मुखिया का बर्दाश्त मौन सहमति के अलावा और कुछ नहीं

संपादकीय
30 सितंबर 2015

उत्तरप्रदेश में दिल्ली के करीब के एक गांव में सोचे-समझे तरीके से हिन्दुओं को यह कहकर भड़काया गया कि गांव के एक मुस्लिम परिवार के लोग गोमांस खा रहे हैं। नौ हजार हिन्दू आबादी के गांव में कुल दो मुस्लिम परिवार थे, और मंदिर से लाउडस्पीकर पर लोगों को उकसाकर, भड़काकर इस घर पर हमला करने भेजा गया, और लोगों ने जाकर घर के बुजुर्ग को बाहर निकाला और सड़क पर पीट-पीटकर मार डाला। आज देश भर में गोमांस को लेकर, मांसाहार को लेकर, जिस तरह की एक हिंसक-धर्मान्धता फैलाई जा रही है, यह उसका एक नतीजा है। लगातार हिन्दू समाज का एक बहुत छोटा तबका गोवंश के पशुओं के मांस के खिलाफ अभियान चला रहा है, और मांसाहार के खिलाफ भी तरह-तरह की रोक के कानून बन रहे हैं, देश में एक शुद्धतावादी, पुरातनपंथी, और फर्जी संस्कृति लादने के लिए हिंसा का खुलकर इस्तेमाल हो रहा है। ऐसा साबित करने की कोशिश हो रही है कि हिन्दू समाज मांसाहारी नहीं था, या हिन्दू समाज में गोमांस कभी खाया नहीं जाता था। खानपान को धर्म से जोड़कर हमले किए जा रहे हैं, मुस्लिमों और ईसाईयों को निशाना बनाया जा रहा है, लेकिन यह बात शुद्धतावादी अनदेखी कर रहे हैं कि हिन्दू समाज का एक बहुत बड़ा हिस्सा मांसाहारी है, और देश के आधे से अधिक हिस्से में ये हिन्दू गोवंश के मांस को भी खाते आए हैं। इस तरह आज हिन्दू धर्म, हिन्दू संस्कृति, हिन्दुस्तानी संस्कृति के ठेकेदार बने हुए मु_ी भर सवर्ण, ब्राम्हणवादी, शुद्धतावादी, और हिंसक-हमलावर लोग खानपान की अपनी सोच को बाकी देश पर थोपने पर आमादा हैं। 
यह लोकतंत्र के लिए एक भयानक नौबत है, और इसका खुलकर विरोध भी हो रहा है। गोमांस खाने वाले हिन्दू समाज के बहुत बड़े हिस्से की सामाजिक-आर्थिक कमजोरी, उनका अछूत या पिछड़ा कहा जाने वाला, माना जाने वाला दर्जा, उनको खुलकर विरोध करने से रोक रहा है। फिर भी मद्रास हाईकोर्ट के वकीलों से लेकर दूसरी कई जगहों तक लोगों ने सार्वजनिक रूप से गोमांस खाकर खानपान पर काबू की सोच का विरोध जाहिर किया है। लेकिन मोदी सरकार आने के बाद साम्प्रदायिक लोगों के एक बड़े तबके को ऐसा लगने लगा है कि उनकी नफरत और उनकी हिंसा के अच्छे दिन आ गए हैं। जिन राज्यों में भाजपा की सरकार है वहां पर गोवंश के मांस को लेकर तरह-तरह के नए कानून बन रहे हैं, या उन पर कड़ाई से अमल हो रहा है। इससे परे भी पूरे देश में तालिबानी अंदाज में हिन्दू समाज के ऐसे हिंसक हिस्से फतवे जारी कर रहे हैं, और जगह-जगह साम्प्रदायिक तनाव खड़ा हो रहा है। अभी दो दिन पहले ही भाजपा शासित झारखंड की राजधानी रांची में मांस के एक टुकड़े को लेकर भारी हिंसा हुई, और मुख्यमंत्री को सड़कों पर निकलकर लोगों से अमन की अपील करनी पड़ी। 
प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी पूरी दुनिया में घूमकर भारत की चाहे जैसी डिजिटल छवि  पेश करने की कोशिश करें, आज के डिजिटल युग में अमरीका में बसे हुए हर भारतवंशी ने अब तक दिल्ली के बगल के गांव की कल की यह खबर पढ़ ली होगी कि किस तरह गोमांस के शक में, बिना किसी सुबूत के लोगों ने एक मुस्लिम बुजुर्ग को घर से निकालकर पीट-पीटकर मार डाला। जिन देशों में मोदी भारत में पूंजीनिवेश की संभावनाओं को बेचना चाहते हैं, वे तमाम देश पढ़े-लिखे हैं, और इस तरह की साम्प्रदायिकता की वहां पर कोई जगह नहीं है। मोदी सरकार की सोच, और साम्प्रदायिकता के लिए उसके बर्दाश्त में एक बड़ा विरोधाभास है। मोदी के मंत्रियों से लेकर मोदी की पार्टी के नेताओं तक, और मोदी के पार्टी की राज्य सरकारों तक, साम्प्रदायिकता को जगह-जगह बर्दाश्त किया जा रहा है, बढ़ावा दिया जा रहा है। प्रधानमंत्री और उनकी पार्टी पता नहीं कैसे भारत की जाति व्यवस्था का यह सच भूल जा रहे हैं कि देश की शायद तीन चौथाई हिन्दू आबादी में आधे से अधिक तबका ऐसा है जो न सिर्फ मांसाहारी है, बल्कि जिसे गोवंश के मांस से कोई परहेज नहीं है। और जब हिन्दुओं में मांसाहार की बात करें, तो शायद तीन चौथाई से अधिक हिन्दू मांसाहारी हैं। ऐसी तमाम हिंसक-साम्प्रदायिकता से मोदी सरकार और भाजपा का जनाधार भी खिसक रहा है, और यह बात अभी खुलकर दिखाई इसलिए नहीं पड़ रही है कि राष्ट्रीय स्तर पर अभी कोई चुनाव नहीं हो रहे हैं। 
भाजपा और उसके सहयोगी संगठन अगर देश में इसी तरह से कट्टरपंथ और अवैज्ञानिक बातों को बढ़ावा देते चलेंगे, तो वे आने वाली कई पीढिय़ों के लिए इस देश की वैज्ञानिक सोच, और तर्कशक्ति को खत्म करने का जुर्म भी कर रहे हैं। आज दुनिया में जो भी देश विकसित हो रहे हैं, वे ऐसे सामाजिक नुकसान के साथ विकास नहीं कर रहे। मोदी एक तरफ तो देश की अर्थव्यवस्था के लिए अच्छे दिन लाने की बात कर रहे हैं, और दूसरी तरफ अपने साथियों की हर किस्म की साम्प्रदायिकता और धर्मान्धता को बर्दाश्त कर रहे हैं। मुखिया का बर्दाश्त करना मौन सहमति के अलावा और कुछ नहीं होता। 
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दबे हुए इतिहास को तो उजागर होना ही चाहिए

29 सितंबर 2015 
संपादकीय

नेताजी सुभाष चंद्र बोस का इतिहास हमेशा से रहस्य में घिरा रहा है। उनकी मौत को लेकर भी दशकों तक यह अटकल चलती रही कि वे मर चुके हैं या कहीं साधू बनकर जी रहे हैं। देश पर आधी सदी से अधिक राज करने वाली कांगे्रस पार्टी के भीतर सुभाष बाबू को नेहरू का एक बड़ा प्रतिद्वंद्वी माना जाता था, इसलिए यह भी माना गया कि नेहरू की दिलचस्पी सुभाष चंद्र बोस के न रहने में जरूर रही होगी। ऐसी गंभीर शंका के लिए सुबूत तो नहीं थे, लेकिन इस बात के सुबूत जरूर थे कि नेहरू सरकार ने लगातार नेताजी पर सरकारी खुफिया एजेंसियों से निगरानी करवाई थी। इस सिलसिले में इतने किस्म के फर्जी और गढ़े हुए कागजात भी हमेशा लोगों के बीच तैरते रहे, कि जिसको जैसा नतीजा निकालना हो, उस किस्म के कागज लेकर आरोप लगाना जारी रहा। ऐसे में पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बैनर्जी ने यह हिम्मत दिखाई है कि आजादी के पहले से लेकर अब तक के बंगाल सरकार के नेताजी से संबंधित कागजात वे जारी कर रही हैं। इससे एक तो नेहरूवादियों को अपने प्रिय नेता पर लगे हुए आरोपों में से अगर कोई आरोप बेबुनियाद होंगे, तो उनको हटाने का एक मौका मिलेगा। और दूसरी बात यह भी होगी कि जो लोग आधी-अधूरी जानकारी के आधार पर भारतीय इतिहास के इस सबसे महत्वपूर्ण दौर का इतिहास लिख रहे थे, अब उनके हाथ कुछ नई बुनियाद लगेगी।
हमारा यह मानना है कि इतिहास को बहुत छुपाकर रखना मुजरिमों का काम होता है। जब इतिहास इतना पुराना हो चुका रहता है कि वह वर्तमान को नुकसान नहीं पहुंचा सकता, तब उसका उजागर हो जाना सबके भले का रहता है। भारत में लोगों को याद होगा कि कई बरस पहले देश के एक बड़े नेता रहे मौलाना अबुल कलाम आजाद की लिखी एक किताब का एक सील बंद रखा गया तीस पेज का हिस्सा सामने आया था जिसे उन्होंने अपनी मौत के बीस बरस बाद ही खोलने के लिए कहा था।  यह हिस्सा उनकी आत्मकथा इंडिया विन्स फ्रीडम, का अप्रकाशित हिस्सा था। इसमें उनके समकालीन कुछ लोगों के बारे में ऐसी आलोचना से भरे हिस्से थे जो कि सरकार के लिए और मौलाना के साथियों के लिए शर्मिंदगी की वजह बन सकते थे।
इतिहास के प्रति हर किसी की यह जिम्मेदारी रहती है कि वे अपने देश-प्रदेश की जनता, और अपने को जानने-मानने वाले लोगों के सामने इतिहास की जरूरी हकीकत को उजागर करके जाएं। इसलिए नेहरू ने अगर सुभाष चंद्र बोस के साथ कोई ज्यादती की थी, सरकार और खुफिया मशीनरी का बेजा इस्तेमाल किया था, तो भी वह बात अब सामने आनी चाहिए। गांधी हों, नेहरू हों, या गोडसे हो, इन सबकी हकीकत पूरी पारदर्शिता के साथ सामने आनी चाहिए। और यह भी हो सकता है कि नेताजी की उजागर हो रही फाईलों से नेहरू पर चली आ रही तोहमतें खत्म भी हों।
दुनिया के सभ्य देशों और विकसित लोकतंत्रों में सार्वजनिक जगहों पर रहे लोगों से जुड़ी हर बात उजागर करने का एक लगातार सिलसिला चलता है। दुनिया में सबसे अधिक साजिशों और हमलों का जिम्मेदार अमरीका भी शायद बीस बरस बाद तमाम फाईलों को उजागर कर देता है, और हो सकता है इसमें राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़ी हुई कुछ गोपनीय फाईलें हों, लेकिन अधिकतर हिस्सा सामने आ जाता है। यह भारत के लिए एक अच्छी बात है कि दबे हुए इतिहास के सामने आने का एक सिलसिला शुरू हो रहा है, और इससे अब सरकारों में बैठे लोग गलत काम करने के पहले यह याद रखेंगे कि आने वाले बरसों में इन कामों का इतिहास भी उजागर होगा।

लोकतंत्र के स्तंभों को काटकर भट्टी जलाने पर आमादा लोग

संपादकीय
28 सितंबर 2015

राहुल गांधी एक कार्यक्रम में हिस्सा लेने अमरीका गए, तो भाजपा के राष्ट्रीय प्रवक्ता टीवी समाचार चैनलों पर सौ तरह से यह साबित करने में लग गए कि राहुल जिस कार्यक्रम में गए हैं, वह कार्यक्रम तो जुलाई में ही हो चुका है, और कांग्रेस अपने नेता के बारे में झूठ बोल रही है। यह बहस खासी लंबी चली, और भाजपा के प्रवक्ताओं का हाल यह था कि वे अपने नेता, प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के अमरीका दौरे के बजाय राहुल के अमरीका-दौरा न होने का दावा करने में अधिक मेहनत करते दिखे। इसके जवाब में आज राहुल गांधी की तरफ से ट्विटर पर उनके उस कार्यक्रम में मौजूदगी की कई तस्वीरें पोस्ट की गई। 
एक लोकतंत्र में राष्ट्रीय पार्टियों का यह रवैया ठीक नहीं है। इतनी राजनीतिक बात तो ठीक रहती कि क्या राहुल गांधी को बिहार चुनाव के वक्त चुनाव प्रचार से अलग रखने के लिए उनको अमरीका भेजा गया है? लेकिन यह बात नाजायज है कि कोई पार्टी अपने नेता के बारे में एक औपचारिक बयान दे रही है, और बिना किसी सुबूत के विरोधी पार्टी उसे झूठ करार देने के लिए जान लगा दे। आज अगर कांग्रेस की पोस्ट की गई तस्वीरें झूठी नहीं हैं, तो बोलचाल की जुबान में यह पूछा जा सकता है कि भाजपा के दिग्गज प्रवक्ता अपने कहे हुए झूठ का अब क्या करेंगे? और यह बात सिर्फ इसी एक मामले को लेकर नहीं है, भारतीय राजनीति में बहुत सी पार्टियों के बीच, और बहुत से नेताओं के बीच एक रासायनिक-दुश्मनी दिखाई पड़ती है। यह दुश्मनी इंसानी दुश्मनी से बहुत अधिक है, और ऐसा लगता है कि दो रसायन एक-दूसरे को बर्दाश्त नहीं कर पाते हैं, या जिस तरह चुम्बक के दो एक जैसे ध्रुव एक-दूसरे को दूर ही धकेलते हैं, आसपास रहने की कोई वैज्ञानिक संभावना नहीं रहती। 
यह सिलसिला इस लोकतंत्र को गड्ढे में धकेल रहा है। जिस लोकतंत्र में संसद के भीतर देश के हित में मिलकर बात करने, बहस करने, और फिर जनहित के फैसले लेने की उम्मीद की जाती है, उस लोकतंत्र में पिछले कई बरसों से हम एक ऐसा अंतहीन टकराव देख रहे हैं, जो सिर्फ बढ़ते दिख रहा है। यह लोकतंत्र नहीं है, और यह संसदीय लोकतंत्र नहीं है। दूसरी बात यह कि कांग्रेस हो या भाजपा, या कि कोई और पार्टी, आज समकालीन राजनीतिक इतिहास लगातार दर्ज हो रहा है, और ऐसे में भी भारतीय राजनीतिक दलों को अपना नाम कालिख से लिखे जाने का कोई डर दिखाई नहीं पड़ रहा है। देश जाए भाड़ में, लेकिन अगर विपक्षी पार्टी या विरोधी नेता को भाड़ में झोंकने के लिए साथ में बंधा हुआ देश भी जा रहा हो, तो भी किसी को इससे परहेज नहीं दिख रहा है। ऐसे में जब भारत के लोग इस देश को दुनिया का सबसे बड़ा लोकतंत्र करार देते हैं, तो यह दुनिया की सबसे बड़ी भीड़ तो कही जा सकती है, इसे लोकतंत्र कहना अब जायज नहीं लग रहा है। लोकतंत्र महज चुनावों की निरंतरता का नाम नहीं हो सकता, लोकतंत्र उससे बढ़कर है, और भारत में आज साम्प्रदायिक बातें, सरकार और संसद का टकराव, अदालत का बेअसर हो जाना, और मीडिया का बाजारू हो जाना, ये तमाम बातें इस लोकतंत्र के नाकामयाब हो जाने के मजबूत सुबूत हैं। लेकिन इस नौबत से उबरना इसलिए आसान नहीं दिख रहा है क्योंकि लोग एक-दूसरे को आग में झोंकने के लिए लोकतंत्र के स्तंभों को काटकर भट्टी जलाने पर आमादा दिख रहे हैं। 

