भारत की खेल संभावनाएं और खेल दिक्कतों पर सोचें

संपादकीय
10 सितंबर 2015
अंतरराष्ट्रीय मुकाबलों में पिछले कुछ बरसों में भारत के खिलाडिय़ों को खासी कामयाबी मिली है। ओलंपिक या राष्ट्रमंडल खेलों में तो दुनिया के बड़े खिलाड़ी देशों के सामने भारत कहीं टिकता नहीं है, लेकिन निजी मुकाबलों में बहुत से ऐसे अंतरराष्ट्रीय मैदान हैं जिन पर सानिया मिर्जा से लेकर सायना नेहवाल तक, और लिएंडर पेस से लेकर बिलियडर््स के पंकज अडवानी तक बहुत से ऐसे नाम हैं जो बड़ी-बड़ी कामयाबी लेकर देश लौटते हैं। अभी-अभी भारत की महिला हॉकी टीम ने दशकों बाद ओलंपिक में दाखिले में कामयाबी हासिल की है। लेकिन इनमें से एक-एक खेल, या एक-एक नाम पर बातचीत की यहां पर जरूरत नहीं है, हम खेलों की कुछ बुनियादी जरूरतों पर बात करना चाहते हैं।
सवा सौ करोड़ से अधिक आबादी वाला यह देश बहुत से होनहार खिलाडिय़ों वाला है, लेकिन आए दिन ऐसी खबरें आती हैं कि कौन से अंतरराष्ट्रीय या राष्ट्रीय खिलाड़ी सड़क किनारे सामान बेचते हैं, या चाय ठेला चलाते हैं। जिस देश में सत्ता से परे लोगों का सम्मान कम होता हो, वहां पर होनहार लोगों का हौसला बढऩा आसान नहीं रहता। फिर आए दिन ये खबरें भी आती हैं कि किस तरह खिलाडिय़ों को जमीन पर सोना पड़ा, भूखे पेट रहना पड़ा, उन्हें जूते नहीं मिले, प्रशिक्षण के लिए सामान नहीं मिला। ऐसी अनगिनत कहानियां खबरों में आती हैं, और हमारा पक्का अंदाज है कि इससे हजार गुना अधिक कहानियां मीडिया की नजरों में नहीं भी आ पाती होंगी। खिलाडिय़ों के साथ अच्छा बर्ताव सरकार के उन लोगों के जिम्मे छोड़ दिया गया है जो कि सरकारी खरीदी में भ्रष्टाचार के आदी रहते हैं, और उनकी वही ढर्रा खेलों के इंतजाम में भी रहता है। दूसरी बात यह कि छत्तीसगढ़ सहित अधिकांश प्रदेश बड़े-बड़े स्टेडियम बनाने में दिलचस्पी लेते हैं, और खेलों के मैदान घटते चल रहे हैं। स्कूलों के मैदान खत्म हो रहे हैं, कहीं पर सड़कें चौड़ी करने के लिए मैदान काटे जा रहे हैं, तो कहीं पर दुकानें निकालने के लिए। इसके अलावा जो मैदान बचे भी हैं, वहां पर रात-दिन तरह-तरह की बाजारू-प्रदर्शनी लगी रहती है, सामाजिक और राजनीतिक कार्यक्रम होते रहते हैं, धार्मिक समारोह चलते हैं, और खिलाडिय़ों की प्रैक्टिस के लिए मैदान नहीं रहते। 
नतीजा यह होता है कि राज्य इस बात पर गौरव हासिल करता है कि कौन से राष्ट्रीय या अंतरराष्ट्रीय मैच की मेजबानी उसे मिल रही है, लेकिन उसके अपने खिलाडिय़ों को रोज के अभ्यास के लिए क्या मिल रहा है, और क्या नहीं, यह मुद्दा ही नहीं रह गया है। मतलब यह कि जो पांच सितारा मैच हो सकते हैं, उनमें वाहवाही में सबकी दिलचस्पी है, लेकिन ऐसी पांच सितारा टीमों तक पहुंचने के लिए राज्य के खिलाडिय़ों को ठीक-ठाक मैदान मिलें, सहूलियतें मिलें, यह प्राथमिकता किसी की नहीं है। स्कूलों में खेल के सामान, खेल के लिए घंटे गायब हैं। जितनी बड़ी धांधली स्कूली खरीदी में सामने आती है, वह फर्नीचर से लेकर पोशाक तक, और खेल के सामान से लेकर लाइब्रेरी की किताबों तक बिखरी हुई है। ऐसे में घटिया सामान स्कूलों तक पहुंच जाते हैं, अगर सामान बिना पहुंचे महज बिल नहीं पहुंचे उस हाल में। और छोटे-छोटे खेल आयोजन बड़े-बड़े संगठित भ्रष्टाचार का शिकार रहते हैं, उनके नाम पर जो खर्च निकलता है, वह खिलाडिय़ों पर खर्च नहीं होता, और कुछ गिनी-चुनी जेबों में चले जाता है। 
फिर एक बड़ी दिक्कत पूरे देश में यह है कि खेल संघों पर नेताओं और अफसरों का कब्जा कुछ उसी तरह का है जिस तरह का कब्जा सड़कों के किनारे ईश्वर का है। सार्वजनिक जगहों से ईश्वर कभी नहीं हटते, और खेल संघों से ताकतवर, सत्तारूढ़ तबके कभी नहीं हटते। उनकी मनमर्जी, उनकी पसंद-नापसंद के चलते बहुत से अच्छे खिलाड़ी घर बैठने को मजबूर हो जाते हैं, और कुछ छांटे हुए लोगों को बढ़ावा मिलता है। भारत की खेल संभावनाओं और भारत की खेल दिक्कतों के बीच एक बड़े तालमेल की जरूरत है, और हम यहां पर इनमें से कुछ मुद्दों को छू भर रहे हैं। 

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