राखी के मौके का इस्तेमाल सामाजिक सुधार के लिए

संपादकीय
28 अगस्त 2015

रक्षाबंधन भारत का एक ऐसा सांस्कृतिक और सामाजिक त्यौहार है, जिसकी जड़ें किसी धर्म या किसी पुराण तक नहीं पहुंचतीं। यह पूरी तरह से सामाजिक प्रथाओं पर चले आ रहा है, जिसमें लड़कियां अपने भाईयों, या भाई सरीखे गैर-रिश्तेदारों को साल में एक बार राखी बांधती हैं, और फिर उम्मीद करती हैं कि भाई मुसीबत के वक्त उनकी रक्षा करेंगे। बहुत से मामलों में ऐसा होता है, और बहुत से मामलों में भाई अदालतों में अपनी बहन के खिलाफ जमीन-जायदाद के मुकदमे लड़ते भी दिखते हैं, मां-बाप की छोड़ी हुई जमीन से बहन को बेदखल करने के लिए। लेकिन सदियों से भारत में यह चले आ रहा है, और परिवार में भाई-बहन दोनों हैं, तो भी इस दिन का खास महत्व है, और दोनों में से कोई एक नहीं है, तो भी अड़ोस-पड़ोस और आसपास में ऐसे रिश्ते बनते हैं, और अनगिनत मामलों में ऐसे रिश्ते सगे रिश्तों जैसे निभ भी जाते हैं। 
अब यह देखें कि क्या राखी एक पुरूषप्रधान त्यौहार है जो कि आज के महिलाओं के समान अधिकार की ताजा राजनीतिक सोच के साथ मेल नहीं खाता है? सैद्धांतिक रूप से यह बात ठीक लगती है कि सिर्फ पुरूष ही महिला की सुरक्षा क्यों कर सकता है, और कोई महिला पुरूष की सुरक्षा क्यों नहीं कर सकती? लेकिन भारतीय समाज में जिस अनुपात में लड़कियों को छेडख़ानी से लेकर बलात्कार तक झेलना पड़ता है, उससे जाहिर है कि उन्हीं को सुरक्षा की अधिक जरूरत है, और एक तरफ तो जिस पुरूष वर्ग से सुरक्षा की उम्मीद की जाती है, उसी पुरूष वर्ग के दूसरे लोग दूसरों की बहनों के साथ ज्यादती के पीछे रहते हैं। ऐसे में राखी के मौके पर लड़कियों को और महिलाओं को अपने भाईयों से यह मांगना चाहिए कि वे जितनी इज्जत अपनी सगी बहन, या अपनी राखी-बहन की करते हैं, उतनी ही इज्जत वे दूसरों की बहनों, दूसरी लड़कियों, दूसरी महिलाओं की भी करें। हमको इस बात का पुख्ता अंदाज है कि जिस लड़की या महिला के भाई छेडख़ानी या बलात्कार जैसे मामले में गिरफ्तार होते हैं, और दुनिया भर में जिनका नाम ऐसे अपराधों में छपता है, वे लड़कियां भी शर्म में डूब जाती होंगी, और उनको भी अपने भाई पर धिक्कार होता होगा। इसलिए आज भारतीय समाज की हालत को देखते हुए महिलाओं को अपने भाईयों से राखी के मौके पर बड़ा साफ-साफ तोहफा मांगना चाहिए, कि वे सभी लड़कियों और महिलाओं की इज्जत करेंगे। लड़के-लड़कियों के अधिकारों की बराबरी की वकालत करते हुए भी आज भारत की सामाजिक हकीकत यह है कि एक लड़की को सुरक्षा की अधिक जरूरत है, और लड़के अधिक खतरनाक हैं। इसलिए राखी का यह सिलसिला समानता के खिलाफ तो है, लेकिन फिर भी हकीकत देखते हुए जरूरी है।
दूसरा मुद्दा हमको लगता है कि अपने भाईयों से इस मौके पर लड़कियों को उनके ऐब मांग लेने चाहिए। कोई शराब पीते होंगे, कोई सिगरेट पीते होंगे, और कोई तम्बाकू खाते होंगे। ऐसे मौके पर अगर ऐसे हर किसी की बहन कोशिश करे, तो ही भाईयों की उम्र लंबी हो सकती है, और राखी का सिलसिला अधिक लंबा चल सकता है। ऐसे मौकों पर हर किसी को कोशिश करनी चाहिए कि भावनाओं का इस्तेमाल करते हुए लोगों को बेहतर बनाया जाए, बुरी आदतें छुड़वाई जाएं। धार्मिक परंपराओं में भी इस किस्म के सामाजिक सुधार की गुंजाइश रहती है, और जो त्यौहार बिल्कुल निजी संबंधों के लिए होते हैं, उनमें निजी सुधार की संभावना और अधिक होती है। इस मौके पर हम ऐसी ही सामाजिक बेहतरी के लिए कोशिश सुझा रहे हैं। 

कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें