राज-काज के गलत कामों में इंसानियत और मासूमियत की आड़ का हक नहीं

संपादकीय
7 अगस्त 2015
विदेश मंत्री सुषमा स्वराज ने लोकसभा में ललितगेट पर सफाई देते हुए कहा कि उन्होंने कभी भी ललित मोदी को यात्रा दस्तावेज दिलाने के लिए ब्रिटिश सरकार से सिफारिश नहीं की। उन्होंने कहा कि उन्होंने इस संबंध में कोई सिफारिश नहीं की, सिर्फ इतना लिखा कि ब्रिटिश सरकार अपने नियमों के मुताबिक इस पर फैसला ले सकती है। मैंने सिर्फ यह फैसला ब्रिटिश सरकार पर सौंप दिया। सुषमा ने कहा- मैंने ललित मोदी की मदद नहीं की उनकी पत्नी की मदद की है जिन्हें 17 साल से कैंसर है। ललित की पत्नी पर तो कोई आरोप नहीं हैं और वह इस देश की नागरिक हैं। मैं पूछना चाहती हूं कि अगर मेरी जगह सोनियाजी होतीं तो वह क्या करतीं? क्या उस महिला को मरने के लिए छोड़ देतीं। ऐसी महिला की मदद करना अगर गुनाह है तो पूरे राष्ट्र के सामने अपना गुनाह कबूल करती हूं और सदन जो सजा देना चाहे, मैं भुगतने के लिए तैयार हूं।
ललित मोदी की बीमार पत्नी का हवाला देते हुए सुषमा स्वराज ने उसकी आड़ में बचने की कोशिश डॉक्टरों की उस कोशिश के मुकाबले अधिक की है जो कि इस बीमार को बचाने में लगे हुए हैं। सुषमा स्वराज ने ललित मोदी के भारतीय नागरिक होने का हवाला देते हुए राष्ट्रवाद की आड़ लेने की कोशिश की है, एक बीमार महिला तक उसके पति के पहुंचने में मदद मंजूर करते हुए उन्होंने इंसानियत की आड़ लेने की कोशिश की है, और ऐसी नौबत में सोनिया गांधी क्या करतीं, यह सवाल उछालकर उन्होंने सोनिया गांधी को इंसानियत से परे साबित करने की एक कोशिश भी की है। लेकिन सच और हकीकत को देखें तो उनकी ये सारी कोशिशें भारी बचकानी, किसी टीवी सीरियल की तरह आंसू बहाकर भावनात्मक-शोषण, इमोशनल-अत्याचार करने से अधिक कुछ भी नहीं हैं। चूंकि यह पूरा मुद्दा भारत सरकार के सरकारी कामकाज का है, इसलिए सुषमा स्वराज के किए हुए के सीधे-सीधे विश्लेषण की जरूरत है, ठीक वैसे ही जैसे किसी लाश का पोस्टमार्टम किया जाता है, और वैसा करते हुए यह नहीं देखा जाता कि लाश किसी छोटे और मासूम बच्चे की है, या किसी बूढ़े की, या किसी महिला की है। सरकार का कामकाज इमोशनल-अत्याचार से नहीं चलता। 
वैसे तो पाठकों के सामने इस पूरे मामले को अधिकतर खुलासे हैं ही, लेकिन फिर भी यहां पर उन्हें सिलसिलेवार समझने की जरूरत है। सुषमा स्वराज का परिवार पिछले कोई पन्द्रह बरस से ललित मोदी से जुड़ा हुआ है, सुषमा की वकील बेटी बहुत बरसों से ललित मोदी के मामले अदालत में लड़ रही है, और इनमें वह मामला भी शामिल है जिनमें भारत सरकार की ही एक सबसे बड़ी जांच एजेंसी ने ललित मोदी के पासपोर्ट को रद्द करने के लिए अदालत में लड़ाई लड़ी थी, और ललित मोदी की तरफ से इसी मामले में सुषमा की बेटी सरकार के खिलाफ वकील थी। दूसरी बात जो चारों तरफ उजागर हो चुकी है, और सुषमा के पति ने भी मंजूर की है, वह यह कि ललित मोदी अपनी एक कंपनी में सुषमा के पति को डायरेक्टर बनाना चाहते थे, लेकिन उन्होंने इसे मंजूर नहीं किया। तीसरी बात जो मीडिया में छाई हुई अनगिनत तस्वीरों से साफ है, देश की सत्ता के बहुत से बड़े लोगों की तरह सुषमा और उनकी बेटी भी ललित मोदी की क्रिकेट-मेजबानी का लुत्फ उठा चुकी हैं, और इससे परे भी इस परिवार की मेजबानी की और खबरें तारीखों के साथ मीडिया में हैं। 
अब भारत की एक सबसे बड़ी जांच एजेंसी इन्फोर्समेंट डायरेक्ट्रेट ने ललित मोदी के खिलाफ सैकड़ों करोड़ की मनीलॉडिं्रग का केस बनाया है, और इसके लिए ललित मोदी को नोटिस भेजे जा चुके हैं, और उसकी तलाश में इंटरपोल को खबर भी की जा चुकी है। यह एक पूरी तरह कानूनी मामला है, और जो लोग ललित मोदी के मेहमान नहीं भी रहे हैं, जिनके बच्चों ने ललित मोदी के मुकदमे में वकालत नहीं भी की है, वे लोग भी मीडिया से यह जानते हैं कि ललित मोदी भारत की जांच एजेंसियों का भगोड़ा है, और वह भारत लौटने से इंकार करता है, और भारत की पहुंच के बाहर लंदन में उन सैकड़ों करोड़ रूपयों की मेहरबानी से ऐश की जिंदगी जी रहा है, जो कि भारत की ही जांच एजेंसी के मुताबिक उसने रूपयों को काला-सफेद करके बनाए हैं। 
