ऐसी सऊदी दरियादिली पर ईश्वर का कुछ कहना है?

11 सितंबर 2015
संपादकीय

जो सऊदी अरब सीरिया और अफगानिस्तान, इराक और दूसरी जगहों पर मुस्लिम शरणार्थियों के लिए अपने दरवाजे बंद करके बैठने के लिए कुख्यात है, और मध्य-पूर्व में जो अमरीकी गुंडागर्दी के हवाई हमलों का सबसे बड़ा मददगार है, वह सऊदी अरब अब जर्मनी में पहुंच रहे सीरियाई और बाकी शरणार्थियों के लिए मस्जिद बनवाना चाहता है। यह खबर अभी आई ही है, और हो सकता है कि पूरी तरह सच न भी हो, लेकिन हाल तो यही है। भारत में भी मस्जिदों के लिए, और मदरसों के लिए सऊदी अरब सहित दूसरे मुस्लिम देशों से बहुत सा पैसा आता है, लेकिन इस देश में गरीब मुस्लिमों की स्कूली पढ़ाई के लिए, या गरीब मुसलमानों के इलाज के लिए सऊदी अरब से कोई दान आता हो, ऐसा सुनाई नहीं पड़ता। धर्म के नाम पर लोगों की जेब खुल जाती हैं, और धर्म का मकसद पूरा होते ही हाथ जेब से बाहर निकल आता है। 
आज दुनिया में जहां कहीं धर्म का बोलबाला है, वहां पर चारों तरफ लहू फैल रहा है। धर्म से लगाव, और दूसरे धर्मों से नफरत के चलते बहुत से देशों में गृहयुद्ध चल रहे हैं। इसके अलावा एक धर्म के भीतर ही अलग-अलग समुदाय के लोग कट-मर रहे हैं। आज मध्य-पूर्व के देशों में होने वाली लाखों मौतें मुस्लिमों की ही हैं, और उनको मारने वाले लोग भी मुस्लिम हैं, और वहां पर आकर बम बरसाने वाले अमरीकी फौजी विमानों के अरब-मददगार भी मुस्लिम ही हैं। धर्म किसी को हिंसा से नहीं रोकता, फिर चाहे उनकी किताबें चाहे जैसी नसीहतें देने वाली हों। धर्म के प्रचलित रूप एकदम ही हिंसक है। और जो सरकारें अपने आपको किसी धर्म से जुड़ी हुई कहती हैं, या कि जो सरकारें किसी एक धर्म को बढ़ावा देती हैं, वे जनकल्याण को छोड़कर हिंसा को बढ़ावा भी देती हैं। 
हम भारत के बगल में बसे हुए म्यांमार को देखें, तो वहां पर सत्ता पर काबिज बौद्ध लोगों के चलते हुए वहां के मुस्लिमों को जिस तरह मार-मारकर भगाया गया है, और जिस तरह वे लोग बोट पर सवार होकर जीते-मरते हुए दूसरे देशों तक गए हैं, वह तस्वीर अभी सीरिया के समुद्र तट पर मरने वाले बच्चे की तस्वीर से कम भयानक नहीं है। लेकिन इस मौके पर यह भी याद करने की जरूरत है कि म्यांमार से भारत की सरहद लगी हुई है, लेकिन भारत ने वहां के इन शरणार्थियों को अपने देश में जगह नहीं दी। जबकि पड़ोस एक भी ऐसा दूसरा देश नहीं है जहां के लोग मुसीबत के वक्त भारत में जगह न पाते रहे हों। बांग्लादेश, तिब्बत, श्रीलंका, पाकिस्तान, नेपाल, भूटान, इन सभी को मुसीबत के समय भारत ने जगह दी है, लेकिन म्यांमार के शरणार्थियों के लिए भारत ने मुंह नहीं खोला। खैर, वह एक अलग फौजी और राष्ट्रीय हित से जुड़ी हुई कूटनीति या विदेश नीति है, उस पर चर्चा और कभी करना ठीक होगा, आज इस पर बात होनी चाहिए कि जब इंसानी जानों को बचाने की बात होती है, तो सऊदी अरब जैसे धर्म-आधारित देश मस्जिदों पर खर्च करने के लिए तैयार रहते हैं। 
लेकिन यह बात सिर्फ सऊदी या सिर्फ इस्लाम की नहीं है। आज ही के अखबार में हम तेलंगाना में किसानों की आत्महत्या की खबरें और तस्वीरें छाप रहे हैं। वहां चौबीस घंटों में सात और किसान आत्महत्या कर चुके हैं। लेकिन इसी आन्ध्र-तेलंगाना का सबसे बड़ा तीर्थस्थान तिरूपति रोज अपने पर सोने की बरसात देखता है, सुबह से शाम होती है, और करोड़ों का दान पहुंच जाता है। करोड़ों के मुकुट चढ़ाए जाते हैं, लोग अपने कारोबार में तिरूपति के भगवान को भागीदार बनाकर भी रखते हैं। लेकिन कोई यह पूछे कि इसी प्रदेश में किसानों की आत्महत्या पर उनको फंदे से उतारकर जीने के लायक मदद करने का हौसला किसमें है, तो सारे आस्थावान लोग घर भाग जाएंगे। 
धर्म लोगों को कई तरह से क्रूर बना देता है। ऐसा इसलिए भी होता है क्योंकि धर्म में हर बुरे काम को करने के बाद उसके प्रायश्चित की पूरी गुंजाइश बनाई गई है। हर धर्म में लोग अपने पाप के बाद उसे पुण्य में बदलने के लिए ईश्वर से लेकर ईश्वर के  एजेंटों तक पर खर्च करके फिर से साफ-सुथरे हो सकते हैं। जिन लोगों ने मुस्लिम शरणार्थियों को मरने के लिए समंदर में सफर करते देखा है, वे आज उनके लिए मस्जिदें बनाना चाहते हैं। ऐसी दरियादिली पर ईश्वर का कुछ कहना है?

कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें