नाजायज मीडिया के खिलाफ मुकदमे के लिए सरकारी खर्च

संपादकीय
21 अगस्त 2015
तेलंगाना की एक महिला आईएएस अधिकारी के बारे में बड़ी भद्दी और अपमानजनक बात लिखने वाली देश की एक प्रमुख पत्रिका, आउटलुक, के खिलाफ इस अफसर ने मानहानि का मुकदमा दायर करने की घोषणा कुछ समय पहले की थी, और अब राज्य सरकार ने उसे सरकारी खजाने से इस मुकदमे के लिए 15 लाख रूपए मंजूर किए हैं। उसने इस पत्रिका से 10 करोड़ रूपए मुआवजा मांगते हुए नोटिस दिया था और ऐसे मामलों में होने वाले खर्च, और अदालत में जमा करने के लिए जरूरी फीस को देखते हुए सरकार ने यह रकम मंजूर की है। इस पत्रिका ने इस अफसर के लिए नयनसुख (आईकैंडी) जैसे शब्द लिखे थे, और उसकी साडिय़ों पर फैशन परेड जैसी होने की टिप्पणी की थी। इसके तुरंत बाद सोशल मीडिया सहित मीडिया के दूसरे मंचों पर पत्रिका के ऐसे लिखने के खिलाफ लोगों ने जमकर प्रतिक्रिया दी थी, और इसे एक महिला होने की वजह से किया गया एक ओछा हमला करार दिया गया था।  यह मामला थोड़ा सा अलग है, क्योंकि बहुत से राज्यों में अधिकारी मीडिया के खिलाफ मानहानि के मुकदमे दायर करते हैं, कुछ मुकदमे जीतते भी हैं, और कुछ मामलों में संपादक-प्रकाशक को कैद भी होती है। छत्तीसगढ़ भी ऐसे मुकदमे देख चुका है, और अभी एक-दो बरस में ही ऐसी कैद का एक मामला सामने आ चुका है। 
भारत में मानहानि का कानून मोटे तौर पर मीडिया को अधिक हक देने वाला रहा है, और परंपरागत रूप से कम ही लोग मीडिया के मुंह लगते हैं। यह एक गैरबराबरी की लड़ाई मानी जाती है, और ऐसा समझा जाता है कि मीडिया को कटघरे में ले जाने पर वह हाथ धोकर और पीछे पड़ सकता है, और सार्वजनिक जीवन के लोगों की जितनी मानहानि मुकदमे के पहले हुई है, उससे और अधिक मुकदमे के चलते, या मुकदमे के बाद हो सकती है। लेकिन ऐसी सोच ही मीडिया को अधिक गैरजिम्मेदार बनाने के लिए जिम्मेदार रही है। देश का कानून जो मीडिया को एक नागरिक के अभिव्यक्ति के अधिकार के तहत अखबार या पत्रिका शुरू करने का हक देता है, वही कानून बाकी लोगों को भी अपनी निजी जिंदगी का अधिकार देता है और सार्वजनिक जीवन में नाजायज हमलों से बचने का हक भी देता है। एक वक्त था जब अदालतों में मानहानि के मुकदमे दशकों तक नहीं निपटते थे, लेकिन जब से लोग ऐसे मुकदमों को आपराधिक धाराओं के तहत दायर करने लगे हैं, उनमें फैसला जल्दी आने लगा है, और मीडिया के कुसूर पर सजा भी होने लगी है। 
सरकार के किसी मंत्री या अफसर के सरकारी कामकाज को लेकर अगर उसकी ऐसी मानहानि होती है, तो उस पर सरकार को मुकदमे की इजाजत देने के साथ-साथ, मुकदमा लडऩे का खर्च भी देना चाहिए। सरकार में काम करने वाले लोग जनता और मीडिया दोनों की नजरों के सामने रहते हैं, और उनके कामकाज, चाल-चलन पर बारीक निगाहें टिकी रहती हैं। उनमें से बहुत से लोग गलत काम करते हैं, लेकिन जिन्होंने गलत काम नहीं किए हैं, या जिनके गलत काम अदालतों में साबित नहीं किए जा सकते हैं, उनको अपनी प्रतिष्ठा को बचाने का हक होना चाहिए, और इसके लिए सरकार का खर्च करना जायज है। जरूरी होने पर मीडिया को अगर कटघरे में खड़ा किया जाता है, और उसके कुसूरवार होने पर उसे जुर्माना या कैद झेलनी पड़ती हैं, तो इससे मीडिया का अपने आप पर एक काबू बढ़ेगा। अब मीडिया के नीति-सिद्धांत, या पत्रकारिता से जुड़े हुए कई किस्म के मूल्यों के कोई रखवाले बच नहीं गए हैं। प्रेस कौंसिल भी बस फटकार लगाने का काम कर सकती है, उससे अधिक कोई अधिकार उसके पास नहीं हैं। और मीडिया का खुद पर काबू भी बहुत से मामलों में नहीं दिखता है। इसलिए देश के बहुत ही लचीले कानून के तहत अगर बहुत ही गैरजिम्मेदार मीडिया को कटघरा देखना पड़ता है, तो यह अपमानित अफसर के साथ-साथ खुद मीडिया के लिए अच्छा होगा, ताकि वह दो-चार बार सजा पाकर सम्हल सके। 
यह बात सुनने में अलोकतांत्रिक लग सकती है, और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के खिलाफ लग सकती है, लेकिन भारतीय कानून इतना लचीला है कि वह कई गुनहगार छोड़ देने का हिमायती है, बजाय किसी बेकसूर को सजा देने के। और जुर्माने या सजा, या मानहानि की भरपाई के हर्जाने की नौबत तभी आएगी, जब किसी का सचमुच ही बदनीयत से अपमान किया गया होगा। लोकतंत्र मीडिया को जितना लिखने, कहने, या दिखाने का हक देता है, वह इस जिम्मेदारी के साथ ही देता है कि देश के बाकी कानूनों का ध्यान रखते हुए ही मीडिया इस अधिकार का इस्तेमाल करेगा, और ऐसे बाकी कानूनों में बाकी लोगों की प्रतिष्ठा के अधिकार भी शामिल हैं। 

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