मुलायम सिंह जैसे लोगों को जगह-जगह धिक्कारा जाए

संपादकीय
22 अगस्त 2015

सोशल मीडिया पर अमिताभ बच्चन के प्रशंसकों ने उनसे अपील की है कि वे मुलायम सिंह यादव की जिंदगी पर बनने जा रही एक फिल्म को बढ़ावा न दें। इसके पीछे हाल ही में मुलायम का एक सार्वजनिक बयान है जिसमें उन्होंने कहा था कि चार लोग किसी एक से बलात्कार नहीं कर सकते और बलात्कार एक व्यक्ति करता है, और रिपोर्ट चार के खिलाफ लिखा दी जाती है। इसके पहले भी मुलायम सिंह यादव सार्वजनिक बयान दे चुके हैं कि लड़कों से गलतियां हो जाती हैं, इसके लिए उन्हें फांसी देना गलत है। 
मुलायम सिंह यादव अपनी पार्टी की उसी सोच को आगे बढ़ाते हैं, जिसके चलते भारतीय संसद में महिला आरक्षण विधेयक कभी पास हो ही नहीं सका। जो भी पार्टी या गठबंधन सरकार में हो, मुलायम सिंह की सहमति के बिना इतना बड़ा संविधान संशोधन नहीं हो सकता, और मुलायम-लालू जैसे उत्तर भारतीय नेता अपने संसदीय बाहुबल की बदौलत महिला आरक्षण को रोकते आए हैं। ये दोनों नेता समाजवाद के नाम पर बहुत बड़े कलंक हैं, और धर्मनिरपेक्षता-समाजवाद जैसे नारों को लगाते हुए ये दोनों अपने परिवार की अनुपातहीन संपत्ति, परले दर्जे की कुनबापरस्ती, और बहुत ही अश्लील किस्म की पार्टी-तानाशाही का प्रदर्शन करते आए हैं। देश के ये दो सबसे बड़े राज्य इन दोनों कुनबों के नीचे ऐसे कुचल गए हैं, कि वहां धर्मनिरपेक्षता ने दम तोड़ दिया है। लोगों को यह लगने लगा है कि जो धर्मनिरपेक्ष है, या साम्प्रदायिकता-विरोधी है, वह भ्रष्ट तो होगा ही। अब जनता पिछले लोकसभा चुनाव में, या उसके पहले के विधानसभा चुनाव में इन दोनों को अलग-अलग सबक भी सिखा चुकी है, और देश की राजनीति में साम्प्रदायिक ताकतों को इन्हीं दो नेताओं की वजह से एक बड़ी साख मिल जाती है। 
मुलायम सिंह यादव की बातें हैवानियत की हैं। हालांकि हैवान कुछ होता नहीं है, वह इंसान के ही भीतर का एक हिस्सा होता है, जिसे अपना मानने से इंकार करते हुए लोग एक काल्पनिक हैवान खड़ा कर देते हैं, और तमाम बुराइयां उसके माथे पर थोप देते हैं। जिस तरह किसी घर या स्कूल में तोहमत के लिए कुछ शरारती बच्चों की शिनाख्त कर दी जाती है, उसी तरह इंसान अपनी हिंसा के लिए हैवान शब्द गढ़कर काम चलाता है, और उसी भाषा के मुताबिक मुलायम सिंह की बातें हैवानियत की हैं। बलात्कार को लेकर मुलायम सिंह के अलावा अधिकतर दूसरी पार्टियों के नेता बहुत ही गैरजिम्मेदारी और हिंसा के साथ बातें करते हैं, और बलात्कार की शिकार महिलाओं को ही तरह-तरह से जिम्मेदार ठहराने, बलात्कारियों को बचाने में लगे रहते हैं। इक्कीसवीं सदी का लोकतांत्रिक भारत ऐसी जुबानों को उनके मुंह के बाहर खींच लेने की कानूनी ताकत भी नहीं रखता है। हमारा तो मानना है कि सुप्रीम कोर्ट को दखल देकर खुद ही ऐसे लोगों को नोटिस भेजना चाहिए, लेकिन अदालत तो दूर, महिला अधिकारों की हिफाजत के लिए बने हुए राष्ट्रीय महिला आयोग को भी ऐसे नेताओं को नोटिस भेजने की फुर्सत नहीं रहती है। 
भारत में महिलाओं की हालत खराब होने के लिए ऐसे ही नेता, और आयोगों से लेकर अदालतों तक, संवैधानिक कुर्सियों पर बैठे हुए लोगों का निकम्मापन जिम्मेदार है। आज भी हिन्दुस्तानी ताकतवर मर्दों का बस चले, तो वे गर्भ में ही अजन्मी बच्ची की हत्या को बढ़ावा देते चलें, जवान होने तक बच्चियों से बलात्कार करें, दहेज वसूलने के लिए उनको जलाकर मार डालें, और फिर भी अगर कोई महिला बच जाए, तो उसके पति खो देने पर उसे विधवाश्रम भेज दें। इस देश में ऐसे भी नेता और जज अभी जिंदा हैं जिन्होंने राजस्थान में सतीप्रथा का समर्थन किया था, और जो रात-दिन बलात्कार के हिमायती हैं। लेकिन इस बारे में जिन लोगों ने अमिताभ बच्चन से इसी जिम्मेदारी की अपील की है, उनको याद रहना चाहिए कि आज तक अमिताभ बच्चन ने जलते-सुलगते सामाजिक-राजनीतिक मुद्दों पर कुछ भी नहीं कहा है, और अपनी अरबों की दौलत में से समाजसेवा के लिए उन्होंने शायद ही कभी किसी को कुछ दिया है। लेकिन आम जनता को ऐसे हिंसक मुलायम सिंह यादव के खिलाफ जमकर लिखना चाहिए, और जगह-जगह ऐसे लोगों को धिक्कारना चाहिए। 

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