आईएएस की पटवारी से वसूली सजा कई गुना होनी चाहिए

संपादकीय
6 अगस्त 2015

छत्तीसगढ़ में कल तीन बरस पहले आईएएस अफसर बने एक नौजवान को एक पटवारी से रिश्वत लेते पकड़ा गया। वह पटवारी को कार्रवाई करने की धमकी देकर, ब्लैकमेल करके उससे रिश्वत ले रहा था, कुछ बार रिश्वत देने के बाद थके हुए पटवारी ने एंटी करप्शन ब्यूरो में शिकायत की, और सारे मामले की रिकॉर्डिंग के बाद यह गिरफ्तारी हुई। इस राज्य में ऐसे मौके कम ही आए हैं, या शायद यह पहला ही मौका है कि कोई आईएएस इस तरह रिश्वत लेते गिरफ्तार हुआ है। यह लिखने का यह मतलब बिल्कुल नहीं है कि आईएएस में रिश्वतखोर नहीं होते हैं। इस सेवा में भी भ्रष्ट लोगों का अनुपात उतना ही है, जितना कि किसी दूसरी सरकारी सेवा में है, या देश के बाकी किसी ऐसे पेशे में है जिसमें भ्रष्ट होने की गुंजाइश रहती है। लेकिन इस मुद्दे पर लिखने की कुछ वजह हैं। 
आईएएस जैसी ऊंची सरकारी नौकरी पा लेने के बाद लोगों के सामने न सिर्फ साठ बरस की उम्र तक बंगला, गाड़ी, फोन, अर्दली की सहूलियत की गारंटी रहती है, बल्कि समाज में जरूरत से अधिक, और हक से अधिक सम्मान या दबदबे, या दोनों की गारंटी भी रहती है। रिटायर होने के बाद बड़ी-बड़ी कुर्सियां राह देखते रहती हैं, और पेंशन तो रहती ही है। जो लोग नगद रिश्वत या कमीशन जैसे भ्रष्टाचार नहीं करते, वैसे लोग भी ऊंची सरकार कुर्सियों पर रहते हुए अपनी जिंदगी के बहुत से काम मुफ्त में हासिल करते ही रहते हैं। इस तरह केन्द्र सरकार की ऐसी बड़ी नौकरियों में, या राज्य की बड़ी नौकरियों में आने वाले लोगों के सामने भ्रष्टाचार उस तरह की कोई मजबूरी या बेबसी कभी नहीं रहता जैसा कि किसी ऐसे छोटे कर्मचारी के सामने हो सकता है जिसके घर के एक-दो लोग किसी बड़ी महंगी बीमारी के शिकार हो गए हों, या किसी खर्चीले हादसे के। कुछ बहुत छोटे कर्मचारी जिन पर मां-बाप का बोझ भी हो, अपने खुद के बच्चों का बोझ भी हो, और भाई-बहन का बोझ भी हो, तो हो सकता है वैसे कर्मचारी किसी रिश्वत के लिए अपने को मजबूर पाएं, हालांकि वह भी उतना ही बड़ा जुर्म होगा। 
लेकिन छत्तीसगढ़ के सबसे गरीब और पिछड़े आदिवासी इलाके बस्तर में जिस तरह एक बिल्कुल नौजवान आईएएस अधिकारी रिश्वत लेते पकड़ाया है, और पटवारी जैसे छोटे कर्मचारी को धमकाकर रिश्वत लेते पकड़ाया है, उससे यह जाहिर है कि बस्तर में नक्सलियों को जगह क्यों मिली है। ऐसे ही अफसर देश की आजादी के वक्त से बस्तर की जनता का लहू चूस रहे हैं, उनके साथ बलात्कार कर रहे हैं, उनकी उपज को छीनकर ले जा रहे हैं, उनकी बनाई हुई कलाकृतियों को लूटकर ले जा रहे हैं, और जब तक वे बस्तर में तैनात रहते थे, तब तक वहां के गरीब, बेबस और बेजुबान आदिवासियों को बंधुआ मजदूरों की तरह इस्तेमाल करते भी आए हैं। बस्तर के एक सबसे चर्चित कलेक्टर रहे, और बाद में सामाजिक आंदोलनकारी बन गए डॉ. ब्रम्हदेव शर्मा ने वहां कलेक्टर रहते हुए उन अफसरों की शादियां उन आदिवासी महिलाओं से करवाई थीं जिनको वे सेक्स के लिए अपने घरों में रख रहे थे। यह मामला अपने आप में एक अलग किस्म के विवाद का था, और आधी सदी पहले ही यह मुमकिन था कि कोई कलेक्टर ऐसा काम कर ले, हम उसे सही भी नहीं ठहरा रहे, लेकिन सरकारी आतंक की हकीकत बस्तर में यही रहते आई है। 