जनता के हक की खदानों को लेकर बहुत सावधानी जरूरी

संपादकीय
27 सितंबर 2015

छत्तीसगढ़ के एक सबसे बड़े उद्योग वेदांत को राजस्थान में सरकार की कुर्सियों पर बैठे लोगों ने सैकड़ों करोड़ का नाजायज फायदा पहुंचाया, और अभी वहां के एक बड़े आईएएस अफसर की गिरफ्तारी के बाद ये सारी बातें दुबारा खुलकर सामने आ रही हैं। पिछली कांग्रेस सरकार ने भी नाजायज फायदा पहुंचाया, और मौजूदा भाजपा सरकार के रहते तो खनिज भ्रष्टाचार में ये गिरफ्तारियां हुई ही हैं। यही वेदांत कंपनी छत्तीसगढ़ में बालको चलाती है जहां पर मजदूरों की बेहाली है, और इस कंपनी पर हजार एकड़ से अधिक सरकारी जमीन अवैध कब्जे का मामला बिलासपुर हाईकोर्ट पहुंचा था, और वहां पर केस हार जाने के बाद छत्तीसगढ़ सरकार उस फैसले के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट नहीं गई थी। ठीक ऐसा ही राजस्थान मेें वेदांत की एक कंपनी के खुदाई घोटाले में हुआ था। गहलोत-सरकार के वक्त हाईकोर्ट से सरकार ने ही वेदांत के खिलाफ अपना मामला वापिस ले लिया था, और वेदांत को 6 सौ करोड़ का नाजायज फायदा होने का मामला अभी वहां एसीबी ने सामने रखा है। 
देश के जिन प्रदेशों में खनिजों के भंडार हैं, वहीं पर जंगल भी हैं, और इनमें से कई इलाकों में नक्सली भी हैं। वहां पर आदिवासियों पर बेदखली का खतरा भी है, और कुदरत को भी नुकसान पहुंचने का। जब विकास और पर्यावरण के बीच एक टकराव चल ही रहा है, तब देश-प्रदेश की प्राकृतिक-संपदा निजी हाथों में देने के पहले सरकारों को बहुत ही बारीकी से, और बहुत ही न्यायसंगत होकर, पारदर्शी तरीके से काम करना चाहिए, क्योंकि एक बार कोई खदान या जमीन निजी हाथों में गई, तो वह जिंदगी भर के लिए गई। आज हम देख रहे हैं कि पिछली यूपीए सरकार के वक्त प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह की अगुवाई में, उनके कोयला मंत्री भी रहते हुए जिस तरह देश भर की कोयला खदानों को सरकार और कारोबार ने मिलकर लूटा था, वह आज अदालती कटघरे में है। जिस तरह कर्नाटक में लोहे की खदानों को लूटने वाले रेड्डी-भाईयों ने अपने सिर पर सुषमा स्वराज का हाथ रहते हुए, खुद विधायक और मंत्री रहते हुए जिस तरह की खनिज-लूटपाट की थी, उससे कर्नाटक के कुपोषण के शिकार बच्चों की मौत की गारंटी हो गई थी। 
यह हाल खनिजों वाले सभी राज्यों का है। और छत्तीसगढ़ को भी इस मामले में बहुत सावधान रहना चाहिए कि उसकी खदानें देश और प्रदेश के सबसे बेहतर हितों के साथ ही किसी को मिले। हमारा देखा हुआ है कि खदानों को बांटने की लंबी प्रक्रिया में कांग्रेस और भाजपा, केन्द्र और राज्य सरकार, अलग-अलग पार्टियों के नेता, ये सब एक भी हो जाते हैं। छत्तीसगढ़ में पुष्प स्टील को खदान देने का मामला बरसों से सुर्खियों में रहा, और भाजपा सरकार पर खदान देने का आरोप लगा, और केन्द्र में कांग्रेस के एक सबसे बड़े नेता मोतीलाल वोरा पुष्प स्टील की सिफारिश में चि_ी लिखने की तोहमत भी लगी, और वह चि_ी इसी अखबार में छपी भी थी। दरअसल खदानों और खनिज के मामले में इतनी मोटी कमाई रहती है कि नेताओं से लेकर अफसरों तक, और पार्टियों से लेकर अदालतों तक, जगह-जगह प्रभावित करने का सिलसिला चलते रहता है। ऐसे में कभी मीडिया, तो कभी कोई जनसंगठन, तो कभी कोई जनआंदोलन प्राकृतिक संपदा की लूटपाट, बंदरबांट को रोकने में असरदार भी हो पाते हैं। सूचना के अधिकार ने भारत में ऐसे मामलों में भांडाफोड़ करने का एक बड़ा काम किया है। फिर सुप्रीम कोर्ट से लेकर राष्ट्रीय ग्रीन ट्रिब्यूनल तक का नजरिया खदानों और कारखानों को लेकर जनहित का रहते आया है। लेकिन राजस्थान के इस ताजा मामले को देखते हुए हम फिर छत्तीसगढ़ सरकार को आगाह करना चाहेंगे कि उसे खनिज मामलों में, जमीन और जंगल के मामले में, कारखानों और खदानों के मामले में बहुत ही सावधानी से काम करना चाहिए, क्योंकि इसमें कोई भी नाजायज फैसला इस गरीब प्रदेश के गरीब लोगों के हक को छीनकर किसी एक रईस को देने का होगा। इसमें पूरी पारदर्शिता रखी जानी चाहिए, क्योंकि जेलों में बंद आन्ध्र के रेड्डी, या केन्द्र में मंत्री रहे लोग, या अदालती कटघरे में खड़े जिंदल से लेकर मनमोहन सिंह तक, मिसाल और चेतावनी की शक्ल में सामने हैं ही। 

राज्य में महिलाओं के शोषण पर सत्ता-आयोग की खामोशी

संपादकीय
26 सितंबर 2015

छत्तीसगढ़ में पुलिस ने अधिकतर बड़े जुर्म सुलझाकर मुजरिमों को गिरफ्तार किया है। कुछ गिने-चुने अपराध ही ऐसे रह गए हैं जो कि सुलझे नहीं हैं, या कि जो बहुत महत्वपूर्ण नहीं हैं। लेकिन इस बीच हर कुछ हफ्तों में ऐसी खबर आती है कि छेडख़ानी से परेशान होकर किसी लड़की ने खुदकुशी कर ली। ऐसा देश के दूसरे हिस्सों में भी होता है, लेकिन छत्तीसगढ़ में जहां पुलिस कुछ मामलों में अच्छा काम कर रही है, वहीं ऐसे मामलों में समय रहते कोई कार्रवाई न करना एक निराशा पैदा करता है। पुलिस को पहली शिकायत मिलते ही इस किस्म के मामलों में लड़की या महिला को परेशान करने वालों को दबोचना चाहिए, और न्यायसंगत कार्रवाई करनी चाहिए। 
यह भी समझने की जरूरत है कि पुलिस तक अगर एक लड़की शिकायत करने के लिए पहुंच रही है, तो उसके अनुपात में शायद हजार लड़कियां ऐसी होंगी जो कि शिकायत करने का हौसला नहीं जुटा पाती होंगी। और फिर पुलिस कार्रवाई न होने से खुदकुशी की नौबत वाली एक खबर भी ऐसी हजारों लड़कियों को पुलिस के पास जाने से रोकती होगी। साथ-साथ जो ऐसे मुजरिम हैं, उनका हौसला भी  अदालत या जेल न जाकर, सजा न पाकर बढ़ते चले जाता होगा, और छेडख़ानी बढ़ते-बढ़ते बलात्कार तक पहुंचती होगी। यह नौबत बिल्कुल भी बर्दाश्त नहीं की जा सकती, और सरकार को यह चाहिए कि छेडख़ानी या शोषण की किसी भी शिकायत पर तुरंत कार्रवाई हो। जब सरकार बलात्कार की रिपोर्ट या खुदकुशी के बाद की जांच का इंतजार करे, तो वह सरकार जनकल्याणकारी नहीं हो सकती। छत्तीसगढ़ में ऐसी अनगिनत शिकायतों के बाद भी इसे किसी साइकिल चोरी जैसा आम जुर्म मान लिया जाता है, और इससे राज्य में लड़कियों के बीच आत्मविश्वास खड़ा नहीं हो पाता। स्कूली लड़कियों को साइकिलें बांट देने से उनका भविष्य नहीं बनता, अगर इसके साथ-साथ उन्हें सुरक्षा भी न दी जाए। 
इस राज्य में महिलाओं और बच्चों की सुरक्षा के लिए जो संवैधानिक संस्थाएं हैं, वे भी दबी-दबी जुबान में ही बात करती हैं, ताकि सत्तारूढ़ लोगों को कोई असुविधा न हो। यह संवैधानिक व्यवस्था की नीयत को परास्त करने का काम है। सरकार से परे ऐसे आयोग इसीलिए बनाए जाते हैं कि वे सरकार की गलतियों, या गलत कामों पर नजर रख सकें, जवाब-तलब कर सकें, और जनता के प्रति अपनी जवाबदेही पूरी कर सकें। लेकिन अखबारों में जब ऐसी खबरें छप भी जाती हैं, तब भी इस राज्य में, और मोटे तौर पर बाकी देश में भी इन आयोगों के चेहरों पर शिकन नहीं दिखती। इनकी सक्रियता उसी समय दिखती है जब इनको मनोनीत करने वाली पार्टी सत्ता में न हो, और किसी दूसरी पार्टी का सत्ता पर कार्यकाल शुरू हो जाए। वैसे में राष्ट्रीय आयोगों से लेकर प्रदेशों के आयोगों तक पर काबिज लोग मानो विपक्ष की भूमिका निभाने लगते हैं। 
छत्तीसगढ़ के बारे में हम जोर देकर यह बात कहना चाहते हैं कि अगर बच्चों और लड़कियों-महिलाओं की शिकायतों पर, उनकी स्थिति पर अगर महिला और बाल आयोग/परिषद ध्यान नहीं देंगे, तो इतिहास भी अखबारी कतरनों के साथ-साथ इनकी गैरजिम्मेदारी को भी दर्ज करते चल रहा है। इस राज्य में सरगुजा में पुलिस ने एक नाबालिग लड़की को नक्सली कहते हुए उसके साथ बलात्कार किया, और उसकी हत्या कर दी, और सत्ता और संवैधानिक आयोग बरसों तक इस जुर्म को इसलिए छुपाते रहे कि सत्तारूढ़ पार्टी को असुविधा न हो। हमारा मानना है कि सरकार या संवैधानिक आयोगों का यह रूख अपने आप में एक बड़ा जुर्म है, और जनता को जागरूक होकर ऐसी सरकारी-संवैधानिक अमानवीयता का जमकर विरोध करना चाहिए। 


इंसानियत भारत-पाक सरहद की बाड़ से ऊंची

संपादकीय
25 सितंबर 2015

दस बरस का एक बच्चा पाकिस्तान से भटककर भारत पहुंच गया, और पिछले पांच बरस से यहीं फंसा हुआ है। अब कुछ लोगों की मदद से और सोशल मीडिया पर उसकी कहानी फैलने से पाकिस्तान में उसकी मां तक खबर पहुंची, और भोपाल में रह रहे इस बच्चे से मां की बात हो पाई। अब उम्मीद है कि पांच बरस बाद यह बच्चा शायद घर लौट सके। पिछले ही हफ्ते पाकिस्तान के तीन और बच्चे सरहद पर बाड़ के नीचे से भारत की तरफ दाखिल हो गए थे, और उन्हें बीएसएफ ने पकड़ा था। वे भी बहुत कम उम्र के बच्चे थे, और सरहद के दोनों तरफ थोड़ी-बहुत ऐसी आवाजाही गलती से हो जाती है। हमारे पाठकों को याद होगा कि कुछ बरस पहले इस अखबार में हमने कश्मीर के एक ऐसे बुजुर्ग को इंटरव्यू करके वह कहानी छापी थी कि किस तरह वे 15 बरस की उम्र में भारत की तरफ से पाकिस्तान दाखिल हो गए थे, और कोई कागजात, कोई शिनाख्त न होने पर वे कभी हिन्दुस्तान लौट नहीं पाए। वहीं कामकाज करने लगे, वहीं कुनबा बन गया, और अभी कुछ बरस पहले वे करीब 60 बरस बाद कश्मीर लौट पाए थे, कुछ दिनों का वीजा पाकर, बचे-खुचे परिवार से मिलने के लिए। अभी कुछ समय पहले ही भारत की एक हिन्दू लड़की की कहानी पाकिस्तान से तस्वीरों सहित छपी थी, और उसे भी भारत लाने की कोशिश चल रही है। 
इन दोनों देशों के बीच लंबी सरहद जुड़ी हुई है, लंबा इतिहास जुड़ा हुआ है, और गहरे रिश्ते भी जुड़े हुए हैं। ऐसे में गलती से सरहद पार कर लेने वाले लोगों के साथ हमदर्दी की जरूरत है। दोनों जगहों के अनगिनत लोग सरहद पार जेलों में कैद रहते हैं, उनके मरने की उम्र आ जाती है, लेकिन वे देश लौट नहीं पाते। कुछ बरस पहले की लोगों को याद होगी कि पाकिस्तान के एक बहुत ही जर्जर हो चुके बुजुर्ग प्रोफेसर को मरणासन्न हालत में भारतीय कोर्ट की इजाजत से पाकिस्तान वापिस लौटने मिला था, और यहां पर वे किसी बहुत ही मामूली से मामले में बरसों से फंसे हुए थे। पाकिस्तान की जेलों में सैकड़ों ऐसे भारतीय कैद है, और वहां पर भी कुछ नेता उनके मामलों को लगातार उठाते हैं, और दोनों देशों के बीच एक बेहतर रिश्ते के लिए कोशिश भी करते हैं। 
भारत और पाकिस्तान परंपरागत रूप से एक-दूसरे को दुश्मन भी मानते हैं, और मानने से परे हकीकत यह है कि दोनों पड़ोसी हैं। इन दोनों को सरहद की फौजी तैयारियों से परे आम इंसानों के साथ रहम का इंतजाम करना चाहिए। एक दूसरे की जमीन पर गलती से पहुंच गए लोगों को जेलों में कैद रखना बहुत ही अमानवीय है, और आपसी समझ से इसे निपटाना चाहिए। ऐसे बहुत से मामलों में जितना दर्द छिपा हुआ है, जितनी तकलीफें लोग झेल रहे हैं, उनको देखकर सआदत हसन मंटो की कहानी टोबा टेकसिंह याद आती है। और उसी कहानी जैसी दर्दनाक हालत हजारों असल जिंदगियों की भी है। जब दोनों देश एक-दूसरे के साथ बातचीत के रिश्ते भी नहीं रख पा रहे हैं, तब सरकारों और फौजों से परे, आम जिंदगी की ऐसी कहानियां दोनों देशों को करीब ला सकती हैं। पिछले बरसों में लगातार ऐसी खबरें तस्वीरों सहित छपती रही हैं कि किस तरह पाकिस्तान के बहुत से बच्चे गंभीर ऑपरेशन के लिए हिन्दुस्तान लाए जाते हैं, और यहां पर ठीक होकर वे अपने देश लौटते हैं। इसी तरह कहीं कला, कहीं संगीत, कहीं फिल्म, और कहीं टीवी पर रियलिटी शो, इन सबमें जब दोनों देशों के लोग मिलकर काम करते हैं, तो सरहद का तनाव नजरों से कुछ पल के लिए ओझल होता है। 
दरअसल दो देशों के बीच तनाव राजनीतिक कारणों से, और राजनीतिक मजबूरियों से भी होता है। और फिर फौजी ताकतें हमेशा ही जंग की बात करती हैं, क्योंकि उनको वही एक जुबान आती है। ऐसे में दोनों तरफ के अमन-पसंद लोगों को हर छोटे-छोटे इंसानी मामले में बड़ी-बड़ी दरियादिली दिखाते हुए कोशिश करनी चाहिए, और यह साबित करना चाहिए कि इंसानियत सरहद की बाड़ से बहुत अधिक ऊंची होती है। 

सड़कों पर मौत रोकना अब नहीं तो कब?

