इलाहाबाद हाईकोर्ट की क्रांतिकारी सोच पर अमल होना नामुमकिन

संपादकीय
19 अगस्त 2015

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने एक महत्वपूर्ण फैसले में कहा है कि नौकरशाहों, नेताओं और सरकारी खजाने से वेतन या मानदेय पाने वाले प्रत्येक व्यक्ति के बच्चों को सरकारी प्राइमरी स्कूलों में पढऩा अनिवार्य किया जाए। साथ ही ऐसा न करने वालों के खिलाफ दंडात्मक कार्यवाही का प्रावधान किया जाए। जिनके बच्चे कॉन्वेंट स्कूलों में पढ़ें, वहां की फीस के बराबर रकम उनके वेतन से काट ली जाए। साथ ही ऐसे लोगों का कुछ समय के लिए इन्क्रीमेंट व प्रमोशन रोकने की व्यवस्था की जाए। अगले शिक्षा सत्र से इसे लागू भी किया जाए। कोर्ट ने साफ किया कि जब तक इन लोगों के बच्चे सरकारी स्कूलों में नहीं पढ़ेंगे, वहां के हालात नहीं सुधरेंगे। कोर्ट ने राज्य सरकार को छह माह के भीतर यह व्यवस्था करने का आदेश दिया है। न्यायमूर्ति सुधीर अग्रवाल ने जूनियर हाईस्कूलों में गणित व विज्ञान के सहायक अध्यापकों की चयन प्रक्रिया को लेकर दाखिल याचिकाओं पर सुनवाई के दौरान सरकारी स्कूलों की दुर्दशा सामने आने पर दिया है। अदालत को बताया गया था कि उप्र के एक लाख 40 हजार जूनियर व सीनियर बेसिक स्कूलों में अध्यापकों के दो लाख 70 हजार पद रिक्त हैं। सैकड़ों स्कूलों में पानी, शौचालय, बैठने की व्यवस्था जैसी बुनियादी सुविधाएं नहीं हैं तो कईयों में छत भी नहीं है। सरकार, नेता व अफसर इस बदहाली के बावजूद बुनियादी शिक्षा के प्रति संजीदा नहीं हैं क्योंकि उनके बच्चे सरकारी स्कूलों में नहीं बल्कि कॉन्वेंट स्कूलों में पढ़ते हैं।
हाईकोर्ट का यह फैसला बड़ा क्रांतिकारी है, और उत्तरप्रदेश सरकार की फर्जी समाजवादी सोच के बिल्कुल विपरीत, संविधान की समाजवादी सोच के मुताबिक है। अगर देश में सरकारी स्कूल और सरकारी अस्पताल, ये दो जगहें सत्ता पर काबिज लोगों, और उनके परिवारों के लिए अनिवार्य की जा सकें, तो ये दोनों बुनियादी सुविधाएं कुछ बरसों के भीतर ही दुनिया की सबसे अच्छी किस्म की हो सकती हैं। लेकिन अदालत की इस अच्छी नीयत, और उसके हौसले को देखते हुए भी हमारा यह मानना है कि भारतीय संविधान के मौजूदा ढांचे में ऐसा नहीं हो पाएगा। हम पूरी तरह से यह चाहेंगे कि ऐसा हो सके, और अगर इसके लिए जरूरी हो तो देश के संविधान में एक बुनियादी फेरबदल भी किया जाए, लेकिन आज का संवैधानिक ढांचा इलाहाबाद हाईकोर्ट का साथ नहीं देगा। इसकी वजह यह है कि सत्ता की किसी भी ऊंची या नीची कुर्सी पर बैठे हुए लोगों, या देश के किसी भी दूसरे नागरिक को इस बात के लिए मजबूर नहीं किया जा सकता कि वे अपने बच्चों को कहां पढ़ाएं, या उनका इलाज कहां कराएं। आज तो छत्तीसगढ़ सहित देश के अधिकतर राज्य और शायद केन्द्र सरकार भी, देश-प्रदेश के बड़े-बड़े निजी अस्पतालों को सरकारी कर्मचारियों के लिए मान्यता प्राप्त बना चुकी हैं, और वहां का निजी महंगा इलाज सरकारी नौकरी की सुविधाओं के दायरे में जोड़ा जा चुका है। जब सरकार अपने लोगों के इलाज के लिए निजी अस्पतालों में महंगा खर्च करती है, और अपने अस्पतालों को चौपट हो जाने देती है, तब स्कूलों की बहुत मामूली खर्च की पढ़ाई किसी पर कैसे थोपी जा सकती है? लोग अपने बच्चों को अगर निजी स्कूलों में पढ़ाते हैं, तो उसका खर्च भी खुद उठाते हैं। उनको किसी कानून के तहत सरकारी स्कूलों में अपने बच्चे भेजने के लिए बेबस नहीं किया जा सकता। सरकार अगर कुछ कर सकती हैं तो सरकारी कर्मचारियों और सरकारी खर्च पर इलाज पाने वाले तमाम लोगों के लिए सरकारी अस्पताल की ही मंजूरी लागू कर सकती हैं। लेकिन अब तो धीरे-धीरे राज्य सरकारें अपनी सहायता से गरीब नागरिकों का इलाज भी महंगे निजी अस्पतालों में करवाने लगी हैं, और जाहिर तौर पर ऐसी मानवीय सरकारी मदद से निजी अस्पताल पनप रहे हैं, और सरकारी अस्पताल चौपट हुए जा रहे हैं। हम इलाहाबाद हाईकोर्ट की भावना की तारीफ करते हैं, लेकिन उस पर अमल की कोई संभावना नहीं देखते। लेकिन इस मुद्दे पर चर्चा के दौरान यह बात जरूर उठनी चाहिए कि सत्ता पर बैठे तमाम लोग जनता के पैसों से अपना इलाज निजी अस्पतालों में करवाने के बजाय सिर्फ सरकारी अस्पतालों में करवाएं, और उसी में सरकारी अस्पतालों की हालत सुधर जाएगी। 

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