धर्म-आध्यात्म के नाम पर पाखंड का घड़ा फूट रहा...

संपादकीय
8 अगस्त 2015

पुराने जमाने से समझदार बुजुर्ग यह कहते आए हैं कि अति हर बात की बुरी होती है। इन दिनों धर्म को लेकर आए दिन कुछ न कुछ ऐसा साबित हो रहा है। टीवी की जुर्म की खबरों में, बलात्कार की कहानियों में, आसाराम का दिखना अब रोजाना के बजाय हफ्तावार सा हो गया है, लेकिन कोई न कोई ऐसा बाबा या बीबी या बेबी धर्म से जुड़े हुए सामने आते ही रहते हैं, और कभी कोई संत, कभी कोई महंत, और कभी कोई पादरी सेक्स की खबरों से समाचार चैनलों का पेट भरते रहते हैं। धर्म और आध्यात्म के नाम पर, या उसी के तहत, जितने तरह के सेक्स-अपराध होते हैं, जितने तरह की अनैतिक बातें होती हैं, उतनी दुनिया के और किसी धंधे में नहीं होतीं। और इसमें कोई नई बात भी नहीं है। 
आज जो राधे मां खबरों में है, उसके वीडियो देखें, तो यह वजह साफ लगती है कि भक्तों में इतनी बड़ी भीड़ मर्दों की क्यों लगती है। जैसा लिपटना, और जैसे कपड़ों में नाचना यह औरत कर रही थी, उससे पता नहीं कैसे उन धर्मालुओं की भावनाओं को कोई ठेस नहीं पहुंची जो कि बात-बात पर धार्मिक भावनाएं आहत होने की पुलिस रपट लिखाते हैं। चारों तरफ ऐसी खबरें हैं कि यह राधे मां रात-दिन देवी बनी, और सजी-धजी रहती थी, और भक्तों की भीड़ में जब चाहे तब कूदकर किसी मर्द की भक्त की गोद में भी चढ़ जाती थी। कभी दक्षिण भारत के स्वामी नित्यानंद के वीडियो, तो कभी आसाराम और उसके बेटे नारायण सांईं की बलात्कार की कहानियां, तो कभी पंजाब-हरियाणा के कुछ और स्वघोषित संतों की रंगीन कहानियां, धर्म जिंदगी में जरूरत से अधिक दखल पैदा कर लेने के बाद अब अपना नुकसान खुद करते चल रहा है, और यही शायद प्रकृति का नियम भी है। 
उधर पश्चिम में देखें तो रोमन कैथोलिक धर्म का मुख्यालय वेटिकन दशकों से इस जुर्म से घिरा हुआ है कि चर्च के पादरी और बाकी चोगेदार लोग बच्चों का देह शोषण करते हैं, और पोप से लेकर वेटिकन के बाकी साम्राज्य तक को हांकने वाले तमाम लोग इस जुर्म को दबाते चलते हैं। यही हाल हरे कृष्ण आंदोलन ईस्कॉन का रहा, जिसने अपनी स्कूलों में बच्चों के देह शोषण के हर्जाने के रूप में अमरीकी अदालतों में दसियों करोड़ का भुगतान किया। और आज इस्लाम के नाम पर इराक और सीरिया, और अफ्रीकी देशों में मुस्लिम आतंकी जिस दर्जे के सेक्स-अपराध कर रहे हैं, उसे सुनकर तो मुजरिमों के भी दिल दहल जाते हैं, और यह सब इस उम्मीद और वायदे के साथ किया जा रहा है कि इसके बाद जब ये जेहादी जन्नत पहुंचेंगे, तो वहां 72 कुंवारी हूरें उनके लिए तैयार रहेंगी। 
धर्म का नाम लेकर जितनी महानता और दरियादिली की बातें की जाएं, धर्म का जिंदगी पर अच्छा असर तो पता नहीं घर बैठे रहता है, लेकिन धर्म से सीखी गई हिंसा, धर्म से सीखे गए पाखंड, धर्म के नाम पर धोखाधड़ी, और धर्म के नाम पर सेक्स-अपराध का लंबा इतिहास है। हिन्दू धर्म के जिन लोगों को अपने धर्म में कोई खामी नहीं दिखती, उन लोगों को दक्षिण भारत के मंदिरों में देव-दासियों के नाम पर देह का धंधा करने के लिए मजबूर की गई औरतों की परंपरा और उनकी कहानियां पढऩी चाहिए। मंदिरों के अहातों में ही जिस तरह औरतों को बलात्कार झेलने के लिए देवदासी बनाकर रखा जाता था, उसे धर्म की पूरी मान्यता भी थी। 
अब एक के बाद एक, धर्म और आध्यात्म के पाखंड का भांडाफोड़ होने से लोगों के मन में धर्म के लिए, आध्यात्म के लिए, गुरुओं और पादरियों के लिए, साध्वियों और संत-महंतों के लिए जिस तरह की हिकारत बढ़ती चल रही है, वह समाज के भले की बात है। भारत में तो आज धर्म का नाम लेकर राजनीति में आए, और उसके बाद रात-दिन हिंसा और साम्प्रदायिकता की बात करने वाले लोग केन्द्र की मोदी सरकार को ही डुबाने में लगे हुए हैं। भारत के आम लोग धर्म को आस्था के रूप में लेते हैं, लेकिन धर्म को लेकर, आध्यात्म को लेकर सेक्स-अपराध लगातार सामने आने से अब लोगों का धर्म-आध्यात्म से मोहभंग होने लगा है। पुराने जमाने से यह बात कही जाती है कि पाप का घड़ा पूरा भरने के बाद फूटता है, आज यह घड़ा फूट रहा है, और ऐसे पाखंड के बिखरने के बाद हो सकता है कि अगली पीढ़ी की एक वैज्ञानिक सोच विकसित हो सके, जिससे कि लोगों का नजरिया लोकतांत्रिक और न्यायप्रिय भी हो सकेगा, जो कि धर्मतले मुमकिन नहीं है।

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