संपादकीय
24 सितंबर 2015

कल भरी दोपहर छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर में तेज रफ्तार कारों पर सवार नौजवान कॉलेज छात्र शायद एक-दूसरे की गाड़ी से रफ्तार का मुकाबला करते हुए हादसे का शिकार हुए, और तीन जिंदगियां चली गईं। मामला दिन का था, राजधानी का था, रफ्तार और जाने-पहचाने परिवारों का था, तो खबर भी खुलासे से तस्वीरों सहित छपी, और लोगों को दिल दहला गई। लेकिन यह हाल कम चर्चित मौतों का भी रोजाना किसी न किसी जगह से सामने आता है। दो दिन पहले ही मुख्यमंत्री डॉ. रमन सिंह ने ट्रैफिक की जागरूकता के लिए एक बड़े स्टेडियम में दसियों हजार छात्र-छात्राओं के बीच ट्रैफिक सुरक्षा पर जोर देकर अपनी बात कही, और छात्र-छात्राओं के उसी तबके के तीन नौजवान जिंदगियां कल खत्म हो गई, और कई जख्मी हैं। 
हम हर कुछ हफ्तों में इसी जगह पर ट्रैफिक को लेकर अपनी फिक्र जाहिर करते हैं, और इस अखबार के शुरू से ही हम इसमें अपनी तरफ से ट्रैफिक की जागरूकता के लिए इश्तहार बनाकर छापते भी आए हैं। इन दिनों भी गणेश चतुर्थी के मौके पर जो विज्ञापन हम लगातार छाप रहे हैं, मुख्यमंत्री ने उसी विज्ञापन के स्लोगन को इस कार्यक्रम में बड़ी मौजूदगी के बीच बढ़ावा दिया, और वही संदेश लोगों को दिया। लेकिन हकीकत यह है कि भाषणों से मौतें थम नहीं रही हैं। भारत के इस हिस्से में लोग अपनी खुद की जिंदगी की हिफाजत को लेकर इस कदर लापरवाह हैं कि दसियों लाख की गाड़ी जरूर खरीद लेते हैं, लेकिन उसमें मुफ्त में मिला हुआ सीट बेल्ट लगाने को अपनी तौहीन समझते हैं। संपन्न मां-बाप बच्चों को लाखों रूपए दाम की मोटरसाइकिलें दिलवा रहे हैं, लेकिन हेलमेट लगाने से लोग कतराते हैं, और उसे सिर पर बोझ मानकर चलते हैं। ऐसे ही लोगों के लिए सरकार को ट्रैफिक के कड़े नियम बनाने पड़े हैं, और देश भर में जो नियम लागू हैं उनको तोडऩे वाले छत्तिसगढिय़ा अपने आपको सबसे बढिय़ा मानते हुए अपने को मौत-प्रूफ साबित करने की कोशिश करते हैं। इस प्रदेश में तकरीबन हर कोई यह मानकर चलते दिखते हैं कि सड़कों पर मौत किसी और की ही हो सकती है, उनकी नहीं हो सकती। 
यह बात हमारी समझ से पूरी तरह परे है कि जो मुख्यमंत्री हेलमेट को बढ़ावा देने के लिए सड़कों पर दुपहिये पर खुद हेलमेट लगाकर निकलते हैं, उनकी पुलिस को भी हेलमेट कड़ाई से लागू करने में कोई दिलचस्पी नहीं है। और फिर अकेली पुलिस को क्यों कोसना, पुलिस तो नेताओं और प्रशासनिक अफसरों के मातहत काम करती है, और जब तक सरकार में यह हौसला न हो, ऐसी नीयत न हो, कि अपने लोगों को नियम-कायदे मानना सिखाया जाए, तब तक पुलिस कुछ दिनों का एक अभियान ही चला सकती है। छत्तीसगढ़ की सड़कों पर रोजाना अनगिनत मौतें हो रही हैं। इनमें से कुछ मौतों के आंकड़े तो आ जाते हैं लेकिन जो लोग तुरंत नहीं मरते, उनकी बाद में होने वाली मौत खबरों में नहीं आतीं। इन लोगों को बचाने में सरकार और बीमा कंपनियों का भी खासा खर्च होता है, और इनकी मौत या इनके जिंदगी भर के जख्म से इनके परिवार की कमर भी टूट जाती है। 
सरकार को अपनी यह न्यूनतम जिम्मेदारी तुरंत गंभीरता से लेनी चाहिए, और ट्रैफिक के खतरों के लिए जिम्मेदार तीन-चार बुनियादी बातों पर ही अगर ध्यान दिया जाए, तो मौतें एकदम घट सकती हैं। पहली बात नशे में गाड़ी चलाने की है, जिसकी जांच के लिए पुलिस उपकरण लेकर कभी-कभी तस्वीरें खिंचवाती है। दूसरी बात तेज रफ्तार गाड़ी चलाने की है, जिसकी रफ्तार नापने के लिए पुलिस के पास उपकरण मौजूद हैं, और बड़ी आसानी से ऐसी गाडिय़ों को पकड़ा जा सकता है। तीसरी बात बिना हेलमेट या बिना सीट बेल्ट गाडिय़ां दौड़ाने की है, और इनको पकडऩा भी बहुत ही आसान है। चौथी बात कम उम्र के लोगों का गाडिय़ां दौड़ाना है, और ऐसे बच्चों के पालकों पर भी कानूनी कार्रवाई करनी चाहिए, और उन गाडिय़ों को लंबे समय के लिए जब्त भी करना चाहिए। ये काम राजधानी के चौराहों से शुरू होने चाहिए ताकि इनका असर बाकी राज्य तक जा सके। 
अभी छत्तीसगढ़ की सरकार सड़क की मौतों को रोकने में दिलचस्पी लेते नहीं दिख रही है। इसी प्रदेश में हमने किसी-किसी जिले में एक अकेले एसपी को देखा है जिसने कि राज्य शासन के किसी खास निर्देश के बिना भी अपने बूते ही जिले के सभी शहरों में हेलमेट को कामयाबी से लागू करवा दिया था। लगातार मौतों के बाद भी आज सरकार अपनी इस न्यूनतम बुनियादी जिम्मेदारी से कतरा रही है। 
हमारा मानना है कि राज्य सरकार जितना बजट सड़कों को चौड़ा बनाने में खर्च करती है, उसका एक हिस्सा अनिवार्य रूप से उन सड़कों पर तेज होने जा रहे ट्रैफिक को काबू करने के लिए रखना चाहिए। इसी तरह का हिस्सा गाडिय़ों के रजिस्ट्रेशन से मिलने वाली रकम से सीधे-सीधे अलग कर देना चाहिए, और उसे ट्रैफिक सुरक्षा के लिए देना चाहिए। आज ट्रैफिक पुलिस राजधानी में तो नजर आ जाती है, लेकिन प्रदेश के बाकी हाईवे पर उसकी मौजूदगी न के बराबर हैं। मुख्यमंत्री को बिना देर किए इसके लिए एक बैठक बुलाकर एक अभियान छेडऩा चाहिए, जिस राज्य में एक-एक नवजात शिशु को बचाने के लिए सरकार मेहनत करती है, वहां हादसों में ऐसी मौतें बहुत तकलीफदेह हैं। 

छत्तीसगढ़ की पाठ्य पुस्तक में महिलाओं का साफ अपमान

संपादकीय
23 सितंबर 2015

छत्तीसगढ़ की एक स्कूली किताब में छपी हुई एक लाईन देश भर में एक खबर बन गई है। इसे चुनौती देते हुए सरगुजा की एक नौजवान शिक्षिका ने राज्य के महिला आयोग को शिकायत भेजी, और मीडिया से लेकर सोशल मीडिया तक छत्तीसगढ़ फिर चर्चा में आ गया, इस बार बुरी चर्चा में। इस स्कूली किताब में देश में बेरोजगारी के जो कारण गिनाए गए हैं उनमें महिलाओं का काम करना भी एक कारण बताया गया है। यह बात सही है कि 25-50 बरस पहले जब महिलाएं नौकरियों में कम आती थीं, तब तकरीबन सारी नौकरियां पुरूषों के लिए मौजूद रहती थीं। जैसे-जैसे महिलाएं  अधिक आने लगीं, तो पुरूषों का लगभग एकाधिकार खत्म सा हो गया, और वे इसलिए भी पिछड़ते चले गए कि कॉलेज के इम्तिहान में लड़कियों को लड़कों के मुकाबले आमतौर पर अधिक नंबर मिलते हैं। इस बारे में छत्तीसगढ़ के स्कूल शिक्षा विभाग से जुड़े एक अफसर का बयान भी अखबार में आया है जिसने यह कहा है कि यह लेखक के अपने विचार हैं, और शिक्षक अपनी तरह से इसकी व्याख्या कर सकते हैं। 
यह बहुत ही बेइंसाफी वाली किताब है जिसमें महिलाओं के लिए सदियों से चली आ रही एक हिकारत साफ दिखती है। इस बात को शिक्षकों के पढ़ाने के दौरान किसी व्याख्या के लिए नहीं छोड़ा जा सकता, और इसे सीधा-सीधा खारिज किया जाना चाहिए। अगर महिलाओं के आने से रोजगार कम होने की बात कही जा रही है, तो यह बात रोजगार पर महिलाओं के हक को ही मानने से इंकार करती हैं। रोजगार पाना कोई पुरूषों की 'बपौतीÓ  नहीं थी जो कि अब टूट रही है। पहले अगर बराबरी के हक नहीं मिलते थे, और अब महिलाएं सामने आकर समाज में अपने हक का इस्तेमाल कर रही हैं, तो इसे रोजगार के अवसर घटाने वाला कहना बहुत ही अपमानजनक है, और सरकार को किताब का यह हिस्सा तुरंत खारिज करना चाहिए। अगर सरकार ऐसा नहीं करेगी तो कोई भी अदालत बड़ी आसानी से दखल देकर सरकार को इसके लिए मजबूर कर सकती है। 
लेकिन छत्तीसगढ़ में महिलाओं को लेकर संवेदनशीलता पैदा नहीं हो पा रही है। अभी कुछ दिन पहले सोनिया गांधी की पार्टी के राजधानी के विधानसभा चुनाव के उम्मीदवार रहे विकास उपाध्याय नाम के नौजवान ने शिक्षा विभाग के इसी दफ्तर में जाकर किसी मुद्दे पर अफसरों को नालायक या निकम्मा साबित करने के लिए उन्हें चूडिय़ां भेंट की। अब अगर इंदिरा गांधी और सोनिया गांधी की पार्टी के नेता, बड़े पदाधिकारी, चुनावी-उम्मीदवार अगर चूडिय़ों को कमजोरी का प्रतीक, नालायकी या निकम्मेपन का प्रतीक मानते हैं, तो इसके खिलाफ कोई भी जागरूक पार्टी कार्रवाई करती। लेकिन कांग्रेस पार्टी की लीडरशिप पता नहीं अपने आपमें ही इस कदर मगन क्यों है कि अपनी पार्टी के बड़े नेताओं के राजनीतिक-शिक्षण की फिक्र भी उसे नहीं है। एक दिलचस्प बात यह है कि अभी पाठ्य पुस्तक में महिलाओं के अपमान का मुद्दा सौम्या गर्ग नाम की जिस शिक्षिका ने राज्य महिला आयोग के सामने उठाया है, उसी ने कई महीने पहले छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट तक इस बात को लेकर दौड़ लगाई थी कि देश भर में जहां-जहां चूडिय़ों वाले बयान दिए जा रहे हैं, उनके खिलाफ जुर्म दर्ज किया जाना चाहिए। इस शिक्षिका का तर्क था कि यह अपमान एक अपराध है। 
हमारे नियमित पाठक यह जानते हैं कि हम बरसों से लगातार इस मिसाल को लेकर लिखते आ रहे हैं, और महिलाओं से भेदभाव, उनके अपमान की भाषा से लेकर रीति-रिवाजों तक जो-जो बातें हैं, उनके खिलाफ लगातार तर्क देते हैं। लेकिन भारत की राजनीति में आदमी-औरत की समानता कोई मुद्दा नहीं है, और यही वजह है कि राजनीति के काबू में चलने वाले शासन-प्रशासन में भी संवेदनशीलता नहीं आ पाती है। हम छत्तीसगढ़ सरकार से सिफारिश करते हैं कि ऐसे भेदभाव वाली बातों को किताबों से तुरंत खारिज किया जाए, और सरकार को अगर जरूरत हो तो समझदार लोगों की एक ऐसी कमेटी बनाई जाए जो कि किसी भी तरह के सामाजिक भेदभाव वाली बातों को पाठ्य पुस्तकों से निकालकर बाहर फेंके। 

हर पखवाड़े बड़ी गलती की आदी मोदी सरकार

22 सितंबर 2015
संपादकीय

मोदी सरकार लोकप्रियता की जिन लहरों पर सवार होकर सत्ता पर आई थी, वे लहरें अब बैठ रही हैं। दस बरस लंबा विपक्ष किसी भी चुनाव में दस बरस की भ्रष्ट और निकम्मी सरकार के मुकाबले वैसे भी बड़ा लुभावना दिखता है, और फिर इस बार भाजपा के पास मोदी भी थे, और दूसरी तरफ कांगे्रस के नेता राहुल गांधी थे। नतीजा सत्ता तो होना ही था। लेकिन यह सरकार बनने के बाद जिन गलतियों से आसानी से बच सकती थी, उनसे बचने की इसकी न कोशिश दिखती है, और न ही नीयत। ऐसा कोई पखवाड़ा नहीं जाता जब केंद्र सरकार का कोई न कोई मंत्री, कोई न कोई मंत्रालय सरकार के लिए एक निहायत गैरजरूरी फजीहत खड़ी न करे। अब कल बैठे-ठाले सोशल मीडिया और मोबाइल फोन के एप्लीकेशन को लेकर संचार मंत्रालय की तरफ से एक ऐसा मसौदा विचार के लिए जनता के सामने रखा गया, जिसे कुछ घंटों के भीतर चारों तरफ से धिक्कार मिलने लगी। एक बार फिर ऐसा लगा कि सरकार लोगों की निजी जिंदगी में तांक-झांक का अपना शौक फिर पूरा करना चाहती है। हम इससे परे भी देखते हैं कि अगर मोबाइल फोन पर लोगों को नब्बे दिनों तक सारे संदेश संभालकर रखने की बंदिश लागू की जाएगी, तो उससे आम लोगों के मामूली फोन की क्षमता खत्म हो जाएगी, और आम लोग या तो महंगे फोन लेने को बेबस होंगे जिनमें ट्रक भर घूरा ढोकर चलने की ताकत होती है, या फिर वे लोग अपने संदेशों को बंद करने पर मजबूर हो जाएंगे।
कल से सरकार की जो धुनाई चल रही है, वह अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और निजी जीवन में सरकारी तांक-झांक को लेकर है, अब तक लोगों का ध्यान फोन की मेमोरी जैसी तकनीकी बात पर गया नहीं है, लेकिन हमको अंदाज है कि बाजार की कुछ ताकतें भी महंगे फोन का बाजार बढ़ाने के लिए इस तरह की सरकारी नीतियों के पीछे हो सकती हैं। सरकार की तरफ से संचार मंत्री रविशंकर प्रसाद अब यह मसौदा वापिस ले रहे हैं, जो कि पेश करने के पहले ही सरकार को खारिज कर देना था। एक न एक बात को लेकर मोदी सरकार के फैसले, उसके काम, उसके बयान, लोगों के मुंह का स्वाद खराब करते चले आ रहे हैं। फिर सरकार के अलावा सत्तारूढ़ गठबंधन की मुखिया भाजपा से जुड़े हुए धार्मिक, सामाजिक, और साम्प्रदायिक संगठन आए दिन कभी अल्पसंख्यकों को देशनिकाला देते हैं, कभी लोगों के खानपान पर काबू करते हैं, कभी कुरान के खिलाफ बोलते हैं, कभी लोगों के सिर पर गीता लादते हैं, और कभी योग न करने वालों को पाकिस्तान भेजते हैं। नरेन्द्र मोदी जैसे चतुर और तेज नेता अगर सोच-समझकर इस तरह का धु्रवीकरण देश में कर रहे हैं, तो इससे देश का नुकसान तो हो ही रहा है, इससे खुद उनकी पार्टी की आगे की संभावनाएं कमजोर हो रही हैं। धार्मिक आधार पर भी जो लोग भाजपा को पसंद करते हैं, वे तमाम लोग भी न तो शाकाहारी हैं, और न ही हिंसक हैं। वे साम्प्रदायिक भी नहीं हैं, और बिना धार्मिक आधार भी कांगे्रस से नफरत जैसे बहुत से मुद्दों को लेकर भी लोग भाजपा और मोदी के साथ हैं। ऐसे में एक आक्रामक हिंदुत्व, या आक्रामक धु्रवीकरण मोदी को खासा नुकसान पहुंचा रहा है। और अभी हम देश के कारखानों और कारोबार की उस निराशा की चर्चा यहां नहीं कर रहे हैं जो कि देश भर में काले बादलों की तरह छाई हुई है। मोदी के हाथ से रस्सी खिसक रही है, और अगर वे यह सोचते हैं कि वे जब चाहे इसे थाम लेंगे, तो ऐसी गलती करने वाले वे पहले नेता नहीं रहेंगे। 