सुषमा स्वराज भारत सरकार में उसी मंत्रिमंडल की सदस्य हैं जिस मंत्रिमंडल में अरूण जेटली नाम के वित्त मंत्री के मातहत इन्फोर्समेंट डायरेक्ट्रेट नाम की जांच एजेंसी काम करती है। एक तरफ यह एजेंसी ललित मोदी को पकडऩे के लिए कानूनी कार्रवाई कर रही है, और दूसरी तरफ उस भगोड़े को ब्रिटिश सरकार से यात्रा-दस्तावेज पाने के लिए भारत सरकार से एक अनापत्ति चाहिए थी, वह अनापत्ति विदेश मंत्री सुषमा स्वराज ने अपनी विदेश सचिव को बताए बिना, प्रधानमंत्री को बताए बिना, वित्त मंत्री को बताए बिना, किसी भी और को बताए बिना महज फोन और ई-मेल पर खुद होकर ब्रिटिश सरकार को दी और कहा कि अगर ललित मोदी को यात्रा-दस्तावेज दिए जाते हैं, तो इससे भारत के ब्रिटेन से संबंध खराब नहीं होंगे। 
अब अगर इस भगोड़े ललित मोदी जैसी नौबत में भारत के एक और भगोड़े दाऊद इब्राहिम को रखें, और यह देखें कि दाऊद भारतीय विदेश मंत्री को लिखे कि उसकी बीवी का ऑपरेशन पुर्तगाल में होना है, और उसे वहां उसके साथ रहना है, इसलिए सुषमा स्वराज पाकिस्तान सरकार को यह अनापत्ति भेजे कि अगर पाकिस्तान सरकार अपने नियमों के तहत दाऊद यात्रा-दस्तावेज देती है, तो इसमें भारत सरकार को कोई आपत्ति नहीं होगी। अब अगर ऐसी अनापत्ति भेजी जाती है, और इसके लिए भारत के गृहमंत्री से सुषमा स्वराज पूछती भी नहीं हैं, प्रधानमंत्री को बताती भी नहीं हैं, तो यह भी उतना ही मानवीय काम होगा जितना मानवीय ललित मोदी की मदद करना रहा।  दाऊद इब्राहिम की पत्नी भी भारत की नागरिक है, और अपनी किसी बीमारी में उसे भी अपने पति को अपने बगल में पाने का उतना ही मानवीय हक है, तो इस पर सुषमा स्वराज क्या करेंगी? यह एक अलग बात है कि उनकी बेटी दाऊद की वकील नहीं हैं, और इस नाते हो सकता है कि दाऊद पर मेहरबानी करना उनके लिए जरूरी न हो।
सुषमा स्वराज को ब्रिटिश सरकार को मना करते हुए यह लिखना था कि भारत का एक भगोड़ा किसी भी तरह के यात्रा-दस्तावेज के लिए अपने खुद के देश से संपर्क करने से बच रहा है, और ऐसे आदमी को ब्रिटिश सरकार का यात्रा-दस्तावेज मिलने से भारत से ब्रिटेन के संबंध खराब होंगे। सुषमा स्वराज ने विदेश मंत्री की कुर्सी पर बैठकर अपने खुद के विदेश सचिव को बताए बिना, पूछे बिना, बीच में रखे बिना, इस तरह से यह अनापत्ति दे दी, कि मानो वे अपने घर से नमक उठाकर पड़ोसन को दे रही हों। ऐसी मासूमियत की आड़ भारत सरकार के कामकाज में नहीं ली जा सकती। एक भगोड़े की ऐसी मदद जितना बड़ा जुर्म है, उतना ही बड़ा जुर्म यह भी है कि अपने प्रधानमंत्री और अपने मंत्रिमंडलीय सहयोगी को अंधेरे में रखकर उनके दायरे में नाजायज दखल देते हुए जांच से घिरे ललित मोदी को ऐसी अनापत्ति देना। आज भाजपा इस बात पर उबली हुई है कि राहुल गांधी ने सुषमा को मुजरिम कहा है। लेकिन राहुल गांधी की कही बात में कोई भी ज्यादती नहीं है, और न ही उसमें कुछ नाजायज है। हम भारत के नक्सल इलाकों में रात-दिन यह देखते हैं कि नक्सली अगर जंगल में किसी की गाड़ी रोककर उस पर चढ़ जाते हैं, और कुछ दूर का सफर करते हैं, तो वैसे लोग भी जेलों में बंद हैं। नक्सलियों ने अगर किसी से काले रंग के कपड़े के थान खरीद लिए हैं, तो वैसे लोग भी जेल में बंद हैं। नक्सलियों ने अगर किसी दर्जी से किसी निजी सुरक्षा एजेंसी के नाम पर कपड़े सिलवा लिए हैं, तो वैसे दर्जी भी जेलों में बंद हैं। ऐसे में भारत सरकार की एक मंत्री दूसरे मंत्रालय की जांच से घिरे हुए भगोड़े को अपने घरेलू रिश्तों के चलते ऐसी मदद करती है, जिसका कि उसे कोई अधिकार नहीं था, तो यह जुर्म नहीं तो और क्या है?
लोकतंत्र में भाजपा सरकार सुषमा को मंत्री बनाए रख सकती है, लेकिन यह पूरी तरह अनैतिक है, और सुषमा स्वराज का संसद का पूरा जवाब अर्धसत्य है। वह उन असुविधाजनक बातों को सोच-समझकर छुपाता हुआ बयान है जिनसे कि उनका जुर्म साबित होता है। आंसुओं की आड़ बुलेटप्रूफ जैकेट नहीं बन सकती। 

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