अविभाजित मध्यप्रदेश के समय से ऐसी चर्चा बस्तर में आम रहती थी कि भोपाल से जब बड़े लोग वहां हेलीकाप्टर में पहुंचते थे, तो लौटते हुए नोटों से भरे सूटकेस ले जाते थे। हो सकता है कि यह बात महज कहानी हो, लेकिन बस्तर के लूटपाट के इतिहास में पूरी सच्चाई है, और यही वजह है कि जो इलाका सबसे अधिक लुटा, उसी इलाके में नक्सली पनपे। अब जो नौजवान आईएएस अफसर अपने सामने कम से कम तीस-पैंतीस बरस ऐशोआराम की जिंदगी, और उसके बाद मोटी पेंशन तक बुढ़ापे की गारंटी पाकर नौकरी से लगा हो, वह तीन बरस के भीतर ही इस तरह की लूटपाट करने लगा हो। उसने जरा भी वक्त यह देखने में नहीं गंवाया कि अपने हाथ रंगवाए बिना, रिश्वत और कमीशन को कुछ हिफाजत के साथ पाने की राह देख लेता। भारत की किसी भी सरकारी नौकरी में भ्रष्ट लोगों के लिए संभावनाएं निकल ही जाती हैं, लोग चीरघर के बाहर रोते हुए घरवालों से भी लाश को देने के लिए रिश्वत ले लेते हैं, ऐसे में आईएएस के सामने तो पूरी जिंदगी फलों का बगीचा रहता है जिसमें जब जो तोडऩा हो, उसे बस हाथ ही बढ़ाना होता है। लेकिन नौकरी के शुरुआती बरसों में ही जो देश की सबसे ताकतवर और महत्वपूर्ण समझी जाने वाली सर्विस है, उसमें काम छोड़ लूटपाट में लग जाए, उसके बारे में क्या कहा जा सकता है? 
हमारे पाठकों को याद होगा कि हम कई बार यह तर्क लिख चुके हैं कि जब एक ताकतवर किसी कमजोर के खिलाफ जुर्म करे, तो उसकी सजा कई गुना अधिक की जानी चाहिए, क्योंकि कमजोर के पास बचाव की ताकत, सहूलियत, और नौबत की कमी होती है। अब इसी पटवारी को लें, तो एक आईएएस को रंगे हाथों पकड़वाने में अगर वह नाकामयाब हो गया रहता, तो उसे आईएएस अफसर आज नहीं तो कल मक्खी और मच्छर की तरह मसलकर रख देता। इसलिए जब ताकतवर जुर्म करे, और कमजोर के खिलाफ करे, तो उसकी सजा कई गुना होनी चाहिए। 
छत्तीसगढ़ सरकार को यह चाहिए कि अपने अफसरों पर काबू करे। जो खबरें आती हैं, उनके मुताबिक बहुत से अफसर रिश्वतखोरी में लगे हैं, और अभी-अभी दो आईएएस जेल जाने के करीब पहुंच भी चुके हैं। एक महीना भी पूरा नहीं हुआ है कि यह एक और आईएएस जेल पहुंच गया है। राज्य के सबसे बड़े अफसरों की यह सेवा जब ऐसे पुख्ता सुबूतों के साथ पकड़ाती है, तो यह सवाल उठता है कि न पकड़ाने वाले लोग और कितने होंगे? छत्तीसगढ़ सरकार के लिए, और उससे भी बढ़कर, पूरे राज्य के लिए हम इसे एक फिक्र की नौबत मानते हैं, और एक कड़ी कार्रवाई का मौका भी। 

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