भारत की जाति व्यवस्था से लेकर वेताल और मैन्ड्रेक तक की कहानी

21 सितंबर 2015
अमरीका में अभी एक मुस्लिम बच्चे ने घर पर घड़ी बनाई, और उसे स्कूल ले गया। स्कूल ने कुछ शिक्षकों ने समझा कि यह बम है, और उन्होंने आनन-फानन पुलिस बुला ली। पुलिस ने वहां के कानून के मुताबिक, कानून का इस्तेमाल करते हुए उस बच्चे को हथकड़ी लगाई, और उसे थाने ले जाकर घंटों पूछताछ की। बाद में एक मुस्लिम बच्चे से ऐसे बर्ताव पर शर्मिंदगी जाहिर करते हुए अमरीकी राष्ट्रपति ने उसे राष्ट्रपति भवन का न्यौता दिया। 
लेकिन इस एक घटना से परे भी अमरीका में रंगभेद, नस्लभेद, और धार्मिक नफरत के मामले सिर चढ़कर बोलते हैं। वे गिनती में बहुत कम हो सकते हैं, लेकिन हैं। किसी चर्च का ऐसा पादरी निकल आता है, जो कि कुरान के पन्नों को सार्वजनिक रूप से जलाता है, और वहां के कानून में इसकी इजाजत भी है। हर कुछ महीनों में अमरीका में किसी सिख पर हमले, या हमले की सजा की खबर आती है, और बहुत से मामलों में सिखों को दाढ़ी और पगड़ी की वजह से मुस्लिम समझ लिया जाता है, और अमरीका पर ओसामा के आतंकी हमले के बाद से दाढ़ी-पगड़ी को आतंक का उसी तरह एक संकेत मान लिया गया है, जैसा कि भारत में पंजाब के आतंक के दिनों में बाकी प्रदेशों में भी लोग सिखों से मजाक करने लगे थे। लेकिन ऐसे मामले अमरीका में भी कम है, और भारत में भी। 
आमतौर पर समाज मिलजुलकर रहते दिखता है, यह एक और बात है कि खबरें तभी बनती हैं जब कोई हिंसा होती है, या कोई वारदात होती है। अब ऐसी सामाजिक सोच के पीछे के पूर्वाग्रह अगर देखें, तो भारत के हिन्दू समाज में सदियों से शूद्रों और आदिवासियों को समाज के इंसानी ढांचे में पांवों की जगह दी गई है, और हकीकत में ऊंची जाति होने का अहंकार रखने वाले लोगों ने उन्हें अपने पांवों तले कुचला भी है। ऐसा ही हाल अमरीका में सदियो से रहा जब गोरों ने कालों को कुचला, और रंगभेद की हिंसा अश्वेत लोगों के चर्च जलाने तक खुलकर सामने आती थी। आज भी वहां श्वेत अहंकार के प्रतीक संगठन सड़कों पर खुलकर काम करते हैं, और इसे अपनी धार्मिक स्वतंत्रता बताते हैं। 
ऐसे रंगभेद को बढ़ावा देने का काम कुछ ऐसे साहित्य या कुछ ऐसी फिल्मों से होता है जो कि देखने में बड़े मासूम लगते हैं। अमरीका से शुरू दुनिया के सबसे लोकप्रिय कॉमिक्स, फैंटम और मैन्ड्रेक न सिर्फ अमरीकी अंग्रेजी में बल्कि दुनिया की बहुत सी भाषाओं में खूब छपे और खूब बिके। अपने बचपन में आज से कोई आधी सदी पहले मेरे सरीखे लोग भी इन कॉमिक्स का इंतजार करते थे, और इन्हें इक_ा करके इनको बाईंड करवाकर भी रखते थे। 
अमरीका में 1930 के दशक में शुरू हुए इन दोनों कॉमिक्स के पीछे एक गोरा लेखक ही था। और अब अगर इन दोनों को देखें तो फैंटम या वेताल की कहानी जंगल में काले आदिवासियों के मददगार एक ऐसे गोरे मुखिया की है जो कि सदियों से पीढ़ी-दर-पीढ़ी चले आ रहा है, और एक खास पोशाक में उसकी पीढिय़ां एक के बाद एक कालों को बचाने, मुजरिमों को पकडऩे का काम करते चलती हैं, और आदिवासी यही समझते हैं कि यह चलता-फिरता प्रेत कभी नहीं मरता। जंगल के काले आदिवासी उसके सेवक रहते हैं, और वह उनको परेशानियों से बचाता है। इसी लेखक की दूसरी कहानी मैन्ड्रेक में एक गोरा जादूगर रहता है जो कि दुनिया की बुराइयों से लड़ता है। और उसका सहायक, उसका दोस्त, उसके साथ पूरे वक्त चिपके रहने वाला एक ऐसा अश्वेत बाहुबली है जो कि अपने आपमें अफ्रीका के किसी एक देश का राजकुमार है, लेकिन वह पूरी जिंदगी मैन्ड्रेक का सहायक ही बने रहता है। लोथार नाम का यह राजकुमार अपनी खुद की जिंदगी छोड़कर हर वक्त मैन्ड्रेक की मदद को मौजूद रहता है। 
अब इन दोनों कहानियों को देखें, तो इनको पढऩे वाले न सिर्फ अमरीकी, बल्कि दुनिया भर की अलग-अलग भाषाओं वाले करोड़ों-अरबों बच्चों और बड़ों के जेहन में यह बात बिना पढ़े और बिना कहे भी घर कर जाती है कि मुखिया गोरा होता है, और काला उसका सहायक होता है। कालों को बचाने के लिए एक गोरा जरूरी होता है, फिर चाहे वह पीढिय़ों से चले आ रहा वेताल हो, या फिर दुनिया का सबसे बड़ा जादूगर मैन्ड्रेक हो। 
इस किस्म का रंगभेद, जातिभेद, धर्मभेद बहुत से देशों और भाषाओं के साहित्य में चले आता है, और यह खुलकर शब्दों में हिंसक चाहे न हो, यह लोगों के मन में पूर्वाग्रह बढ़ाते चलता है। काले रंग के खिलाफ, छोटे कद के खिलाफ, किसी हकलाने वाले, किसी तुतलाने वाले, किसी मोटे चश्मे वाले, किसी भारी बदन वाले, किसी चेचक के दाग वाले, किसी विकलांग के खिलाफ जिस तरह की कहावतें भारत में भी सदियों से चली आ रही हैं, उनके असर से समाज का बचना नामुमकिन सा रहता है। भारत की बहुत सी कहानियों में ऊंची जाति और नीची जाति कहे जाने वाले समुदायों के लोगों की समझ, उनकी क्षमता, उनके हुनर, इन सबके बीच जो फर्क किया जाता है, वह बचपन से ही लोगों को जाति व्यवस्था, धर्म व्यवस्था के अलावा बाकी किस्म के सामाजिक भेदभाव की तरफ धकेल देता है। 
दिक्कत यह है कि जो साहित्य या फिल्में खुलकर रंगभेद या जातिभेद की हिंसक बातें करते हैं, वे तो उजागर हो जाते हैं, लेकिन पुरानी संस्कृति, रीति-रिवाज, धर्म, कहावतों, इन सबसे जोड़कर जब बिना जाहिर हिंसा के ऐसे भेद को बढ़ावा दिया जाता है, तो बहुत से लोगों को वह भेद दिखता भी नहीं है। समाज में जो लोग ऐसे हिंसक भेदभाव को समझते भी हैं, उनमें से भी बहुत कम लोग इसके खिलाफ मुंह खोलना चाहते हैं, क्योंकि भेदभाव करने वाले ताकतवर तबकों से भला कौन उलझे? दूसरी तरफ ऐसे भेदभाव के शिकार जो तबके होते हैं, उनकी आवाज बहुत संगठित हुए बिना कहीं तक पहुंचती नहीं हैं, और कानून के इस्तेमाल के बिना उनको अपना हक मिलता भी नहीं है। लेकिन कानून सामाजिक भावनाओं का हक नहीं दिला सकता, सरकारी आरक्षण जरूर दिला सकता है। ऐसे में भेदभाव बने रहता है। 
दुनिया भर में आज समझदार लोगों को इस पर चर्चा और बहस की जरूरत है कि धर्म, जाति, रंग, और भेदभाव की बाकी अनगिनत किस्मों के पूर्वाग्रह कैसे खत्म किए जाएं। कुछ लोगों का यह भी मानना है कि दुनिया भर में विरोध के लिए जो काले झंडे दिखाए जाते हैं, काली रिबिन बांधी जाती है, वह भी रंगभेद है। उनका मानना है कि काले रंग को विरोध का रंग बनाकर समाज में जिन लोगों का रंग काला है, उनको एक बुरी किस्म बता दिया जाता है। ऐसा कहा तो नहीं जाता है, लेकिन रंग के ऐसे इस्तेमाल का लोगों की मानसिकता पर ऐसा ही असर होता है। 
कानून से ऐसी बारीक बातें नहीं सुलझ सकतीं, इनके लिए लगातार बातचीत और जागरूकता की जरूरत है। 

आरक्षण पर बहस, शुरुआत मलाईदार तबके से हो

21 सितंबर 2015
संपादकीय

आरक्षण पर राजनीति और उसके दुरुपयोग का आरोप लगाते हुए राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के प्रमुख मोहन भागवत ने एक साक्षात्कार में सुझाव दिया है कि एक समिति बनाई जानी चाहिए जो यह तय करे कि कितने लोगों को और कितने दिनों तक आरक्षण की आवश्यकता होनी चाहिए। उन्होंने कहा कि संविधान में सामाजिक रूप से पिछड़े वर्ग पर आधारित आरक्षण नीति की बात है, तो वह वैसी हो जैसी संविधानकारों के मन में थी। वैसा उसको चलाते तो आज ये सारे प्रश्न खड़े नहीं होते। हम उनकी बात को एक राष्ट्रीय बहस के लायक पाते हैं, लेकिन इस बहस को एक सिरे से शुरू करते हुए हम आरक्षण की जरूरत के बारे में सबसे जरूरी पहलू, क्रीमीलेयर पर आगे बात करना चाहते हैं। आज आरक्षित तबकों के बारे में जब कभी बाकी तबकों की नाराजगी होती है, तो वह आरक्षित लोगों में से क्रीमीलेयर के लोगों की अब बढ़ चुकी ताकत और संपन्नता को लेकर होती है। ऐसे मलाईदार तबके के लोग अपने ही आरक्षित तबके के सही प्रतिनिधि नहीं रह गए हैं, और आरक्षण के बाकी पहलुओं पर बहस चाहे जब हो, राष्ट्र के जिम्मेदार लोगों को मलाईदार तबके का आरक्षण खत्म करने का काम तुरंत करना चाहिए। 
आज हम यहां पर मौजूदा आरक्षित तबकों की बात करना चाहते हैं जो कि कमजोर लोगों को आरक्षण का फायदा देने के नाम पर उन तबकों के ताकतवर लोगों के हाथों में उस फायदे को देने का काम कर रहे हैं। दलित, आदिवासी या ओबीसी, जिस भी जाति के आधार पर आरक्षण तय किया गया उसका मकसद था कि ये समाज देश के भीतर बहुत कमजोर हैं और इसलिए उन्हें बाकी लोगों की बराबरी तक लाने के लिए आरक्षण की जरूरत है। लेकिन इन तबकों के भीतर आरक्षण का फायदा पाने की आर्थिक और शैक्षणिक क्षमता उस मलाईदार तबके में ही लगभग सीमित रह गई है जो कि जाति से इन तबकों का होने के बाद भी ताकतवर हो चुका है और आगे बढ़ चुका है। जब तक किसी भी आरक्षित तबके के भीतर मलाईदार तबके को आरक्षण के फायदे से हटाया नहीं जाएगा तब तक उन जातियों के सबसे कमजोर लोगों को आरक्षित वर्ग के भीतर ही सीमित सीटों पर अपने ही ताकतवर लोगों के बराबर तक मुकाबले में पहुंच पाना नसीब ही नहीं हो सकता। आरक्षित तबके के एक सांसद, विधायक, अफसर या करोड़पति के बच्चे किसी दाखिले के लिए या नौकरी के लिए जितनी तैयारी कर सकते हैं, उतनी तैयारी उनकी जातियों के बाकी 99 फीसदी बच्चे नहीं कर सकते। इसका मतलब यह है कि कमजोर समुदायों के भीतर, जाति और रक्त के आधार पर, एक ऐसे ताकतवर तबके का एकाधिकार सा आरक्षित सीटों पर हो चला है जो कि एक दूसरे नजरिए से देखें तो सामान्य तबके के अधिकांश लोगों से भी बहुत अधिक ताकतवर हो चुका है।
ऐसे में संसद से लेकर अदालत तक और सड़क से लेकर मतदान केंद्र तक जागरूकता का एक ऐसा आंदोलन छेडऩे की जरूरत है जो मलाईदार तबके को देश के किसी भी आरक्षण से बाहर करने के लिए हो। ऐसा कानून लिखकर तैयार करने वाले और ऐसा कानून बनाने वाले लोग चूंकि ऐसे ही मलाईदार तबकों के लोग हैं इसलिए ऐसी राय भी इनके वर्गहित के खिलाफ की है। लेकिन भारत के वामपंथी दलों को इस सामाजिक हकीकत को उठाने की जरूरत है और इसे एक बहुत बड़ा चुनावी राजनीतिक मुद्दा बनाने की जरूरत है क्योंकि राजनीतिक मुद्दा बनाए बिना, वोटों पर असर का खतरा खड़े किए बिना इस देश में ऐसा कोई फैसला सत्ता पर बैठे लोग खुद होकर नहीं लेंगे। यहां पर हम अदालतों में आरक्षण पर बहस के दौरान इस बारे में कही गई बहुत सी बातों को लाना नहीं चाहते क्योंकि कानून की तकनीकी बारीकियों से परे व्यापक जनहित की और सबसे कमजोर तबके की मदद करने की एक सोच जरूरी है जो कि तकनीकी बातों की चर्चा में उलझकर रह जाएगी।

एक मूर्ख सारा पालिन, और वैसे बाकी लोग...

संपादकीय
20 सितंबर 2015

अमरीका में पिछले चुनाव में ओबामा के खिलाफ रिपब्लिकन पार्टी की उम्मीदवार रही सारा पालिन ने एक पूरी तरह भड़काऊ बयान में कहा है कि वहां की स्कूल के जिस मुस्लिम बच्चे को एक घड़ी बनाकर ले जाने के आरोप में स्कूल में गिरफ्तार किया गया था, अगर वह घड़ी थी, तो मैं ब्रिटेन की महारानी हूं। यह कटाक्ष करते हुए उन्होंने राष्ट्रपति ओबामा की इस बात को लेकर भारी आलोचना की, कि उन्होंने उस बच्चे को राष्ट्रपति भवन आने का न्यौता दिया है। 
सारा पालिन अपने दकियानूसी खयालों के लिए राष्ट्रपति चुनाव के दौरान बुरी तरह से उजागर हो चुकी थीं, और वे शायद अमरीकी राष्ट्रपति चुनाव की सबसे अधिक बेवकूफ उम्मीदवार भी थीं। अपने हर इंटरव्यू में, अपने हर भाषण में सारा पालिन ने जिस तरह की रंगभेदी, नस्लभेदी, गरीबों के खिलाफ, और कट्टरपंथ की बातें कही थीं, वे बातें अभूतपूर्व हिंसक थीं। अब अगर किसी वजह से सारा पालिन चुनाव जीतकर राष्ट्रपति बन गई होतीं, तो उस देश का और बाकी दुनिया का क्या हाल होता? यह बात सबको याद है कि उनकी पार्टी के राष्ट्रपति रहे जॉर्ज डब्ल्यू बुश ने अफगानिस्तान और इराक पर जो हमले किए थे उनमें लाखों लोग मारे गए, और पूरी दुनिया में कई तरह की नफरत भड़की। अब अगर उसमें बुश के मुकाबले और ऊंचे दर्जे की बेवकूफी भी जुड़ गई होती, तो जाने क्या हुआ होता ! 
दरअसल ताकत के साथ अज्ञान, या अहंकार, या कई मामलों में दोनों जब जुड़ जाते हैं, तो फिर खतरा कई गुना बढ़ जाता है। और हाल के बरसों में तो हम देखते आ रहे हैं कि भारत के पड़ोस के पाकिस्तान में जिस तरह धर्मान्ध और कट्टरपंथी लोग वहां साम्प्रदायिक हिंसा कर रहे हैं, मुस्लिमों का एक सम्प्रदाय उसी मजहब के दूसरे सम्प्रदाय को थोक में मार रहा है, वहां परमाणु वैज्ञानिक दूसरे देशों को परमाणु तकनीक बेचते पकड़ा रहे हैं, और वहां एयरफोर्स के लड़ाकू पायलट के अलकायदा जैसे खतरनाक आतंकी संगठन से रिश्ते सामने आ रहे हैं, ऐसे में ताकत और अधिक खतरनाक हो जाती है। हिन्दुस्तान में यह इतिहास में दर्ज है कि किस तरह अंगरक्षकों ने इंदिरा गांधी को मार डाला था। प्रधानमंत्री के आसपास वह बंदूक की ताकत थी जिसने कि साम्प्रदायिकता और धर्मान्धता के साथ मिलकर यह हत्या की थी। अब अगर अमरीका के राष्ट्रपति पद पर, या फिर पाकिस्तान के प्रधानमंत्री या फौज के मुखिया के ओहदे पर अगर मूर्खता और साम्प्रदायिकता मिल जाएं, तो वे दुनिया के लिए जानलेवा हो सकते हैं। फिर यह भी समझने की जरूरत है कि अमरीका से लेकर पाकिस्तान और हिन्दुस्तान तक दुनिया आज एक-दूसरे से कई जटिल रिश्तों में जुड़ी हुई है। ऐसे में एक जगह जुबानी या हथियारों के हमले का असर दूसरी जगह जाने कितनी तरह से कितने शक्लों में हो सकता है, होता है। 
इसलिए आज दुनिया को न सिर्फ ऐसे नेताओं की जरूरत है जो कि अपने देश की सरकारों को ठीक से चला सकें, बल्कि ऐसे नेताओं की भी जरूरत है जिनका नजरिया अंतरराष्ट्रीय बेहतरी का भी हो। ऐसा करना कई बार खासा मुश्किल होता है क्योंकि घरेलू चुनौतियां और घरेलू जरूरतें किसी भी देश के मुखिया को बाकी दुनिया की फिक्र से परे जाने को मजबूर कर देती हैं। ऐसे नेता कुछ वक्त के लिए तो ताजा इतिहास बनाते दिखते हैं, लेकिन लंबे इतिहास में ऐसे नेता हाशिए पर चले जाते हैं। एक वक्त था जब नेहरू जैसे नेता दुनिया के बहुत से देशों के लोगों से सरकारी रिश्तों से परे भी दोस्ती रखते थे, और ब्रिटिश साम्राज्य के खात्मे के बाद के उस दौर मेें दुनिया को बेहतरी में ढालने में उनकी भूमिका एक देश के नेता से बहुत अधिक थी। आज ये दोनों बातें जरूरी हैं। कुछ नेता एक उग्र राष्ट्रवाद का नारा देकर, काल्पनिक दुश्मन का डर दिखाकर, अपने देश की सत्ता पर काबिज हो सकते हैं, लेकिन लंबे समय में ये अपने देश के लिए भी खतरनाक साबित हो सकते हैं, और दुनिया के लिए भी। आज दुनिया में परमाणु हथियारों के गोदाम लबालब हैं, और कई जगहों पर हो सकता है कि नफरत-जीवी सरकारी या आतंकी लोग इनका बेजा इस्तेमाल करने का हौसला भी कर लें। ऐसे में बहुत ही सब्र और बर्दाश्त से, पूरी दुनिया की भलाई के लिए काम करने वाले नेताओं की जरूरत है। सारा पालिन की बेवकूफी और बदनीयत को लेकर आज की यह चर्चा शुरू हुई है, लेकिन यह चर्चा सिर्फ अमरीका को लेकर नहीं है, बाकी दुनिया को भी इस खतरे को समझने की जरूरत है। जो लोग भारत में साम्प्रदायिकता को बढ़ावा दे रहे हैं, उनको यह नहीं मालूम है कि वे लोग अपने घर बैठे तो सुरक्षित हैं, लेकिन दूसरे देशों में काम कर रहे करोड़ों हिन्दुस्तानी ऐसे हैं जिनके सिर पर भारत की ऐसी हिंसक-बकवास खतरा टंग जाता है। 
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शरणार्थी संकट से जुड़ी धर्म और संस्कृति की बातें

