधिक पिछड़ी हुई हैं, उन्हें समाज और विकास की मूल धारा में लाने के लिए उनको आरक्षण का सहारा देना जरूरी है। अब जब किसी जाति में जन्म के आधार पर आरक्षण तय हो गया, तो उस जाति के अनगिनत लोगों के बीच जो गिने-चुने मौके नौकरी या चुनाव के लिए रहते हैं, उन तक पहुंच अधिकतर लोगों की हो ही नहीं पाती। आरक्षित तबकों के भीतर सत्ता की ताकत से, किसी ओहदे के महत्व के चलते, या संपन्नता की वजह से गिने-चुने लोग ऐसी हालत में रहते हैं कि वे और उनके परिवार के लोग आरक्षित मौकों का अधिकतम फायदा उठाने के लायक अपने आपको अधिक सक्षम बना चुके रहते हैं। ऐसा मलाईदार तबका चुनावी टिकटों को पाने, नौकरी के मुकाबले के इम्तिहान की तैयारी में अधिक ताकत रखता है, और आरक्षित तबकों के बाकी लोग इनके मुकाबले कहीं टिक नहीं पाते। 
लंबे समय से यह बात चल रही है कि आरक्षण का फायदा एक पीढ़ी को मिलना चाहिए, और जब कोई सरकारी नौकरी, या संसद-विधानसभा जैसी सदस्यता पा लेते हैं, तो वे अपने अगली पीढ़ी को समाज के आम पैमाने तक पहुंचाने के लिए सक्षम हो जाते हैं, और अगली पीढ़ी को आरक्षण का फायदा देने के बजाय उसी तबके के बाकी लोगों को ऐसे मौके देने चाहिए। दूसरी बात यह कि जो लोग संपन्नता का एक दर्जा पा चुके रहते हैं, उनको भी आरक्षण का फायदा नहीं मिलना चाहिए, क्योंकि ऐसे परिवार समाज में मौके के लिए अपने आपको तैयार कर सकते हैं। इन तमाम स्थितियों को सोचें तो यह बात साफ दिखती है कि आरक्षण का फायदा पाने के बाद ऐसे लोगों की अगली पीढ़ी भी अपना वक्त आने पर आरक्षण का फायदा पाने के लिए एक बेहतर तैयारी कर चुकी रहती है। और कमजोर तबकों के सबसे कमजोर लोग शायद ही कभी ऐसी तैयारी तक पहुंच पाते हों। 
हर आरक्षित तबके के सबसे संपन्न और ओहदे वाले लोग अपने-अपने तबकों के कमजोर लोगों के मौकों को कुचलने वाले हो गए हैं। अगर आरक्षण से क्रीमीलेयर को हटाया नहीं गया, तो आरक्षण का मकसद ही कुचला जा रहा है। इसलिए आज जब किसी जाति को आरक्षण की बात उठती है, तो उसके साथ-साथ मौजूदा आरक्षण पर भी इस नजरिए से बहस होनी चाहिए कि मलाईदार तबके को फायदे से हटाया क्यों नहीं जाए। ऐसा इसलिए मुमकिन नहीं हो पा रहा है कि क्रीमीलेयर के जो पैमाने हैं, उसमें आने वाले सांसदों और विधायकों को ही ऐसा संविधान संशोधन करना पड़ेगा, और वे क्यों अपने हक पर कुल्हाड़ी चलाने चले? दूसरी बात यह कि बड़े अफसर और बड़े जज, जो ऐसे किसी संवैधानिक फैसले के पहले और बाद उससे जुड़़े रहेंगे, उनमें भी आरक्षित तबकों के जो लोग हैं, वे अपनी अगली पीढ़ी के हक भला क्यों कुचलेंगे? इसलिए आज का ताकतवर तबका अपनी ताकत को, अपनी अगली पीढ़ी के मौकों को कम नहीं होने देना चाहता, और क्रीमीलेयर को बनाए रखने में उनका एक बड़ा साफ-साफ वर्गहित है। 

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