केंद्र सरकार पखाना ढोने को हुनर और रोजगार बता रही

4 अगस्त 2015
संपादकीय

भारत सरकार की एक बड़ी महत्वाकांक्षी योजना, कौशल विकास और लोगों को काम दिलवाने की वेबसाईट पर सफाई कर्मचारियों के साथ-साथ मैला उठाने के काम को रोजगार की एक संभावना बताया गया है। और इस नई योजना की नई-नई बनी वेबसाईट पर यह काम तब किया गया है जब सुप्रीम कोर्ट द्वारा दस बरस पहले यह काम करवाने को जुर्म करार दिया जा चुका है। एक तरफ तो सुप्रीम कोर्ट केंद्र सरकार के मार्फत और सीधे भी यह जानकारी राज्यों से मांगती है कि उनके इलाकों में कोई मैला तो नहीं ढो रहे हैं, और दूसरी तरफ केंद्र सरकार के अफसर इसे आज भी एक वैकल्पिक रोजगार बता रहे हैं।
मोदी सरकार की नेशनल करियर सर्विस पोर्टल की वेबसाईट में नाली, गटर साफ करने के अलावा बड़ा साफ-साफ लिखा गया है कि एक और रोजगार इंसान के पखाने को उठाने का है जिसके लिए टीन की प्लेट और झाड़ू की जरूरत पड़ती है। इस काम को असंगठित वर्ग का बताते हुए सरकार की वेबसाईट इस हुनर को मामूली खतरों वाला बतला रही है। मजे की बात यह है कि इस काम को केंद्र सरकार ज्योतिषी, हस्तरेखा विशेषज्ञ, या साहूकारी के काम जितना ही खतरनाक करार दे रही है।
सरकार की तरफ से यह हक्का-बक्का कर देने वाली जानकारी इस बात का सुबूत है कि सरकार हांक रहे लोगों की सामाजिक समझ खत्म हो चुकी है, और ऊंची कुर्सियों पर बैठे लोगों का नीचे समझे जाने वाले लोगों की जिंदगी की कड़वी और तकलीफदेह हकीकत से कोई सामना नहीं होता। इससे यह भी पता लगता है कि ऐसे तबकों और ऐसी जातियों से आरक्षण का फायदा लेकर जो लोग सांसद या मंत्री बनते हैं, बड़े अफसर या सरकारी कर्मचारी बनते हैं, वे भी अपने तबके से संपर्क खो चुके हैं। यह बात इस तथ्य से भी साबित होती है कि भारत की संसद में किस तरह एक-एक करके करोड़पति बढ़ते चल रहे हैं, और गरीबों को टिकट देने के पहले पार्टियां यह सोच लेती हैं कि उनके जीतने की संभावना शून्य होगी। जो आरक्षित सीटें हैं, वहां पर भी उन जातियों या तबकों के बड़े-बड़े ताकतवर हो चुके ठेकेदार ही चुनावी टिकट पाते हैं, चुनाव में फतह खरीदते हैं, और जीत जाने पर कई बार कुर्सियां भी खरीदते हैं। ऐसे लोगों के सत्ता में रहते हुए उनके तबके के जो लोग मैला ढोने के काम को सदियों से करते चले आ रहे हैं, उनके दुख-दर्द की सत्ता तक कोई पहुंच हो भी नहीं सकती।
ऐसी नौबत को देखने के पहले भी हम बार-बार यह लिखते आए हैं कि भारत में संसद-विधानसभा, या स्थानीय चुनाव, या सरकारी नौकरियों के लिए आरक्षण के भीतर मलाईदार तबके को बाहर हटाना जरूरी है, क्योंकि मलाईदार तबके के ताकतवर लोग अपने कमजोर तबके के सच्चे प्रतिनिधि रह भी नहीं जाते। इस बात का वही तबका खुलकर विरोध करता है जो कि आरक्षित तबकों के भीतर मलाईदार हिस्से में आता है, और पीढ़ी-दर-पीढ़ी यही तबका आरक्षण का फायदा पाने के लिए अपने बाकी कमजोर लोगों के मुकाबले अधिक ताकतवर हो चुका रहा है। 
फिलहाल कौशल विकास या हुनर को बेहतर बनाने की प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की योजना पखाना साफ करने को एक हुनर और रोजगार बता रही है, उनको इस बारे में सोचना चाहिए।

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