संपादकीय
19 सितंबर 2015

दुनिया के सामने एक अभूतपूर्व शरणार्थी संकट आ खड़ा हुआ है। खाड़ी के देशों से वहां सरकार और बागियों के बीच चल रही गोलीबारी में जिंदगियां खोते हुए, बचे हुए लोग निकलकर योरप की तरफ बढ़ रहे हैं, और उनको दाखिले देते-देते अब योरप के देश अपने भीतर नागरिकों का प्रतिरोध और तनाव झेल रहे हैं। देशों की सरहद पर शरणार्थियों को रोकते हुए स्थानीय पुलिस को ताकत का इस्तेमाल करना पड़ रहा है, और इससे भारी बदनामी की नौबत भी आ रही है। योरप के इन देशों के स्थानीय लोगों की आशंकाएं पूरी तरह बेबुनियाद नहीं हैं। वहां लोगों को यह लग रहा है कि देश का बहुत सा खर्च इन शरणार्थियों पर लगेगा, जो कि दूसरी संस्कृति से आए हुए हैं, और जिनके धार्मिक रीति-रिवाज, मान्यताएं, योरप की संस्कृति के मुकाबले कट्टर हैं। ऐसे में लोगों को एक खतरा यह भी लग रहा है कि शरणार्थियों के झुंड में शामिल होकर इस्लामिक स्टेट जैसे आतंकी संगठनों के लोग भी साथ में पहुंच सकते हैं, और योरप में आतंकी हमलों को बढ़ावा दे सकते हैं। 
यह संस्कृतियों के टकराव की नौबत भी है, और एक बड़े असली आतंकी खतरे की आशंका भी बेबुनियाद नहीं है। जो लोकतंत्र लोकतांत्रिक मूल्यों को बढ़ावा देने और उन पर टिके रहने की बात करते हैं, उनको ऐसे तनाव से गुजरना भी पड़ता है। दूसरी तरफ जिन धर्मों के लोग अपने धर्म को लोकतंत्र से ऊपर मानते हैं, उनको ऐसा प्रतिरोध भी झेलना पड़ता है, और उनके प्रति लोगों की आशंका खत्म नहीं होती है। यह धार्मिक, सांस्कृतिक, आर्थिक, और आतंकी, सभी तरह के टकराव की एक नौबत है, और इसके चलते हुए मानवीय आधार पर जो मदद होनी चाहिए, वह प्रभावित हो रही है। यह एक ऐसा मौका है जब इन शरणार्थियों से परे बाकी दुनिया को भी यह सोचना-विचारना चाहिए कि लोकतंत्र और धर्म के बीच जब टकराव की नौबत आती है, तब लोगों को क्या करना चाहिए? और यह बात हम सिर्फ मध्य-पूर्व के शरणार्थियों को लेकर नहीं कर रहे हैं। भारत में केन्द्रीय संस्कृति मंत्री महेश शर्मा लगातार जिस बुरी तरह की हिंसक और साम्प्रदायिक बातें सार्वजनिक रूप से, कैमरों पर, टीवी प्रसारण में कर रहे हैं, उसके खतरे समझने की जरूरत है। जब वे कहते हैं कि मुस्लिम होने के बाद भी डॉ. अब्दुल कलाम एक राष्ट्रवादी थे, तो वे इस देश के बाकी मुस्लिमों को एक ऐसी गाली देते हैं जिसके कि वे हकदार नहीं है। भारत में ऐसे अनगिनत उदाहरण मोदी-सरकार आने के पहले से चले आ रहे थे, और मौजूदा सरकार आने के बाद से ये बढ़ते चले गए हैं। दूसरी तरफ भारत के बगल के म्यांमार की खबर है कि वहां पर ऐसे कानून अभी-अभी बनाकर लागू किए गए हैं जो कि मुस्लिमों के धार्मिक रीति-रिवाजों के खिलाफ हैं, और वहां की बौद्ध-सरकार की मर्जी के हैं। पिछले साल भर से लगातार म्यांमार से भयानक खबरें आती हैं कि किस तरह रोहिंग्या मुस्लिमों को वहां से मार-मारकर भगाया जा रहा है और समंदर के रास्ते वे इंडोनेशिया, मलेशिया जैसे देशों तक मरते-मरते पहुंच रहे हैं, या पहुंचते-पहुंचते मर रहे हैं। 
दुनिया को आज यह समझने और सीखने की जरूरत है कि गैरजरूरी धार्मिक और सांस्कृतिक कट्टरता किसी तनाव का हल नहीं हो सकतीं। इनसे हिंसा और खतरे का बढ़ते ही चले जाना है, और कोई देश, कोई समाज ऐसे में सुरक्षित नहीं रह सकते। दिक्कत यह है कि भारत जैसा एक धर्मनिरपेक्ष और विविधता वाली देश ऐसे में हिन्द महासागर के इस पूरे इलाके में मिसाल बन सकता था, मिसाल रहते आया है, लेकिन उसे घोर हिंसक राष्ट्रवादी हिन्दुत्व का झंडा लेकर चलने वाले लोग एक मिसाल रहने नहीं दे रहे। नतीजा यह हो रहा है कि बहुसंख्यक तबके की साम्प्रदायिकता के जवाब में न सिर्फ अल्पसंख्यक तबके की साम्प्रदायिकता बढ़ रही है, बल्कि देश में धर्मान्धता के और किस्म के खतरे भी बढ़ रहे हैं। पंजाब में दलितों के बीच खासी पकड़ रखने वाले बाबा राम-रहीम ने अपनी ताजा फिल्म को बढ़ावा देने की जो इंटरव्यू दिया है उसमें उन्होंने आदिवासियों को शैतान करार दिया है। अब दलितों के गुरू अगर आदिवासियों को ऐसी हिकारत से देख रहे हैं, तो फिर हिन्दू धर्म में ऊंचे होने का दावा करने वाली जातियों की दलित-आदिवासियों के लिए हिकारत भला कैसे खत्म होगी?
दुनिया के लोगों को एक-दूसरे से बहुत कुछ सीखना भी चाहिए, और अपने आपको एक बेहतर मिसाल बनाकर दुनिया को बिना कुछ कहे भी एक अच्छी संस्कृति सिखाना भी चाहिए। भारत में आज शुद्धतावादी हमलावर तबके देश के ताने-बाने को तोड़ रहे हैं, और यह देश में हर किसी के लिए एक नया खतरा खड़ा कर रहा है। 

घुटनों पर लगी चोट से सरकार एकदम सक्रिय

संपादकीय
18 सितंबर 2015

दिल्ली में डेंगू से मौत हुई, और बच्चे की मौत के बाद मां-बाप ने आत्महत्या कर ली, तो केन्द्र सरकार और दिल्ली सरकार ने अस्पतालों और चिकित्सा-जांच केन्द्रों पर नकेल डाल दी। कई तरह के नियम लागू कर दिए, जो कि जनता की नाराजगी को दूर करने के लिए अधिक थे, और इलाज के लिए कम। दिल्ली के एक बड़े पांच सितारा अस्पताल के मालिक ने मीडिया से कहा कि डेंगू के इलाज के लिए सिर्फ बिस्तर रख देने से काम नहीं चलेगा, उसके लिए बहुत ही विशेषज्ञ डॉक्टरों के साथ-साथ विशेषज्ञ सहायकों की जरूरत भी पड़ती है, और रातों-रात ऐसा चिकित्सकीय ढांचा खड़ा करना मुमकिन नहीं है। 
अंग्रेजी में जिसे नी-जर्क रिएक्शन कहा जाता है, सरकारों के रवैये में आमतौर पर वैसा ही दिखाई पड़ता है। घुटने पर चोट पड़ी, तो बिलबिला जाती हैं सरकारें, और फिर आनन-फानन आग बुझाने के अंदाज में तेजी से काम दिखाने की कोशिश में लग जाते हैं नेता और अफसर। लेकिन यह किसी भी बात का इलाज नहीं है। दो बरस हो रहे हैं उत्तराखंड की तबाही को, लेकिन आज भी वहां हालात वैसे ही खराब हैं। बाढ़ के तुरंत बाद ऐसा लग रहा था कि केन्द्र और राज्य मिलकर दुनिया भर के लोगों की मदद से पूरा ढांचा ही मजबूत कर देंगे, लेकिन हुआ कुछ नहीं। वैसा ही कश्मीर की बाढ़ के बाद हुआ, एक बरस पूरा हो गया और लोगों की जिंदगी वापिस नहीं लौटी हैं।  जब किसी शहर में बीमारी फैलती है, तो वहां ऐसी ही हड़बड़ी में फौजी कार्रवाई के अंदाज में काम होता है, लेकिन ऐसी बीमारी फैलने के पीछे जो वजहें हैं, उनको खत्म करना एक मुश्किल और लंबा काम होता है, इसलिए उस बारे मेें कुछ भी नहीं किया जाता। 
दरअसल केन्द्र और राज्य सरकारों के सामने कोई न कोई चुनाव खड़े रहते हैं, और चुनावों में वोट दीर्घकालीन योजनाओं से नहीं मिलते। चुनावी फसल तुरंत फायदा पहुंचाकर ही पाई जा सकती है, और भारतीय लोकतंत्र में केन्द्र, राज्य, या स्थानीय संस्थाएं अपने कार्यकाल का आधा हिस्सा ऐसे ही चुनावी-दबाव में गुजार देती हैं। फिर एक दूसरी बात यह कि देश की बुनियादी जरूरतों पर भी प्रधानमंत्री या मुख्यमंत्री, या फिर विभागीय मंत्री की निजी पसंद, उनका निजी एजेंडा इस तरह हावी हो जाता है कि  जनता और देश-प्रदेश का सचमुच भला कर सकने वाली योजनाएं पीछे की सीट पर जाकर बैठ जाती हैं, और नेताओं के नाम के साथ जुड़कर चलने वाली योजनाएं सामने की पूरी कतार पर कब्जा कर लेती हैं। भारतीय लोकतंत्र में जनता का एक बड़ा हिस्सा इसी किस्म के नारों पर चलता है, और इस वजह से उसे ऐसी ही नारेनुमा योजनाएं परोसी जाती हैं। 
जब तक मीडिया नेताओं और अफसरों के किसी कुर्सी पर पहुंचते ही उनकी प्राथमिकताएं पूछने में जुटा रहेगा, तब तक देश का यही हाल रहेगा। पता नहीं क्यों मीडिया हर नेता और अफसर के अहंकार को बढ़ाते चलता है, और उन्हें यह एहसास कराते चलता है कि उन्हें अपनी प्राथमिकताएं हर कीमत पर तय करने और लागू करने का हक है। अगर ऐसा ही है तो सरकारी काम के अलग-अलग दायरों में किसी भी विशेषज्ञ और जानकार, किसी अनुभवी और योजनाशास्त्री की जरूरत ही क्या है? और जब देश-प्रदेश की, शहर और स्थानीय संस्थाओं की बड़ी-बड़ी योजनाएं सिर्फ एक नेता की मनमर्जी से बनने लगती हैं, तो जनता का ढेरों पैसा उसमें डूब जाता है। आज अगर देश की राजधानी में भी एक मामूली बीमारी से निपटने की ताकत नहीं है, तो इसके पीछे आजादी के बाद की आधी-पौन सदी की योजना की कमी है, उस पर अमल की कमी है, और नेताओं की मनमर्जी की अधिकता भी है। इस देश को सत्ता पर बैठे व्यक्तियों की व्यक्तिगत पसंद-नापसंद, और प्राथमिकता से ऊपर उठने की जरूरत है, और देश को एक व्यवस्था के तहत चलाने की जरूरत है। जब तक ऐसा नहीं होगा, तब तक किसी हादसे की चोट से सरकार के घुटने बिलबिलाएंगे, और आनन-फानन कोई रास्ता ढूंढेंगे, लेकिन उससे अगले हादसे नहीं टलेंगे। 

तिलक की भावना को गणेश के आशीर्वाद से आगे बढ़ाने की जरूरत

संपादकीय
17 सितंबर 2015

भारत में गणेशोत्सव देश के एक विख्यात स्वतंत्रता संग्राम सेनानी लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक ने अंग्रेज राज के समय भारतीयों में एक सामाजिक-राजनीतिक जागरूकता के मकसद से शुरू किया था। आज न अंग्रेज राज रहा, और न स्वतंत्रता संग्राम रह गया। लेकिन सामाजिक-राजनीतिक जागरूकता की जरूरत शायद आज उस वक्त के मुकाबले कुछ अधिक ही है। लेकिन यह देखें कि भारत के बहुत बड़े हिस्से में बड़े जोश-खरोश से मनाया जाने वाला गणेशोत्सव आज कितनी चेतना फैला पा रहा है, तो बड़ी निराशा हाथ लगती है। 
गणेश खुद होकर तो कोई चेतना फैला नहीं सकते लेकिन वे शायद दुनिया के ऐसे सबसे उदार भगवान हैं जो कि अपनी प्रतिमा के साथ, अपनी झांकियों के साथ, अपने हुलिए के साथ लोगों को हर किस्म की आजादी लेने देते हैं। और इसका नतीजा यह होता है कि हर बरस गणेश झांकियां उस साल की घटनाओं से जुड़ी रहती हैं, और लोगों को साल भर की घटनाओं की याद भी दिलाती हैं। लेकिन क्या ऐसी याद सामाजिक-राजनीतिक चेतना को बढ़ाने और फैलाने के लिए काफी है? और गणेशोत्सव का कितना हिस्सा, आयोजन समितियों के खर्च का कितना हिस्सा इस चेतना पर खर्च होता है, अगर इसको देखें, तो निराशा और भी बढ़ जाती है। अधिकतर पैसा प्रतिमा पर, सजावट पर, झांकियों पर, प्रतिमा लाने और विसर्जन कर खर्च हो जाता है, और ऐसे आयोजन का कोई बौद्धिक, सैद्धांतिक, और सामाजिक योगदान वाला उपयोग नहीं हो पाता। 
लोकमान्य तिलक ने गणेशोत्सव को एक और धार्मिक समारोह बनाने के लिए इस तरह शुरू नहीं किया था। गणेश तो वैसे भी हिन्दू धर्म और भारतीय परंपराओं के मुताबिक अपार महत्व पाते ही हैं। हिन्दू रीति-रिवाजों में किसी भी शुभ काम को शुरू करने के पहले सबसे पहली पूजा गणेश की ही होती है। इसलिए गणेशोत्सव से गणेश को कोई अलग महत्व नहीं मिल सकता, तब तक जब तक कि इस मौके का इस्तेमाल देश और समाज के लिए न हो। अगर यह एक और धार्मिक अनुष्ठान बनाकर रख दिया जाएगा, तो गणेश जैसे उदार मन के देवता की उदारता बिना इस्तेमाल के रह जाएगी। इसलिए इस मौके पर जिम्मेदार गणेशोत्सव समितियों को समाज के भले के बहुत से काम करने चाहिए। जहां पर आस्थावान लोगों का मेला जुटता है, वहां पर नेत्रदान के लिए, रक्तदान या देहदान के लिए जागरूकता फैलाई जा सकती है, लोगों को उनके घरों के बेकार सामान समाज के जरूरतमंदों को बांटने के लिए जागरूकता फैलाई जा सकती है, और तरह-तरह के पर्चों, तरह-तरह के भाषण के रास्ते महिलाओं की सुरक्षा का मुद्दा लोगों को समझाया जा सकता है। भारत के बहुत से राज्यों में गणेशोत्सव करोड़ों लोगों को खींचता है, और ऐसे मौके हाथ से जाने नहीं देना चाहिए। सिर्फ रौशनी, सिर्फ संगीत, और सिर्फ हंगामे से गणेशोत्सव का महत्व घट जाता है। देश में ऐसे त्यौहार कम हैं जिनमें इतने दिनों तक इतने लोग एक ऐसे भगवान के दर्शन को पहुंचते हैं, जो उसके साथ किए जाने वाले किसी भी तरह के मजाक का बुरा नहीं मानता। किसी भी और धर्म के ईश्वर, या हिन्दू धर्म के ही बाकी किसी भी देवी-देवता के साथ ऐसी छूट नहीं ली जा सकती। इसलिए हमारी सलाह यह है कि समाज के जिम्मेदार लोग गणेशोत्सव के ऐसे आयोजन की जगहों पर तरह-तरह की विचारोत्तेजक बहस, वाद-विवाद, नारे और पोस्टरों की प्रतियोगिता, जैसे आयोजन और करें, ताकि लोकमान्य तिलक की भावना को, भगवान गणेश के आशीर्वाद से आगे बढ़ाया जा सके। 

खेती से परे भी गांवों में वैकल्पिक आय जरूरी

संपादकीय
16 सितंबर 2015
छत्तीसगढ़ की डेढ़ सौ तहसीलों में से करीब सौ में सूखे के असर की रिपोर्ट राज्य सरकार ने तैयार की है और केंद्र सरकार को भेजी है। दो तिहाई राज्य सूखे की चपेट में है, और धान का किसान वैसे भी परंपरागत रूप से पूरी दुनिया में गरीब रहते आया है। ऐसे में राज्य की यह हालत भयानक है, और छोटे किसानों, खेतिहर मजूदरों और खेती से जुड़े दूसरे कामगारों के बेरोजगार हो जाने की नौबत आ चुकी है। आज केंद्र और राज्य सरकार मिलकर भी ऐसे किसानों को सिर्फ राहत दे सकते हैं, लेकिन कोई लंबा समाधान, कोई स्थायी इलाज इससे निकलने वाला नहीं है। लंबे समय के लिए अगर सूखे या अधिक बारिश, बाढ़ जैसे खतरों से जूझने का रास्ता अगर निकालना है, तो वह छत्तीसगढ़ के गांवों को सिर्फ खेती पर निर्भर रखने के बजाए ग्रामीण अर्थव्यवस्था को मजबूत बनाना पड़ेगा, और यह काम कोई एक शहर बसाने से भी अधिक मुश्किल काम होगा। 
गांवों की संभावनाएं कम नहीं होती हैं। वहां पर बिना बिजली, बिना मशीनों, और बिना बाहरी हुनर के भी लोग रोजी-रोटी कमा सकते हैं, और राष्ट्रीय अर्थव्यवस्था में काफी कुछ जोड़ सकते हैं। पशुपालन, डेयरी, मछली पालन, मधुमक्खी पालन, रेशम के कीड़ों को पालना, पेड़ों पर लाख की खेती, वनोपज पर आधारित कामकाज, ऐसे दर्जनों काम रहते हैं, जो कि परंपरागत रूप से गांवों में होते आए हैं, और स्थानीय खूबियों के मुताबिक इनको आज भी बढ़ावा दिया जा सकता है। छत्तीसगढ़ के कुछ हिस्से में बुनकर हैं, और वहां पर हैंडलूम को बढ़ावा मिल सकता है, इस राज्य में परंपरागत रूप से बीड़ी बनाने का काम होता था, और उसे भी बढ़ाया जा सकता है। आज सूखे के मौके पर ये बातें बेमतलब लग सकती हैं कि जब आग लगी हो, तब दमकल खरीदने की नसीहत दी जा रही है, लेकिन ऐसे ही मौके पर आगे की योजना के बारे में भी सोचने की जरूरत है। 
छत्तीसगढ़ के किसानों को अगर महज धान की खेती पर छोड़ दिया जाएगा तो सूखे से परे भी उनकी अर्थव्यवस्था कमजोर ही रहेगी। छत्तीसगढ़ के साथ एक दिक्कत यह भी है कि यहां के लोग सीमित जरूरतों में जीना सीख चुके हैं, और वे बड़ा कर्ज लेकर जोखिम वाली खेती नहीं करते। यही वजह है कि छत्तीसगढ़ में दूसरे राज्यों के मुकाबले किसानों की खुदकुशी कम है, क्योंकि यहां के लोग खतरे कम उठाते हैं, कर्ज में कम डूबते हैं। लेकिन इस राज्य में सरकार की कोशिशें भ्रष्टाचार में डूब जा रही हैं। लगातार अलग-अलग विभागों के बारे में खबरें आती हैं कि किस तरह किसानों के लिए उपकरण खरीदी में घोटाला होता है, या धान खरीदी में भ्रष्टाचार होता है, जिसकी वजह से सरकार किसानों को ठीक से बोनस भी नहीं दे पाती है, और न ही पिछले बरसों की तरह पूरा धान खरीद पाती है। लेकिन इस पूरी नौबत को सुधारना सिर्फ कृषि विभाग का काम नहीं है, बल्कि गांवों में कृषि के जो भी विकल्प हो सकते हैं, वैसे तमाम ग्रामोद्योग के बारे में सरकार को एक मिशन बनाकर सोचना चाहिए, और किसान की जिंदगी में धान से अधिक भी कुछ लाने के बारे में कोशिश करनी चाहिए। 

ऐसी सरकारी व्यवस्था में गरीब की मौत ही है

15 सितंबर 2015
संपादकीय

देश की राजधानी दिल्ली में होने वाली कोई भी बात अनुपात से अधिक महत्व पाती है। यहीं पर केंद्र और इस राज्य की सरकारें बैठी हैं, देश की सबसे बड़ी अदालत बैठी है, देश की संसद बैठी है, तमाम तरह के संवैधानिक राष्ट्रीय आयोग यहीं बैठे हैं, देश के मीडिया का एक बड़ा हिस्सा यहीं बैठा है, और दुनिया के तमाम देशों के कूटनीतिक दफ्तर देश के इसी शहर में हैं। ऐसे में यहां होने वाली हर बात का अधिक महत्व पाना स्वाभाविक है, और बात-बात पर दिल्ली मिसाल बनने लगती है। 
यहां डेंगू से पीडि़त एक बच्चे को दो अस्पतालों ने दाखिल करने से मना कर दिया, उसकी मौत हो गई, और तकलीफ बर्दाश्त न कर पाने वाले मां-बाप ने खुदकुशी कर ली। नतीजा यह हुआ कि एकाएक देश-प्रदेश के नेताओं को, और मीडिया को यह ध्यान आया कि दिल्ली में सरकारी जमीन जिन शर्तों पर बड़े-बड़े अस्पतालों को दी गई थी, उन शर्तों के तहत गरीबों के इलाज की जिम्मेदारी इनमें से कोई पूरी नहीं कर रहा है। खबरों से हिली हुई सरकार ने कई किस्म की जांच शुरू कर दीं, और अब अस्पतालों से हुए अनुबंध देखे जा रहे हैं। 
लेकिन यह हाल तो निजी इलाज करने वाले तमाम अस्पतालों का है। वे कहीं सरकारी जमीन रियायत पर पाकर इमारत बनाते हैं, कहीं पर वे सरकारी कर्मचारियों के इलाज के लिए सरकारी मान्यता पाकर अरबों रुपये सालाना का सरकारी भुगतान पाते हैं, और कहीं पर वे सरकारी बीमा योजना के तहत गरीबों का इलाज करके मोटी कमाई करते हैं। छत्तीसगढ़ में इनमें से हर किस्म की रियायतों या फायदे पाने वाले अस्पतालों का बुरा हाल दर्ज किया है। इलाज-बीमा के कार्ड वाले गरीबों के गर्भाशय जवानी में ही निकाल-फेंक दिए गए, क्योंकि इन गरीबों के कार्ड पर अभी रकम बची हुई थी, और अस्पताल उसे लूटने के लिए उनके बदन को काटकर फेंकने पर भी उतारू हो गए। लेकिन ऐसा करने वाले अस्पताल और डॉक्टर सरकार की बड़ी रियायती कार्रवाई पाकर बच गए हैं, और लूटपाट के कई और तरीके ईजाद करने  में लग गए हैं। इनकी मदद करने के लिए छत्तीसगढ़ जैसे राज्य में बड़े से बड़े सरकारी अस्पताल अपने-आपको बदहाल करने में लगे हुए हैं ताकि महंगे निजी अस्पताल चल सकें। हैरान-परेशान मुख्यमंत्री डॉ. रमन सिंह ने अभी इलाज के लिए गरीबों को सरकारी रकम मंजूर करते-करते थकने के बाद रायपुर मेडिकल कॉलेज अस्पताल के डॉक्टरों को बुलाकर पूछा कि जब कैंसर जैसी हर बीमारी का इलाज इस अस्पताल में है, तो सरकारी मदद पाने वाले लोग निजी अस्पतालों में जाने को क्यों मजबूर होते हैं? 
इस सवाल का एक आसान जवाब है, जो कि हिंदुस्तान की पढ़ाई और इलाज की बहुत सी बीमारियों का इलाज भी है। इस देश में सत्ता पर बैठे ताकतवर लोगों और उनके परिवारों की पढ़ाई से लेकर उनके इलाज तक के लिए महंगे निजी स्कूल-कॉलेज और अस्पतालों तक दौड़ लगती है। अभी कुछ हफ्ते पहले इलाहाबाद हाईकोर्ट ने उत्तरप्रदेश सरकार को हुक्म दिया है कि सभी मंत्रियों-अफसरों के बच्चों को निजी स्कूलों से हटाकर सरकारी स्कूलों में दाखिल किया जाए। यह बात हर उस बीमारी के इलाज पर भी लागू होनी चाहिए जो कि सरकारी अस्पतालों में ठीक की जा सकती हैं। आज पूरे देश में केंद्र और राज्य सरकारों, संसद और अदालतों के लोगों का निजी अस्पतालों में ऐसे इलाज के लिए भी रात-दिन जाना होता है जो कि सरकारी अस्पताल में हो सकते हैं। अगर सत्ता के लोग अपने परिवार के साथ सरकारी अस्पतालों में जाएं, तो सरकारी अस्पतालों की हालत सुधर जाएगी। आज सरकारी पैसों से बड़े-बड़े निजी अस्पतालों को खड़ा करना, और उनका कारोबार बढ़ाना समझदारी नहीं है। यह पूंजीवादी व्यवस्था अमरीका से लेकर ब्रिटेन तक गरीबों का इलाज छीन चुकी है, और बड़ी-बड़ी बीमा कंपनियों, और बड़े-बड़े अस्पतालों की मुनाफाखोरी का कारोबार बढ़ा रही है। यह सिलसिला थमना चाहिए। शिक्षा और स्वास्थ्य की बुनियादी जिम्मेदारी से सरकार को बचना नहीं चाहिए। लेकिन सरकार ऐसे विभागों को चलाना नहीं चाहती है, यहां पर बदहाल को ठीक करने में अधिक मेहनत लगती है। सरकार की दिलचस्पी ऐसे कामों में रहती है जिनमें आनन-फानन महंगे सामानों की खरीदी करके कमाई की जा सकती है। ऐसी व्यवस्था में गरीब की मौत ही है, फिर चाहे वह गर्भाशय निकालने की साजिश हो, या लापरवाह-नसबंदी हो, या फिर दिल्ली में डेंगू के शिकार बच्चे की मौत और उसके मां-बाप की खुदकुशी हो।

अपनी भाषा पर आत्ममुग्ध लोग उसके खासे बड़े दुश्मन साबित..

14 सितंबर 2015
हिन्दी पर चारों तरफ बहुत छप रहा है और हिन्दी दिवस के अलावा पिछले दिनों भोपाल में विश्व हिन्दी सम्मेलन भी हुआ जिसमें हिन्दी पर हावी हिन्दू को लेकर बहस छिड़ी। कहीं कुछ लोग हिन्दी की दशा और दिशा पर बात कर रहे हैं, तो कहीं यह चर्चा कर रहे हैं कि सरकार से लेकर बाजार तक हिन्दी के साथ किस कदर का भेदभाव है। एक-दो हफ्ते पहले मैंने भी इसी कॉलम में शुद्ध हिन्दी के लिए लोगों की शुद्धतावादी जिद के नुकसान लिखे थे, लेकिन हिन्दी को लेकर कुछ और पहलुओं पर लिखा जाना जरूरी है। 
आज एक सवाल आम लोगों के मन में यह उठता है कि अगर वे किसी तरह खींचतान कर अपने बच्चों को किसी सतही ही सही, अंग्रेजी स्कूल में पढ़ा सकते हैं, तो क्या इसके बावजूद उन्हें अपने बच्चों को हिन्दी स्कूल में भेजना चाहिए? या फिर हिन्दी महज मजबूरी की जुबान है? स्कूल में बच्चे हिन्दी पढ़ भी लें, तो उसके बाद उनका कॉलेज का भविष्य क्या है? कॉलेज के आगे की और ऊंची पढ़ाई में उनकी संभावना क्या रहेगी, और दुनिया के कारोबार में उनकी क्या गुंजाइश रहेगी? 
दरअसल कोई भी भाषा भावनाओं से अगर संपन्न हो सकती होती, तो हिन्दी एक खासी रईस जुबान होती। इसने भावनाओं का इस कदर सम्मान किया कि कभी अंग्रेजी हटाओ आंदोलन चलाया, तो कभी भारत की ही दूसरी भाषाओं के शब्दों के इस्तेमाल का हौसला पस्त करते हुए लोगों को संस्कृत की तरफ ठेलने की अंतहीन कोशिश की। हिन्दी तो इससे पता नहीं कहां पहुंची, लेकिन महज हिन्दी पर टिके हुए लोग बड़े बाजार से बाहर हो गए। अपने आपको राष्ट्रभाषा का भक्त, या हिन्दी का सेवक कहने वाले लोग हिन्दी का उतना ही बुरा करते चले गए जितना बुरा एक आक्रामक हिन्दुत्व के त्रिशूलधारी लोग हिन्दू धर्म का कर चुके हैं। 
हिन्दी को लेकर एक धर्मान्ध कट्टरता जैसी सोच ने इस जुबान का भारी नुकसान किया है। मेरे एक पुराने अखबारनवीस साथी विनोद वर्मा ने कल ही अमर-उजाला के इंटरनेट संस्करण के संपादक की कुर्सी से हिन्दी की दशा में एक लेख लिखा है जिसमें उन्होंने हिन्दी बोलने वालों की आबादी, और इंटरनेट पर उस अनुपात में ज्ञान और जानकारी के हिन्दी पेज के आंकड़े गिनाए हैं। किस तरह दुनिया के अलग-अलग जुबान बोलने वाले लोगों की गिनती और उनकी जुबान में मौजूद ज्ञान और तकनीकी सूचना के पैमाने पर हिन्दी और हिन्दी वालों का बुरा हाल है, यह बात उन्होंने लिखी है। 
यह नौबत आई इसलिए है कि हिन्दी के झंडाबरदार लोगों ने इस भाषा में काम करने के बजाय इसकी सेवा करने को अपना जिम्मा समझ लिया था। और जिस तरह सेवा में एक कट्टरता को काफी मान लिया जाता है, उसी तरह की कट्टरता हिन्दी जुबान को गड्ढे में डालने के लिए काफी साबित हुई। आज सरकार से लेकर कारोबार तक हिन्दुस्तान में हिन्दी एकदम ही गरीब जुबान बन चुकी है, गरीबों की जुबान बन चुकी है, छोटे खरीददार की जुबान बन चुकी है, और इसके महत्व को बढ़ाने के बजाय इसके नाम पर नेतागिरी करने वाले लोग इसे माता का दर्जा दिलाने में लगे रहे। नतीजा यह हुआ कि पिछले दस दिनों में दस ऐसे कार्टून मीडिया में आए जिसे हिन्दी को मां कहा गया, और यह भी कहा गया कि इस मां को औलाद वृद्धाश्रम में छोड़ आई है। 
हिन्दी के साथ एक बड़ी दिक्कत आज यह है कि हिन्दुस्तान कोई टापू नहीं रह गया है जहां के हिन्दीभाषी राज्यों की संभावनाएं बाकी दुनिया से कटकर चल सकती हैं। बाकी दुनिया को तो छोड़ ही दें, हिन्दुस्तान के ही बाकी गैरहिन्दी राज्यों से कटकर हिन्दी-राज्य नहीं चल सकते। बहुत से मामलों में हिन्दी के राज्य अहिन्दी राज्यों के मुकाबले कहीं भी नहीं टिकते। कारोबार के मामले में महाराष्ट्र से लेकर दक्षिण भारत के राज्यों तक का हाल हिन्दी राज्यों के मुकाबले आसमान पर है। महाराष्ट्र में और आन्ध्र में किसानों की आत्महत्या जरूर हो रही है, लेकिन उससे इन राज्यों के गैरकिसानी कारोबारों पर फर्क नहीं पड़ा है। आज इन राज्यों का कम्प्यूटरों से जुड़ा हुआ कारोबार आसमान पर है, और हिन्दी राज्य इस मामले में जमीन पर औंधे मुंह पड़े हुए हैं। और इस फर्क की एक बड़ी वजह अंग्रेजी और हिन्दी का फर्क है। यही हाल कन्नड़ वाले कर्नाटक का है, यही हाल मलयालम वाले केरल का है, और यही हाल तमिल वाले तमिलनाडू का है। इन तमाम राज्यों में अपनी क्षेत्रीय भाषा में स्कूली शिक्षा को खूब मजबूत किया, लेकिन इन्होंने दुनिया की आज और आने वाले कल की जरूरतों को समझते हुए न सिर्फ अपनी नई पीढ़ी को अंग्रेजी सिखाई, बल्कि तरह-तरह के हुनर भी सिखाए, और यही वजह है कि दुनिया भर के देशों में इन्हीं राज्यों के कामगार जाकर अधिक काम कर रहे हैं। 
अमरीका में हाईवे के किनारे के मोटल अब उनके पटेल-मालिकों की वजह से पोटेल कहे जाते हैं। इसके अलावा भी दुनिया के कई देशों में गुजराती कारोबारियों ने छोटे से लेकर बड़े तक कई किस्म के कारोबार किए, और इनमें न हिन्दी उनके काम आई है, और न गुजराती। उनके काम एक कारोबारी-नजरिया आया, और अंग्रेजी की मामूली जानकारी आई। इसी तरह बिना मजबूत अंग्रेजी के, पंजाब से निकलकर लाखों लोग अंग्रेजों के घर ब्रिटेन में बसे, कनाडा, ऑस्ट्रेलिया, और अमरीका में बसे। वहां खूब मेहनत की, और कामयाब हुए। उन्होंने अंग्रेजी न जानने को दिक्कत नहीं बनने दिया, क्योंकि उन्होंने मेहनत खूब की। 
अब भाषा का एक विकल्प कुछ लोगों ने मेहनत को बना लिया, कुछ लोगों ने एक कारोबारी-सूझबूझ को बना लिया, और कुछ लोगों ने हुनर को बना लिया, जैसा कि केरल से जाकर पूरी खाड़ी पर छा गए मलयाली कारीगर और कामगार हैं। इस तरह भाषा का इस्तेमाल कुछ हद तक है, और उस हद के बाद भाषा के बिना भी काम लोग निकाल लेते हैं। लेकिन भाषा के विकल्प के रूप में उनको कुछ न कुछ खूबी आना जरूरी होता है, और दक्षिण के राज्यों से लेकर गुजरात और पंजाब तक ने यह साबित किया है। 
हिन्दी के साथ दिक्कत यह रही कि वह राष्ट्रभाषा होने के अपने आत्मसम्मोहन से परे ही नहीं निकल पाई। और भाषा होती दरअसल एक औजार है, जिसका इस्तेमाल सिर्फ लोगों के बीच बातचीत के लिए होता है। अब इस बातचीत को कुछ लोग साहित्य तक खींचकर ले जाते हैं, जो कि भाषा के कई किस्म के इस्तेमाल में से है महज एक इस्तेमाल है। ऐसे में जिन लोगों के दिमाग पर साहित्य का अहंकार होता है, वैसे लोग उस भाषा को लेकर भी एक झूठे अहंकार में खुद भी फंसते हैं, और दूसरों को भी फांस लेते हैं। नतीजा यह होता है कि भाषा की राजनीति में, भाषा के अहंकार में, भाषा के दुराग्रह और पूर्वाग्रह में, साहित्य तो चौपट होता ही है, उस भाषा के गैरसाहित्यिक आम इस्तेमाल वाले लोग भी चौपट होते हैं। जब दुनिया के रोज के कामकाज में अपनी भाषा की संभावना बनाने के बजाय उस भाषा की आरती उतारते चले जाने को ही उस भाषा की बढ़ोत्तरी मान लिया जाता है, तो इस धर्मान्धता से वह भाषा पत्थर की एक प्रतिमा की तरह हो जाती है। 
आज की दुनिया में कम्प्यूटरों के साथ तालमेल बिठाकर चलना सीखने के बजाय हिन्दी के लोग भाषा के अहंकार में जीते चले गए। जिस तरह आज भारत के इतिहास से परे की कहानियों को लेकर बहुत से लोग एक झूठे अहंकार में जीने को राष्ट्रगौरव मानकर चलते हैं कि किस तरह दुनिया में विज्ञान की तमाम चीजें बाकी देशों से हजारों बरस पहले भारत में बन चुकी थी, उसी तरह भाषा का अहंकार लोगों को मातृभाषा की सेवा, राष्ट्रभाषा का दर्जा, ऐसी बातों में उलझाकर रख देता है। आज दुनिया में इंटरनेट और कम्प्यूटर, टेक्नालॉजी और साईंस, इनकी भाषा की जरूरतों के हिसाब से हिन्दी ने न अपने को ढाला, न अपनी शब्दावली को दरियादिल बनाया, और न ही यह सोचा कि हिन्दी की देवनागरी लिपि की संभावनाओं के सीमित होने से उबरने का क्या रास्ता आज के वक्त निकाला जा सकता है। 
हिन्दी में अपने आपको हिन्दीभाषी इलाकों की बोलियों से भी ऊपर उठाकर एक शास्त्रीय भाषा की तरह एक ऐसी खड़ी बोली बनाकर उसे क्षेत्रीय बोलियों पर लादने का काम किया, जिससे कि क्षेत्रीय बोलियों की अपनी मौलिक अनोखी बात कुचलती चली गई। ऐसा करके हिन्दी ने अपने आपको अधिक आबादी की जुबान तो साबित किया, लेकिन पिछले सौ-दो सौ बरस में ही जो खड़ी बोली प्रचलित हुई, उसने क्षेत्रीय बोलियों की खूबियों को भी इस हिकारत से देखा कि वे एक देहाती सी हों, और इस नाते सस्ती हों, सतही हों, और गैरजरूरी हों। ऐसे में हिन्दी की बुनियाद में जिन क्षेत्रीय भाषाओं के पत्थर लगे हैं, वे भी हिन्दी की खड़ी बोली से जुडऩे के बजाय या तो अपनी बोली के साथ रहे, या फिर उन्होंने भी अंग्रेजी के विकल्प को ढूंढने की कोशिश शायद की होगी। 
अब आज हिन्दी एक ऐसे चौराहे पर खड़ी है कि जहां वह अपने पीछे अपनी जुबान के लोगों को या तो एक अनिश्चित भविष्य की राह पर ले जा सकती है, और उस राह का कोई भविष्य दिखता नहीं है। दूसरा रास्ता यह है कि हिन्दी अपने आपको हिन्दीभाषी इलाकों में संपर्क की एक भाषा रखते हुए, पढ़ाई-लिखाई, खासकर ऊंची पढ़ाई-लिखाई की जुबान अंग्रेजी को अपरिहार्य मानकर उसको जगह दे, उसका इस्तेमाल करे, और अपनी अगली पीढ़ी को भाषान्धता का शिकार न बनाए। तीसरा विकल्प यह है कि देश और हिन्दीभाषी प्रदेशों की सरकारें हिन्दी में उच्च शिक्षा तक को इतना मजबूत बनाए कि लोग उच्च शिक्षा अपनी मातृभाषा में करें, और फिर अंग्रेजी या कोई और अंतरराष्ट्रीय जुबान सीखकर दुनिया के मुकाबले में उतर जाएं, जैसा कि आज चीन कर रहा है। लेकिन इसकी संभावना हमको शून्य दिखाई पड़ती है, क्योंकि भारत में केन्द्र और राज्य सरकारों ने शिक्षा और स्वास्थ्य से अपना हाथ खींचना जारी रखा है, और उच्च शिक्षा में तो सरकारी हिस्सेदारी खत्म सी हो चली है। चौथा रास्ता टर्की की तरह का कोई क्रांतिकारी रास्ता हो सकता है, जहां पर कि दशकों पहले एक दूरदर्शी प्रधानमंत्री ने अपने देश की भाषा वही रखते हुए उसकी लिपि अंग्रेजी रोमन लिपि कर दी थी, ताकि किसी दिन यह देश योरप का हिस्सा बनने का दावा कर सके। इस मिसाल को देने का मतलब हिन्दी की लिपि बदलने का सुझाव बिल्कुल ही नहीं है, लेकिन किसी तरह की कोई क्रांतिकारी सोच शायद हिन्दी को एक बेहतर कामकाजी भाषा बना सके। 
हिन्दी का हो-हल्ला अगर हिन्दुत्व के हो-हल्ले की तरह ही चलता रहेगा, तो इस भाषा का अंतरराष्ट्रीय स्तर पर कभी कोई भविष्य नहीं होगा, और इसमें अपना भविष्य ढूंढने वाले लोग, अपने बच्चों के लिए बहुत आश्वस्त न रहें। भाषा का आविष्कार लोगों के बीच संवाद के लिए एक औजार की तरह हुआ था। इस औजार को कुछ लोगों ने आत्ममुग्ध होने के लिए आईने की तरह बना लिया, और कुछ लोगों ने इसे दूसरी भाषाओं के खिलाफ एक हथियार की तरह बना लिया। यह नौबत किसी भी भाषा के लिए ठीक नहीं है। 

चैनल पर आदमी और औरत की मारपीट के बाद अब और क्या?

14 सितंबर 2015
संपादकीय

एक टीवी चैनल पर राधे मां को लेकर चल रही बहस के दौरान राधे मां वाले हिन्दू धर्म से ही जुड़े हुए दो भगवाधारी लोगों के बीच जीवंत प्रसारण पर मारपीट आने लगी, तो टीवी देखते लोग हक्का-बक्का रह गए। ये दोनों ही धर्मगुरू के रूप में इस बहस में स्टूडियो में पेश किए गए थे, और इस आदमी और इस औरत का पहले शायद किसी ने नाम भी न सुना हो, लेकिन हिन्दुस्तान में जटा और भभूत रहने पर कोई भी साधू कहला सकते हैं, भगवा साड़ी में हर महिला साध्वी कहला सकती है, और संत तो किसी भी कपड़े में कोई भी कहला सकते हैं। ऐसे में टीवी चैनल के स्टूडियो में आपस में मारपीट करते आदमी और औरत को धर्मगुरू का दर्जा पाने के लिए कोई खास मेहनत नहीं करनी पड़ती, कपड़ों के रंग से धर्म के ओहदे तय हो जाते हैं। 
हिन्दुस्तानी मीडिया में एक दिक्कत खड़ी हो रही है कि टीवी चैनलों के पास वक्त हर दिन पूरे चौबीस घंटे का खड़ा हो जाता है, और यह भूखा वक्त हर पल खाने को मांगता है। इसी तरह अखबारों में पन्ने बढ़ते चले गए हैं, और उनको भरने के लिए हर गैरखबर को भी खबर मानने की मजबूरी वहां काम करने वाले लोगों की हो गई है। ऐसे में समाचार और विचार में जितने बड़े पैमाने पर मिलावट हो रही है, वह देखने के लायक है। टीवी चैनलों में चूंकि अखबारों के संपादकीय की तरह विचारों के कॉलम अलग से नहीं होते, इसलिए वहां के रिपोर्टर ही, या स्टूडियो में बैठे प्रस्तुतकर्ता भी, समाचारों के तथ्यों के साथ-साथ अपने विचारों की मनमानी मिलावट करके उसे खबर की शक्ल में पेश करते हैं। फिर अखबारों में पाठक को बांधने के लिए एक पन्ने पर कई खबरें हो सकती हैं, और पाठक पन्नों को पलट-पलटकर देख भी सकते हैं, और मनचाही खबरों पर रूक सकते हैं, अनचाही खबरों को छोड़ सकते हैं, लेकिन टीवी की अपनी सीमाएं हैं, और वहां पर खबरें रेल के डिब्बों की तरह एक के पीछे एक लगी रहती हैं, और दर्शक के सामने एक खबर को छोड़कर उसके बाद की खबर तक जाने की सहूलियत नहीं होती, इसलिए दर्शक सीधे चैनल बदलने का काम करते हैं। ऐसे नुकसान से बचने के लिए टीवी चैनलो के सामने यह मजबूरी रहती है कि दर्शक को पल-पल बांधकर रखा जाए। एक बहुत ताकतवर जंगली जानवर को जंजीर से बांधकर रखना कुछ आसान काम हो सकता है, लेकिन टीवी समाचार चैनल के दर्शक को एक ही चैनल से बांधकर रखना उसके मुकाबले खासा अधिक मुश्किल काम है। 
ऐसे में स्टूडियो में मारपीट चैनल का एक नफा है, क्योंकि यह मारपीट दर्शक को बांधकर रख सकती है, और अगले दिन खबर तो बनती ही है। अब देखना यह है कि पीछे रह गए बाकी समाचार चैनल किन और लोगों के बीच मारपीट करवा सकते हैं, या किन और लोगों के बीच मारपीट से अधिक कुछ करवा सकते हैं। यह बाजारू मुकाबला अखबारों में हो, या कि टीवी चैनलों में, है बहुत भयानक। और पन्नों को और घंटों को भरने के चक्कर में समाचार और विचार के फासले को खत्म कर दिया गया है, और महत्वहीन तथ्यों को समाचार की तरह पेश करने की मजबूरी अखबारों के सामने भी आ गई है। ऐसे मीडिया के ग्राहकों को कई बार मीडिया के बाजारू मुकाबले के चलते यह भी पता नहीं चलता कि लुभावनी और चटपटी, सनसनीखेज और भांडाफोड़ खबरों से परे कौन सी ऐसी घटनाएं देश-प्रदेश और दुनिया में हो रही हैं जो कि जिंदगी के लिए सचमुच मायने रखती हैं। जब तक कुछ बिकाऊ नहीं है, दर्शनीय और पठनीय नहीं है, तब तक ऐसी खबरों का मीडिया के लिए महत्व अब खो चुका है। 
अब विज्ञापन देने वाला बाजार भी ऐसी ही खबरों को चाहता है जो कि चाहे महत्वहीन हों, लेकिन लोगों को बांधकर रख सकें। ऐसे रस्सी से बांधे गए जानवरों को बाजार अपनी मर्जी का चारा परोस और खिला सकता है, और वही बाजार का सपना होता है। आने वाले दिनों में टीवी चैनलों पर एक भगवा आदमी, और एक भगवा औरत के बीच मारपीट से आगे और होता है क्या, इसका इंतजार करें। 

मध्यप्रदेश के विस्फोट हादसे से सबक लेने की जरूरत

संपादकीय
13 सितंबर 2015

मध्यप्रदेश के झाबुआ में कल हुए विस्फोट में मरने वाले शायद सौ तक पहुंचने को होंगे, और विस्फोट ने पूरे प्रदेश को हिला दिया है। वहां न कोई कारखाना था, और न कोई वजह थी कि इतनी मौतें होतीं, लेकिन फिर भी एक धमाका हुआ, और आसपास के लोगों के टुकड़े-टुकड़े हो गए। अब सरकार इस बात पर जांच-पड़ताल कर रही है कि विस्फोटक वाली दुकान में इतना विस्फोटक रखने का लाइसेंस था या नहीं? एक अलग चर्चा यह भी है कि यह दुकान भाजपा के किसी नेता की थी, जो कि अब फरार है। यह बात सच हो या न हो, इतना तो सच है ही कि सरकारी अमले ने अपना काम जिम्मेदारी से किया होता, और विस्फोटक जैसे स्टॉक की जांच-पड़ताल समय रहते हुए रहती, तो इतने बेकसूर नहीं मारे गए होते। लेकिन इस विस्फोट से परे, और मध्यप्रदेश से बाहर भी छत्तीसगढ़ जैसे अधिकतर राज्यों में गली-मोहल्ले तक, और बाजार से लेकर स्कूल-अस्पताल के अगल-बगल तक कहीं विस्फोटक के अवैध गोदाम रहते हैं, तो कहीं जलने वाले रबर और रसायनों के गोदाम। ऐसे खतरों को स्थानीय प्रशासन अनदेखा करते चलता है, तब तक, जब तक कि कोई हादसा न हो जाए। और जब ऐसी कोई बड़ी आग लगती है, तो आग बुझाने की क्षमता भी अब स्थानीय संस्थाओं के दमकल विभाग में नहीं रह गई है, और छत्तीसगढ़ की राजधानी में तो यह सुनाई पड़ता है कि कभी दमकल ड्राइवर नहीं है, तो कभी दमकल में डीजल नहीं है। 
किसी भी हादसे से बाकी तमाम लोगों को सबक लेना चाहिए। छत्तीसगढ़ और बाकी प्रदेशों के हर शहर को यह देखना चाहिए कि उनके इलाकों में विस्फोटकों के गोदामों और उनकी दुकानों का क्या हाल है? गैस सिलेंडरों के गोदाम और उनके कारखानों का क्या हाल है? जलने वाले सामानों के गोदाम कहां-कहां पर हैं, और वहां आग बुझाने का क्या इंतजाम है? ऐसा भी नहीं है कि स्थानीय पार्षद को, या स्थानीय थाने को इसकी खबर नहीं होती। और ऐसा भी नहीं है कि ऐसे सामानों की बिक्री करने वाले दुकानदारों के नाम सरकार के दूसरे विभागों के पास नहीं हैं। रबर के सामान, पेट्रोलियम सामान, गैस सिलेंडर जैसे सामानों के कारोबारियों से उनके गोदामों को लेकर हलफनामा लिया जाना चाहिए कि उन्होंने कहां-कहां इसका स्टॉक रखा है। ऐसा अगर जिम्मेदारी के साथ किया जाएगा, तो आग लगने पर या कोई विस्फोट होने पर ऐसी जगहें सरकार की नजर में रहेंगी, और नियम-कानून के तहत अगर उनको घनी बस्तियों से दूर रखना जरूरी होगा, तो सरकार किसी हादसे के पहले ही इनको हटा सकेगी। 
भारत में अधिकतर हादसे लोगों की लापरवाही से नहीं होते, बल्कि नियम तोड़कर गलत काम करने से होते हैं। और ऐसे तकरीबन हर हादसे के पीछे सरकार के किसी जिम्मेदार विभाग की लापरवाही और अनदेखी होती है। छत्तीसगढ़ सरकार को चाहिए कि मध्यप्रदेश में मौतों की इस बड़ी गिनती को देखते हुए तुरंत इससे सबक ले, और किसी भी तरह के हादसे को टालने के लिए जो-जो सावधानी मुमकिन हो सकती है, उसका इंतजाम करे। 

मरीजों से लेकर मुर्दों तक को बर्दाश्त बढ़ा लेनी चाहिए

संपादकीय
12 सितंबर 2015

चंडीगढ़ में प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के पहुंचने के पहले ही अफसरों ने पूरे शहर के स्कूल बंद करने का फतवा जारी कर दिया था। इसके अलावा प्रधानमंत्री के कार्यक्रम के दौरान आसपास के पूरे इलाके को इस तरह बंद किया गया था कि एक श्मशान को भी बंद कर दिया गया, और मुर्दे जलने का इंतजार करते खड़े रहे। मोदी ने ट्विटर पर लोगों को हुई दिक्कतों के लिए माफी मांगी, और जांच और कार्रवाई का भरोसा दिलाया है। चंडीगढ़ चूंकि केन्द्र सरकार के सीधे प्रशासन वाला शहर है, इसलिए यह किसी राज्य सरकार की जिम्मेदारी नहीं थी, और मोदी की सरकार खुद ही इसके लिए जिम्मेदार है। 
लेकिन चंडीगढ़ के मुर्दों के इंतजार से परे आज देश भर में लोगों के बीच एक बार फिर इस बात को लेकर नाराजगी हो रही है कि सत्ता पर बैठे लोग जिस तरह से अपने आपको वीआईपी, और वीवीआईपी दर्जा देकर जनता से ऊपर ईश्वर की तरह रहते हैं, क्या वह लोकतंत्र है? यह बात सिर्फ मोदी के साथ हो ऐसा भी नहीं है, यह बात सिर्फ केन्द्र और राज्य के मंत्रियों-मुख्यमंत्रियों की हो, ऐसा भी नहीं है। सत्ता जिनके हाथ आती है, वे उसकी ताकत का एक बहुत ही अश्लील और हिंसक प्रदर्शन किए बिना अपने अहंकार की भूख नहीं मिटा पाते। नेताओं से परे अफसर, अफसरों से परे बड़ी अदालतों के जज, सभी तबकों में यह हाल दिखता है। सांसदों और विधायकों की गाडिय़ों में नंबर प्लेट की जगह सांसद या विधायक लिखा दिखता है, और धीरे-धीरे यही हाल महापौर और पार्षदों तक का होने लगता है। मीडिया भी इससे अछूता नहीं है, और नंबर प्लेट की जगह प्रेस लिखाकर घूमना भी एक आम बात है। 
भारतीय लोकतंत्र में लोग अपने अधिकारों और दूसरों की जिम्मेदारियों के लिए तो बुरी तरह चौकन्ना हैं, लेकिन अपनी जिम्मेदारियों और दूसरों के अधिकारों की समझ उनको छू भी नहीं गई है। नतीजा यह है कि आज के ताकतवर तबके सौ बरस पहले के सामंती तबकों की तरह रहते हैं, और कहीं किसी वीआईपी काफिले से हुए ट्रैफिक जाम में एम्बुलेंस में पड़े लोग दम तोड़ देते हैं, कहीं लोगों की गाडिय़ां छूट जाती हैं, और कहीं बूढ़े या बीमार चक्कर खाकर गिर पड़ते हैं। सत्ता का नशा बहुत हिंसक हो चला है। लोग लालबत्तियों के लिए जिद करते हैं, जिनको अदालती आदेश के चलते लालबत्ती नहीं मिल सकती, वे भी अपनी गाडिय़ों पर असली या नकली बत्तियां लगाकर घूमते हैं, कानून तोड़ते हुए सायरन बजाते हैं, लोगों को सड़कों से धकेलते हुए चलते हैं। यह पूरा सिलसिला किसी अदालती रोक के बिना खत्म होते दिख नहीं रहा है। लेकिन दिक्कत यह है कि सुप्रीम कोर्ट और हाईकोर्ट के जज भी पुलिस के काफिलों में चलते हैं, और उनके लिए भी दो शहरों के बीच की सड़कों पर भी दर्जनों या सैकड़ों पुलिसवालों को तैनात किया जाता है कि कोई जानवर भी ऐसे काफिलों के सामने दौड़ न पड़े। अब इस देश की अदालतों में वैसे तो मामले पूरी-पूरी पीढ़ी की उम्र जितने बरस पड़े रहते हैं, लेकिन जज पुलिस सायरन के साथ इस तरह सड़कों पर चलते हैं कि उन्हें जल्दी पहुंचकर तुरंत ही सारे फैसले सुनाने हैं। 
लोकतंत्र में चूंकि सभी सरकारी, संसदीय और अदालती, सभी तबके मुर्दों को इंतजार करवाने का, मरीजों को सड़क पर मारने का हक रखते हैं, इसलिए इस नौबत में सुधार का कोई आसार दिखता नहीं है। ऐसे में मरीजों से लेकर मुर्दों तक को अपनी बर्दाश्त बढ़ा लेनी चाहिए। 

ऐसी सऊदी दरियादिली पर ईश्वर का कुछ कहना है?

11 सितंबर 2015
संपादकीय

जो सऊदी अरब सीरिया और अफगानिस्तान, इराक और दूसरी जगहों पर मुस्लिम शरणार्थियों के लिए अपने दरवाजे बंद करके बैठने के लिए कुख्यात है, और मध्य-पूर्व में जो अमरीकी गुंडागर्दी के हवाई हमलों का सबसे बड़ा मददगार है, वह सऊदी अरब अब जर्मनी में पहुंच रहे सीरियाई और बाकी शरणार्थियों के लिए मस्जिद बनवाना चाहता है। यह खबर अभी आई ही है, और हो सकता है कि पूरी तरह सच न भी हो, लेकिन हाल तो यही है। भारत में भी मस्जिदों के लिए, और मदरसों के लिए सऊदी अरब सहित दूसरे मुस्लिम देशों से बहुत सा पैसा आता है, लेकिन इस देश में गरीब मुस्लिमों की स्कूली पढ़ाई के लिए, या गरीब मुसलमानों के इलाज के लिए सऊदी अरब से कोई दान आता हो, ऐसा सुनाई नहीं पड़ता। धर्म के नाम पर लोगों की जेब खुल जाती हैं, और धर्म का मकसद पूरा होते ही हाथ जेब से बाहर निकल आता है। 
आज दुनिया में जहां कहीं धर्म का बोलबाला है, वहां पर चारों तरफ लहू फैल रहा है। धर्म से लगाव, और दूसरे धर्मों से नफरत के चलते बहुत से देशों में गृहयुद्ध चल रहे हैं। इसके अलावा एक धर्म के भीतर ही अलग-अलग समुदाय के लोग कट-मर रहे हैं। आज मध्य-पूर्व के देशों में होने वाली लाखों मौतें मुस्लिमों की ही हैं, और उनको मारने वाले लोग भी मुस्लिम हैं, और वहां पर आकर बम बरसाने वाले अमरीकी फौजी विमानों के अरब-मददगार भी मुस्लिम ही हैं। धर्म किसी को हिंसा से नहीं रोकता, फिर चाहे उनकी किताबें चाहे जैसी नसीहतें देने वाली हों। धर्म के प्रचलित रूप एकदम ही हिंसक है। और जो सरकारें अपने आपको किसी धर्म से जुड़ी हुई कहती हैं, या कि जो सरकारें किसी एक धर्म को बढ़ावा देती हैं, वे जनकल्याण को छोड़कर हिंसा को बढ़ावा भी देती हैं। 
हम भारत के बगल में बसे हुए म्यांमार को देखें, तो वहां पर सत्ता पर काबिज बौद्ध लोगों के चलते हुए वहां के मुस्लिमों को जिस तरह मार-मारकर भगाया गया है, और जिस तरह वे लोग बोट पर सवार होकर जीते-मरते हुए दूसरे देशों तक गए हैं, वह तस्वीर अभी सीरिया के समुद्र तट पर मरने वाले बच्चे की तस्वीर से कम भयानक नहीं है। लेकिन इस मौके पर यह भी याद करने की जरूरत है कि म्यांमार से भारत की सरहद लगी हुई है, लेकिन भारत ने वहां के इन शरणार्थियों को अपने देश में जगह नहीं दी। जबकि पड़ोस एक भी ऐसा दूसरा देश नहीं है जहां के लोग मुसीबत के वक्त भारत में जगह न पाते रहे हों। बांग्लादेश, तिब्बत, श्रीलंका, पाकिस्तान, नेपाल, भूटान, इन सभी को मुसीबत के समय भारत ने जगह दी है, लेकिन म्यांमार के शरणार्थियों के लिए भारत ने मुंह नहीं खोला। खैर, वह एक अलग फौजी और राष्ट्रीय हित से जुड़ी हुई कूटनीति या विदेश नीति है, उस पर चर्चा और कभी करना ठीक होगा, आज इस पर बात होनी चाहिए कि जब इंसानी जानों को बचाने की बात होती है, तो सऊदी अरब जैसे धर्म-आधारित देश मस्जिदों पर खर्च करने के लिए तैयार रहते हैं। 
लेकिन यह बात सिर्फ सऊदी या सिर्फ इस्लाम की नहीं है। आज ही के अखबार में हम तेलंगाना में किसानों की आत्महत्या की खबरें और तस्वीरें छाप रहे हैं। वहां चौबीस घंटों में सात और किसान आत्महत्या कर चुके हैं। लेकिन इसी आन्ध्र-तेलंगाना का सबसे बड़ा तीर्थस्थान तिरूपति रोज अपने पर सोने की बरसात देखता है, सुबह से शाम होती है, और करोड़ों का दान पहुंच जाता है। करोड़ों के मुकुट चढ़ाए जाते हैं, लोग अपने कारोबार में तिरूपति के भगवान को भागीदार बनाकर भी रखते हैं। लेकिन कोई यह पूछे कि इसी प्रदेश में किसानों की आत्महत्या पर उनको फंदे से उतारकर जीने के लायक मदद करने का हौसला किसमें है, तो सारे आस्थावान लोग घर भाग जाएंगे। 
धर्म लोगों को कई तरह से क्रूर बना देता है। ऐसा इसलिए भी होता है क्योंकि धर्म में हर बुरे काम को करने के बाद उसके प्रायश्चित की पूरी गुंजाइश बनाई गई है। हर धर्म में लोग अपने पाप के बाद उसे पुण्य में बदलने के लिए ईश्वर से लेकर ईश्वर के  एजेंटों तक पर खर्च करके फिर से साफ-सुथरे हो सकते हैं। जिन लोगों ने मुस्लिम शरणार्थियों को मरने के लिए समंदर में सफर करते देखा है, वे आज उनके लिए मस्जिदें बनाना चाहते हैं। ऐसी दरियादिली पर ईश्वर का कुछ कहना है?

भारत की खेल संभावनाएं और खेल दिक्कतों पर सोचें

संपादकीय
10 सितंबर 2015
अंतरराष्ट्रीय मुकाबलों में पिछले कुछ बरसों में भारत के खिलाडिय़ों को खासी कामयाबी मिली है। ओलंपिक या राष्ट्रमंडल खेलों में तो दुनिया के बड़े खिलाड़ी देशों के सामने भारत कहीं टिकता नहीं है, लेकिन निजी मुकाबलों में बहुत से ऐसे अंतरराष्ट्रीय मैदान हैं जिन पर सानिया मिर्जा से लेकर सायना नेहवाल तक, और लिएंडर पेस से लेकर बिलियडर््स के पंकज अडवानी तक बहुत से ऐसे नाम हैं जो बड़ी-बड़ी कामयाबी लेकर देश लौटते हैं। अभी-अभी भारत की महिला हॉकी टीम ने दशकों बाद ओलंपिक में दाखिले में कामयाबी हासिल की है। लेकिन इनमें से एक-एक खेल, या एक-एक नाम पर बातचीत की यहां पर जरूरत नहीं है, हम खेलों की कुछ बुनियादी जरूरतों पर बात करना चाहते हैं।
सवा सौ करोड़ से अधिक आबादी वाला यह देश बहुत से होनहार खिलाडिय़ों वाला है, लेकिन आए दिन ऐसी खबरें आती हैं कि कौन से अंतरराष्ट्रीय या राष्ट्रीय खिलाड़ी सड़क किनारे सामान बेचते हैं, या चाय ठेला चलाते हैं। जिस देश में सत्ता से परे लोगों का सम्मान कम होता हो, वहां पर होनहार लोगों का हौसला बढऩा आसान नहीं रहता। फिर आए दिन ये खबरें भी आती हैं कि किस तरह खिलाडिय़ों को जमीन पर सोना पड़ा, भूखे पेट रहना पड़ा, उन्हें जूते नहीं मिले, प्रशिक्षण के लिए सामान नहीं मिला। ऐसी अनगिनत कहानियां खबरों में आती हैं, और हमारा पक्का अंदाज है कि इससे हजार गुना अधिक कहानियां मीडिया की नजरों में नहीं भी आ पाती होंगी। खिलाडिय़ों के साथ अच्छा बर्ताव सरकार के उन लोगों के जिम्मे छोड़ दिया गया है जो कि सरकारी खरीदी में भ्रष्टाचार के आदी रहते हैं, और उनकी वही ढर्रा खेलों के इंतजाम में भी रहता है। दूसरी बात यह कि छत्तीसगढ़ सहित अधिकांश प्रदेश बड़े-बड़े स्टेडियम बनाने में दिलचस्पी लेते हैं, और खेलों के मैदान घटते चल रहे हैं। स्कूलों के मैदान खत्म हो रहे हैं, कहीं पर सड़कें चौड़ी करने के लिए मैदान काटे जा रहे हैं, तो कहीं पर दुकानें निकालने के लिए। इसके अलावा जो मैदान बचे भी हैं, वहां पर रात-दिन तरह-तरह की बाजारू-प्रदर्शनी लगी रहती है, सामाजिक और राजनीतिक कार्यक्रम होते रहते हैं, धार्मिक समारोह चलते हैं, और खिलाडिय़ों की प्रैक्टिस के लिए मैदान नहीं रहते। 
नतीजा यह होता है कि राज्य इस बात पर गौरव हासिल करता है कि कौन से राष्ट्रीय या अंतरराष्ट्रीय मैच की मेजबानी उसे मिल रही है, लेकिन उसके अपने खिलाडिय़ों को रोज के अभ्यास के लिए क्या मिल रहा है, और क्या नहीं, यह मुद्दा ही नहीं रह गया है। मतलब यह कि जो पांच सितारा मैच हो सकते हैं, उनमें वाहवाही में सबकी दिलचस्पी है, लेकिन ऐसी पांच सितारा टीमों तक पहुंचने के लिए राज्य के खिलाडिय़ों को ठीक-ठाक मैदान मिलें, सहूलियतें मिलें, यह प्राथमिकता किसी की नहीं है। स्कूलों में खेल के सामान, खेल के लिए घंटे गायब हैं। जितनी बड़ी धांधली स्कूली खरीदी में सामने आती है, वह फर्नीचर से लेकर पोशाक तक, और खेल के सामान से लेकर लाइब्रेरी की किताबों तक बिखरी हुई है। ऐसे में घटिया सामान स्कूलों तक पहुंच जाते हैं, अगर सामान बिना पहुंचे महज बिल नहीं पहुंचे उस हाल में। और छोटे-छोटे खेल आयोजन बड़े-बड़े संगठित भ्रष्टाचार का शिकार रहते हैं, उनके नाम पर जो खर्च निकलता है, वह खिलाडिय़ों पर खर्च नहीं होता, और कुछ गिनी-चुनी जेबों में चले जाता है। 
फिर एक बड़ी दिक्कत पूरे देश में यह है कि खेल संघों पर नेताओं और अफसरों का कब्जा कुछ उसी तरह का है जिस तरह का कब्जा सड़कों के किनारे ईश्वर का है। सार्वजनिक जगहों से ईश्वर कभी नहीं हटते, और खेल संघों से ताकतवर, सत्तारूढ़ तबके कभी नहीं हटते। उनकी मनमर्जी, उनकी पसंद-नापसंद के चलते बहुत से अच्छे खिलाड़ी घर बैठने को मजबूर हो जाते हैं, और कुछ छांटे हुए लोगों को बढ़ावा मिलता है। भारत की खेल संभावनाओं और भारत की खेल दिक्कतों के बीच एक बड़े तालमेल की जरूरत है, और हम यहां पर इनमें से कुछ मुद्दों को छू भर रहे हैं।